उड़ीसा स्थानीय चुनाव परिणाम : बीजद की नींद उड़ी

Written by गुरुवार, 16 फरवरी 2017 12:58

उड़ीसा के स्थानीय निकाय चुनावों के परिणामों ने नवीन पटनायक की पार्टी बीजू जनता दल के साथ-साथ काँग्रेस की नींद भी उड़ा दी है. हाल ही में सम्पन्न स्थानीय चुनावों के दो चरणों में 188 जिला परिषदों में से भाजपा ने 71 सीटें जीत ली हैं.

जबकि 2012 में भाजपा को केवल सात जिला परिषद सीटों पर जीत मिली थी... यानी सीधे दस गुना की बढ़त. स्वाभाविक रूप से लगातार चार बार के मुख्यमंत्री नवीन की सत्ताधारी पार्टी सबसे अधिक सीटं जीतकर पहले नंबर पर है, लेकिन भाजपा काँग्रेस को पीछे धकेल कर दूसरे नंबर की पार्टी बनने जा रही है. यह नतीजे स्वयं भाजपा के लिए भी आश्चर्यजनक हैं, वहीं काँग्रेस के माथे पर चिंता की लकीरें स्पष्ट दिखाई दे रही हैं.

हालाँकि इसे नवीन पटनायक के खिलाफ जनमत नहीं माना जा सकता, लेकिन इसे भाजपा की मजबूती से जरूर जोड़ा जा सकता है. नवीन पटनायक को हाल-फिलहाल कोई खतरा नहीं है, क्योंकि पिछले पन्द्रह वर्ष में उनके सामने काँग्रेस कोई चुनौती नहीं पेश कर पाई है. लेकिन इतना जरूर है कि बीजद से अलग किए जाने के बाद पिछले पाँच वर्ष में भाजपा के कैडर ने जिस तरह मेहनत करके अपनी जमीन तैयार की है, उससे पटनायक की बजाय राहुल गाँधी की दिक्कतें बढ़ गई हैं, क्योंकि उड़ीसा ऐसा राज्य था जहाँ केवल काँग्रेस-बीजद का मुकाबला होता था. इस राज्य में “तीसरी शक्ति” के लिए कोई स्थान नहीं था. जब भाजपा, बीजद से अलग हुई थी तब सभी ने मान लिया था कि अब यह अप्रासंगिक हो जाएगी क्योंकि सत्ता में भागीदारी खत्म हो गई. परन्तु सभी को हैरान करते हुए भाजपा कार्यकर्ताओं ने मेहनत की है और उसका फल भी दिखाई दे रहा है.

बिलकुल यही स्थिति पंजाब में भी थी, लेकिन भाजपा ने नवजोत सिद्धू की बात नहीं मानकर खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है. उल्लेखनीय है कि नवजोत सिद्धू पिछले तीन वर्ष से कह रहे थे कि भाजपा को अकालियों से अलग होकर सत्ता छोड़ देना चाहिए और अकेले के दम पर मेहनत करनी चाहिए, परन्तु सिद्धू की अनसुनी कर दी गई और आज पंजाब में भाजपा के पास एक चेहरा तक नहीं है. यदि आज से दो-तीन वर्ष पहले सिद्धू की बात मानकर भाजपा वहाँ अकेले चुनाव लड़ने का फैसला करती और सिद्धू को अपने “चेहरे” के रूप में पेश करती तो संभवतः पंजाब में भी उसका पुनर्जागरण या पुनर्जीवन मिल जाता. यदि इन चुनावों में काँग्रेस पंजाब जीत गई तो राहुल गाँधी को बोलने का मौका मिल जाएगा, जबकि भाजपा पंजाब में एकदम रसातल में पहुँच जाएगी, सिद्धू को वे पहले ही गँवा चुके हैं. उड़ीसा के परिणामों ने कई चुनाव विश्लेषकों को अपने समीकरण और विश्लेषण बदलने पर मजबूर कर दिया है.

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