इंजीनियर पति और CA पत्नी :- कृषक और गौपालक

Written by सोमवार, 24 अप्रैल 2017 07:48

कहाँ तो एक मेकेनिकल इंजीनियर पति और एक चार्टर्ड अकाउंटेंट पत्नी की ऑस्ट्रेलिया जैसे देश में शानदार नौकरी, उच्च जीवनशैली, तमाम सुख-सुविधाएँ और वर्ष में दो बेहतरीन लंबे अवकाश... और कहाँ तेलंगाना के महबूब नगर के धूल भरे खेत, गायों का गोबर और दिन भर धूप में कड़ी मेहनत...

यदि किसी को भी इसमें से एक चुनने को कहा जाएगा तो वह पहला विकल्प ही चुनेगा... लेकिन आंधप्रदेश के रहने वाले रंगनाथ उप्पू दम्पति की सोच कुछ अलग है. ऑस्ट्रेलिया की उस शानदार जीवनशैली को अलविदा कहकर, वहाँ से अपना सारा पैसा और संपत्ति समेटकर ये दम्पति अपने मूल गाँव अय्यावारीपल्ली में आ बसे हैं और अब यहाँ अपने 26 एकड़ के खेत में प्राकृतिक और देशी खेती के विभिन्न प्रयोग करते हैं. केवल तीन वर्षों में ही उन्होंने खेती और गौ-आधारित दुग्ध उत्पादों से अच्छा मुनाफ़ा कमाना शुरू कर दिया है.

रंगनाथ के अनुसार, IT क्षेत्र में आए बूम के कारण हमारे इलाके में किसानों के कई बेटे अपना पुश्तैनी काम यानी खेती छोड़कर विदेशों में जा बसे और इधर गाँव वीरान हो गए, बूढ़े माता-पिता अकेले रह गए. कृषिप्रधान कहा जाने वाला देश विदेशी खाद्यान्न मंगवाने लगा और रासायनिक उर्वरकों ने भारत की जमीन को बंजर बनाना शुरू कर दिया. कई वर्षों से मेरे दिमाग में यह कौंध रहा था कि आखिर हम कर क्या रहे हैं? क्यों हम विदेशों में विदेशियों की नौकरी कर रहे हैं? लेकिन कोई रास्ता नहीं सूझता था, नौकरी छोड़ने की हिम्मत भी नहीं होती थी. मैं यह सोचकर विदेश गया था कि जल्दी से अच्छा पैसा बना लूँगा और भारत वापस आ जाऊँगा, लेकिन वैसा नहीं हुआ... अपनी जीवनशैली में मैं भारत आना ही भूल गया. सिंगापुर में दो वर्ष तथा ऑस्ट्रेलिया में दस वर्ष नौकरी करने के बाद समझ में आया कि उधर माता-पिता बूढ़े हो रहे हैं और अकेले पड़ गए हैं, अब वे हमारे साथ नहीं आ सकते और थोड़ी सी जमीन जो बची है वह अनुपयोगी होने के कारण बंजर होती जा रही है. मैंने अपनी पत्नी अपर्णा के साथ लंबा विमर्श किया, पैसों का हिसाब लगाया और पाया कि अब यदि हम सादा जीवन व्यतीत करें तो आराम से जीवन भर बैठे-बैठे खा सकते हैं... तो क्यों न हम अपनी गाँव की जमीन को कुछ लौटाएँ?

रंगनाथ उप्पू और अपर्णा अपना सब कुछ समेटकर गाँव पहुँच गए. दोनों पति-पत्नी ग्रामीण पृष्ठभूमि से थे और उनका बचपन गाँव में ही बीता था, इसलिए उन्हें शुरुआती दिक्कतों के बावजूद माहौल में रमने में अधिक कठिनाई नहीं हुई. रंगनाथ के ससुर ने उनके इस निर्णय को मूर्खतापूर्ण करार दिया और शानदार नौकरी छोड़ने को लेकर खरी-खोटी सुनाई. उनका कहना था कि खेती इतनी सरल नहीं है, जितना तुम दोनों समझरहे हो और जो तकलीफें हमने खेती में उठाई हैं, वह तुम लोग नहीं उठा पाओगे, लेकिन ना तो वे अपनी बेटी अपर्णा और ना ही दामाद को उनके मार्ग से डिगा पाए. ऑस्ट्रेलिया से लौटते ही दोनों ने चौबीस एकड़ बंजर जमीन खरीदी... दो एकड़ परिवार के पास पहले से थी. दोनों पति-पत्नी इन्जीनियर होने के कारण ऐसे ही खेती में नहीं कूद पड़े, पहले उन्होंने अध्ययन किया. महबूबनगर इलाके की मिट्टी के बारे में थोड़ा रिसर्च किया और गाँव के बुजुर्गों से सलाह-मशविरा किया. कई किताबें पढीं और सैकड़ों वेबसाइटों को खंगाला. इसके बाद उन्होंने निर्णय किया कि प्राकृतिक खेती की शुरुआत प्रायोगिक रूप से वे केवल दो एकड़ से ही करेंगे. उन्होंने मूंगफली, मसूर और बाजरा उगाने का फैसला किया.

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सबसे पहले शुरुआत हुई देशी मूल के गायों की खोज से. रंगनाथ उप्पू दम्पति इसके लिए ठेठ गुजरात के गीर तक पहुँचे और वहाँ से उन्होंने सोलह गाएँ खरीदीं. खेतों के पास ही अपनी गौशाला बनाई और गाय के गोबर तथा गौमूत्र से पंचगव्य खाद बनाने की शुरुआत की. शुरुआत के कुछ महीने उन्हें जमीन समतल करने, उसकी मिट्टी को उपचारित करने में लग गए, इसके बाद जब उन्होंने प्राकृतिक ट्रीटमेंट शुरू किया तो नतीजे उत्साहवर्धक दिखाई देने लगे. सुभाष पालेकर नामक किसान (जिन्हें हाल ही में मोदी सरकार ने पद्म सम्मान दिया है) से भी रंगनाथ की चर्चा हुई और उन्होंने कहा कि सिर्फ किताबों और इंटरनेट के भरोसे मत रहो, गाँव के बुज़ुर्ग किसानों के अनुभव तथा आसपास के गाँवों के किसानों का व्हाट्स एप्प समूह बनाकर अपने अनुभव शेयर करो तभी लाभ होगा. रंगनाथ ने वैसा ही किया.

अपर्णा कहती हैं कि पिछले बीस-तीस वर्षों में खाद कंपनियों ने रासायनिक उर्वरकों के जरिए हमारे देश की जमीनों को बर्बाद कर दिया है और हमारे स्वास्थ्य को काफी नुक्सान पहुँचाया है. इसीलिए हमें अपने खेतों की जमीन और मिट्टी को पुनः स्वास्थ्यवर्धक बनाने के लिए थोड़ा समय चाहिए था. इसके लिए हमने नीमस्त्रम, अग्निस्त्रम, जीवामृत जैसे कई स्वदेशी उर्वरकों के साथ गौमूत्र और पंचगव्य का उपयोग किया. यह भी एक विज्ञान ही है और हमें इसे सीखने में काफी मजा आया. तीन वर्षों में रंगनाथ और अपर्णा ने कड़ी मेहनत करके, दिन-रात गायों की सेवा करके, गोबर उठाते, गौमूत्र एकत्रित करते हुए अपने दिन बिताए... और अंततः अपने लक्ष्य को प्राप्त कर ही लिया. आज तीन वर्ष के बाद रंगनाथ की खेती “प्रॉफिट” में आ गई है, क्योंकि प्राकृतिक खाद के लिए उन्हें बाज़ार पर निर्भर नहीं रहना पड़ता, खुद की गौशाला से ही अधिकाँश काम चल जाता है. साथ ही पिछले तीन वर्षों में उन्होंने धीरे-धीरे करके अच्छे उन्नत बीजों की श्रृंखला भी तैयार कर ली है, जिसे वर्ष-दर-वर्ष बढ़ाने और भंडारण करने की योजना है ताकि दूसरे गरीब किसानों को वे बाँट सकें.

अपनी गौशाला में वे आयुर्वेद के नियमों के अनुसार गाय का घी हाथ से बनाते हैं, और चूँकि आसपास के ग्रामीण इनके प्राकृतिक प्रेम, शुद्धता तथा गौसेवा के बारे में जानते हैं इसलिए दूर-दूर से आयुर्वेद के चिकित्सक दवाओं के लिए इनका उत्तम गौ-घृत खरीदने भी आने लगे हैं. इस कमाई से भी इनका काफी खर्चा निकल जाता है. घी बनाने की प्रक्रिया के दौरान जो छाछ निकलती है, उसे वे गौमूत्र में मिलाकर पौधों की जड़ों में डाल देते हैं जिससे पौधों की वृद्धि जबरदस्त होती है. अब उन्होंने पाँच एकड़ जमीन और खरीद ली है जिस पर वे फूलों की खेती करने की योजना बना रहे हैं. रंगनाथ दम्पति इस बात को लेकर दुखी हैं कि अब गाँवों में युवा नहीं बचे हैं, केवल कुछ वृद्ध या अधेड़ किसान ही बचे हैं जो रासायनिक उर्वरकों से बंजर हुई जमीन को बेचकर शहरों में भागने की तैयारी में लगे हैं. उप्पू दम्पति का कहना है कि युवाओं को शुरुआत में एक-दो एकड़ से शुरुआत करनी चाहिए, अब खेती से सम्बन्धित ज्ञान चारों तरफ उपलब्ध है, तकनीक है, पढ़ाई है... बस केवल थोड़ी मेहनत की बात है और दो-तीन साल में ही युवा चाहें तो अपने परिवार लायक कमाने की स्थिति में आ सकते हैं. आखिर हमें अपनी जमीन तो बचाना ही है.... फिर विदेशियों की नौकरी के भरोसे कब तक और क्यों रहा जाए?

रंगनाथ दम्पति से संपर्क करने के लिए आप इस फॉर्म को भर सकते हैं...

https://docs.google.com/forms/d/1OXHydEVjazNUQuCPmCu14n9E9xfkwsR187tMZSV40cw/viewform?ts=58eb57e5&edit_requested=true 

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साभार : The Better India

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