रोहिंग्याओं पर महबूबा मेहरबान : जम्मू के हिन्दू परेशान

Written by शुक्रवार, 09 मार्च 2018 08:12

भारत का मुकुट कहा जाने वाला जम्मू-कश्मीर एक बार पुनः अंदर ही अंदर उबलने लगा है, लेकिन इस बार “युद्धक्षेत्र” मुस्लिम बहुल कश्मीर नहीं, बल्कि हिन्दू बहुल जम्मू है.

भाजपा समर्थित महबूबा सरकार (Mehbooba Mufti) ने बड़ी ही सफाई और धूर्तता के साथ कश्मीर के बाद अब जम्मू में भी हिंदुओं को “अल्पसंख्यक” बनाने की योजना का दूसरा चरण आरम्भ कर दिया है. हाल ही में सूचना का अधिकार (RTI) के माध्यम से एक जानकारी सामने आई, जिसके बाद जम्मू क्षेत्र के हिन्दूओं के होश उड़ गए, तथा इस इलाके के सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने खुलेआम यह आरोप लगा दिया है कि महबूबा सरकार, उसके मंत्री और प्रशासन पूरी योजना और तैयारी के साथ अपने इस “इस्लामिक मिशन” में पूरी तरह से जुटा हुआ है.

RTI से प्राप्त जानकारी के अनुसार महबूबा मुफ्ती ने पुलिस एवं जिला प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जब तक सरकार की नीति नहीं बनती और जनजाति विभाग की लिखित अनुमति नहीं मिल जाती है, तब तक जम्मू क्षेत्र से अतिक्रमणकारियों को न हटाया जाए. यानी सीधे शब्दों में कहा जाए तो कश्मीर के पहाड़ी इलाकों से धीरे-धीरे जम्मू में अपना बसेरा बसाने आ रहे मुस्लिम गुज्जर, बकरवाल समुदाय के लोगों को जम्मू से नहीं निकाला जाएगा. महबूबा मुफ्ती के अनुसार जम्मू विकास प्राधिकरण के लोग अतिक्रमण हटाने के नाम पर इन “गरीब” मुस्लिमों की बस्तियाँ उजाड़ रहे हैं. जबकि अब जम्मू की हिन्दू जनता को समझ में आने लगा है कि यह पूरा खेल इस क्षेत्र को भी मुस्लिम बहुल बनाने का है. जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के वकील अंकुर शर्मा ने चौदह फरवरी को महबूबा मुफ्ती और प्रशासनिक अधिकारियों की बैठक के डीटेल्स निकलवाए, तब ये पता चला कि प्रशासन जम्मू में पसरते जा रहे इन मुस्लिम अतिक्रमणकारियों के खिलाफ सुस्त क्यों हो गया है. उल्लेखनीय है कि महबूबा सरकार ने “लिखित में” यह माना है कि जम्मू शहर में लगभग 1500 एकड़ की जमीन पर गुज्जरों और रोहिंग्याओं (Rohingya Muslims in India) का अतिक्रमण है, लेकिन सरकार फिलहाल इन्हें यहाँ से हटाने के मूड में नहीं है. अंकुर शर्मा के अनुसार सरकार की इस नई नीति के कारण इन जनजातीय अतिक्रमणकारियों के खिलाफ भू-राजस्व क़ानून अथवा भारतीय दण्ड संहिता के तहत भी केस दायर नहीं किया जा सकेगा. इस कारण अब ये लोग और भी बेख़ौफ़ होकर जम्मू के हिन्दू बहुल इलाकों में अतिक्रमण करते चले जा रहे हैं, क्योंकि अब इन्हें प्रशासन का भी मूक समर्थन मिल रहा है.

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महबूबा सरकार ने इन जनजातीय मुस्लिम गुज्जरों को शह देने तथा बचाने के लिए एक निर्णय और लिया है कि प्रशासन इनके खिलाफ “एनीमल क्रुएलिटी एक्ट” नहीं लगाए. असल में ये लोग गौ-तस्करी में गहरे लिप्त हैं, और अपने पशुओं के परिवहन के नाम पर बिना किसी परमिट के सैकड़ों गौवंश इधर-उधर कर देते हैं. इस कारण महबूबा मुफ्ती ने इन्हें जम्मू प्रशासन से राहत दिलाने के लिए यह दबाव भी बना दिया है.

जम्मू से निकलने वाले अखबार “डेली एक्सेलसियर” के अनुसार मुख्यमंत्री के इन दोनों निर्णयों के कारण जम्मू क्षेत्र में क़ानून-व्यवस्था की स्थिति तेजी से बिगड़ी जा रही है, और साथ ही रोहिंग्याओं के अतिक्रमण के कारण विकास कार्य भी प्रभावित होने लगे हैं. उदाहरण के लिए विजयपुर के पास बनने जा रहे AIIMS के विशाल अस्पताल का काम इसलिए रुका पड़ा है, क्योंकि इसके आसपास की खाली जमीन पर रोहिंग्याओं और गुज्जरों ने अतिक्रमण कर रखा है. इसी प्रकार नागरौता क्षेत्र के अन्य विकास प्रोजेक्ट भी अटके पड़े हैं, क्योंकि पुलिस न तो इन क्षेत्रों की सघन तलाशी ले पा रही है और महबूबा के समर्थन के कारण इन्हें हटा भी नहीं पाती है. दबी ज़बान में पुलिस अधिकारी स्वीकार करते हैं कि यह स्पष्ट रूप से मुस्लिम अतिक्रमणकारियों और भू-माफिया की मिलीभगत है, ताकि इस हिन्दू बहुल जम्मू में अशांति पैदा की जाए और इसी की आड़ लेकर खाली जमीनों पर कब्ज़ा कर लिया जाए, इस योजना को महबूबा मुफ्ती का पूरा समर्थन हासिल है.

जम्मू के हिंदुओं के लिए जितनी बड़ी समस्या गुज्जर और बकरवाल हैं, उससे बड़ी समस्या हैं रोहिंग्या शरणार्थी. अंग्रेजी मैग्जीन “स्वराज्य” के पत्रकारों ने अपनी ग्राउंड रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले सनसनीखेज खुलासे किए हैं. सैयद हुसैन नामक एक रोहिंग्या शरणार्थी ने बताया कि पहले उसने बांग्लादेश से सीमा पारकर कोलकाता में कदम रखा और वहाँ से सीधी ट्रेन पकड़कर जम्मू पहुँच गया. सैयद हुसैन आज से दस साल पहले यानी 2007 में जम्मू के भातिंदी इलाके में आने वाले पहले रोहिंग्या जत्थे में शामिल थे. जम्मू पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि ये रोहिंग्या पिछले कई वर्षों से लगातार सियालदह एक्सप्रेस से सीधे कोलकाता से जम्मू पहुँचते रहे हैं, लेकिन दो दिन की इस यात्रा के दौरान ये रोहिंग्या शरणार्थी बिहार, यूपी, पंजाब जैसे राज्यों में कहीं भी नहीं उतरते, ये लोग सीधे जम्मू पहुँचते हैं. क्योंकि कोलकाता और हैदराबाद में कई मुस्लिम गिरोह काम कर रहे हैं जो इन रोहिंग्याओं को जम्मू में सारी सुविधाएँ मुहैया करवा रहे हैं. ये मुस्लिम गिरोह ट्रेन में चढ़ाते समय इन रोहिंग्याओं को बताते हैं, कि उन्हें बीच के स्टेशनों में कहीं नहीं उतरना है, क्योंकि केवल एक “मुस्लिम बहुल” राज्य ही उनकी रक्षा कर सकता है. चूँकि बंगाल में रोजगार के साधन कम हैं, इसलिए कुछ रोहिंग्याओं को हैदराबाद जबकि अधिकाँश को जम्मू भेजा जा रहा है. जनवरी 2018 तक जम्मू के पास भटिंडी के सबसे बड़े रोहिंग्या शरणार्थी कैम्प के 192 मकानों सहित 1548 रोहिंग्या परिवार मौजूद हैं. यह आँकड़ा आधिकारिक और सरकारी है और केवल एक कैम्प का है. इसी से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जम्मू के हिन्दू बहुल इलाकों में ये कितनी तेजी से पसर चुके हैं.

 

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जम्मू क्षेत्र की पुलिस एवं ख़ुफ़िया अधिकारी भी इन रोहिंग्याओं की हरकतों से परेशान हैं. 2015 में दक्षिणी कश्मीर में एक आतंकी अब्दुर रहमान अल अराकानी मारा गया था, जिसकी पहचान “छोटा बर्मी” के रूप में हुई, जो कि म्यांमार के रखीने प्रांत का निवासी था. इन रोहिंग्याओं के बीच छिपकर कुछ आतंकी तत्त्व भी जम्मू क्षेत्र में घुस आए हैं जिन्हें पाकिस्तान से पूरी मदद मिल रही है. असल में रोहिंग्या मुस्लिम सीमा पार करने में माहिर हैं, इन्हें कठिन से कठिन तार फेंसिंग काटने का भी अनुभव है तथा अमानवीय स्थितियों में यात्राएँ करने का भी. सुरक्षा बलों ने पिछले कुछ माह में आतंकियों की मोबाईल बातचीत को ट्रेस किया तो पाया है कि बार-बार इनकी बातचीत में “बर्मा” शब्द आता है. भटिंडी किरयानी तालाब के आसपास के हालात बेहद खराब हैं. यहाँ पर हेरोईन और अन्य प्रकार के ड्रग्स का धंधा खुलेआम पनपने लगा है, पुलिस भी हैरान है कि इन रोहिंग्या मुस्लिमों को बंगाल से आते समय हेरोईन और अफीम कहाँ से मिल जाती है? तीस वर्षीय मोहम्मद इदरीस बताते हैं कि म्यांमार के बौद्धों ने उन्हें रातोंरात भागने पर मजबूर कर दिया था. मैं अपना सब कुछ छोड़छाड़कर लगभग 250 लोगों के साथ नंगे पैर भागा, हम लगभग दो दिन चलते रहे और बांग्लादेश की सीमा पार कर गए. वहाँ मैंने एक झोंपड़ी किराए पर ली और वहाँ से एक भारत की सिम खरीदी, जिससे मैंने हैदराबाद के अपने रिश्तेदार से बात की. फिर भारत की सीमा पर मैंने 3000 रूपए की रिश्वत दी और एक मिनी बस में बैठकर सीधे कोलकाता पहुँच गया. तीन माह वहाँ रहने के बाद ट्रेन पकड़कर सीधे जम्मू चला आया, क्योंकि कोलकाता में रोजगार या धंधा-पानी की दिक्कत हो रही थी. जम्मू इलाका हमारे लिए बहुत बढ़िया है. इदरीस कहता है कि अगर मैं दोबारा म्यांमार के रखीने प्रांत में गया तो बौद्ध लोग मुझे मार देंगे. हालाँकि पाँच मिनट बाद ही वह ये भी स्वीकार करता है कि दो माह पहले वह एक निकाह में शामिल होने म्यांमार गया था, और वहाँ से अपने भाई और उसके परिवार को भी जम्मू ले आया है.

मोहम्मद इदरीस के अनुसार जम्मू के एक अखरोट तोड़ने वाले कारखाने में हमने अपनी महिलाओं को “बर्मी महिलाओं” के रूप में दिहाड़ी नौकरी पर लगा दिया है. फैक्ट्री मालिक को भी इससे कोई ऐतराज नहीं है, क्योंकि उसे सस्ते में नाबालिग लड़कियाँ मजदूर के रूप में मिल रही हैं. देखते ही देखते पिछले पाँच वर्षों में रोहिंग्या मुस्लिमों ने भटिंडी के पास “बर्मी मार्केट” भी खोल लिया है, जहाँ अब उनकी बड़ी, सुन्दर और भरपूर माल वाली दुकानें दिखने लगी हैं. पास की ही एक कॉलोनी में छोटी सी किराना दुकान चलाने वाले बिल्लाराम कहती हैं कि जितना मैंने पिछले बीस साल में भी नहीं कमाया, उतना इन रोहिंग्या मुस्लिमों ने पाँच साल में ही कमा लिया है, क्योंकि इन्हें सीमा पार से जमीन और अन्य संसाधनों की मदद मिल रही है. जमीनों पर अवैध कब्जे करके बाद में ये लोग उसे बेच देते हैं और पैसा बना रहे हैं. जम्मू प्रशासन और पुलिस सारी बातें जानते हैं लेकिन वे महबूबा सरकार के रुख के कारण चुप्पी साध लेते हैं.

 

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जम्मू के स्थानीय निवासियों को साफ़ दिखाई दे रहा है कि बाहर से आने वाले इन रोहिंग्याओं तथा गुज्जरों की प्रशासन में बैठे लोग मदद कर रहे हैं. इनके राशन कार्ड, आधार कार्ड वगैरह तो बन ही चुके हैं, लेकिन सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह कि इन रोहिंग्याओं का PRC कार्ड भी बना दिया गया है. PRC (Permanent Resident Certificate) कार्ड एक प्रकार का प्रमाणपत्र होता है, जिसके द्वारा केवल और केवल जम्मू-कश्मीर का नागरिक ही इस राज्य में संपत्ति खरीद सकता है सरकारी नौकरी पा सकता है, उच्च शिक्षा ग्रहण कर सकता है. एक पुलिस अधिकारी के अनुसार “बर्मी मार्केट” के ही एक रोहिंग्या मुस्लिम व्यापारी ने हाल ही में जम्मू के बाहरी इलाके में दो करोड़ रूपए की एक बड़ी कोठी खरीदी है. ज़ाहिर है कि गुज्जरों-बकरवाल तथा रोहिंग्याओं को बसाने का यह खेल पूरी तरह से इस क्षेत्र के जनसँख्या संतुलन को बिगाड़ने तथा “डेमोग्राफी” को मुस्लिम पक्ष में झुकाने की लंबी रणनीति का भाग है, जिसे महबूबा सरकार का पूरा समर्थन हासिल है.

भाजपा के नेता आरोप लगाते हैं कि हाल ही में सुन्जुवान के सेना कैम्प पर हुए हमले में रोहिंग्या आतंकी शामिल थे, जिनमें से एक बाद में मारा भी गया. दुर्भाग्य से भाजपा या तो इस खेल से अनजान बनी हुई है, या फिर बेहद मजबूर है कि वह कुछ भी नहीं कर पा रही. शर्मा अपने आरोपों को स्पष्ट करते हुए आगे लिखते हैं कि नेशनल कांफ्रेंस और महबूबा की पार्टी, यानी पक्ष-विपक्ष दोनों ही रोहिंग्या मुस्लिमों के समर्थन में हैं और उनके खिलाफ कुछ भी नहीं सुनना चाहते. हिन्दू बहुल इलाकों में कश्मीरी सरकार की अल्पसंख्यक नीति जिसे “रोशनी एक्ट” नाम दिया गया है, उसके जरिये जम्मू, उधमपुर, साम्बा, कठुआ जैसे क्षेत्रों में मुस्लिमों को और खासकर शरणार्थियों को प्राईम लोकेशन पर जमीनें आवंटित की जा रही हैं, जबकि सिखों और बौद्धों को केवल आश्वासन देकर टरका दिया जाता है. धारा 370 तो बहुत दूर की बात है, धारा 35-A को भी हटाने के बारे में यहाँ कोई सोच नहीं सकता. भटिंडी के नजदीक स्थित राजीव नगर के रहवासी और दुकानदार इन रोहिंग्याओं से भयभीत रहने लगे हैं. एक दुकानदार सतपाल शर्मा कहते हैं कि पहले हमारा इलाका बेहद शांत और खूबसूरत था, लेकिन जब से ये बर्मी रोहिंग्या मुस्लिम आए हैं, यहाँ ड्रग्स और गन्दगी की भरमार हो गई है, ऐसा लगता है कि ये लोग गन्दगी में ही रहते आए हैं और यहाँ भी वही हाल कर देंगे. पिछले चार वर्षों में केवल जम्मू नगर में 25 FIR दर्ज की गई हैं, जिनमें किसी रोहिंग्या मुस्लिम का नाम ड्रग्स स्मगलिंग में सामने आया है और लगभग सत्तर किलो हेरोइन जब्त की गई है.

जम्मू में काम कर रही सामाजिक कार्यकर्ता नीलम कुमारी तथ्यों और सबूतों के साथ बताती हैं कि म्यांमार से आने वाले रोहिंग्या मुस्लिम अपनी लड़कियों को या तो वेश्यावृत्ति में धकेल रहे हैं या फिर कश्मीरी मुस्लिम युवकों को अच्छे दामों पर बेच रहे हैं. पिछले छः माह में कम से कम दस FIR जम्मू के विभिन्न थानों में रजिस्टर की गयी हैं, जिनमें पुलिस ने रोहिंग्या मुस्लिम लड़कियों को होटलों से बरामद किया है. जबकि कश्मीर में पत्थरबाजी, बेरोजगारी और आतंकियों से संबंधों के चलते जिन लड़कों का निकाह नहीं हो पा रहा था, अब उनके लिए रोहिंग्या लड़कियां आसानी से उपलब्ध हैं. जम्मू के दूरदराज इलाकों में अब खुलेआम गाय काटने के घटनाएँ सामने आ रही हैं.

कुल मिलाकर जम्मू के हिन्दू बहुल इलाकों में स्थिति तेजी से विस्फोटक होती जा रही है, स्थानीय लोगों में रोहिंग्याओं तथा गुज्जरों के खिलाफ आक्रोश बढ़ता जा रहा है. जम्मू जैसे सुन्दर शहर में चहुँओर अतिक्रमण की बाढ़ आ गयी है और अपराध ग्राफ बढ़ रहा है. समस्या ये है कि पुलिस भी इन रोहिंग्याओं पर अधिक से अधिक केस दर्ज करके जेल ही भेज सकती है, इन्हें देश से बाहर करना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं है. जबकि भाजपा, जिसने जम्मू क्षेत्र में सर्वाधिक विधानसभा सीटें जीती थीं, वह महबूबा के सामने बेबस नज़र आ रही है. म्यांमार से लेकर जम्मू तक का सफर जब केवल 3000-5000 रूपए के बीच आराम से हो रहा हो, तो भला रोहिंग्या मुस्लिम बांग्लादेश में क्यों टिकेंगे?? देखना तो ये है कि मामला हिंसक होने से पहले भारत सरकार क्या ठोस कदम उठाती है? अथवा क्या वह महबूबा मुफ्ती के इस खुलेआम तुष्टिकरण तथा इस्लामी डेमोग्राफी बदलने के काम पर कोई लगाम लगा पाती है?

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साभार : स्वराज्य मैगजीन 

मूल लेख : स्वाती गोयल शर्मा 

अनुवाद : सुरेश चिपलूनकर 

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१) रोहिंग्याओं के चक्कर में कहीं बांग्लादेशियों को न भूल जाना.. :- http://desicnn.com/news/rohingya-muslims-are-threat-to-nation-as-even-threat-are-bangladeshi-in-assam 

२) धारा 35-A पर नारीवादी एवं दलित संगठन चुप क्यों हैं? :- http://desicnn.com/news/article-35a-of-jammu-kashmir-must-be-abolished-because-its-anti-women-anti-dalit 

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