क्या है कल्लूरी मॉडल, कौन हैं शहरी नक्सलवादी? - जानिये

Written by बुधवार, 10 मई 2017 21:22

काफी समय से राष्ट्रीय विमर्श से गायब रहे नक्सली सुकमा में लगातार दो हमलों के बाद फिर से चर्चा के केंद्र में हैं। नक्सलवादियों की यही रणनीति भी है कि बीच बीच में इस तरह की क्रूर हिंसात्मक गतिविधियों द्वारा देश को झकझोरते रहें।

हाल ही में एक परचा सामने आया है, जिसमें नक्सलियों ने संघ की आनुषांगिक "लीगल राईट्स ओब्ज़रवेट्री" के सदस्यों को जान से मारने की धमकी दी है, क्योंकि यह संस्था दिल्ली में स्थित कुछ "तथाकथित बुद्धिजीवियों" को न्यायिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था के माध्यम से बेनकाब करने में लगी हुई है. नक्सली इस तरह के क्रियाकलापों के द्वारा जहाँ सरकार के खिलाफ अपनी इस अनैतिक लड़ाई को जीवित एवं सक्रिय दिखाना चाहते हैं, वहीँ अपने "शहरी सफेदपोश थिंकटैंक" को भी अपनी क्षीण होती शक्ति का एहसास न होने देने का प्रयास करते हैं। नक्सलवादियों की शैतानी हरकतों पर पर्दा डालने के लिए छद्म बुद्धिजीवी (जिन्हें शहरी नक्सली कहना ज्यादा उचित होगा) भिन्न भिन्न तरह के सैद्धांतिक मुखौटे पहनाने का स्वांग भरते हैं। ये लोग सरकारी खर्चो पर सेमीनार करके, प्रेसवार्ता करके, नक्सलियो के साहित्य का वितरण करवाकर, नक्सलियो के लिए सहानुभूति बटोर कर, विभिन्न क्रियाकलापो द्वारा अपने इस कुत्सित अभियान को अंजाम देते हैं।

आम भारतीय जनमानस को इस विषय में बेहद सतर्क और जागरूक रहने की आवश्यकता है, जो कि इस आलेख का मकसद भी है। नक्सलवादी कतई सिद्धांतविहीन हैं, ये लोग अपने नापाक सिद्धांतो की आड़ में आदिवासी महिलाओं के यौन शोषण को अंजाम दे रहे हैं, जनता से अवैध धन उगाही करना इनका प्रमुख धंधा है, बूढों बच्चो को अपनी ढाल बनाकर पूरे क्षेत्र में स्वघोषित तानाशाही के जरिये अकूत धन संपत्ति एकत्रित कर रहे हैं। नक्सलियो का एक ही ध्येयवाक्य है "सत्ता बंदूक की नली से निकलती है" अर्थात इनकी दृष्टि हिंसा ही सत्ता प्राप्ति का एकमेव साधन है। सबसे बड़ी बात यह है कि नक्सली दुर्दांत हिंसा के जरिये जिस सत्ता को पाना चाहते हैं, उसके प्रशासन के लिए उनके पास कोई सुविचारित गवर्नेंस मॉडल भी नही है। अभिप्राय यह है कि अपने शहरी आकाओं की सरपरस्ती में कुछ लोग थोथे सिद्धांतो को गढ़कर भारतीय शासन के खिलाफ अनैतिक लड़ाई लड़कर अपने ही लोगो का खून बहा रहे हैं, ये लोग खुद को जिनका रहनुमा दर्शाते हैं उन्ही आदिवासियों का भरपूर शोषण कर रहे हैं, और यह सब शहरो में बैठे नक्सली तथाकथित बुद्धिजीवियों के इशारे पर हो रहा है।

शुरूआती दशकों में सरकारी उदासीनता से नक्सलवाद को पनपने का खूब अवसर मिला, जो हमें नक्सलवाद के विस्तार में साफ़ दिखाई देता है। एक रिपोर्ट के अनुसार एक समय 200 से अधिक जिलों तक नक्सलवाद फ़ैल चुका था, लेकिन अब सिमटकर 107 जिले नक्सलवाद की चपेट में हैं। छत्तीसगढ़ को नक्सली समस्या विरासत में मिली, आंध्रप्रदेश और बंगाल के नक्सलवादी संगठनों ने छत्तीसगढ़ के स्वर्ग बस्तर संभाग को अपना ठिकाना बनाकर वहां के आदिवासी समुदाय के जीवन में जहर घोलना शुरू कर दिया। नक्सलवाद के मामले में सबसे विकट स्थिति छत्तीसगढ़ की ही रही है, सबसे बड़े और ज्यादा आघात छत्तीसगढ़ ने ही सहे हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से छत्तीसगढ़ की स्थिति में सुधार दिखाई दे रहा था। बकौल छत्तीसगढ़ सरकार दक्षिण बस्तर में 220 किमी सड़क का निर्माण हुआ, रावघाट रेल लाइन शुरू हुई, मूलभूत सुविधाएं लोगो तक पहुंची जिनका सकारात्मक असर वहां दिख रहा है। सरकार ने नक्सलवादी संगठनों के खात्मे के लिए समय समय पर कई तरह के प्रयोग किये हैं,जिनमे सलवा जुडूम और कल्लूरी मॉडल ये दोनों नक्सली समस्या से निबटने में काफी प्रभावशाली रहे थे। लेकिन कोर्ट की " विशेष" अनुकम्पा से अब दोनों ही इस ऑपरेशन से बाहर हैं। सलवा जुडूम पर काफी चर्चा हो चुकी है,लेकिन कल्लूरी मॉडल पर चर्चा आवश्यक भी है, और प्रासङ्गिक भी। आखिर क्या है कल्लूरी मॉडल?? और शहरी तथा जंगली नक्सली कल्लूरी से इतना खौफ क्यों खाते हैं? आईये देखते हैं...

आई पी एस. एस आर पी कल्लूरी बस्तर जोन के पूर्व आई जी रह चुके हैं। 2004 में सरगुजा के एस पी के तौर पर ज्वॉइन करने के बाद से जनवरी 2017 तक कल्लूरी साहब का यही (बस्तर संभाग) ही कार्यक्षेत्र रहा है। कल्लूरी 2 साल तक आईजी बस्तर के तौर पर कार्यरत रहे, कल्लूरी के बारे में तमाम नक्सल विशेषज्ञो की राय रही कि जब तक कल्लूरी बस्तर में रहे, तब तक नक्सलियो पर ही कल्लूरी का दबाव रहा, ज्यादातर नक्सली कमांडर कल्लूरी के कार्यकाल में बस्तर छोड़ कर भाग गए थे, सरकार भी यह मानकर चल रही थी कि कल्लूरी के चलते पहली बार नक्सली बैकफुट पर हैं तथा कमजोर दिख रहे हैं। कल्लूरी खुद रात रात भर चलकर नक्सलियो के खिलाफ सफल ऑपरेशन अंजाम देते रहे, सटीक रणनीति से नक्सलियो को अपने जाल में फंसा कर नक्सलियो को भारी नुकसान पहुंचाया। 2 नवम्बर 2016 को राज्योत्सव समारोह में जब मोदी छत्तीसगढ़ गए थे तो वह कल्लूरी की सफल गतिविधयों के कारण विशेष रूप से कल्लूरी से मिले। इस मुलाकात में कल्लूरी ने मोदी जी को 2018 तक नक्सलवाद के खात्मे का आश्वासन दिया था, जिससे मोदी काफी प्रसन्न हुए थे, लेकिन दुर्भाग्य से नक्सल समर्थक शहरी एक्टिविस्ट कल्लूरी को आई जी बस्तर के पद से हटवाने में कामयाब रहे, यह एक बड़ी साजिश थी जिस पर आगे विस्तार से चर्चा करेंगे, पहले नक्सलियो से निबटने में सफल रहे कल्लूरी मॉडल की चर्चा कर लेते हैं।

कल्लूरी साहब ने मिशन 2016 के तहत 5 बिंदुओं पे काम किया। बड़े स्तर पर जनजागरण अभियान चलाया गया, अग्नि सरीखे कई सामजिक संगठनों के माध्यम से जनता तक सीधी पहुँच बनायी, संवाद स्थापित किया जिससे नक्सली गतिविधियों की जानकारी हासिल करने में भी सहूलियत हुई।जनजागरण के माध्यम से नक्सलियो को आत्मसमर्पण का अभियान और समर्पित नक्सलियो के पुनर्वास की सही व्यवस्था बनायी, जिसका प्रभाव यह हुआ कि वर्ष 2016 में सबसे ज्यादा नक्सलियो का आत्म समर्पण हुआ। हिंसक नक्सलियो पर आक्रामक एनकाउंटर ऑपरेशन को अंजाम दिया गया जिसके तहत पिछले वर्ष सबसे ज्यादा नक्सलियो का वध करने में सफलता मिली। चौथे बिंदु के तहत बस्तर के विकास कार्यों को सुरक्षाबलों ने रणनीतिपूर्वक सुरक्षा प्रदान की, जिससे सड़क, बिजली तथा मूलभूत सुविधाओं का दायरा काफी मात्रा में बढ़ा, सरकारी आंकड़े भी इसकी तस्दीक कर रहे हैं। विशेषज्ञो का मानना है कि विकास कार्यों की बढ़ती पहुंच से नक्सली बेहद बौखलाए तथा हतोत्साहित दिख रहे थे, क्योंकि इससे सरकार की सीधी पहुंच जनता में बन पा रही थी जिसे नक्सलियो ने बरसो से बंदूक के दम पर रोका हुआ था। पाँचवे बिंदु के रूप में डी आर जी (डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड) के तहत स्थानीय युवकों की भर्ती कर, उन्हें प्रशिक्षित कर सुरक्षाबलों के साथ संयुक्त अभियान चलाना। इससे नक्सलियो के खिलाफ स्थानीय सहयोग से सफल आप्रेशन के संचालन में काफी सफलता मिली। इन्ही रणनीतियों का परिणाम हुआ कि वर्ष 2016 में नक्सलियो का समर्पण और वध ज्यादा मात्रा में हुआ तथा इसकी अपेक्षा काफी कम सुरक्षाकर्मी शहीद हुए, जबकि पहले के आंकड़े काफी विपरीत होते थे।

कल्लूरी ने बस्तर की जनता में सीधी पैठ बनायी, उनकी समस्याओं का समाधान किया, इस कदम से लोकल इंटेलिजेंस भी मजबूत हुई जिससे नक्सल विरोधी अभियान को काफी सफलता मिली। कल्लूरी के इन सदाशयता पूर्ण कदमो से बस्तर की 40 लाख जनता उन्हें हीरो के रूप से देखती है, इसीलिए जब कल्लूरी को अचानक उनके पद से हटाया गया तो जनता ने कल्लूरी की वापसी के लिए तमाम जगह प्रदर्शन भी किये। ध्यातव्य है कि जैसे ही कल्लूरी को हटाया गया तभी इस बात की आशंका जताई गई थी, कि अब निश्चित तौर पर नक्सली हमलावर हो सकते हैं, वही हुआ भी. 29 जनवरी 2017 से अब तक कुछ ही समय में 50 से ज्यादा सुरक्षाकर्मी शहीद हो चुके हैं। 

अब इस पूरे घटनाक्रम के दुसरे पक्ष पर भी विचार करना आवश्यक है,जिसके बाद देश के जागरूक बुद्धिजीवी नागरिकों की भूमिका नक्सलियो के विरुद्ध इस संघर्ष में स्पष्ट हो सकेगी। जैसे ही कल्लूरी की सफल रणनीति से बस्तर में हथियारबंद नक्सली खात्मे की ओर जा रहे थे, वैसे वैसे नक्सलियो के शहरी थिंकटैंक में बैचेनी बढ़ती जा रही थी। नक्सलियो के शहरी थिंकटैंक/शहरी नक्सली हथियारबंद नक्सलियो से भी कहीं अधिक खतरनाक हैं। शहरी नक्सलियो में कुछ अकादमिक लोग हैं जो विभिन्न विश्वविद्यालयों तथा शिक्षण संस्थानों में कार्यरत हैं, तमाम न्यायविद जिनमे वकील और न्यायाधीश शामिल हैं, अनेको तथाकथित मानवाधिकार के मुखौटे पहने स्वघोषित कार्यकर्ता, सैंकड़ो NGO, अफसर, नेता, सामाजिक कार्यकर्ता आदि शामिल हैं। यह एक व्यापक संगठित गिरोह है, जो हथियारबंद नक्सलियो को हर तरह की रणनीति, जानकारी, सहायता मुहैया कराते हैं, नक्सलियो के लिए समाज में, न्यायालय में, मंत्रालय में सहानुभूति बटोरते हैं, अगर आसानी से बात नही बनती तो शहरो में कुछ मीडिया संस्थानों की देखरेख में उग्र प्रदर्शन करना भी इनकी रणनीति का हिस्सा होता है। शिक्षण संस्थानों में नक्सल समर्थक सेमिनार, भारत राष्ट्र और संविधान के खिलाफ लोगो को बरगलाना तथा शहरो में नेटवर्क खड़ा करना इनका ख़ास मकसद होता है।

बड़े शहरी नक्सलियों का खूंखार नक्सलियों से संबंध भी अब तो प्रमाणित होने लगा है. पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जीएन साईबाबा जो नक्सलियों के थिंक टैंक के तौर पर सक्रिय था उसे के साथ संबंध प्रमाणित होने पर सजा भी हुई है. इसी तरह अर्चना प्रसाद ऑफिसर JNU नंदिनी सुंदर दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स पर विनीत जोशी (दिल्ली के जोशी अधिकार संस्थान से) नक्सलियों से मिलकर एक आदिवासी शामनाथ बघेल की हत्या के मामले में एक FIR दर्ज हुई थी जिसे सुप्रीम कोर्ट के जज ने बिना जांच की ही स्थगन लगा दिया। आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि यह लोग समय-समय पर बस्तर जाते हैं, कुछ गांवों का दौरा करते हैं तथा वहां से नक्सलियों का विरोध करने वाले परिवारों को चिन्हित कर नक्सलियों को कमांडरों को बताते हैं तथा नक्सली कमांडर उन पर आक्रमण कर उन निर्दोष, अन्याय से लड़ने वाले आदिवासियों को मार देते हैं। यहाँ पर यह प्रश्न भी खड़ा होता है कि सरकारी सेवा के लोगों को बार-बार नाम बदलकर बस्तर जाने की छुट्टी कैसे मिल जाती है और इनके क्या हित वहां सध रहे हैं? यह नाम कुछ नमूना भर हैं। मानवाधिकार आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक शहरी नक्सलियों की अच्छी पैठ है, तभी तो निर्दोष आदिवासियों और सुरक्षाबलों की नृशंस हत्याओं से भी इनके कान खड़े नहीं होते, लेकिन जब ये ही लोग शहरी नक्सलियों की अर्जियों पर दुर्दांत नक्सलियों के पक्ष में तुरंत सक्रिय हो जाते हैं। बस्तर में भी कई सफेदपोश लोग नक्सलियों के पक्ष में सक्रिय रहते हैं, जिनका मकसद दिल्ली तथा तमाम जगह स्थित शहरी नक्सलियों तथा हथियारबंद नक्सलियों के बीच समन्वय स्थापित करना, रणनीति बनाना, उन्हें सहायता उपलब्ध कराना होता है तथा जो अवैध धन खूंखार नक्सली उगाही करते हैं उस धन को लेकर ठिकाने लगाने का भी होता है।

मालिनी सुब्रमण्यम, शालिनी गेरा, बेला भाटिया, हिमांशु कुमार, गौतम नवलखा जैसे लोग सफेदपोश बन कर नक्सलियों की सहायता करने का काम कर रहे हैं। स्थानीय जनता इन लोगों के बारे में जान चुकी है इसलिए 22 जनवरी और उसके पहले भी वहां के स्थानीय लोगों ने बेला भाटिया के घर के सामने लोकतांत्रिक रूप से प्रदर्शन किया, स्थानीय लोग बेला भाटिया के नक्सल से संपर्क गतिविधि से खफा है, वे लोग चाहते हैं कि बेला भाटिया बस्तर क्षेत्र को छोड़कर कहीं और चली जाए जिससे बस्तर क्षेत्र से नक्सली गतिविधि खत्म हो सके। इसके बाद तमाम शहरी नक्सली कल्लूरी के खिलाफ सक्रिय हुए तथा मानवाधिकार आयोग पर दबाव बनाकर 27 जनवरी को कल्लूरी को बस्तर से हटवाने में कामयाब रहे। सूत्रों का कहना है कि 200 से अधिक देशों से शहरी नक्सलियों ने बेला भाटिया के पक्ष में सीएम, पीएम, मानवाधिकार आयोग और तमाम अधिकारियों को मेल और कॉल के माध्यम से बेला भाटिया के पक्ष में समर्थन किया, कल्लूरी का विरोध किया, बेला भाटिया के लिए सुरक्षा उपलब्ध करवाने के लिए मुहिम चलाई और कल्लूरी को हटवाने के लिए मुहीम चलाई।

कल्पना कीजिए कि शहरी नक्सलियों का संगठित गिरोह इतना मजबूत निकला कि अपने प्रभाव क्षेत्र से मुक्त होते बस्तर से अपने मुख्य शत्रु कल्लूरी को हटवाने में कामयाब रहे। शहरी नक्सली हथियारबन्द नक्सलियों जितने ही अपराधी हैं, जिनमें अग्निवेश, प्रशांत भूषण, बेला भाटिया, गोपाल राय, विनायक सेन, जी एन साईं बाबा, अर्चना प्रसाद, नंदिनी सुंदर, मालिनी सुब्रमण्यम, संजय पराते, सोनी सोरी जैसे अनेक नाम है। अनेक संस्थाएं यहां तक कि सरकारी /सामाजिक संस्थाओं में भी शहरी नक्सलियों का पक्का नेटवर्क काम कर रहा है। नक्सली जो धन उगाही करते हैं उसमें से सारा धन इन्हीं शहरी नक्सलियों के पास आता है, लेकिन हथियारबंद गरीब नक्सली जो अपनी जान पर खेलते हैं वे पूरी तरह गरीब ही बने रहते हैं। आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार केवल बस्तर से 11 सौ करोड़ धन की उगाही नक्सली करते हैं, जिसे नक्सलियों के बड़े कमांडर और उपर्युक्त शहरी नक्सली आपस में बांट लेते हैं। वस्तुतः जब सुकमा जैसी घटना होती तब पूरे देश का खून खोलता है, अत्यंत वेदना की अनुभूति होती है, लेकिन कहीं ना कहीं हम इन घटनाओं के सूत्रधारों सही से पहचान नहीं पाते, जो कि देश के लिए जानना पहचानना बहुत जरूरी है।

इस पूरी हिंसा और बदहाली के पीछे शहरी नक्सली थिंक टैंक हैं। ये लोग यूं ही नक्सलियों द्वारा उगाही किए धन से ऐश आराम करना चाहते हैं, वह नहीं चाहते की खून बहने का सिलसिला रुके। अनेको देशों में इनका नेटवर्क सरकारों के लिए भी दुविधा की स्थिति पैदा करता है। मीडिया, न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका भी शहरी नक्सलियो के प्रभाव से अछूता नहीं है। सुरक्षा बलों का स्पष्ट मानना है कि वह हथियारबन्द नक्सलियों से तो लड़ सकते हैं सकते हैं, जीत सकते हैं परंतु शहरी नक्सलियों के कुटिल हथकंडो से निबटना उनके लिए भी कठिन काम है। ऐसी स्थिति में शहरी नक्सलियो से निबटने का काम जागरुक नागरिक को अपने हाथों में लेना होगा, लगातार तीक्ष्ण दृष्टि से इनकी पहचान कर इन्हें बेनकाब करना होगा, इनका लगातार सामाजिक बहिष्कार करना होगा, सरकार पर दबाव बनाना होगा कि वह इन लोगो पर नकेल कसे। जैसे ही शहरी नक्सलियो का संगठित गिरोह का खात्मा होगा वहीँ से दुर्दांत नक्सली पूर्ण समाप्ति की ओर धकेल दिए जाएंगे। शहरी नक्सलियों से चल रही इस लड़ाई में यही हमारी आहूति होगी। 

Read 6223 times Last modified on गुरुवार, 11 मई 2017 07:40
न्यूज़ लैटर के लिए साइन अप करें