राजदण्ड का महत्व और हिन्दू विरोध की आत्मघाती नीति

Written by शुक्रवार, 10 फरवरी 2017 12:34

यदि राजा के हाथ में दण्ड (डंडा) है तो समाज के दुष्ट और अत्याचारी लोग अपनी असामाजिक गतिविधियों के प्रति शांत रहते हैं। किंतु यदि राजा देश की बहुसंख्यक जनसंख्या के साथ घृणित उपहास करते हुए कुछ लोगों की तुष्टि हेतु बहुसंख्यकों के हितों से समझौता करता है, अथवा उनकी उपेक्षा करता है तो राष्ट्र विनाश के भंवर जाल में फंस जाया करता है जैसा कि आज भारत में हो भी रहा है।

भाजपा प्रणीत राजग अर्थात राष्ट्रीय जनता गठबंधन सरकार के द्वारा भारत में पोटा लगाया गया। यह पोटा राजनीतिक विद्वेष को निकालने के लिए राजनीतिज्ञों के विरूद्घ राजनीतिज्ञों के द्वारा ही प्रयुक्त किया जाने लगा। जिन नागों को मसलने और कुचलने के लिए यह लाया गया था वे इसके शिकंजे से मुक्त ही रहे। अत: पोटा लाकर भी राजशक्ति इच्छाशक्ति और दण्ड शक्ति और भी अधिक हीन और पंगु ही दृष्टिगोचर हुई। कुल मिलाकर ये पोटा आदि की बातें करना तो मात्र जनता को मूर्ख बनाने वाली बातें हैं। पोटा से पहले शस्त्र (दण्ड) की आवश्यकता है - इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। राष्ट्र को चेतन हिंदू के संरक्षण, संवर्धन और पोषण की आवश्यकता है। जिस राजा के पास, जिस शासक के पास शस्त्र-दण्ड अर्थात डंडा हाथ में आ जाएगा, उसके रहते शास्त्र (राष्ट्र के जीवन मूल्य, राष्ट्र की चेतना का संरक्षण, संवद्र्घन और पोषण) की रक्षा का सपना स्वयं पूरा हो जाएगा। तभी तो कहा गया है कि-

''शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे, तव शास्त्र चर्चा प्रवर्तते।''

अर्थात शस्त्र से राष्ट्र की रक्षा होती है, तभी शास्त्र चर्चा भी संभव है। भारत के बहुसंख्यकों के हितों से खिलवाड़ करने का खेल बंद होना चाहिए। हमें ज्ञात होना चाहिए कि जब शासक लोग अपनी चेतना से ही खेलने लगते हैं तो उन्हें समाज और संसार मूर्ख कहता है। क्योंकि वे लोग अपने अस्तित्व को मिटाने का आत्मघाती कार्य कर रहे होते हैं। अत: हिंदू की उपेक्षा उसके हितों के प्रति उदासीनता का प्रदर्शन कर और इस राष्ट्र की चेतना का प्रतीक उसको मानने के स्थान पर उसकी उपेक्षा व तिरस्कार करने का सरकारी दृष्टिकोण अब बंद होना चाहिए, अन्यथा अलीगढ़ विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर दलवाई द्वारा दिया गया यह बयान यहां एक दिन अवश्य ही गुल खिलाएगा-

दलवाई के अनुसार - 'यदि आज' नहीं तो 50 वर्ष में, यदि 50 में नहीं तो 100 वर्ष में यह देश अंत में इस्लामी बाढ़ में डूब जाएगा। हमें दलवाई के इस बयान पर भी ध्यान देना होगा - इस प्रकार के बयानों को इक्के-दुक्के लोगों का विचार कहकर उपेक्षा करना ठीक नहीं होगा। मैं जिन मुस्लिमों से मिला हूं उसमें दस में से नौ लोगों का चिंतन यही था।'

हमें मानवतावाद की बात निश्चित रूप से करनी चाहिए, वैसे भी मानवतावाद इस देश की संस्कृति का मूल तत्व है, और हमें इस तत्व से बाहर जाने का कोई अधिकार भी नही है, परंतु अपनी संस्कृति को बचाये रखना और उसके ऊपर मंडरा रहे खतरों पर विचार करना हर विचारशील व्यक्ति के लिए आवश्यक है। इस विचार को करते समय हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हम अनावश्यक किसी विपरीत मजहब के लोगों के प्रति अनावश्यक घृणा की बात न करने लगें, इस देश में रहने का सबको अधिकार है, किसी को भी किसी के अधिकारों का दलन और दमन करने का या ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करने का अधिकार नहीं है, जिससे कि किसी एक वर्ग का या तो जीना कठिन हो जाए, या धीरे-धीरे देश से उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाए।

मुस्लिम संख्या के खतरे

आज भारत में मुस्लिम जन्म दर हिंदुओं की अपेक्षा बहुत ऊंची है। जो लोग इसे एक इस आकस्मिक संयोग मानते हैं, वे भूल में हैं। इसके पीछे हिंदू विरोध की वह राजनीति और षडय़ंत्र कार्य कर रहा है, जिसके चलते एक दिन यह राष्ट्र हिंदूविहीन होकर मुस्लिम देश में परिवर्तित हो जाएगा। अत: यह ऊंची मुस्लिम जन्म दर आकस्मिक न होकर पूर्व नियोजित है। भारत सरकार इस विषय में पूर्णत: निष्क्रिय है, वह इस ऊंची जन्म दर के सच को सदा की भांति कुछ सिरफिरे लोगों की इस सोच का परिणाम मान रही है कि इससे इस देश का देर सवेर इस्लामीकरण हो जाएगा। 

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