राम जन्मभूमि विवाद :- केवल सच्चा मुसलमान बोले, काफिर नहीं

Written by गुरुवार, 10 मई 2018 08:00

राम जन्मभूमि का मुद्दा (Ram Mandir Movement) पिछले कई वर्षों से प्रमुख रूप से चर्चा में रहा है, अब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) की सुनवाई में अंतिम चरण पर पहुँच चुका है. इस सन्दर्भ में कई-कई पक्ष अपने-अपने दावे कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में मूल सवाल ये है कि राम जन्मभूमि मुद्दे पर हिन्दुओं के अलावा किसी और पक्ष की बात यदि सुननी भी हो, तो वह केवल “सच्चा मुसलमान” की ही हो सकती है, किसी “काफिर” की नहीं. अब सवाल ये उठता है कि सच्चा मुसलमान कौन है? इसके लिए पहले थोड़ी पड़ताल करते हैं. 

सर्वप्रथम तो यह कि माननीय उच्चतम न्यायालय में जो वाद विचाराधीन है, वह तो” श्री राम जन्मभूमि मंदिर बनाम विवादित ढांचा” इस प्रकार से है. इसलिए मस्जिद का तो प्रश्न ही विचार के दायरे से बाहर चला गया. यह इतना महत्वपूर्ण तथ्य है, कि अगर इस्लाम की जो मान्यताएं हैं, उसके हिसाब से जबरन कब्जा की हुई जगह पर मस्जिद बनाई ही नहीं जा सकती. मस्जिद वहीं बनाई जाएगी जो भूमि दान में मिले या खरीदी हुई हो, तो फिर यह जमीन जिस पर श्री राम जन्मभूमि मंदिर है वह तो मस्जिद बनाने के लिए न तो खरीदी गई थी, न ही दान में मिली थी. तो क्या मंदिर तोड़कर जबरन कब्जा किया गया, अगर ऐसा हुआ है तो वह मस्जिद कबूल ही नहीं हो सकती, ऐसा इस्लाम (Muslim Traditions in Quran) का मानना है.

बाबरनामा में कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं है, कि बाबर ने ऐसी कोई मस्जिद बनाने की आज्ञा राम जन्म भूमि स्थान के विषय में दी हो अथवा अयोध्या में कोई मस्जिद बनवाने का आदेश दिया हो तो इस प्रकार हर तरह से श्री राम जन्म भूमि ही निर्विवाद रुप से वह स्थान है और वहां श्री राम जन्म भूमि की सब प्रकार से मान्यता है तथा यहाँ एक भव्य श्रीराम मंदिर बनना चाहिए. यह बात बहुत स्पष्ट हो जाती है. जब यह बात स्पष्ट हो जाती है तो प्रशासन का एक बड़ा दायित्व है कानून-व्यवस्था और शांति समाज में बनाए रखना, इसके लिए आवश्यक तथ्य और सत्य का समाज में प्रसार करना. इसलिए सर्वप्रथम तो केंद्र और राज्य दोनों प्रशासन को चाहिए कि वह इस सत्य का प्रचार करें, कि इस्लाम में मस्जिद इस प्रकार की जमीन पर बनाई जा सकती है, कि वह खरीदी हुई हो या दान दी हुई हो और किस प्रकार अन्य लोगों के श्रद्धा केंद्र को तोड़कर मस्जिद बनाना जुर्म है, अपराध है और वह इस्लाम के जो सर्वोच्च आराध्य हैं, उनको स्वीकार नहीं होगा.

यह बात स्वयं मोहम्मद साहब ने कही थी, तो इस बात का प्रचार करना चाहिए और बाबरनामा में इसका ज़िक्र कहीं नहीं है, इस बात का कोई प्रमाण ही नहीं है कि बाबर ने कोई मस्जिद यहाँ बनाई थी तो यह फालतू नाम कब से फैला, कैसे फैला, किसने फैलाया, इन तथ्यों की भी छानबीन की जाए. विवादास्पद जमीन पर मस्जिद इस्लाम के नियमों के मुताबिक भी संभव नहीं है, उसके विरुद्ध है और भाई लोग भी कह रहे हैं कि नहीं, इस प्रकार कोई मस्जिद नहीं हो सकती और जब सारा समाज इस सत्य को जान लेगा तो परस्पर शांति और सद्भाव स्थापित हो जाएगा, समाज में शांति सुव्यवस्था और कानून व्यवस्था के लिए शासन का यह कर्तव्य होता है कि वह ऐसी सच्ची जानकारी को पूरे समाज में तरह-तरह से फैलाए, व्यापक स्तर पर फैलाए.

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि मस्जिद की जरूरत किसे है? तो मस्जिद की जरूरत मुसलमानों को है, मस्जिद के बारे में सवाल उठाने का हक मुसलमानों का है, अन्य किसी का नहीं. अब सवाल उठता है कि मुसलमान कौन? ज़ाहिर है कि मुसलमान वह है, जो मुहम्मद साहब की बातों को माने, उन पर जो आयतें उतरीं, और उनके द्वारा प्रतिपादित अन्य उपदेशों जिन्हें हदीस कहते हैं को माने, अर्थात कुरान शरीफ और हदीस इन दो को जो माने एवं पालन करे, वही सच्चा मुसलमान है (Islamic Research Foundation).

अब यह बात ठीक है कि मोहम्मद साहब ने अपने जीवन काल में किसी को यह आदेश नहीं दिया कि कुरान शरीफ को लिख लो. बहुत से पढे लिखे लोग थे, कायदे कानून के जानकार लोग थे, व्याकरण और भाषा के जानकार लोग थे, उसी समय कुरान शरीफ लिख देते लेकिन मोहम्मद साहब के जीवनकाल में कुरान शरीफ नहीं लिखी गई, और उनके बाद भी कई वर्षों तक नहीं लिखी गई. लगभग १०० वर्षों तक कुरान शरीफ नहीं लिखी गयी और जब पहली बार लिखने का प्रयास हुआ तो सैकड़ों प्रतियां सामने आयीं जिनमें से एक प्रति मान्य हुई. तब से वही सच्ची कुरान शरीफ है, उसी में लिखी बातें प्रमाणिक हैं और उन्हें ही अल्लाह ने मोहम्मद साहब पर उतारा यानी आदेश दिया, ज्ञान दिया, उपदेश दिया. अन्य जो प्रतियाँ थीं, उन सैकड़ों को लेकर तरह तरह के विवाद हुए, पर वह तो मुसलमानों का अंदरुनी मामला है और अंत में एक प्रति स्वीकार की गई कि यही आज से प्रामाणिक कुरान शरीफ है तो हमें भी यही मानना चाहिए कि कुरान शरीफ वही है जो सर्वमान्य है. कुरान शरीफ और हदीस में जो है, उसके अनुसार जो चले वही सच्चा मुसलमान है. कुरान शरीफ और हदीस के अनुसार जो नहीं चले वह सच्चा मुसलमान नहीं है और जो सच्चा मुसलमान नहीं है उसे मस्जिद पर कोई भी दावा करने का अधिकार नहीं है.

मोहम्मद साहब फरमाते हैं कि अल्लाह तआला की बनाई हुई जो भी चीजें हैं, उनकी नकल करना कुफ्र है इसीलिए किसी भी तरह का प्राकृतिक वस्तुओं का यथावत चित्रांकन काफिराना काम है. जो भी इस तरह के मानव आकृति अथवा प्रकृति में जो कुछ विद्यमान है उसकी हूबहू शक्ल या नक़ल बनाने वाले जितने भी चित्र हैं अथवा उनकी छवि प्रस्तुत करने वाले जो भी छायाचित्रादि माध्यम है, या फिल्म है या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम है या कोई भी संचार माध्यम जो दिखाने वाला हो दृश्य के रूप में जो अल्लाह ताला की बनाई हुई चीजों को मनुष्य और प्रकृति को दिखाएं, वह सब कुफ्र हैं. अर्थात सिनेमा आदि में जो अभिनय करे, वह काफिर है, वह मुसलमान नहीं है. इसी तरह जो कोई भी अपनी या किसी अन्य की तस्वीर बनाता है, चित्र बनाता है, छायाचित्र लेता है, उसको प्रसारित करता है यानी फिल्म बनाता है, फिल्म में एक्टिंग करता है, स्त्री या पुरुष अथवा उसका निर्माण और निर्देशन करता है, वह काफ़िर है क्योंकि उसमें तो अल्लाह ताला के बनाए हुए मनुष्य और प्राकृतिक दृश्यों का चित्रण होता है अर्थात ऐसी काफिराना हरकत करने वाले मुसलमान नहीं हैं. अर्थात जो लोग भी फिल्म इंडस्ट्री में हैं, अन्य दृश्य माध्यमों में हैं, चित्रकला में हैं और ऐसे चित्र बना रहे हैं जो अल्लाह ताला की बनाई हुई चीजों और इंसानों की शक्ल वाले हैं, उनकी नकल करते हैं वह काफिर हुए. उनमें से कोई भी मुसलमान नहीं है. अर्थात संगीत और नृत्य के विषय में मोहम्मद साहब ने जो कहा है, उसका पालन करना चाहिए. जो उसका पालन नहीं करता वह काफिर है, और फिर उसे मस्जिद पर हक का दावा करने का कोई अधिकार नहीं.

मोहम्मद साहब ने तो पत्थर की किसी मस्जिद की कभी बात ही नहीं की. मक्का में जो उन्होंने मस्जिद बनाई वह तो खजूर के पत्तों वगैरा से बनी थी. कोई एक गारे ईंट पत्थर आदि की चिनाई से तो मस्जिद बनाई नहीं गई थी. इसलिए पक्की मस्जिद बनाना भी कुफ्र हुआ या नहीं, इस पर विचार होना चाहिए. मोहम्मद साहब ने जो नहीं कहा, जो हुक्म नहीं दिया, वह काम करना कुफ्र है. जहां तक काबा की बात है काबा तो पहले से मौजूद था और मोहम्मद साहब ने काबा जैसी कोई चीज़ बनाने का कोई आदेश दिया नहीं है. इस तरह की कोई भी चीज बनाने की कोशिश कुफ्र है.

इसी प्रकार जगह-जगह जो मजारें बनती हैं, वह हिंदू समाज के संतों आदि की समाधि की नकल में मजारें बनाई गई है भारत में. इस्लाम में इसका कोई आदेश नहीं है, इसका कोई निर्देश नहीं है, इसलिए मज़ार तो साफ़-साफ़ कुफ्र है और यह जो हिन्दू समाज की समाधि की नकल में बनती भी है तो वह समाधि जैसी पवित्र नहीं होती. कोई हड्डी वगैरह रख देते हैं, तो यह सब कुफ्र है. पैगंबर साहब ने जिसका विधान नहीं किया है, ऐसा कोई भी काम करने वाले लोग तो मुसलमान होने का दावा नहीं कर सकते, वे काफिर ही कहे जायेंगे. जहां तक अपना चित्र बनाने या प्रसारित करने की बात है इस कसौटी पर स्वयं ओसामा बिन लादेन काफ़िर सिद्ध होते हैं क्योंकि अपना चित्र बनाने या बनवाने की मनाही है, वर्जना है और जो अपना चित्र बनाए या बनवाएं और उस को प्रसारित करें, वह काफिर हो गया. ओसामा बिन लादेन ने यह काम किया और उनके समर्थकों ने यह काम किया. इसी तरह सद्दाम हुसैन ने तो अपनी ही प्रतिमा जगह जगह स्थापित करवाई, वह भी सरासर कुफ्र था.

इसी तरह जो मुगल बादशाह हुए हैं उनमें से कोई एक भी दिन हज नहीं गया जबकि कुरआन में कहा गया है कि जिसके पास हज जाने की हैसियत है, उसे हज जाना लाजिमी है और जो राजा हैं, नवाब हैं, बादशाह हैं, उसकी तो हैसियत ही हैसियत है. अर्थात जो लोग हैसियत होने के बावजूद हज पर नहीं गए, वह तो काफिर है इसलिए मुगलिया मंगोल खानदान के जो लोग भी दिल्ली की गद्दी पर बैठे हुए मंगोल हैं, मंगोल को बिगाड़कर आप मुगल करें तो मुग़ल हैं लेकिन वह मुसलमान तो नहीं माने जा सकते क्योंकि वे हैसियत होने पर भी हज नहीं गए, और उन्होंने तो राजपूतों की आन बान शान की नक़ल की और उनके जैसी पगड़ी पहनी और मूछें दाढ़ी रखीं. जिन्होंने दाढ़ी के साथ मूँछ रखी राजपूतों की तरह रहन-सहन अपनाया, वे सब तो काफिर हैं. उन्हें मुसलमान नहीं कहा जा सकता .

मुसलमान वही है जो मोहम्मद साहब की तरह केवल दाढ़ी रखे मूंछ न रखें. उन्हीं के तरह के लिबास पहने. इन सब तथ्यों और कसौटियों पर हम विचार करें तो पाएंगे कि भारत में मुसलमान तो बहुत ही थोड़े हैं. तो भारत सरकार का यह कर्तव्य बनता है, कि वह मोहम्मद साहब के उपदेशों के अनुसार कुरान और हदीस के अनुसार (जो भी कुरान इस समय सर्वमान्य है और हदीस के अनुसार) जीवन जीने वाले, खान-पान, रहन-सहन अपनाने वाले लोगों को ही मुसलमान मानकर उनकी गणना कराये, और भारत के मुसलमानों की नए सिरे से जनगणना करें. ऐसा करने पर हम पाएंगे कि भारत में मुसलमान तो बहुत ही थोड़े हैं और जो थोड़े से मुसलमान हैं, यानी सच्चे मुसलमान, केवल उन्हें मस्जिद के बारे में कुछ बात करने का अधिकार है. जो मुसलमान ही नहीं हैं, जो काफिरों जैसी हरकत करता है, उसको तो मस्जिद के बारे में कुछ भी बोलने का अधिकार नहीं. ये सारे तथ्य समाज के सामने आना चाहिए और शासन का यह कर्तव्य है कि वह समाज के सामने सत्य और तथ्य लाए ताकि शांति और सुव्यवस्था स्थापित रहे और अफवाहें न फैलें, तनाव न फैले. 

इस मुद्दे पर एकाध-दो और प्रमुख लेख जरूर पढ़ें... 

१) 1528 से अभी तक राम मंदिर की टाईमलाईन (http://desicnn.com/news/timeline-history-of-ram-temple-movement-in-india-shows-hindu-resistance-and-tolerance

२) राम मंदिर वाले केके मुहम्मद (http://desicnn.com/news/kk-mohammad-a-nationalist-archaeologist-is-being-harassed-by-communist-gang-and-irfan-habib)

Read 1337 times Last modified on गुरुवार, 10 मई 2018 18:25