"पैडमैन" :- सामाजिक सोद्देश्यता वाली उत्तम फिल्म

Written by सोमवार, 19 फरवरी 2018 19:58

भारतीय समाज में स्त्रियों की प्रमुख प्राकृतिक शारीरिक क्रिया (Menstrual Cycle) अर्थात माहवारी के बारे में बात करना बेहद संवेदनशील, संकोची और पर्दादारी वाला माना जाता है. यहाँ तक कि आज के आधुनिक समय में भी केवल शहरी और महानगरीय क्षेत्रों को छोड़ दें तो कस्बे और गाँवों में यह विषय अभी भी दाएँ-बाँए देखकर फुसफुसाते हुए बात करने वाला विषय माना जाता है. ऐसे समय पर अक्षय कुमार ने Padman (पैड-मैन) फिल्म बनाकर इस धारणा को तोड़ने का सफल प्रयास किया है. पिछले कुछ समय से अक्षय कुमार लीक से हटकर विषयों पर फ़िल्में चुनने लगे हैं, पैडमैन भी इसी श्रृंखला की फिल्म है.

यह फिल्म हमारे तमिलनाडु के ही एक असली हीरो अर्थात अरुणाचलम मुरुगानंदन के जीवन पर आधारित है. अरुणाचलम, जो खुद ही स्कूल की पढ़ाई अधूरी छोड़कर कामधाम में लग गए थे. उन्होंने अपनी पत्नी की माहवारी के दौरान, उसे होने वाले कष्ट को कम करने तथा साफसफाई को लेकर जागरूक करने के उद्देश्य से बेहद सस्ता “सैनिटरी नैपकिन” (Sanitary Napkin) बनाया और इस तरह वे सामाजिक उद्यमी कहलाए. अक्षय कुमार की यह फिल्म इन्हीं के जीवन के पहलुओं, मुरुगानंदन के संघर्षों, ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं की परेशानी को अच्छी तरह बेहद सटीक तरीके से उजागर करती है. लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जब चेन्नई के थियेटर में मैंने यह फिल्म देखी, उस समय हॉल में केवल बीस दर्शक थे. यह संभव है कि ऐसा इसलिए हुआ हो, क्योंकि तमिलनाडु में हिन्दी फिल्मों का चलन उतना नहीं है. परन्तु एक तमिलभाषी होने के नाते मुझे थोड़ी शर्म भी महसूस हुई कि तमिलनाडु के इस सामाजिक हीरो के बारे में दुनिया को पता चले और स्त्रियों की इस सनातन समस्या के प्रति जागरूकता बढ़े, इसके लिए किसी हिन्दी फिल्म वाले ने कदम उठाया, जबकि सामाजिक सोद्देश्यता की फ़िल्में बनाने वाली तमिल फिल्म इंडस्ट्री ने अरुणाचलम को अभी तक उपेक्षित कैसे रखा?

Padman 2

(अरुणाचलम मुरुगानंदन... सैनिटरी नैपकिन बनानी वाली अपनी छोटी सी फैक्ट्री में) 

फिल्म के कुछ दृश्य मजाकिया हैं, जबकि कुछ दृश्य अन्य कुरीतियों के खिलाफ भी माहौल बनाने का प्रयास करते हैं. फिल्म के संवाद बेहतरीन हैं, हालाँकि वे कहीं-कहीं ओवर-ड्रामाटिक हो जाते हैं, लेकिन ये कोई खास बात नहीं है. मुख्य बात यह है कि फिल्म स्त्री-पुरुष के बीच होने वाले सामाजिक भेदभाव को सफलतापूर्वक उजागर करती है. मुम्बईया फिल्मों की मसालेबाजी से दूर इस फिल्म में असली और नकली आध्यात्मिकता, ग्रामीण भागों में फैले अंधविश्वासों, हर मौके को धर्म परिवर्तन का मौका देखने वाली नन, पर्दा प्रथा की आलोचना जैसे कई मुद्दों को छुआ गया है.

जिस तरह से फिल्म का हीरो “लक्ष्मीकांत” (अर्थात वास्तविक हीरो अरुणाचलम मुरुगानंदन) अपने सस्ते वाले सैनिटरी नैपकिन को पेटेंट करने से मना कर देता है, उसने मुझे विश्वप्रसिद्ध “जयपुर फुट” (विकलांगों के लिए नकली पाँव) के आविष्कार को पेटेंट करने से मना करने का स्मरण हो आया. किसी भी ज्ञान को पेटेंट करना, उससे कमाई करना और अपने तक सीमित रखना भारतीय संस्कृति में फिट नहीं बैठता.

कहने का तात्पर्य यह है कि अब भारतीय समाज बदल रहा है... भारतीय हिन्दी फ़िल्में भी बदल रही हैं... प्रधानमंत्री मोदी के स्वच्छता मिशन और आव्हानों के चलते जागरूकता में वृद्धि तो हुई ही है, लेकिन दुर्भाग्य से धनपशु बन चुके मीडिया हाउसों के मालिकों तथा गरीबों-शोषितों के नाम पर चंदा बटोरने वाले वामपंथियों ने मोदी की इस पहल का कभी भी खुलकर समर्थन नहीं किया. बहरहाल... यह फिल्म तारीफ़ के काबिल है, देखे जाने लायक है. इसे अपने पूरे परिवार के साथ देखें, खासकर किशोर एवं युवा बेटे-बेटियों के साथ बैठकर.

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