अंग्रेजों के आँख की प्रमुख किरकिरी :- नाना फडनवीस

Written by बुधवार, 05 अप्रैल 2017 07:56

वाई, महाराष्ट्र के सातारा ज़िले में कृष्ण नदी के तट पर स्थित एक छोटा सा शहर है। सह्याद्री पर्वत श्रृंखला से घिरा, यह शहर कृष्णा नदी पर कई घाटों के लिए प्रसिद्ध है, यहां अनेक प्राचीन मंदिर हैं। वाई की एक पहचान और भी है कि इसने भारतीय इतिहास के दो सबसे महत्वपूर्ण परिवारों को जन्म दिया हैं।

यहां के मोरोपंत तांबे जिन्हें बाद में झांसी की रानी के पिता होने का सौभाग्य मिला और दूसरे नाना फडनवीस. वाई से कुछ दूर स्थित मेन्वाली गाँव में नाना फडनवीस ने अपना वाडा (बंगला) बनाया और तत्कालीन राजनीति के महत्त्वपूर्ण सूत्र वहाँ से हिलाए... नाना फडणवीस ने मराठा संघ के प्रधान मंत्री के रूप में पानीपत के अपमानजनक पराजय के बाद भी मराठा साम्राज्य स्थापित करने में अभूतपूर्व योगदान दिया. उन्होंने यहाँ मेलावली गाँव में निवास किया और यहाँ नाना फडणवीस वाडा और घाट, शिव और मेंनेश्वर मंदिर की स्थापना की। आइये मेन्वाली गाँव के साथ जुडी हुई इस ऐतिहासिक गाथा और एक ऐसे व्यक्ति जिसने अपनी खुफिया और कूटनीति चालों के साथ ब्रिटिश फ़ौज को दो बार हराकर भी अजेय रहा... जी हाँ!! थोड़ा सा नाना फडणवीस के बारे में जानते हैं।

इस उल्लेखनीय प्रतिभा का जन्म सातारा जिले में चितपावन ब्राह्मण परिवार में बालाजी जनार्दन भानू के रूप में हुआ था, नाना उनका उपनाम था। उनके दादा बालाजी भानु को कोंकण क्षेत्र में श्रीवर्धन के समुद्रतट शहर से चले गए थे और पहले पेशवा बालाजी विश्वनाथ भट्ट के करीबी दोस्त थे। बालाजी ने एक बार मुगलों से पेशवा को बचाया था और कृतज्ञता में उन्हें फडणवीस का खिताब मिला। बाद में जब पेशवाओं ने पुणे पर शासन किया, तो उन्हें वित्त मंत्री बनाया गया। परंपरा के अनुसार, बालाजी भानु को उनके दादाजी का नाम और शीर्षक मिला। पेशवा ने उनके बेटे विश्वासराव, माधवराव और नारायणराव के समक्ष उनकी शिक्षा का प्रबंध किया। 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई में भितरघातियों के कारण मिली पराजय और मराठा संहार, पेशवा बालाजी बाजी राव के लिए बहुत मुश्किल समय था। यह मराठा संघ के इतिहास में एक महत्वपूर्ण समय था। पानीपत न केवल मराठा साम्राज्य के लिए झटका था, बल्कि इसके सम्मान और प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिन्ह भी था। इस युध्द में उन्होनें वारिस विश्वास राव को खो दिया, साथ ही बेहतरीन कमांडर सदाशिव राव भाऊ को खो देने के कारण शक्तिहीन मराठा साम्राज्य के पास बहुत सारी वित्तीय समस्याएँ थी. प्रशासन पर कोई नियंत्रण नहीं था, धन की कोई जवाबदेही नहीं थी। पेशवा के रूप में पदभार संभालने वाले माधवराव सिर्फ 17 वर्ष के थे। ऐसी स्थिति में नाना फडनवीस ने युवा पेशवाओं के मार्गदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। गोपालराव पटवर्धन, त्र्यंबकराव पेटे और राम शास्त्री के साथ, फड़नवीस ने पेशवा को सलाह दी और राज्य के मामलों को सही दिशा में आगे बढ़ाया। सही मार्गदर्शन के साथ, पेशवा ने खातों और खजाने पर गौर करना शुरू कर दिया। कुछ ही समय में, राजकोष को विनियमित किया गया था, चोरी को रोक दिया गया और जल्द ही मराठा साम्राज्य सामान्य वित्तीय स्थिति में वापस आ गया।

निजाम पर पेशवा सेना ने जीत हासिल की, और पानीपत के बाद खोया गौरव पुनः प्राप्त किया। माधव राव का जल्द ही टीबी की बीमारी से निधन हो गया और उनके छोटे भाई नारायण राव अगले पेशवा बने। नारायण राव, उनके भाई के विपरीत, अपरिपक्व और प्रशासन चलाने में असमर्थ थे। महत्वाकांक्षी और षडयंत्रकारी रघुनाथ राव, बालाजी बाजी राव के भाई और नारायण राव के चाचा ने इसे अपने लिए सिंहासन को पकड़ने के लिए एक उपयुक्त अवसर के रूप में देखा। जब नारायण राव ने रघुनाथ राव (राघोबा) को बुलाया तब तक भी राघोबा के मन में अगले पेशवा बनने की महत्वकांक्षा थी। माधव राव के समय के दौरान, उन्होंने लगातार उनके खिलाफ षडयंत्र रचा था। अब तो कमजोर नारायण राव पेशवा थे और 1773 में उनकी भी हत्या कर दी गयी यहाँ तक कि उसके लिए निजाम के साथ भी हाथ मिला लिया।

राघोबा कुछ समय के लिए पेशवा तो बन गए लेकिन नाना फडणवीस ने कभी भी ऐसे दुष्ट व्यक्ति को पेशवा नहीं माना। उन्होंने 11 अन्य मराठा सरदारों के साथ मिलकर राघोबा को उखाड़ फेंक दिया और राज्य के मामलों को अपने नियंत्रण में लिया। अन्य 11 मराठा सरदार तुकोजी राव होलकर, महादजी सिंधिया, हरिपंत फडके, मोरोबा फड़निस, सकरंबापू बोकिल, त्रिंबक्रामा पेटे, फलटणकर, भगवानराव प्रतिनिधी, मालोजी घोरपड़े, सरदार रस्ते और बाबूजी नायक थे। इन 12 पुरुषों ने एक रीजेन्सी काउंसिल का गठन किया जो कि बारभाई परिषद के नाम से जाना जाता था, और प्रभाव में शिशु माधवराव द्वितीय को संरक्षित किया, जो 40 दिनों में सबसे कम उम्र के पेशवा थे। नाना फडणवीस ने कभी पदों या पदकों के लिए परवाह नहीं की, उनके लिए मराठा संघ के हित सबसे सर्वोच्च थे। अराजकता के समय जब स्वार्थी मराठा सरदार अपने स्वयं के हितों की तलाश कर रहे थे, तब फड़नवीस अखंडता और निस्वार्थता के प्रकाश के रूप में खड़े रहे। फडनवीस एक दूरदर्शी थे जिन्होंने अंग्रेजी और फ्रांसीसी व्यापारियों के रूप में फल फूल रहे मराठा साम्राज्य के असली शत्रु की पहचान कर ली थी।

अंग्रेजों के इस रूप को महान योद्धा महादजी सिंधिया अक्सर अनदेखा करते और उनमे अंग्रेजों के असली खतरे को देखने के लिए दूरदर्शिता नहीं थी। फडनवीस ने सबसे मजबूत खुफिया विभाग और जासूसी नेटवर्क स्थापित किया। यह ऐसा कुशल नेटवर्क था जो साम्राज्य के किसी भी कोने में किसी भी घटना को उसके अध्ययन कक्ष में कुछ घंटों तक पहुँचा देता था। उन्होंने अक्सर सिंधिया को चेतावनी दी थी कि यदि अंग्रेजों को मराठा साम्राज्य में अनुमति दी गई तो भारत जल्द ही एक विषम परिस्थिति में होगा। अंग्रेज समझ चुके थे कि मराठा साम्राज्य में केवल फडणवीस ही थे जो उनके असली मंसूबे एकदम अच्छी तरह से समझ सकते थे। उन्होंने अपनी कपटनीति से फडणवीस को हटाने और निष्ठावानों को नियुक्त करने के लिए गन्दी चालें चलनी शुरू कीं। हालांकि जनता और अष्ट-प्रधान पूरी तरह से फडनवीस का समर्थन करते रहे और अंग्रेज अपने इस प्रयासों में असफल रहे। जब षडयंत्रकारी राघोबा ने पूना को अंग्रेजों की मदद से लेने की कोशिश की तो फडनवीस ने उसका उचित जवाब दिया। हालांकि 1775 में सूरत में मराठों के साथ अंग्रेजों ने एक संधि पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन फडणवीस की चतुराई से वे इसका गलत फायदा नहीं उठा सके। हताशा में उन्होंने पुना में 1777 में एक और संधि बनायी, जिसका एकमात्र उद्देश्य फडनवीस को निकालना ही था।

यह जानते हुए कि अंग्रेजों के लिए संधियों का कोई महत्व नहीं होता, नाना फडनवीस ने निजाम, हैदर अली, आरकोट के नवाब और मुगल सम्राट शाह आलम के साथ एक गठबंधन बनाया जिसका एक उद्देश्य अंग्रेजों को उखाड़ फेंकना और ब्रिटिश शासन का निश्चित अंत करना था। तत्कालीन गवर्नर वॉरेन हेस्टिंग्स ने विभाजन और शासन की नीति के तहत महादजी शिंदे के साथ हस्ताक्षरित एक संधि की लेकिन नाना फडनवीस की रणनीति के चलते ब्रिटिशों को एक बार फिर मुंह की खानी पड़ी। फडनवीस के प्रयासों के कारण ही मराठा संघ ने एक बार फिर अपनी शक्ति वापस प्राप्त की और अब वह मुगल सम्राट शाह आलम के संरक्षक भी बन गए। नाना फडनवीस का 1800 में निधन हो गया और उनके साथ मराठा साम्राज्य की महिमा भी खंडित हो गयी। उसके बाद तो अंग्रेजों ने स्वार्थी मराठा सरदारों का फायदा उठाया और उन्हें एक-एक करके दूर कर दिया। संक्षेप में कहा जाए तो सन 1800 में फडनवीस के निधन के बाद ही अंग्रेज भारत में अपने कदम मजबूती से जमा सके. इसके बाद लगभग पचास वर्षों तक अंग्रेजों को खास चुनौती नहीं मिली, लेकिन फिर से 1857 में "एक और नाना" यानी तात्या टोपे और नानासाहब की जोड़ी ने एक बार फिर अंग्रेजों की नाक में दम किया... इस असफल क्रान्ति के बाद लगभग नब्बे वर्ष यानी 1947 तक अंग्रेजों को कोई खास चुनौती नहीं मिली. यदि दूसरे विश्व युद्ध में अंग्रेजों की हालत पतली न होती तथा भारत में सुभाषचंद्र बोस एवं भगत सिंह जैसे लोगों ने सशस्त्र क्रान्ति से अंग्रेजों के पेंच ढीले न किए होते तो उनका भारत छोड़कर जाने का कतई इरादा नहीं था... 

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फुटनोट :- बहरहाल... आज वाई कस्बे की एक अलग पहचान है और आजकल यह बॉलीवुड का पसंदीदा स्थान बन गया है, जब भी ग्रामीण पृष्ठभूमि की ज़रूरत होती है पूरा बॉलीवुड वाई से तीन किमी दूर स्थित मैनावाली गाँव पहुँच जाता है, स्वदेश, गंगाजल, दबंग जैसी न जाने कितनी ही फिल्मों की शूटिंग यहाँ हुई है। अलबत्ता जिन्हें भारत के गौरवशाली इतिहास में रूचि है, वे आज भी नाना फडनवीस का वह विशाल वाड़ा देखने पहुँच ही जाते हैं... जहाँ से अंग्रेजों के विस्तार के खिलाफ तथा मराठा साम्राज्य को पुनर्जीवित करने की राजनीति चला करती थी. 

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