ई-लेनदेन हेतु व्हाट्सएप्प को अनुमति : आखिर क्यों?

Written by शुक्रवार, 14 जुलाई 2017 07:49

एक समाचार के अनुसार केन्द्र सरकार के उपक्रम नेशनल पेमेंट्स कार्पोरेशन ऑफ इण्डिया (NCPI) ने गूगल और व्हाट्सएप्प को यह अनुमति प्रदान कर दी है, कि वे अपने मोबाईल एप्प से UPI अर्थात एकीकृत भुगतान प्रणाली या कहें सरकारी मोबाईल प्लेटफार्म को समाहित कर सकते हैं.

उल्लेखनीय है कि डिजिटल इण्डिया को बढ़ावा देने तथा मोबाईल बैंकिंग को प्रोत्साहन देने के लिए केन्द्र सरकार ने BHIM (भारत इंटरफेस फॉर मनी) नामक एप्प बनाया है, तथा एक केन्द्रीय प्रणाली विकसित की है, जिसे हम UPI के नाम से जानते हैं. फिलहाल यह प्रणाली बहुत बढ़िया काम कर रही है, तथा 52 प्रमुख बैंक इससे जुड़े हुए हैं. लेकिन असली सवाल यह है कि क्या गूगल, व्हाट्स एप्प और फेसबुक को इस तरह देश के सभी क्षेत्रों में घुसपैठ का मौका देना उचित है? क्या इन महाकाय कंपनियों के हाथों गोपनीयता सुरक्षित रहेगी? जब हर चीज़ को आधार कार्ड से जोड़ा जा रहा है, प्रत्येक सरकारी उपक्रम में निजी कम्पनियाँ दखल दे रही हैं, ऐसे में व्हाट्स एप्प (अथवा गूगल) को देश की बैंकिंग से जोड़ना कितना सुरक्षित माना जाए?

गूगल, अमेजन, उबर और फेसबुक ये चारों महाकाय कम्पनियाँ पिछले काफी समय से इस प्रयास में लगी हैं कि उनके द्वारा विकसित मोबाईल एप्प को भी UPI से जोड़ने की सुविधा मिल जाए, ताकि उपभोक्ता सीधे व्हाट्स एप्प अथवा फेसबुक से लॉग-इन करके भी अपने भुगतान कर सके. रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया ने हाल ही में बीस करोड़ से अधिक उपयोगकर्ताओं वाले गूगल के एप्प अर्त्थात व्हाट्स एप्प को इसकी अनुमति दे दी है. NCPI के कार्यकारी निदेशक का कहना है कि सरकार के इस कदम से डिजिटल भुगतानों की संख्या में खासी बढ़ोतरी होगी, क्योंकि व्हाट्स एप्प एवं फेसबुक अब एक बड़ी जनसंख्या तक अपनी पहुँच बना चुके हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो सरकार अपनी विफलता को स्वीकार कर रही है कि वह अपने एप्प अर्थात BHIM को लोकप्रिय बनाने में असफल सिद्ध हुई है. पिछले माह के आंकड़ों के अनुसार पूरे भारत में 52 बैंकों से जुड़कर UPI का उपयोग करके 3067 करोड़ का डिजिटल लेनदेन हुआ, जबकि BHIM एप्प ने 49 बैंकों का उपयोग करते हुए लोगों ने 1486 करोड़ का लेनदेन किया. केन्द्र सरकार इससे कतई संतुष्ट नहीं है, इसीलिए डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए वह गूगल-फेसबुक की शरण में चली गई है. परन्तु ऐसा करते समय सरकार में बैठे वित्त विशेषज्ञ यह भूल रहे हैं कि इस कदम से BHIM अथवा “आधार-पे” जैसे सरकारी एप्प को कोई फायदा पहुँचने वाला नहीं है, बल्कि वे और भी गर्त में चले जाएँगे, क्योंकि ये भीमकाय कम्पनियाँ अपने और अधिक आकर्षक एप्प बनाकर, आक्रामक विज्ञापन देकर देश के अधिकाँश डिजिटल उपभोक्ताओं को हथिया ले जाएँगी, स्वाभाविक है कि BHIM अपनी मौत मर जाएगा.

(यह लेख आप तक desicnn.com के सौजन्य से पहुँच रहा है... जारी रखें)

इस कदम का दूसरा खतरा यह हो सकता है कि एक बार देश की बैंकिंग एवं UPI प्लेटफार्म सिस्टम में घुसने का मौका मिलने के बाद ये कम्पनियाँ इतनी आसानी से आपका पीछा छोड़ने वाली नहीं हैं. इस समय UPI और BHIM से किया जाने वाले पेमेंट पर लेनदेन करने वाले दोनों को कोई शुल्क नहीं देना पड़ता है, लेकिन गूगल-फेसबुक कोई जनसेवा करने तो नहीं आ रही हैं. इसलिए जिस तरह से VISA और Mastercard जैसी कम्पनियाँ उपभोक्ता से शुल्क लेती हैं, वैसे ही ये कंपनियां भी वसूलेंगी, जो कि जाने-अनजाने एक सामान्य व्यक्ति पर अतिरिक्त भार तथा इन कंपनियों की मोटी कमाई का जरिया बनेगा. इसकी बजाय सरकार को ही ऐसे प्रयास करने चाहिए कि देश की अधिकाँश जनता BHIM अथवा UPI के जरिये काम करे. जिस प्रकार सरकार ने VISA और मास्टर कार्ड का मुकाबला करने एवं उपभोक्ताओं को लेनदेन के शुल्क से बचाने के लिए अपना सरकारी Ru-Pay कार्ड लेकर आई है, उसी प्रकार सरकार को अभी इन कंपनियों को अनुमति देने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए. रूपे-कार्ड इसलिए सफल हुआ है, क्योंकि सरकार ने VISA और मास्टर कार्ड को जनधन खातों से दूर ही रखा. देखते ही देखते सरकारी रू-पे कार्ड ने बाजार के 43% हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया है, क्योंकि इसमें ट्रांजेक्शन का कोई शुल्क नहीं लगता. ऐसा ही होना भी चाहिए.

सरकार को थोडा धैर्य रखना चाहिए, वैसे भी अभी तक भारत में डिजिटल करेंसी अथवा ई-ट्रांजेक्शन का यह दौर शैशव अवस्था में है, इसलिए BHIM और UPI को मजबूत होने में थोड़ा समय लगेगा. परन्तु इन्हें अपने पैरों पर खड़े होने का मौका और समय दिए बगैर गूगल-फेसबुक-अमेज़न जैसी डायनासोर कंपनियों को सरकारी प्लेटफ़ॉर्म उपयोग की अनुमति देना न सिर्फ जल्दबाजी भरा कदम है, बल्कि सुरक्षा और गोपनीयता के लिए भी खतरा है. गूगल ने भारत के 400 रेलवे स्टेशनों पर मुफ्त वाई-फाई की सुविधा दी थी, क्या अब वह अपनी इस छोटी सी भेंट के बदले “बड़ा सौदा” चाहती है? क्या व्हाट्स एप्प से बैंकिंग जुड़ जाने के बाद ग्राहकों के आधार कार्ड अथवा पैन-कार्ड की जानकारी लीक नहीं हो सकती? सरकार को इस निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए, इस काम के लिए स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया SBI से बेहतर पार्टनर कोई और नहीं हो सकता, क्योंकि SBI की शाखाएँ देश के कोने-कोने में हैं. इन विदेशी कंपनियों पर इतना ज्यादा और इतनी जल्दी भरोसा नहीं करना चाहिए. हाल ही में एक वेबसाईट पर रिलायंस जियो के फोन नम्बरों से जुड़े डाटा के लीक होने की ख़बरें सही पाई गई हैं. ऐसे में हरेक के मन में सवाल है कि क्या भारत में कुछ भी गोपनीय नहीं है?? क्या निजी कम्पनियाँ (खासकर गूगल) हमारे देश के चप्पे-चप्पे में विद्यमान है, वे हमारे बारे में सब कुछ जानती हैं... और अब बैंक खातों, आधार कार्ड में भी इसका दखल होगा??

==============================

- मूल लेख : आर. जगन्नाथन
- अनुवाद : सुरेश चिपलूनकर

Read 950 times Last modified on शुक्रवार, 14 जुलाई 2017 08:03
न्यूज़ लैटर के लिए साइन अप करें