"नकली दलित" रोहित वेमुला के भूत का पलटवार

Written by मंगलवार, 14 फरवरी 2017 10:12

आंध्रप्रदेश सरकार ने फैसला किया है कि वह रोहित वेमुला के “दलित” होने संबंधी नकली सर्टिफिकेट को रद्द करने जा रही है, तथा अब रोहित वेमुला को “OBC” का सही सर्टिफिकेट दिया जाएगा.

उल्लेखनीय है कि हैदराबाद विवि के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या को लेकर तमाम विपक्षी दलों और तथाकथित दलित चिंतकों ने खूब छाती कूटी थी और हिन्दू नाम से बने कुछ नकली फेसबुक पेजों के जरिये खूब “कोहर्रम” भी मनाया गया था. गहन जाँच के बाद पाया गया है कि रोहित वेमुला ने विवि में प्रवेश और छात्रवृत्ति हासिल करने के लिए खुद को “दलित” बनवाया और जाली सर्टिफिकेट देकर तमाम सुविधाएँ हासिल कीं. आंधप्रदेश सरकार ने रोहित की माँ राधिका वेमुला को एक नोटिस जारी करके पूछा है कि क्यों न इस धोखाधड़ी के लिए उनके खिलाफ मुकदमा चलाया जाए.

इस मामले ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है, कि नकली SC/ST सर्टिफिकेट जारी करवाते हुए भारत में न जाने कितने OBC लोगों ने वास्तविक दलितों का हक मारा है?? भारत में ऐसी कोई निगरानी प्रणाली और जाँच एजेंसी क्यों नहीं है जिसके द्वारा गहराई से जाँच किए जाने के बाद ही “दलित सर्टिफिकेट” मिले. जैसा कि सभी जानते हैं दलितों को बहुत सी शासकीय सुविधाएँ मुफ्त में मिल रही हैं, जिस पर कई OBC जातियों की निगाह बनी हुई है. इस मामले में अपने दलित भाईयों का हक मारा जाता हुआ देखकर भी तथाकथित “दलित चिन्तक” चुप्पी साधे बैठे हैं.

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इस फैसले के बाद अब दिल्ली के प्रमुख “विष”-विद्यालय, JNU में भी नई बहस छिड़ गई है कि वास्तव में JNU में कितने छात्र दलित हैं और कितने “नकली दलित” हैं. ऐसी अफवाहें हैं कि यहाँ पर कई छात्र तो नकली दलित बने घूम ही रहे हैं, लेकिन JNU के कुछ प्रोफ़ेसर भी दलित नहीं हैं, लेकिन जाली सर्टिफिकेट के जरिये दलित कोटे में पद हथियाए बैठे हैं. देखना रोचक होगा कि तथाकथित दलित विचारक और अराजक वामपंथी इस मुद्दे पर क्या बोलते हैं... अब उनका “दलित प्रेम”(??) उजागर हो जाएगा. वास्तविक दलितों की पीठ में छुरा घोंपकर उन्हीं के नाम पर रोटी सेंकने वाले प्रोफ़ेसर और छात्र नेताओं के SC/ST सर्टिफिकेट की गहन जाँच होनी चाहिए. साथ ही इस बात की जाँच भी होनी चाहिए कि जो स्वयं को दलित चिन्तक कहते हैं, कहीं उन्होंने धर्म परिवर्तन तो नहीं कर लिया है? हिन्दू दलितों को आरक्षण मिलना ही चाहिए, लेकिन जिन्होंने धर्म परिवर्तन कर लिया उन्हें आरक्षण देने का कोई औचित्य ही नहीं है. हालाँकि इस बात की उम्मीद फिर भी कम ही है कि इस प्रकरण के बाद दलितों की आँखें खुलेंगी और वे सोचने पर मजबूर होंगे कि आखिर वे किनके हाथों में खेल रहे हैं...

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