देशी गाय के घी को पश्चिमी वैज्ञानिकों ने बदनाम क्यों किया?

Written by रविवार, 15 अप्रैल 2018 12:30

सन् 2015 में अमेरिका के यू. एस. फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के यह स्वीकार करने के बाद कि भोजन में कोलेस्ट्रॉल लेने का दिल की बीमारियों में कोई संबंध नहीं है, साबित हो गया कि कोलेस्ट्रॉल युक्त भोजन को ना लेने का कोई कारण नहीं है।

फूड इंडस्ट्री ने घी (Native Cow Ghee) एवं कच्ची घानी आदि के अन्य पारंपरिक तेलों को इसलिए बदनाम किया था ताकि सफोला, फाच्र्यून रिफाइंड, एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल जैसे तेलों को दिल के लिए लाभकारी बताकर घर-घर पहुंचा दें। फूड इंडस्ट्री की इस काली करतूत की वजह से घी के प्रति हमारे मन में एक डर घर कर गया है। जिसके कारण पिछले करीब पचास साल से हमने ना केवल घी बल्कि मूंगफली, काजू, नारियल जैसी बेहद लाभदायक चीजों को भी खाना छोड़ दिया था। और तो और दूध भी लो फैट ही लाने लगे। सही बात तो यह है कि घी भोजन की ग्लाइसेमिक इंडेक्स को कम करता है अर्थात घी के प्रयोग से लिए गए भोजन का ग्लूकोस खून में धीरे धीरे पहुंचता है। ऐसा डायबिटीज एवं दिल की बीमारियों के मरीजों के लिए अत्यंत लाभकारी होता है। यही कारण है कि पुराने जमाने से ही खिचड़ी, दाल-चावल एवं अन्य कई व्यंजनों में ऊपर से घी डालकर खाया जाता है। खून में ग्लूकोज धीरे-धीरे रिलीज होने से शरीर एवं दिमाग में ग्लूकोस का सतत् लेवल बना रहता है। घी न केवल हमारे भोजन के स्वाद को बढ़ाता है बल्कि भोजन में घी होने से, कम मात्रा में भोजन करने पर ही भूख शांत होने लगती है। इस प्रकार हम अधिक मात्रा में खाने से बचते हैं। इसके अलावा भोजन में घी की कमी होने से ही भोजन के उपरांत मीठा खाने की इच्छा बनी रहती है।

चाहे हम घी खाएं या तेल सभी में समान कैलोरी होती है। सभी फैट के 1 ग्राम से 9 कैलोरी मिलती है। एक बात और तेल बार-बार गर्म करने से खराब होते है और ट्रांस फैट में बदलते है यही ट्रांस फैट शरीर में जमता है और बीमारियों का कारण बनता है। परंतु इसके विपरीत घी को उबाल कर ही शुद्ध किया जाता है। सबसे ज्यादा स्मोक पॉइंट होने के कारण घी अधिक तापमान को भी सहन करने की क्षमता रखता है। यदि आप असमंजस में रहते हैं तो दिमाग की सोचने समझने की शक्ति को विकसित करने के लिए घी खाइए। क्योंकि घी में मौजूद फैट आसानी से दिमाग में पहुंचते हैं और सोचने समझने की शक्ति को विकसित करने में लाभदायक होते हैं।

घी हमारे आमाशय की जठराग्नि को उसी प्रकार प्रचंड करता है जिस प्रकार यज्ञ की अग्नि को। अत: घी न केवल स्वयं शीघ्रता से पचता है बल्कि भोजन के अन्य अवयवों को भी पचाता है। घी हमारे शरीर में ‘गुड गट बैक्टीरिया’ को बढ़ाता है जो कि भोजन के पाचन एवं अवशोषण के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। घी में मौजूद फैट को प्रीबायोटिक का दर्जा दिया गया है इस प्रकार भोजन में घी का होना अपच, कब्जी, पेट के फुलाव आदि का स्वाभाविक इलाज है। इसी प्रीबायोटिक गुण के कारण घी सबसे अच्छा एंटी एलर्जिन भी है क्योंकि तरह-तरह की फूड एलर्जी का कारण आंतों के बैक्टीरिया का कम होना है । घी में विटामिन ए, डी, इ, के एवं बी12 प्रचुर मात्रा में होते हैं। इनमें से विटामिन ए व डी एंटीआक्सीडेंट होते हैं। अत: घी स्वयं एक एंटीआक्सीडेंट की तरह काम करता है और हमारे शरीर की कोशिकाओं को क्षति से बचाता है। घी हमारे जोड़ों को मजबूती देता है। कच्चे दूध से निकाले गए सफेद मक्खन में वुलजेन फैक्टर मौजूद होता है जो जोड़ों की सामान्य बीमारियों में एवं गठिया में लाभकारी होता है। वुलजेन फैक्टर को एंटी स्टिफनेस फैक्टर एवं एंटी आर्थराइटिक न्यूट्रिएंट भी कहते है।

घी में मौजूद फैटी एसिडस् झुर्रियों रहित, दमकती त्वचा प्रदान करते है। बालों में मजबूती एवं चमक देते हैं। और तो और घी में रहने वाला कंजुगेटेड लिनोलिक एसिड (सीएलए) शरीर की चर्बी को गलाने में सहायक होता है। अत: जिस प्रकार लोहा लोहे को पिघला देता है उसी प्रकार शरीर की चर्बी को गलाने के लिए हमें गुड फैट की आवश्यकता होती है. जून 2014 में यू. के. फूड गाइडलाइन्स, नेशनल इन्सटीटियूट ऑफ हेल्थ केयर एक्सीलेन्स ने माना कि हमारे भोजन में ओमेगा 3 फैटी एसिड्स प्राकृतिक रुप से बादाम, अखरोट और अलसी में मिल जाते हैं। इसके लिए अलग से कैप्सूल या फूड सप्लीमेंट लेने की आवश्यकता कतई नहीं है। क्योंकि यदि ओमेगा 3 एवं ओमेगा 6 फैटी एसिड्स को भोजन में ज्यादा लिया जाता है तो यह शरीर में ट्रांस फैट में बदल जाते हैं और अंगों को क्षति पहुंचाते हैं। इसलिए सभी व्यक्तियो को चाहे वे अपच, मोटापा, शुगर, रक्तचाप या दिल की बीमारी से ही ग्रसित क्यों ना हो, भोजन में शुद्ध घी का प्रयोग भरपूर मात्रा में करना चाहिए।

जब भी हम घी खाने के लिए कहते हैं तो हमारा अभिप्राय देसी गाय के शास्त्रोक्त ढंग से बनाए गए घी से होता है। शास्त्रोक्त ढंग से हमारा अभिप्राय यह है कि पहले गाय के दूध से दही बनाया जाए फिर दही को मथ कर मक्खन निकाला जाए और फिर उससे घी प्राप्त किया जाए। आज कल सीधे सीधे दूध से क्रीम निकाल कर उस से बनाए गए घी में वह गुण और लाभ नहीं होते जो इस लेख में बताए गए हैं। एक बात और घी का सेवन हमेशा अपनी प्रकृति और पाचन शक्ति के अनुसार करना चाहिए। जैसे यदि व्यक्ति वात प्रधान है तो वह कुछ अधिक मात्रा में, पित्त प्रधान है तो सामान्य मात्रा में और कफ प्रधान है तो सामान्य से कम मात्रा में घी का सेवन करना चाहिए। और हां यदि हो सके तो इस विषय में किसी वैद्य का परामर्श भी ले लेना चाहिए।

सामान्यत: घी स्मरणशक्ति, बुद्धि, अग्नि, वीर्य, ओज, कफ और भेद धातु को बढाने वाला होता है वात, पित्त, विषजन्म विकार, उन्माद रोग, राजयक्ष्मा, शरीर की अशोभा (कुरूपता) और ज्वर को नष्ट करता है। यह सभी स्नेहो में श्रेष्ठ है, वीर्य में शीत, रस और विपाक में मधुर होता है तथा विभिन्न द्रव्यों से संस्कारित होने पर इसमें हजार गुना शक्ति आ जाती है अत: हजार प्रकार के कार्य करने वाला होता है। जहां एक ओर घी स्निग्ध होने के कारण वात का शमन करता है वहीं शीतवीर्य होने से पित्त का शमन करता है और अपने समान गुण वाले कफ दोष को संस्कार के द्वारा नष्ट करता है। संस्कार का अर्थ है कि घी किसी भी अन्य चिकनाई की तुलना में अन्य द्रव्यों के गुणों को सहजता से धारण करता है अत:सभी स्नेहो द्रव्यों अर्थात तेल या रिफाइंड आदि की तुलना में घी को ही उत्तम माना गया है।

घी सेवन के अधिकारी — जो मनुष्य वातप्रकृति के या पित्तप्रकृति के हों अथवा वातपैत्तिक प्रकृति के हों, वातज अथवा पित्तज विकारों से पीडि़त हों, अपने नेत्र स्वस्थ रखना चाहते हों, जो छाती पर लगी किसी चोट से पीडि़त हों, जिनका शरीर क्षीण हो गया हो, वृद्ध हो गए हो या अत्यन्त दुर्बल हों, जो दीर्घायु की इच्छा रखते हों जो बल, वर्ण और स्वर को उत्तम बनाना चाहते हों,शरीर में पुष्टि तथा उत्तम सन्तान प्राप्ति की इच्छा रखते हों, शरीर में सुकुमारता, शान्ति, ओज, स्मरण—शक्ति, मेघा (धारणाशक्ति), अग्नि की दीप्ति (पाचन शक्ति में वृद्धि), इन्द्रियों में शक्ति और इन्द्रियों को बलवान बनाना चाहते हों तथा दाह, शस्त्र, विष और अग्नि से पीडि़त हों उन लोगों को घी का सेवन करना चाहिए।

घी सेवन की मात्रा — घी की मात्रा को निर्धारण आयु, प्रकृति, शरीर बल एवं प्रत्येक व्यक्ति की पाचन शक्ति के आधार पर निर्धारित करनी चाहिए तथापि सामान्य रूप से 15—50 ग्राम घी का सेवन दिन भर में किया जा सकता है।
घी या घी से बनी वस्तुओं या खाद्य पदार्थों का सेवन करने के बाद अनुपान के रूप में उष्ण जल का प्रयोग करना चाहिए।

गाय के घृत के गुण

बपाके मधुरं शीतं वात पित्त विषापहम्।
चक्षुष्यं अग्रयं बल्पचं गव्यं सीर्पगुणोत्तरम्।। (सु.सू.45/97)

अर्थात् गाय का घी विपाक में मधुर शीत प्रकृति वाला, वात, पित्त और विष का नाशक, नेत्रों के लिये हितकारी, बलवद्र्धक तथा अन्य प्राणियों के घी की अपेक्षा गोघृत सर्वात्तम गुणयुक्त होता है।

भैंस के घी के गुण

मधुरं रक्तपित्तध्नं गुरु पाके उफापहम्।
वातपित्त प्रशमनं सुशीतं माहिषं घृतम्।। (सु.सू.45/96)

भैंस का घी मधुर, रक्तपित्त नाशक, पचने में भारी, कफवर्धक, वात तथा पित्त को शान्त करने वाला तथा शीतल होता है। 

इतने सारे गुणों के बावजूद षड्यंत्रपूर्वक देशी गाय के घी का हौआ खड़ा किया गया, ताकि देशी-विदेशी कंपनियों के रिफाईन्ड तेल जैसे घटिया पदार्थ को बेचा जा सके. इसके लिए भारतीयों के प्राचीन ज्ञान को नीचा दिखाते हुए उन्हें स्वास्थ्य का नाम लेकर डराया भी गया. लेकिन धीरे-धीरे असलियत खुलने लगी है और लोग वापस पुरानी पद्धति का भोजन करने लगे हैं. यही बात आटा और मैदा पर भी लागू होती है, उसके बारे में फिर कभी... 

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साभार :- भारतीय धरोहर

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