नर्मदा बाँध पर घटिया कांग्रेसी राजनीति का काला इतिहास...

Written by रविवार, 18 जून 2017 08:29

नोट :- प्रस्तुत लेख के लेखक गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री स्व छ्वील दास मेहता जी है, ये लेख उन्होंने कच्छमित्र दैनिक में लिखा था, जिसे मै साभार हिंदी में रूपांतरित कर रहा हूँ ताकि हर भारतीय काँग्रेस की इस गंदी सच्चाई को जान सके.

हाल ही में सरदार सरोवर का काम 56 वर्षों बाद जाकर पूरा हुआ. इस बारिश में सरदार सरोवर पहली बार पूरी तरह भरेगा और इसका पानी सूखाग्रस्त गुजरात के कोने-कोने में पहुँचेगा. बारह वर्षों तक नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहे और उन्होंने अपनी व्यक्तिगत रूचि लेकर इस बाँध और पूरे नर्मदा प्रोजेक्ट की देखरेख की. लेकिन उनसे पहले यह सारा प्रोजेक्ट तमाम तरह की राजनीति, चालबाजी और काँग्रेस द्वारा जानबूझकर की गई देरी की वजह से चर्चाओं में रहा. असल में नर्मदा मुद्दे पर कांग्रेस ने गुजरात की जनता को सिर्फ ठगा है. नर्मदा परियोजना पर उठे विवाद को खुद इंदिरा गाँधी देख रही थी उन्होंने एक कई सदस्यों वाली कमेटी बनाई थी जो इस परियोजना से जुड़े हर पहलुओ पर विचार करके अपना फैसला देने वाले थे| उस समय मै गुजरात का बांधकाम एवं सिंचाई मंत्री था और स्व.चिमनभाई पटेल मुख्यमंत्री थे| तत्कालीन प्रधानमन्त्री स्व. इंदिरा गाँधी खुद नर्मदा मामले में रूचि ले रही थी, और वो जल्द से जल्द इस विवाद का निपटारा चाहती थी| उन्होंने इसके लिए एक हाई-पावर कमेटी बनाई थी और वह कमेटी इंदिरा जी को रिपोर्ट करती थी| कमेटी के सदस्यों के साथ खुद इंदिरा जी ने मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दावो को सुना था, और उन दावो पर जल्द से जल्द विचार करने का आदेश दिया था|

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३० जनवरी १९७४ को मुझे नर्मदा विवाद कर अंतिम फैसले की कापी लेने के लिए दिल्ली बुलाया गया| मै, चिमनभाई और गुजरात की जनता बहुत खुश हुई कि, चलो अब सरदार साहेब का सपना जल्द से जल्द पूरा होगा| साथ ही मेरे ऑफिस में ये एक पत्र भी आया था, जिसमे इस फैसले की भूमिका थी .. उसके अनुसार नर्मदा के कुल अंदाजित २१ मिलियन एकर पानी में से गुजरात को ९ मिलियन पानी मिलेगा और बिजली केवल महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश को मिलेगी. हालांकि ये गुजरात के साथ सरासर अन्याय था, फिर भी हम सहमत थे की चलो कम से कम गुजरात की प्यासी धरती की कुछ तो प्यास बुझेगी| मै दिल्ली जाने की तैयारी में ही था कि एकाएक इंदिरा जी का चिमनभाई के पास संदेश आया कि अभी निर्णय की कापी लेने मत आइयेगा क्योकि निर्णय टल गया है, अब हमने नर्मदा मामले को एक ट्रिब्यूनल के हवाले कर दिया है और अब ट्रिब्यूनल ही इस मामले की सुनवाई करेगी| हम सब ये सुनकर अवाक् रह गये| फिर चिमनभाई ने तहकीकात किया कि आखिर इस फैसले के पीछे कौन सी ताकते है| चिमनभाई ने इंदिरा जी के निजी सचिव आरके धवन को विशवास में लेकर पूछा, और जो धवन साहब ने बताया उसे सुनकर हम दंग रह गये कि क्या भारत के नेता अब इतने नीचे गिर चुके है की अपने निहित स्वार्थ के लिए पुरे राज्य को बर्बाद कर दे? आज जो कुछ मै कच्छमित्र में लिख रहा हूँ उसे मेरे और चिमनभाई के अलावा दूसरा कोई भी नही जानता|

हमे पता चला कि स्व. रतुभाई अदानी [तत्कालीन गुजरात प्रदेश कांग्रेस प्रमुख] ने तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री और इंदिरा गाँधी के काफी करीबी स्व उमाशंकर दीक्षित [शीला दीक्षित के ससुर] को फोन करके कहा कि यदि आप चिमनभाई के शासन में नर्मदा का निर्णय देंगे तो चिमनभाई इस परियोजना को तेजी से पूरा करेंगे और फिर आने वाले ३० सालो तक हम चिमनभाई को गुजरात से हटा नही सकते| इससे चिमनभाई बहुत ही मजबूत नेता बन जायेंगे, इसलिए आप अभी नर्मदा परियोजना को और कुछ सालो तक लटका कर रखो| असल में मित्रो, चिमनभाई कांग्रेस से बगावत करके मुख्यमंत्री बने थे, और जिस तरह से उनका कद बढ़ रहा था उससे इंदिरा जी काफी चिंतित थी| फिर उमाशंकर दीक्षित और रतुभाई अदानी ने इंदिरा जी को कई तरह से इस बारे में समझाया और उनसे ये भी कहा गया कि अभी एमपी और यूपी के विधानसभा चुनाव आने वाले है और इस फैसले से एमपी में भारी असंतोष होगा और एमपी के कई जिले यूपी से सटे हुए है इसलिए इसका असर यूपी के चुनावो पर भी पड़ेगा और कांग्रेस को काफी हार का सामना करना पड़ सकता है| लेकिन सबसे बड़ा नुकसान गुजरात में होगा क्योकि चिमनभाई का कद बहुत ही ज्यादा बढ़ जायेगा| चूँकि इंदिरा जी चिमनभाई को अपने लिए सबसे बड़ा खतरा मानती थी, इसलिए उन्होंने नर्मदा परियोजना को लटकाने के लिए उसे ट्रिब्यूनल के हवाले कर दिया| कुछ वर्षों के बाद गुजरात के अहमदाबाद के गुजरात कालेज में छात्रों ने होस्टल के मेस में खराब खाने को लेकर हड़ताल किया, और इसको एक बड़ी समस्या बताते हुए इंदिरा गाँधी ने चिमनभाई सरकार को ही बर्खास्त कर दिया.

बाद में सब कुछ भूलकर चिमनभाई की विधवा पत्नी उर्मिलाबेन पटेल कांग्रेस के सरकार में केन्द्रीय जलसंसाधन मंत्री बनी, और उनके पुत्र सिद्धार्थ पटेल कई पार्टियों में घूमते हुए आज गुजरात कांग्रेस में है. जबकि चिमनभाई शेरदिल इंसान और मुख्यमंत्री थे, उस समय वर्ल्ड बैंक ने गुजरात को नर्मदा के लिए फाइनेंस हेतु स्पष्ट तरीके से ना बोल दिया था, लेकिन चिमनभाई ने गुजरात की जनता को नर्मदा का पानी मिले, इसके लिए नर्मदा बौंड निकाले और सालाना 19 फीसदी ब्याज देने का एलान किया. इस तरह उन्होंने पैसा एकत्रित कर के ताबड़तोड़ नर्मदा का काम शुरू करवाया, और परियोजना का बहुत सारा कार्य करवाया। परन्तु घटिया काँग्रेसी राजनीती ने इस प्रोजेक्ट में हरसंभव अड़ंगे लगाए और क्रेडिट लेने की कोशिश की. विदेशों से चंदा प्राप्त करने वाले NGO गिरोह की मेधा पाटकर ने भी इस काम में अड़ंगे लगाने की भरपूर कोशिशें की, जिसे कोई गुजरातवासी कभी नहीं भूल सकता.

Read 3590 times Last modified on सोमवार, 19 जून 2017 07:40
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