श्रीरामचरितमानस में छिपा है, आधुनिक मैनेजमेंट साईंस

Written by रविवार, 09 जुलाई 2017 07:24

श्रीरामचरित मानस संसार के सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थों में से एक है। गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित इस ग्रन्थ में मानव जीवन के सभी प्रश्नों का उत्तर मिलता है। गोस्वामी जी ने अपने इस महान ग्रन्थ में समाज के प्रत्येक पक्ष का वर्णन किया है।

यह एक ऐसा अदभुत ग्रन्थ है जिसको जिस भी दृष्टिकोण से देखा जाये, उसी दृष्टिकोण से ये ग्रन्थ नजर आता है। गोस्वामी जी का ये महान ग्रन्थ अध्यात्मिक भी है, सामाजिक भी है, राजनैतिक भी है और व्यक्तिगत है। इसलिए गोस्वामी तुलसीदासजी न केवल महान अध्यात्मिक विभुति है, बल्कि वे सामाजिक एवं राजनैतिक शास्त्र के महान विद्वान भी है। वर्तमान में प्रबंधनशास्त्र की बड़ी चर्चा है। हर व्यक्ति इस विषय पर बात करता हुआ नजर आता है। आधुनिक प्रबंधन में संगठन की महत्वपूर्ण भूमिका है या हम कह सकते है कि किसी भी संगठन की सफलता उसके प्रबंधन पर निर्भर करती है। अगर हम अच्छा प्रबंधन कर पाएं तो हम अपने संगठन को सफलता के शीर्ष पर पहुॅचा सकते है। संगठन कैसा भी हो सकता है, वो राजनैतिक भी हो सकता है, सामाजिक भी हो सकता है, और व्यावसायिक भी हो सकता है।

व्यावसायिक संगठनों के प्रबंधन के जो आजकल प्रचलित सिद्धान्त और मान्यताएं हैं वे ज्यादातर अमेरिका, जापान, और पश्चिमी देशों से लिए गए हैं। आज के समय में जब हम विद्याथियों को प्रबंधन की शिक्षा दे रहे हैं तो उसमें ज्यादातर सिद्धान्त और पुस्तकें बाहर के देशों से आयी है। हमारी शिक्षा प्रणाली और विद्वानों का दोष यह है कि उन्हें हमारे ग्रन्थों और हमारे सनातन ज्ञान में कुछ भी नजर नहीं आता और अगर कोई रखना और पढ़ाना भी चाहे तो उसे सांप्रदायिक करार दिया जाता है। पर हमारे ग्रन्थों में अद्भुत रहस्य और ज्ञान दिया हुआ है। बस जरूरत है उसे आज के सन्दर्भ में देखने की और प्रस्तुत करने की। श्रीरामचरित मानस एक ऐसा ही अद्भुत ग्रन्थ है जिसमें आधुनिक संगठन और उसके प्रबंधन की महान शिक्षा छिपी हुई है। किसी भी आधुनिक प्रबंधन शास्त्र के पाश्चात्य विद्वानों की संगठनों उनके प्रबनधों और उसके नेतृत्व की परिकल्पना के कई सौ वर्ष पूर्व गोस्वामी तुलसीदास जी ने संगठन प्रबंधन और नेतृत्व के बारे में अद्भुत परिकल्पना श्रीरामचरित मानस में प्रस्तुत की। श्रीरामचरित मानस गोस्वामी तुलसीदासजी का एक शोधग्रन्थ है, जिसमें उन्होंने सम्पूर्ण भारतीय ज्ञान के सार का संकलन किया।

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मैंने श्रीरामचरित मानस को आज के आधुनिक संगठन, उसके प्रबंधन और नेतृत्व के सन्दर्भ में देखने की कोशिश की है। किसी भी संगठन की सफलता उसके उद्देश्य और उसके नेतृत्व के गुणों पर निर्भर करती है। अगर संगठन के उद्देश्य सही हैं और नेतृत्व में सही गुण है तो उस संगठन की सफलता निश्चित है। श्रीरामचरित मानस इस विषयों की उचित तरह से रेखांकित करता है। श्रीरामचरित मानस में सात अध्याय हैं बालकाण्ड से लेकर उत्तरकांड तक। उत्तरकांड में गोस्वामी तुलसीदासजी एक आदर्श संगठन की परिकल्पना करते हैं। आज के ज्यादातर संगठन सिर्फ अधिक से अधिक धन कमाने को सफलता समझते है तुलसीदासजी उत्तरकांड में एक सफल संगठन की परिकल्पना प्रस्तुत करते है।

तुलसीदास जी कहते हैं, दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि व्यापा।

गोस्वामीजी के अनुसार वो संगठन सफल हैं जिसमें रहने वाले या काम करने वाले शारीरिक, मानसिक एवं भौतिक कष्टों से मुक्त है। गोस्वामीजी का संगठन त्रिकोणात्मक है जिसकी एक भुजा शारीरिक सम्पत्ति, दूसरी भुजा मानसिक सम्पत्ति एवं तीसरी भुजा भौतिक सम्पत्ति है। यानि कि जब तक किसी संगठन में काम करने वाले इन तीनों सम्पत्तियों से युक्त नहीं हैं तब तक उस संगठन को सफल नहीं माना जा सकता है। केवल भौतिक सम्पत्ति अर्जित करने को ही सफलता नहीं माना जा सकता है। संगठन को देखना पड़ेगा कि उसमें काम करने वाले व्यक्तियों का मानसिक और शरिरिक स्वास्थ्य भी उत्तम हो। अतः केवल वे ही संगठन सफल माने जाएंगे जिनमें काम करने वाले इन तीनों सम्पत्तियों के मालिक हो।

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तुलसीदासजी अगले सूत्र में कहते हैं कि सब नर करहिं परस्पर प्रीति। चलहिं स्वधर्म निरत सुति नीति।  ऐसे संगठन जिसमें काम करने वाले परस्पर प्रेम के साथ रह कर एक दूसरे के साथ सहयोग करते हुए अपने अपने काम करते हुए संगठन के उद्देश्य प्राप्ति में लगे रहते है, सफल माने जाएंगे। जहां पर नकारात्मक विरोधाभास हो और लोग एक दूसरे के काम में हस्तक्षेप करते हों, कभी भी सफल नहीं हो सकते हैं। इसलिए वो संगठन सफल माने जाएंगे जो कि ऐसा वातावरण बना सके जिसमें लोग एक दूसरे को मदद कते हुए अपना अपना काम करें, पर ऐसा संगठन बनाने एक उच्च कोटि का नेतृत्व चाहिए।

गोस्वामी तुलसीदास उत्तरकांड में आदर्श संगठन की स्थापना करते हैं पर इसके पहले छह अध्याय में ऐसे नेतृत्व पर शोध करते हैं जो कि ऐसा आदर्श संगठन बना सके। श्रीराम इस ग्रन्थ के नायक हैं और तुलसीदास रामचरित मानस के रूप में राम यानि नायक के चरित्र पर शोध करते हैं और पता लगाने की कोशिश करते हैं कि एक उच्च कोटि के नायक में कौन कौन से गुण होने चाहिए। ये एक दुख का विषय है कि आज सम्पूर्ण विश्व में नायक और उसके चरित्रों पर शोध चल रहा है, हम अपने विद्यालयों में पाश्चात्य विद्वानों और पुस्तकों को तो पढ़ा रहे हैं, परन्तु हमने अपने इस महान ग्रन्थ की इस सन्दर्भ में उपेक्षा कर दी। तुलसीदासजी रामचरित मानस के बालकाण्ड में एक नायक की स्थापना करते हैं और फिर बाकि के पांच अध्याय यानि लंकाकाण्ड तक उसमें उपस्थित गुणों और चरित्रों पर शोध करते हैं।

गोस्वामी तुलसीदासजी बालकाण्ड में प्रश्न करते हैं कि राम कौन हैं? यानि कि नायक कौन हो सकता है? और उसका उत्तर देते हैं यानि पहली बार नायक को परिभाषित करते है। तुलसीदासजी प्रश्न करते हैं, राम कवन प्रभु पूछउं तोही। कहिऊ बुझाई कृपानिधि मोही।। वे पूछते हैं कि राम कौन हैं? यानि नायक को परिभाषित करने का अतुलनीय प्रयास है। इस प्रश्न का उत्तर देते हुए वे कहते हैं कि - जासु कृपा अस भ्रम मिट जाई। गिरिजा सोई कृपाल रधुराई।  जिसकी कृपा से हमारे भ्रम दूर हो जाएं वो राम हैं, वो नायक है। अगर गोस्वामीजी के इस सूत्र को समझने की कोशिश करें, तो नायक होने के लिए तीन बिन्दुओं का होना आवश्यक है। पहला कि वही व्यक्ति किसी का अज्ञान दूर कर सकता है जिसमें खुद ज्ञान हो। यानि विवेक और ज्ञान नायक होने की पहली शर्त है। पर अगर किसी में ज्ञान हो, पर वो उसको किसी को बता न सके तो वो उसके अज्ञान या भ्रम को दूर नहीं कर सकता, यानि कि दूसरी आवश्यक शर्त संवाद है। अगर नायक में संवाद का गुण न हो, तो वो किसी के भ्रम दूर नहीं कर सकता। इस स्थिति में वो उस व्यक्ति का नायक नहीं हो सकता। अतः संवाद, नायक होने की दूसरी शर्त है।

एक संगठन में अलग-अलग मानसिक स्तर के लोग होंगे और उनको अलग-अलग समय पर अलग-अलग ज्ञान की जरूरत होगी। अतः उनके भ्रमों को दूर करने के लिए कृपा यानि एक प्रक्रिया की जरूरत होगी। नायक को पता होना चाहिए कि उसको किस वक्त किस प्रक्रिया को चुनना होगा ताकि वो उचित संवाद के साथ आवाश्यक ज्ञान को लोगों तक पहुँचा सके। यानि इस सूत्र के साथ तुलसीदासजी कहते है कि जिस व्यक्ति में ज्ञान हो, संवाद करने की विशेषता हो और उस प्रक्रिया से परिचित हो जिसके माध्यम से संवाद करके अपने ज्ञान को दूसरों तक पहुंचा सके, वही व्यक्ति सच्चे अर्थों में नायक हो सकता है, और ऐसा नायक ही ऐसे आदर्श संगठन की रचना कर सकता है जिसमें शारीरिक, मानसिक एवं भौतिक तीनों सम्पत्तियों का वास हो। 

संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह है कि प्राचीन भारतीय ग्रंथों में आज के आधुनिक मैनेजमेंट, वित्त एवं रक्षा संबंधी कई ज्ञान के खजाने छिपे हुए हैं. आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी जड़ों की तरफ लौटें, अपने इन ग्रंथों में से अच्छी बातें चुन-चुनकर अपनी अगली पीढी को परोसें, ताकि संस्कृत का जो कृत्रिम हौवा खड़ा किया गया है, संस्कृत एवं प्राचीन भारतीय ग्रंथों के बारे में जो नकारात्मक बातें फैलाई गई हैं, वे दूर होंगी. आने वाली पीढ़ी का मानस "भारतीय" बनाना है तो शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन आवश्यक है. अंगरेजी शिक्षा व्यवस्था के समकक्ष ऐसी "भारतीय शिक्षा व्यवस्था" भी होनी चाहिए, जो पश्चिम को आईना दिखा सके. आज पश्चिमी देशों में हमारे ही ग्रंथों पर गहन शोध हो रहे हैं और इधर हम अपनी युवा पीढ़ी को अनावश्यक एवं अनर्गल शिक्षा प्रदान कर रहे हैं. 

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साभार : भारतीय धरोहर

Read 1708 times Last modified on सोमवार, 10 जुलाई 2017 17:16
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