भारतीय संस्कृति में रचे-बसे, अफ्रीका के हजारों नीग्रो

Written by रविवार, 26 नवम्बर 2017 19:52

एक जनरल स्टोर के बाहर भीड़ के मध्य क्रान्तिवीर फिल्म के पात्र नाना पाटेकर का बोला गया बहुचर्चित डायलॉग बोलता वह नीग्रो (Negro Community in India) लड़का बड़ा आश्चर्यजनक लगा। एकाएक विश्वास ही न हुआ, कि यह अफ्रीकी नीग्रो लड़का आखिर कैसे इतनी स्पष्ट और शुद्ध टोन में नाना पाटेकर की मिमिक्री कर रहा है।

बाद में उसने बताया कि वह नस्ल से अफ्रीकी तो है परन्तु पिछले बारह तेरह सौ वर्ष से भारतवर्ष ही उसके और उसके पूर्वजों की मातृभूमि-पितृभूमि और कर्मभूमि रही है। यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह गहरी श्यामवर्णीय अफ्रीकी (East Africans in India) जनजाति भारतवर्ष में शताब्दियों से रह रही है और हम जानते तक नहीं।

 

(ये हैं मिस्टर बशीर, अफ्रीकी मूल के नीग्रो, लेकिन गुजरात में गीर के निकट जम्बूर क्षेत्र के निवासी)

वाकई में भारतवर्ष रहस्यमय और विविधता से भरा हुआ देश है। वैसे पुराणों में (विष्णु पुराण में) कहा गया है कि भारतवर्ष में देवता भी इस पुण्यभूमि की महत्ता के विषय में बतलाते हैं वह मिलकर गीत गाकर कहते हैं कि देवता स्वयं इस पुण्यभूमि भारत में जन्म लेने की अभिलाषा रखते हैं। और यहाँ जन्मने में धन्यता का अनुभव करते हैं।

गायन्ति देवा किल गीतिकानी
धन्यास्तु ते भारत भूमि भागे
स्वर्गापवर्गास्पद हेतु मार्गे
भवन्ति भूयः पुरूषः सुरत्वात।

भारतवर्ष में मुश्किल से एक प्रतिशत जनता भी यह नही जानती होगी, कि अफ्रीका की नीग्रो जनजाति भारतवर्ष में बहुत पहले से ही रहती चली आ रही है। वास्तव में इस नीग्रो जनजाति के भारतवर्ष में प्रवासी बनकर आने और इसी देश के बनकर रह जाने के विषय में कोई निश्चित तिथि या समय इतिहासकारों को भी नहीं मालूम है। भारतवर्ष में यह अफ्रीकी जनजाति साउथ ईस्ट अफ्रीका के किस स्थान से यहाँ भारत आकर बसी यह जानकारी अभी तक स्पष्ट नही हुई है। वैसे तो यह कहा जा सकता है यह गहरे श्यामवर्ण और घुंघराले बालों वाली जनजाति साउथ ईस्ट अफ्रीका के बन्तू कबीले से संबंधित है, और या तो यह केन्या से यहाँ आई है या इथियोपिया से।

इस जनजाति के भारतवर्ष में आने और यहीं के होकर रह जाने के संदर्भ में बहुत से मत कहे जाते हैं कुछ लोग कहते हैं कि यह अरबी आक्रमणकारियों के साथ उनके पक्ष में लड़ाई करने वाले गुलाम योद्धा बनकर आए थे, कुछ कहते हैं कि यह लोग पुर्तगाली व्यापारियों के गुलाम बनकर आए और बाद में अंग्रेजों के. कुछ विद्वान इन्हें सिंध पर मुहम्मद बिन कासिम के बर्बर आक्रमण के समय सन ७१२ ई• में उनके गुलाम योद्धा के रूप में आया बताते हैं, तो कुछ विद्वान कहते हैं कि यह ७००-८०० वर्ष पूर्व पुर्तगाली व्यापारियों के गुलाम बनकर यहाँ आए। बाद में बिटिशर्स इन्हें अपने व्यापारिक हितपूर्ति के साधन के रूप में गुलाम. बनाकर भारतवर्ष में लाए।

 

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अरब, पुर्तगाली और अंग्रेज तो इस देश को लूट पीटकर कंगाल बनाकर अपने अपने देश चले गये लेकिन अपने साथ गुलाम बनाकर लाये गए, इन गहरे श्यामवर्णीय लोगों (हब्शियों या हफ्सियों) को यहीं भारतवर्ष में नियति के भरोसे छोड़कर चले गये। वाकई में हफ्सी या हब्शी शब्द गलत अर्थों में प्रयुक्त होने के कारण अपमानजनक समझा जाता है। किंतु अरबी भाषानुसार इथियोपिया देश को अबीसीनिया कहा जाता था और यहाँ के नीग्रो लोगों को उन्होंने हब्शी-अल-हब्श कहकर पुकारा, जिसका अर्थ अरबी में सैय्यद या सईद शब्द के ही समानार्थी सिद्धी शब्द है और इसके मायने होते हैं मास्टर। भारतवर्ष में इन्हें सिद्धी कहकर पुकारा गया।

अपनी सुगठित देहयष्टि और प्रचंड शक्ति के कारण इस्लामिक ईरा में इस गुलाम जनजाति ने सेना में बहुत नाम और यश कमाया कहा जाता है कि इल्तुतमिश की बेटी रजिया सुलताना का अभिन्न सहयोगी एक गुलाम हब्शी याकूत था, जिसने उसे शासन तथा शासनेतर कार्यों में अत्यधिक विश्वसनीयता से सहयोग दिया था। इस विषय पर कमाल अमरोही द्वारा एक हिंदी फिल्म रजिया सुलतान भी बन चुकी है। भारतवर्ष जैसी विशाल जनसंख्या वाले राष्ट्र में यह अफ्रीकी सिद्धी जनजाति करीब करीब पचास साठ हजार के आसपास अत्यधिक अल्प मात्रा में है। यह कर्नाटक, गुजरात, हैदराबाद, गोवा दमन एवं दीव तथा कोंकण में बहुत ही न्यून संख्या में हैं। जहाँ यह समाज से एकदम आइसोलेटेड या पृथक होकर प्रायः गहन वनों में निवास करती है। कर्नाटक में यह एथनिक ग्रुप येलापुर, हलियाल, अंकोला, जोइडा, मुन्दगोड और उत्तरी कन्नड के सिरसी तालुका तथा बेलगांव के आसपास रहता है। गुजरात में राजकोट के जंबूर तथा तलाणा में भी यह सिद्धी लोग रहते हैं।

यूँ तो पुरातन काल में भारतीय संस्कृति की विभिन्न परकीय और विदेशी संस्कृतियों को स्वयं में समाहित करने की (पचाकर स्वयं में मिलाने की पाचन शक्ति या) एसिमिलेशन की शक्ति ( assimilation) बहुत जबर्दस्त रही है। इस राष्ट्र में बहुत सी योद्धा जातियाँ आक्रमण के लिए आयीं परन्तु इस महान राष्ट्र भारतवर्ष ने उन सभी को पचाकर स्वयं में मिला लिया आज उन आक्रमणकारियों को अपना पूर्वज बताकर धन्यता अनुभव करने वाला कोई भी नहीं बचा। शक, हूण, कुषाण, तातार आदि परकीय नस्लें पूरी तरह से सनातन धर्म की इस पुण्य सलिला गांगेय भूमि में पूर्णरूपेण विलीन होकर कृतार्थ हो गयीं हैं। किंतु यह सिद्धी प्रजातीय नस्ल अपने चेहरे मोहरे की बनावट तथा गहरे रंग के कारण और गुलामी की हीन भावना से ग्रसित होने के कारण इस संस्कृति का अभिन्न भाग न बन पाई। अरबों, पुर्तगालियों तथा अंग्रेजों के द्वारा क्रय किए गये यह दास सिद्धीयों के पुरखे लोग अतीत में इनके द्वारा दी गयी अमानवीय पीड़ा के स्वयं साक्षी रहे हैं। अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी में दास प्रथा पर संपूर्ण विश्व में त्यागने के कारण इन सिद्धी हब्शियों के पूर्वज गहन वनों में भागकर छिप गये। यद्यपि यहाँ इन लोगों ने स्थानीय सभ्यता और संस्कृति को आंशिक रूप से स्वीकार तो किया लेकिन स्थानीय संस्कृतियों को मानने वाले देशज लोग इन्हें पूर्णतः स्वीकार न कर सके। इस प्रकार नस्लीय डिस्क्रिमिनेशन या रंगभेद के कारण यह सिद्धी लोग न अफ्रीकी बन सके और न ही भारतीय।

 

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स्वाजातीय विवाह के कारण इनकी भौतिक देहयष्टि बनावट और शारीरिक ढाँचा अफ्रीकी ही बना रहा और पहली नजर में इन्हें देखकर सभी लोग इन्हें आउटसाइडर्स ही कहते हैं। एक सिद्धी यह कहता है कि घर से मात्र छः किलोमीटर की दूरी के बाद वह लोगों द्वारा विदेशी ही समझे जाते हैं। इसके अलावा यह बहुत दुर्भाग्यजनक है कि यह लोग देश की मुख्यधारा में अभी तक भी सम्मिलित नही हो पाये हैं। यद्यपि इन लोगों ने भारत में सूफी मुस्लिम पंथ, रोमन कैथोलिक ईसाई पंथ और हिंदुत्व को अपनाया लेकिन बाह्य व आन्तरिक कारणों से यह लोग पूरी तरह से भारतीयता में आत्मसात नही हो पाये। गरीबी, अस्पृश्यता और अभाव ही इन लोगों की नियति बनकर रह गया। यह बहुत दुर्भाग्यजनक है कि इन्हें भारतवर्ष में चिड़ियाघर के दुर्लभ जानवर के तौर पर देखा जाता है। दुर्व्यवहार व अनदेखी के कारण बहुत से सिद्धी युवा अवैध मादक पदार्थों की तस्करी व अपराध से जुड़ गये। लेकिन फिर भी इन्हें राष्ट्र के साथ एकाकार होने का अवसर प्रदान किया जाना चाहिए। आज सनातन-धर्म की वैश्विक स्वीकार्यता और इसकी महान परंपरा को दृष्टिगत रखते हुए इन्हें सनातन धर्म के प्रेम, करूणा और विश्वबन्धुत्व वाले सर्वश्रेष्ठ सर्वमान्य मत में शामिल हो जाना चाहिए, तभी यह लोग मुख्यधारा में सम्मिलित हो सकते हैं।

भारतवर्ष के विभाजन के पश्चात मुस्लिम सिद्धी लोग पाकिस्तान की ओर पलायन कर गये। जहाँ यह लोग पाकिस्तान के मकरान व कराची में बस गए। पाकिस्तान में इन सिद्धी हब्शी लोगों को अत्यधिक नस्लीय-भेदभावपूर्ण व्यवहार और अत्याचार झेलना पड़ता है। जबकि भारतवर्ष में रह गए मुस्लिम सिद्धी हिंदु सिद्धी -और- कैथोलिक ईसाई सिद्धी अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं। नीग्रो लोगों की एक सर्वश्रेष्ठ खूबी या यूँ कहें इनकी USP इनके अंदर ऐथलेटिसिज्म या जबर्दस्त खेल क्षमता (या स्पोर्ट्समैनशिप) का होना है। दुनियाभर के जिन-जिन गोरे देशों में नीग्रों दास बनाकर ले जाए गये वह वह देश अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की खेल स्पर्धाओं में बहुत से गोल्ड मेडल प्राप्त करते हैं क्योंकि उन उन देशों ने इनकी खेल क्षमता का उपयोग देश को मेडल दिलवाने में किया है। दुर्भाग्य से भारतवर्ष ने सन १९८० के दशक में SAI यानि स्पोर्ट्स आथिरिटी आफ इन्डिया ने इस पहल पर काम तो किया परन्तु यह योजना नौकरशाही और किन्ही आन्तरिक कारणों से ड्राप आउट कर ली गई। जिन बच्चों को इस योजना के तहत ट्रेनिंग इत्यादि दी जा रही थी उन्हें वापस भेज दिया गया, जिससे इन सिद्धी बच्चों के मन में गहरी निराशा फैल गई।

वैसे तो भारतवर्ष में सिद्धी लोगों ने स्थानीय भाषा, पहनावे, संस्कृति, तथा मान्यताओं को स्वीकार किया है। फिर भी चमड़ी का रंग उनके इस राष्ट्र के साथ अन्तर्लीन होने में प्रमुख बाधा के रूप में देखा गया है। वैसे तो इस सृष्टि से पंक्ति भेद कभी नष्ट नहीं हो सकता क्योंकि यह हमेशा-हमेशा से अस्तित्व में रहा है। फिर भी इसे खत्म करने की दिशा में कदम बढाने की नितांत आवश्यकता है। देखा जाए तो इन हब्शी लोगों की भारतवर्ष में स्थिति अमेरिका व ब्रिटेन की तुलना में बहुत अच्छी है। क्योकि अमेरिका में इनके विरूद्ध बहुत नस्लीय भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता है। यहाँ तक कि पुलिस खुलेआम इनकी हत्या तक कर देती है। वहीं भारतवर्ष में इनके उत्थान हेतु सरकार ने इन्हें शिड्यूल्ड ट्राइब्स के तहत आरक्षण प्रदान करने का सुअवसर दिया है, ताकि यह लोग सरकारी नौकरी प्राप्त कर एक सम्मानजनक जीवन जी सकें।

 

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वहीं अमेरिका तथा ब्रिटेन खुद के गिरेबान में न झाँककर भारत को ज्ञान पिलाते रहते हैं कि भारत में समाज के कुछ वर्ग असहिष्णुता का शिकार हैं, उनके साथ सही व्यवहार नही किया जाता। अमेरिका की यह उलटबाँसियाँ भारत की जनता नही जानती है। बहुत बार अफ्रीकी लोगों ने इन भारत में बसे सिद्धी लोगों को पुनः अपने मूल देश में बसने का प्रलोभन दिया लेकिन इन्होंने अस्वीकार कर दिया। यह लोग अब वहाँ पूरी तरह से एडजस्ट नहीं हो सकते हैं क्योंकि वहाँ के मूल लोगों के साधन सुविधाओं में इनके कारण कमी होगी, और एक ही समुदाय के दो परस्पर भिन्न गुटों के बीच अकारण ही शत्रुता जन्म ले सकती है। वास्तव में कोई पेड़ जब बड़ा हो जाता है तो उसे स्थानांतरित नहीं किया जा सकता है, स्थानान्तरित करने में उस पेड़ के जीवित रहने की संभावना क्षीर्ण हो जाती है। ठीक इसी संदर्भ में भारतवर्ष के इन हब्शी सिद्धी लोगों ने अफ्रीकी लोगों के द्वारा उन्हें अपने मूल स्थान में पुनः बसने के लिए दिए गए आमंत्रण को सहर्ष ठुकरा दिया

पिछले हजार से अधिक वर्षों से अपने मूल स्थान से कट जाने के कारण इन सिद्धी लोगों की अपनी मूल भाषा,संस्कृति और परंपराओं का लोप हो गया। केवल स्वाजातीय विवाह ही होने के कारण इनके शारीरिक ढाँचे-रंग-रूप आदि में किंचित भी परिवर्तन नही आया। परंतु इन्होंने अपने पारंपरिक नृत्य-संगीत कला आदि को अभी तक भी जीवित रखा है। पुरातन समय में विभिन्न सांस्कृतिक आक्रमणों को झेलने और उनका दृढता से मुकाबला करने के बाद उन परकीय धारणाओं ने सनातन की पुण्य सलिला गंगा में स्नान कर स्वयं को पवित्र कर लिया। सनातन धर्म की पाचन क्षमता अत्यधिक प्रबल थी। उसने सभी वैदेशिक आक्रमणकारी शक्तियों को स्वयं में मिला लिया और उसे पचाकर परिमार्जित कर दिया। किंतु समय की वेगवती धारा में सभी क्रिया प्रक्रियाऐं सदैव एक ही रहें यह संभव नहीं। अरब से हुए भीषण आक्रमणों के बाद सनातन धर्म को बचाने हेतु यह संस्कृतियों को पचाने वाला सिद्धांत काम न आ सका। (Assimilation of the Invaders Culture and Religion ) अतः युगधर्म बदला और एक अन्य विचार प्रकिया ने भारतीय धर्म और संस्कृति को बचाने का बीड़ा उठाया।

अब वैदेशिक सांस्कृतिक आक्रमणों से भारतवर्ष और सनातन धर्म को बचाने हेतु जात्याभिमान या जातीय स्वाभिमान के अभिनव विचार ने प्रवेश किया। जिस प्रकार कमठ (कछुआ) स्वयं की रक्षा हेतु अपने सभी अंगो को सिकोड़कर अपनी कठोर पीठ के नीचे छुपा लेता है ठीक उसी प्रकार सनातन धर्म को बचाने हेतु अब हिन्दुत्व में जातीय स्वाभिमान की ढाल ले कछुए की पीठ का कार्य किया। सभी वर्ग और वर्णों में जातीय स्वाभिमान उन्हें परकीय विचार और मत अपनाने से रोकने में कारगर सिद्ध हुआ। जातिच्युत, जाति बहिष्कृत होने से राजा भी डरने लगा। अतः कुल मिलाकर कहा जाए तो इस प्रक्रिया से सनातन धर्म की पूर्णरूपेण रक्षा संभव हुई। किंतु इस जात्याभिमान या जातीय स्वाभिमान रूपी युगधर्म के कारण अब अन्य मत पद्धतियाँ सरलता से हिंदुत्व में प्रवेश नही कर पाईं। यह इसका नकारात्मक पहलू भी रहा और कमोबेश इन्हीं कारणों से यह हब्शी भी पूर्णरूपेण सनातन धर्म में विलीन नही हो पाये। 

यदि भारतवर्ष इन सिद्धी लोगों को खेलों के माध्यम से मौका दे तो, भारत अपनी अन्तर्राष्ट्रीय छवि को विश्व स्तर पर ऊँचा उठा सकता है। खेल विश्व स्तर पर देश को प्रतिष्ठित करने का एक शक्तिशाली उपकरण और माध्यम है। आज अमेरिका, ब्रिटेन, साउथ अफ्रीका, जैसे बहुत से देशों ने इन हब्शी लोगों की अद्वितीय खेल प्रतिभा को मौका देकर इसके माध्यम से देश का मान बढाया है। आज गुजरात, कर्नाटक, हैदराबाद में बसे सिद्धीयों को गुजराती, कन्नड़, कोंकणी, हिंदी आदि देशज बोलियाँ बोलते देखकर इस महान चिरंतन राष्ट्र की सहअस्तित्व, और विश्वबन्धुत्व की भावना का सहज ही बोध हो जाता है

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