अल्लाह हमें रोने दो - एक मुस्लिम औरत की व्यथा

Written by सोमवार, 06 फरवरी 2017 19:13

या अल्लाह... तुम तो हमें अकेले में चीखने दो और जोर जोर से रोने दो। कहीं एकान्त में हमारा दम ही न निकल जाए। बुरके की घुटन में लोक जीवन की चारदीवारी में हमें इतना जी भर के रो लेने दो कि हमारी आखों में एक भी आंसू बाकी न बचे।

हमें इतना रोने दो कि उसके बाद रोने की ताकत ही न रहे। क्यों केवल एक ही अधिकार तुमने मुसलमान महिलाओं के लिए छोड़ा है। पूरे मुस्लिम संसार में उलट पुलट हो रहे हैं पर हम मुसलमान तो वही पुराने ढर्रे पुराने संस्कारों की बेड़ियों में जकड़े हुएहैं । पूरे संसार की नारियों के लिए मुक्ति आंदोलन चले और आज वह स्वतंत्रता के मुक्त वातावरण में सांस ले रही हैं। परन्तु वाह रे हमारा भाग्य! मुस्लिम समाज की महिलाओं की मुक्ति का एक भी स्वप्न संसार के किसी कोने से नहीं फूटा। हमारी मुक्ति के लिए कोई भी समाज सुधारक, चिन्तक, कोई नेता व कोई भी धार्मिक व्यक्ति आगे नहीं आया।

या अल्लाह! कितना अदभुत है हमारा मुस्लिम समाज जिसमें कोई शरतचन्द्र पैदा नहीं हुआ जो हमारे आसुंओं का हिसाब चुकता कर दे। बदरूद्दीन तैयबजी, हमीद दलवई आदि प्रसिद्ध विद्वानों ने गो हत्या बंद हो इस पक्ष में निबंध लिखे परन्तु हमारे लिए सहानुभूति का एक भी अक्षर हलक से नहीं फूटा। अब्दुल जब्बार ने हिजड़ों के दुख के बारे में तो एक मोटी पुस्तक लिख डाली परन्तु हमारे लिए एक भी शब्द उनके शब्दकोष से नहीं फूटा। सैय्यद मुस्तफा सिराज ने तो लिख ही डाला कि हिन्दू समाज अपने लोगों के दोषों और त्रुटियों को लेकर स्वतंत्रता पूर्वक लिख सकते हैं परन्तु हम लोग अपने समाज के बारे में लिखने से डरते हैं। हमारे विचारक भी मुस्लिम मुल्ला , मौलवियों से डरे हुए, सहमें हुए से एक शब्द भी नहीं कह पाते। खासतौर से एक मुस्लिम विवाह कानून को लेकर अगर कुछ ने लिखना भी शुरु कर दिया जैसे कि नरगिस सत्तार साहब की हमें आषा की एक किरण फूटती सी दिखाई तो दी पर अफसोस! उसके वाद फिर वही घोर अंधकार , गहरी काली स्याही व एक लंबी चुप्पी।

पिछले कई सालों से संसार के कई हिस्सों में कई परिवर्तन हुए। विवाह कानून में कई तब्दीलियां हुई कई नई वैज्ञानिक खोजों और चिन्तनों ने पुराने रूढ़ियों को छोड़ने को मजबूर कर दिया लेकिन मुस्लिम समाज वही पुरानी रूढ़िवादियों मे अटका हुआ है। लाहौर में सहस्रों स्त्रियों महिला कानून विदों ने जब मुस्लिम महिलाऒं के अधिकारों को लेकर जुलूस निकाला तो पुरूष पुलिस ने भयंकर लाठी चार्ज करके उसे भंग कर दिया। एक बार भारत की पारलियामैन्ट में मुस्लिम महिलाऒं के अधिकारों को लेकर डीबेट रखी गयी। ए डी एम के की पार्टी के मुस्लिम सांसदों द्वारा इस प्रश्न को उठाया गया पर मुस्लिम वोट खो देने के भय से देश की सब राजनैतिक पार्टियों को सांप सूंघ गया। सबके सब गूगें बहरे हो गए। क्या अजीब जीव है अल्लाह ? यह राजनैतिक पार्टी के नेता व कार्यकर्ता। ऐसा लगता है जैसे इन सबकी जुबान को लकवा मार गया हो।

या अल्लाह ! यह राजनैतिक पार्टियों के नेता और कार्यकर्ता सुल्तानों के बनाए हुए खोजीयों हिजड़ों से भी नीच व निकृष्ट जीव हैं। खोजी लोग वह होते थे जो सुल्तानों द्वारा उनकी काम वासनाओं को पूरा करने के लिए सुन्दर स्त्रियों के बीच रहते हुए भी उनका भोग नहीं कर सकते थे। उन सुंदर स्त्रियों को देख कर वह मजबूरी में मन मसोस कर रह जाते थे क्योंकि हरम की स्त्रियों को बुरी नजर से देखना उनकी मौत का न्यौता देने के बराबर होता था। ऐसे ही आज के नेता केवल दिखावे के लिए समाज सुधारक बनते थे अन्दर से उनकी निगाहें स्रितायों के बदन को निहारती रहती है। यदि वे मुस्लिम स्त्रियों कि उत्थान की बात भी करते हैं तो केवल छलावा मात्र होता है। करके दिखाने की शक्ति उनमें नाम मात्र की भी नहीं होती है। इसलिए आज मुस्लिम स्त्रियों का आकुल क्रंदन चालू है। और शायद युगयुगान्तर तक रहेगा । यह राजनैतिक तुच्छ जीव ऊंची आवाज में मधुर मधुर सुन्दर महान शब्दों मे स्वाधीनता , साम्यता व समान अधिकारों जैसे शब्दों का प्रयोग तो करते हैं परन्तु वह वोटों के लालची मुस्लिम स्त्रियों के उत्थान में एक एक भी पग नहीं उठाते। वाह कितनी सुन्दर शब्दावली का प्रयोग करते हैं मानों आज ही मुस्लिम स्त्री समाज की नैया पार लगा देगें। परन्तु उनके भाग्य में तो आंसू के दरिया में डूबना ही लिखा है। आंसू ही उनका भाग्य है जैसे संसार का तीन हिस्सा पानी है और एक हिस्सा पृथ्वी है ऐसा ही मुस्लिम समाज की महिलाओं का जीवन गर्दन तक आंसुओं में डूबा है। हिम्मत तो देखिए पुरूष समाज का ८० वर्ष का शेख कांपते हुए सिर वाला डगमगाते हुए कदमों वाला घर में ५ बीबियां होते हुए भी भारत में आ रहा है केवल १३, १४ वर्ष की लड़की से विवाह रचाने और वह लाचार लड़की पुरुषों द्वारा संचालित समाज में न चाहते हुए भी बूढ़े खूंसट के साथ अरब देश में पहुंच जाती है। इस प्रकार की दिल दहला देने वाली घटनाओं। आए दिन समाचार पत्रों में पढ़कर मुस्लिम महिलाओं की रूह कांप जाती है पर बेचारगी पर आंसू बहाने के सिवाय उनके पास कोई चारा नहीं।

मुस्लिम महिला की घुटन भरी जिन्दगी ऐसी खबरों को पढ़ कर घर के अन्धेरे कोनों में सुबक कर रोने में ही बीत जाती है। कोई एक भी तो उनकी नहीं सुनता उनकी सिसकियों भरी आवाज। न घर में न घर के बाहर न भाई न पिता न मस्जिद न मुल्ला मौलवी न नेता न समाज सुधारक सब के सब मौन। कोई भी तो मौलवी ऐसी घटना के विरुद्ध फतवा जारी नहीं करता। उल्टा पाशविक धार्मिकता की आड़ में स्त्री तो पुरुष के पांव की जूती, बच्चा पैदा करने वाली मशीन पुरुष की भोग्या ऐसी धारणाओं की बलिवेदी पर परवान हो जाती है। चार पांच सौतों के साथ जीवन कितना नारकीय बन जाता है यह तो केवल भोगने वाला ही जान सकता है। किसी मौलवी का जिहाद ऐसी कुप्रथा के विरुद्ध क्यों नहीं चलता उल्टा मुल्ला साहिब इसको मुता विवाह का नाम देकर अपना धार्मिक कर्मकाण्ड करता है। यह मुता विवाह है क्या ? केवल थोड़े समय के लिए शादी फिर तलाक तलाक तलाक। असंख्य अस्वस्थ रहन सहन, दारिद्रय, अशिक्षा ने हमारे समाज को उजाड़ बना दिया है। भेड़ बकरी और जानवरों के समान हमारी जिन्दगी, बीबियों के बीच प्रायः धक्का मुक्की, केश केशी व जूतमपैजार होती ही रहती है। मियां साहब अगर घर में हो तो बात ही क्या? दोनों की ही ढोर (जानवरों) के समान पिटाई होती है, उसके बाद तीसरी को लेकर मियां साहब दरवाजा बन्द करके अपने सोने वाले कमरे में पहुंच जाते हैं। हे अल्लाह! ऐसा कैसा जीव बदा है तुमने हमारे लिए। प्रेम, तो हमारे जीवन में कभी आता ही नहीं है। प्रकाश की एक किरण कभी देखी नहीं। प्यार का उदाहरण तो बेगम मुमताज में ही देख पाते हैं जिसकी याद में अपूर्व शिल्पकला युक्त ताजमहल शाहजहां ने बनवाया था। उसी बेगम की मृत्यु तेरह संताने पैदा करने के बाद, जब संतान धारण करने के ताकत न रहने के बाद भी गर्भधारण करना पड़ा तो अंतिम संतान के जन्म में मौत के आगोश में सो गयी। यह है मुस्लिम बादशाह के प्यार का अनोखा ढंग। अब तुम ही बताओं ऐ अल्लाह! जहां शहजादियों के प्रेमी या प्यारी बेगमों की यह हालत है तो हम जैसी साधारण मुस्लिम महिलाओं का तो कहना ही क्या? हमारे प्यार के पैमाने को तुम ही नाप सकते हो अल्लाह! तलाक वाली तीखी धार तलवार महिलाओं के सिर पर कब आ गिरे कुछ कहा नहीं जा सकता, अगर कही पान में चूना लगाने में तनिक देरी हो जाए तो तलाक की तलवार से कब कत्ल होना पड़े कुछ भरोसा नहीं। मियां जी की मन की मौज उनकी मर्जी से मजाक में भी तीन बार तलाक कह देने से सालों साल का विवाहित जीवन कब बिखर जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। ऐसे तलाक का परिणाम छोटे बच्चे मां के प्यार से विहीन, नन्हें मुन्ने बिलखते हुए बच्चे, स्वास्थ्य से रहित उपेक्षा व अनादर का जीवन जीते जीते कब आतंकियों की जमात में चले जाते हैं पता ही नहीं चलता। अन्य समाजों मे ऐसा नहीं होता यह बात नहीं है पर धर्म के नाम पर वहां ऐसा नहीं होता। मौलवी लोग मियांओं को इस प्रकार का उपदेश देते हैं कि बच्चे पैदा करके फायदा उठाओ, संख्या बढ़ाओ और देश व्यवस्था में अव्यवस्था फैलाओ। पर अल्लाह! उनके पागलपनें की धुन को सहन करते हैं हम मां बनकर। विवाहित मुस्लिम स्त्री कभी खाली नहीं रहती या तो गोद में या गर्भ में एक न एक बच्चा रहेगा। शीलहीन, स्वास्थ्यहीन होकर विचित्र जिन्दगी जीनी होती है उसे..

हम लोग पड़ोस में ही हिन्दू नारियों की जिन्दगी देखते ही रहते हैं। अहा ! कितनी पवित्रता, शुचिता, प्रेम और विश्वासपूर्ण जीवन जीती हैं। पर हमारे जीवन में पवित्रता, व सतीत्व के अवसर ही कहां हैं? तलाक के बाद अगर मियां जी को पश्चाताप हो तो घर में बीबी को रख नहीं सकते क्योंकि इस्लाम की शरीयत का पंजा अड़ाकर मौलवी लोग मार्ग अवरुद्ध कर देगें। यदि वह लड़की वापिस अपने पति के पास लौटना चाहे और पति रखना चाहे तो एक नयी यातना झेलनी होगी। फिर एक दूसरे मियां के साथ शादी रचाए, उस शादी के तीन दिन व तीन रात घृणामय दाम्पत्य जीवन बिताने के बाद वह महिला पवित्र होगी व कुवारी मानी जाएगी। फिर यदि वह मियांजी कृपा करके तलाक की भीख देगें तो ही पूर्व पति उसे ग्रहण कर सकता है। अगर कहीं लड़की खुदा की दया से सुंदर हो तो बहुतों का मन बदल जाता है और तलाक नहीं देते और परिणामस्वरूप खूना खानी तक हो जाती है। ऐसा है हमारा जीवन। ओ अल्लाह! किसे कहें? किससें बोले अपनी व्यथा? यदि विवाह करें तो भंयकर सजा मिले, शिकायत करें तो मुखालफत। इस पृथ्वी के समस्त धर्मों में कौमार्य, ब्रह्‌मचर्य, पवित्रता आदि की मान्यता है परन्तु हमारे यहां नहीं। हमारे समाज में बहुशिक्षित मुसलमान तो हैं और इन बातों को वे जानते भी हैं परन्तु मजा लूटने के लोभी वे भी है इसीलिए कोई भी इसके विरोध में कुछ नहीं कहता। अधिक आधुनिक शिक्षित जो हैं वे हिन्दू समाज के आसपास चक्कर काटते रहते हैं वे भी हमारी सुध लेने की जरूरत नहीं समझते शायद इससे ही हमारी तरफ देखकर काजी अब्दुल ओद्ध ने एक बार कह डाला कि चौदह सौ वर्षों के इतिहास में इस्लाम मानव सभ्यता के अन्धकार में एक छोटा सा चिराग भी न जला सका और अबू सय्‌यद समग्र जीवन रवीन्द्र की चर्चा करते रह गए। इसी प्रकार एमसी छागला, उपराष्ट्रपति हिदायतुल्लाह, सिकन्दर बख्त, डा. जिलानी, सैयद सुज्तबा अली आदि जो हमारे समाज में मनुष्यता में श्रेष्ठ हुए वे सब इस मुस्लिम समाज से किनारा करते मुक्त हिन्दू समाज के निकट ही रहने लगे। इसी कारण हम मुस्लिम महिलांए मुल्ला मौलवी के शासन के अधीन अन्धकार भरा जीवन जीते हुए, भर्राए हुए ह्‌रद्य सेरुदन भरा व असहनीय यातनाओं भरा जीवन जीने के लिए रह गयीं। कोई साहित्यकार अथवा पत्रकार हमारे जीवन के कष्टमय अन्त स्थल में नहीं झांक सका, कोई हमारे दुखद आसुंओं को नहीं देख पाया, किसी ने कोई किस्सा कहानी या निबन्ध नहीं लिखा। भारत सरकार ने हमें वोट देने का अधिकार तो दिया परन्तु हमारी सुधि लेने के लिए कोई कार्य नहीं किया जिससे हमारा जीवन शांति से व्यतीत हो सके। हिन्दू नारियों के लिए हिन्दू कोड बिल पास करके उनको सुख पूर्वक रहने का अधिकार मिल गया, पर हमारे लिए कुछ भी ऐसा नहीं किया गया। हमारे समाज ने कोई भी तब्दीली मुस्लिम विवाह पद्धति में नहीं की है। मार्क्सवादियों के ऊपर भरोसा था, पर उन्होंने भी हमारे लिए कुछ नहीं किया, जबकि तजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमानिस्तान आदि देशों में मुस्लिम स्त्रियां मार्क्सवादी शासन में मुक्त हो गयी हैं। अब अरब देशों से आकर कोई शेख उन्हें खरीदने की जुर्रत नहीं कर सकता। कोई भी उन्हें जबरदस्ती बाहर नहीं ले जा सकता। अब वह अत्याधिक बच्चे पैदा करने के बोझ से मुक्त हो चुकी हैं। हर वक्त गर्भ धारण की परिस्थिति से भी वह स्वतंत्र हो चुकी हैं। अब कोई भी मुल्ला उनके जीवन का नियंता नहीं।

परन्तु हमारे भारत देश के मार्क्सवादी तो मुल्लाओं के ही वश में हैं। मंसूर हबीबुल्ला जैसे कट्टर मार्क्सवादी भी मुल्लाओं के अधीन मियाओं को प्रसन्न करने के लिए मक्का गए, हज करके हाजी बने। हे अल्लाह! तुमने हमारे लिए कही भी शांति व अवसर का नहीं छोड़ा। हमारे प्रति तुम्हारी सदा ही उदासीनता और उपेक्षा बनी ही रहीं। अनन्त यातनाओं में हमारे दिन व रात बीतते हैं। संसार की सभ्यतांए कई कुप्रथाओं को छोड़कर उन्नति की मंजिल की ओर बढ़ती रहीं पर हम जस की तस वहीं की वहीं बैठी रहीं। यहां तक की हिन्दू समान ने सती प्रथा जैसी वीभत्स प्रथा को समाप्त कर दिया। बाल विवाह व वृद्ध कें साथ विवाह की प्रथा को भी समाप्त करने के लिए कानूनी जामा पहना दिया है। समय के प्रभाव से सभी अमानवीय प्रथाएं समाप्त हो गयी हैं। पर हमारे मुस्लिम महिलाओं के लिए तो कुछ भी नहीं हुआ। हमारे मुस्लिम समाज में भी परिवर्तन तो घटित हुए हैं पर सब पुरुषों की अनुकूलता के लिए ही। ईराक में बसरा के पास एक गांव था जो खोजियों (हिजड़ा) युवकों के लिए प्रसिद्ध था। खोजी लोग ज्यादा तर नौजवान किशोर होते थे जो अप्राकृतिक व अमानवीय तरीके से खोजी बनाए जाते थे। इस अवैज्ञानिक प्रक्रिया में में ६० लड़के मृत्यु को प्राप्त हो जाया करते थे। ये खोजी सुल्तान, धनी व बादशाहों के हरम की चौकीदारी किया करते थे ताकि हरम से स्त्रियां भाग न सकें। अब इस कातिल प्रथा का अन्त हो चुका है। हम आज भी उसी कत्लगाह में रह रहीं हैं।

हमारे समाज के पुरुष आज भी हमारे आंसुओं के प्रति उदासीन हैं। केवल सम्पत्ति का अधिकार देकर समझते हैं कि हमें सब कुछ दे दिया है। कितना बढ़िया है यह सम्पत्ति का अधिकार, जबकि हमारा निकाह आज भी अनिश्चित है। यह संपत्ति का अधिकार हमें तलाक से कितनी निजात दिला सकता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ के कारण मुस्लिम महिला का जीवन लांछनमय हो गया है। उत्तर भारत के प्रख्यात पत्रकार मुजफ्‌फर हुसैन ने लिखा है, तलाक तलाक तलाक के नाम से एक फिल्म हिन्दी भाषा में तैयार हो रही थी हमारे मियांओं ने फिल्म के शीर्षक को लेकर आपत्ति प्रकट की और फिल्म का नाम बदलकर निकाह कर दिया गया। अब आपको बताते है कि फिल्म का नाम बदलने के लिए कौन से कारण बताए गए। मियांओं ने यह कहा कि मानों जब मियांजी फिल्म देख कर घर लौटे और बीवी ने पूछ लिया कि कौन सी फिल्म देख कर आए हो। जवाब में मियां जी ने कहा तलाक तलाक तलाक। तो तीन शब्दों में बीवी का जीवन हलाक हो जाएगा। अजीव तमाशा है फिल्म का नाम भी बताने पर मुस्लिम महिला कष्टमय जीवन बिताने पर मजबूर हो जाएगी। ईरान में खुमैनी के शासन में सैकड़ों महिलाओं की हत्या कर दी गयी, उनका अपराध क्या? केवल खुमैनी के मुस्लिम शासन के विरुद्ध थोड़ी सी जुबान खोलना, बस इसी कारण इस्लाम के नाम पर उनको नरकपूर्ण जीवन बिताने पर मजबूर होना पड़ा। सैकड़ों महिलाऒं ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी। क्योंकि इस्लाम में इस्लाम के विरुद्ध बोलने का हक किसी को नहीं है। विष्णु उपाध्याय ने इस घटना के बाबत आजकल समाचारपत्र में लिखा परन्तु आज तक एक भी शब्द मुस्लिम जगत नहीं बोला। यदि अन्य समाज की महिलाओं के साथ बलात्कार होता है तो समाचार पत्र उसकी चीख पुकार से काले को उठते हैं। एक आंधी, एक तूफान, एक हलचल सी मच जाती है ऐसी घटना के विरुद्ध। पर इस्लाम का अर्थ तो शान्ति चुपचाप, खामोशी से सब देखना है।

या अल्लाह! तुम ही हमारा करुण क्रंदन सुनो। तुम्हें न कहें तो किसे कहें? कौन सी दर पर दरवाजा खटखटाएं? तुमने हमारे लिए कोई सुख का अवसर क्यों न छोड़ा। धनी घर में बेगमें बनें तो असंख्य सौतों के बीच में विलास का साधन बनकर रह जांए। ईर्ष्या और प्रतिद्वदिता का जीवन जिएं। अगर गरीब घर में पहुंचे तो दिन रात जी तोड़, कमर तोड़ मजदूरी और उस पर भी हर साल संतान पैदा करना। पूरे समय गर्भ धारण करना यही हमारे भाग्य में लिखा है। गरीब घर की बेगम बनकर हमारी तकदीर में तलाक की तलवार जिधर भी जाएं लटकी ही रहती है। इस तलाक से हमारे बच्चे भी भिखारी बनकर या अपराधी बनकर दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो जाते हैं। हावड़ा स्टेशन के आस पास ऐसी ही परित्यक्ता महिलांए व उनके बच्चों की भीड़ देखी जा सकती है। वहां पर दाड़ी वाले मुल्ला जी की उपस्थिति भी इसीलिए होती है ताकि वह देखता रहे कि इन महिलाओं व बच्चों ने इस्लाम तो नहीं छोड़ा। उन दाड़ी वाले मुल्ला का उनके स्वास्थ्य से कोई लेना देना नहीं। वह अच्छे इंसान बनते हैं या नहीं उससे भी मुल्ला जी का कोई सरोकार नहीं। हे अल्लाह! मुस्लिम स्त्रियों की जिन्दगी में दुख, वेदना, हताशा व दरिद्रता के सिवाय कुछ नहीं बचता। उनके पास आंसुओं की सम्पत्ति, चुपचाप सिसकने की इजाजत के सिवा कुछ भी नहीं।

इसी से ऐ अल्लाह! हमें रोने दो, शान्ति से रोने दो, तब तक रोने दो जब तक हम मौत को प्राप्त नहीं होतीं। अल्लाह कृपया हमें अकेला ही छोड़ दो

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