मुस्लिम शरणार्थी समस्या : यूरोप में बने कैराना-मंदसौर

Written by सोमवार, 06 मार्च 2017 21:17

बचपन में चिड़िया और बहेलिया की कहानी हम सबने पढ़ी थी, जिसमें चिड़िया जाल में फँस जाती हैं, मगर अपनी एकता के बल पर बहेलिये को हराने में सफल हुई थी। अब समुद्र किनारे अयलान कुर्दी नामक बच्चे की लाश "चारा" है, "दाना" है, "चुग्गा" है.

उस कहानी में तो जाल बिछाने वाला एक ही बहेलिया था, जो जाल बिछाने के बाद, दाना डालने के बाद शिकार के इंतज़ार में था। फिर भी अपनी सूझ बूझ से चिड़िया जाल में फंसने के बाद भी बच गईं। मगर क्या अब चिड़िया बच सकती है जाल में फंसने से? जाल अब शातिराना ढंग से बिछाया जा रहा है और ऐसा जिसमें एक बार फंसने के बाद बचा नहीं जा सकता है। अब शिकारी अपने शिकार को झूठी संवेदना के जाल में फंसाता है। तुर्की के एक समुन्दर तट पर पूरी दुनिया के लिए एक जाल बिछाया गया, जिसमें एक छोटे से बच्चे के मृत शरीर का दाना डाला और देखते ही देखते उस भावनात्मक जाल में पूरी दुनिया फँस गयी, पूरे यूरोप में मुस्लिम शरणार्थियों की बाढ़ आ गई. उस बाढ़ से “सांस्कृतिक विनाश” की एक नई कहानी यूरोप में शुरू हुई है. स्वीडन और ब्रिटेन के दो पत्रकारों द्वारा अपनी आपबीती सोशल मीडिया और अखबार में शेयर करने के बाद ही जो बात सभी पहले से जानते-मानते हैं वहाँ के “सेकुलरों” ने अब जाकर मानना शुरू किया है कि, “हाँ!!! यूरोप की संस्कृति और सामाजिकता खतरे में है, और कारण हैं इस्लामी शरणार्थी”... बहरहाल, दोनों पत्रकारों की आपबीती आगे पढ़िए... आपको लगेगा “अरे? ये तो भारत के बंगाल-कैराना-मंदसौर जैसी कहानी है?”

बहेलिया धीरे धीरे जाल बुनता जा रहा है, वह झूठी संवेदना के माध्यम से शरणार्थियों को यूरोप में भेजता जा रहा है और वहां पर भी “शरिया ज़ोन” बनाता जा रहा है। स्वीडन में ऐसे ही शरिया ज़ोन में पत्रकारों के अनुभव आँखें खोल देने के लिए पर्याप्त हैं। जबकि मीडिया का एक तबका आज तक ऐसे क्षेत्रों के होने से ही इंकार करता रहा है। ब्रीबर्ट लन्दन के मुख्य सम्पादक रहील कासम स्वीडन के ऐसे ही “नो ज़ोन” क्षेत्र के बारे में बताते हुए कहते हैं... “भीडभाड वाले मालमो सेन्ट्रल स्टेशन पर उतरते समय मैं सोच रहा था कि क्या वाकई इस जगह पर कोई “नो गो ज़ोन” क्षेत्र हो सकता है? शायद नहीं। फरवरी की ठण्ड में बावजूद मालमो बहुत ही खूबसूरत लग रहा था। मैंने अपने होटल में चेक इन किया और जल्द ही अपनी मंजिल रोजेनगार्ड की तरफ चल पड़ा। हाल में स्वीडन के “नो-गो ज़ोन” क्षेत्रों के बारे में बहुत कुछ कहा गया है। No-Go Zone, यानी जिस मोहल्ले में, जिस इलाके में आप आसानी से नहीं जा सकते. वर्ष 2015 में हुए पेरिस हमले के बाद स्वीडन डेमोक्रेट नेता जिमी अकेसन ने मुझसे कहा था “हमारे यहाँ भी ऐसी कई जगहें हैं” और मैं चौंक गया था, और सच कहूं तो मुझे ज़रा भी यकीन नहीं हुआ था।

 

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मेरे हिसाब से तो स्वीडन एक स्वर्ग जैसी जगह थी, जहां नाच है, गाना है, आज़ादी है, वहां पर ये सब? मेरे दिमाग ने जैसे इसे स्वीकारने से ही मना कर दिया था। मगर सच को जानने की ललक में आज मैं यहाँ पर था। मेरा पहला पड़ाव रोजेनगार्ड था जहां से मेरे साथी ओलिवर लेन ने सबसे पहली बार सितम्बर 2015 में रिपोर्ट किया था। जैसे ही हम घरों के निकट पहुंचे हमें समस्याओं की हल्की झलक मिलने लगी थी, और हमारे सामने समस्याएं स्पष्ट थीं : ड्रग, बलात्कार, महिला उत्पीड़न जो राज्य द्वारा प्रायोजित ““बहुसंस्कृतिवाद”(??)” ने एक बड़े हिस्से को तोहफे में दे दिया है.

स्वीडन की उदारवादी नीतियाँ पिछले कुछ दशकों में विदेशों से आने वाले शरणार्थियों पर पाबंदी लगाने में विफल रही हैं, और उनसे ऐसे समुदाय स्वीडन का हिस्सा बन गए हैं जिनके कल्याण पर सरकार को काफी खर्चा करना पड़ रहा है। जैसे ही हम आगे बढे एक मस्जिद की दीवार पर एक वामदल का पोस्टर लगा हुआ था, और हेरेगार्डन हाउसिंग एस्टेट में कुछ लडकियां खड़ी हुई थीं, जैसे ही हमने उनसे रास्ता पूछा उन्होंने मुस्कराकर रास्ता बताते हुए कहा “आगे वाले मोहल्ले में जाने के लिए शुभकामनाएँ, ध्यान रखियेगा”... “बढ़िया, शुक्रिया” मैंने सोचा क्या गडबड़ी है पता नहीं....| खैर... अब हवा में हड्डियों को गला देने वाली ठण्ड थी और सड़क पर कुछ ही लोग बचे थे। इमारतों के बीच हिज़ाब ओढ़े कुछ स्त्रियाँ बच्चों को लेकर चल रही थीं। हमें न तो कोई देख रही थी, और बात करने का तो कोई सवाल ही नहीं।

मेरे गाइड ने कहा “शायद उन्हें यह पता भी नहीं होगा कि हम स्वीडिश में क्या कह रहे हैं?” हाँ, शायद यही लगता है कि उन्हें समझ ही नही आ रहा था। एक अनुमान के हिसाब से हेरेगार्डन हाउसिंग एस्टेट की आबादी में लगभग 96%लोग या तो विदेशी हैं या विदेशी पृष्ठ भूमि के हैं। धीरे धीरे कुछ कुछ लोग बाहर आ रहे थे मगर वे या तो हमसे बात नहीं करना चाह रहे थे या बोलने में असमर्थ थे। मुझे बाद में पता चला कि वे ऐसी मस्जिद से आ रहे थे, जिसमें नमाज पढने के लिए अंडरग्राउंड या बेसमेंट में जगह होती है जो सरकार की नजर में नही होती है।

मैंने अपनी आने वाली किताब मेंरोजेनग्राउंड के बारे में खुलकर लिखा है, जो मैं अभी नहीं कह सकता। यह सब सामान्य नहीं है और अगर नई परिभाषा के हिसाब से सब कुछ सामान्य है तो इसे तुरंत ही अस्वीकार किया जाना चाहिए, जैसा राष्ट्रपति ट्रंप ने इस सप्ताह स्वीडन की वामपंथी उदारवादी सरकार से कहा है। स्टॉकहोम की गलियों में रिन्कबे और हस्बी में भी यही हुआ था जब फ़िल्म निर्माता एमी होरोवित्ज को एक फ़िल्म की शूटिंग करते समय पीटा गया। सेन्ट्रल हस्बी में कैब से बाहर निकलते ही मैं तमाम तरह के ड्रग डीलर से घिर गया। वे मुझे हशीश और मारिजुआना बेचने की कोशिश कर रहे थे, और तभी हमारी नज़र स्वीडन पुलिस की दो वैन पर गयी जो एक व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए भीड़ से बातचीत में लगी हुई थी।

यहाँ पर इतने सैटेलाईट डिश क्यों हैं?” मैंने अपने गाइड से पूछा... उसने कंधे उचकाकर कहा “वे यहाँ पर स्वीडिश चैनल नहीं देखते, उन्हें यहाँ की भाषा समझ नहीं आती, वे केवल अपने देश की अपनी भाषा के चैनल देखने के लिए यह सब करते हैं. वहीं एक नोटिसबोर्ड पर घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं के लिए एक फोन नंबर था। और जब हमने एक व्यक्ति की फोटो खींची तो वह विक्षिप्तता से हंसता चला गया। सेन्ट्रल स्कवयर के कॉफी हॉल में केवल और केवल पुरुष ही इकट्ठे हो रहे थे, और हमारी गतिविधियों पर नज़र रख रहे थे। हमारे आने से कुछ ही दिन पहले यहाँ पर कुछ पुलिस वालों की पिटाई हुई थी। शायद दुकानों पर जाकर बात करने वाले हम जैसे आम लोगों के लिए यह “नो-गो ज़ोन” नहीं था। मगर एक युवा महिला, पुलिस या अन्य आपात सेवाओं के लिए इन क्षेत्रों में जान हथेली पर लेकर ही घुसना होता है। आप आने वाले दिनों में इन सभी के बारे में मेरी किताबों में पढेंगे और यहाँ पर राष्ट्रपति ट्रंप स्वीडन में जो कुछ भी हो रहा है, उसके बारे में एकदम सही हैं।

इसी के साथ ब्रेबर्ट न्यूज़ डेली के डोक्युमेंटरी फ़िल्म निर्माता एमी होरोवित्ज ने यूरोप में ऐसे ही मुस्लिम नो-गो ज़ोन इलाके में अपने साथ हुई आपबीती बताई। होरोविट्ज़ कहते हैं कि आप विश्वास करें या नहीं मगर यह बात सच है कि स्वीडन ने अपनी क्षमता से कहीं ज्यादा शरणार्थी ले लिए हैं। यहाँ तक कि इस धरती पर किसी भी देश से ज्यादा, टर्की से भी अधिक! उनका कहना है कि पिछले दो दशकों में हमने लगभग 3,50,000 सीरियाई शरणार्थियों को जगह दी है। मेरे वहां जाने का कारण यह था कि जिस देश की संस्कृति ने बलात्कार का नाम भी नहीं सुना था, वहां पर स्वीडन का रेप कैपिटल हो जाना मेरे लिए एक आश्चर्य का विषय था। बलात्कार कभी कभार होने वाली घटना थी। और अब तो पूरे यूरोप में बलात्कार के आंकड़े आसमान छू रहे हैं। हम यही पता लगाने के लिए वहां गए थे, कि यकीन मानिए कहीं न कहीं इस विस्थापन और बलात्कार के बीच कोई न कोई कड़ी जरूर ही है।

कसाम को बताते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे क्षेत्रों में जाते हुए कई तरह की समस्याएं आती हैं, पहली तो आप जैसे लोगों को कुछ भी समझ नहीं आता कि आपको करना क्या है और लोग आखिर कह क्या रहे हैं? मगर आपको धीरे धीरे पता लगने लगता है। जैसे ही हमने हस्बी से आगे कदम बढ़ाया, हमने खूबसूरत घर, पार्क पौधे देखे और वहां की खुशहाली देखकर लग ही नहीं रहा था कि यहाँ पर कोई समस्या भी हो सकती है। कुछ और आगे बढ़ने पर, पांच लोग हमारे और हमारी टीम के पास आए। और हमें धमकी देने लगे “तुम लोग जहाँ से भी आए हो, यहाँ से जाओ!” मेरी पूरी टीम वहां से चली गयी मगर मैंने वहीं टिके रहने का और इन लोगों को देखने का फैसला किया। मेरे मुंह से एक भी शब्द निकलने से पहले या कहें यह कहने से पहले ही, कि मैं क्या करना चाहता हूँ, वे मुझ पर टूट पड़े और मुझे गिराकर मारने लगे। मैंने अपनी बांहों से अपने सिर को घेर रखा था, और मैंने देखा कि लोग मुझ पर हंस रहे थे मगर कोई भी मेरी मदद करने के लिए आगे नहीं आ रहा था। मुझे पता था कि यहाँ से बाहर जाने के लिए मुझे खुद ही जाना होगा।

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वे खुद के अपने आप घुटनों पर खड़े होने को याद करते हुए कहते हैं, “मैंने अपनी पूरी ताकत से उसके गले में मारा! मेरे लिए खुद को बचाने के लिए वही एक क्षण काफी था, मगर मेरे साथ मुसीबत ये थी कि मेरे घुटने वगैर सभी में दर्द हो रहा था। उन्होंने मुझे दोबारा गिरा दिया और मुझ पर हमला करने लगे। मगर शुक्र था कि वह एक अपार्टमेन्ट की इमारत थी, किसी ने दरवाजा खोला और अरबी भाषा में कुछ बोला। उन्हें अलग किया और इस तरह मैं बचा। वे अरबी में चिल्ला रहे थे कि हम फ़िल्म बनाना बंद कर दें। और पीटते हुए यही कह रहे थे। इसके बाद यह मैं अकेला ही वहाँ था, जो एक छोटे बच्चे की तरह चीख रहा था।

वे कहते हैं “पहले तो हम यही जान लें कि ये “नो-गो क्षेत्र” होते क्या हैं? और स्वीडन में ये क्या है? मजेदार बात यह है कि सीएनएन और बीबीसी आदि पर यही बुद्धिजीवी बहसें होती रहती हैं कि आखिर ये हकीकत में होते भी हैं कि नहीं! या ये केवल कल्पना है, जबकि मैं अपने चार यूरोपीय देशों के अनुभव से कहता हूँ कि सभी देशों में ये “इस्लामिक नो-गो क्षेत्र” हैं। स्वीडन में पुलिस इन No-Go क्षेत्रों के बारे में बताती है। पुलिस के ही शब्दों में “अगर हम किसी अपराधी का पीछा कर रहे हैं, और वह इस No-Go Zone में प्रवेश कर गया है तो हम रुक जाते हैं। फिर हम सेना के साथ उन क्षेत्रों में ऐसे प्रवेश करते हैं मानो हम अफगानिस्तान के किसी आतंकी क्षेत्र में घुसने जा रहे हों। यही आपात सेवाओं के साथ हो रहा है। स्वीडन में आपात सेवाएं तो ऐसे क्षेत्रों में तब तक नहीं जा पाती, जब तक उसके पास सेना का सहयोग या समर्थन न हो। उन पर लगातार हमले होते हैं... या ऐसा कहें कि वे “एक राज्य के भीतर दूसरा राज्य” हैं। (भारतीय मित्रों को अपने शहर में आसपास स्थित ऐसे कई मुस्लिम मोहल्ले याद आ गए होंगे).

कसाम ने कहा कि उन्होंने भी नो गो क्षेत्रों और ऐसे क्षेत्रों में जहां आप जाना नहीं चाहते में ऐसी ही कई समस्याएं देखी हैं। होरोविट्ज़ कहते हैं कि अगर आप मुस्लिम नहीं हैं तो आप वहां पर नहीं जा सकते, और अगर आप पुलिस में हैं तो तो आप बिलकुल ही नहीं जा सकते जब तक कि आपके पास कोई सशस्त्र सेना न हो, मैं इसी को No-Go क्षेत्र कहता हूँ. कसाम इससे सहमत नहीं है उनके अनुसार पश्चिमी देश का कोई भी ऐसा क्षेत्र जहां पर गैर मुस्लिम या गैर उत्तरी अफ्रीकी को जाने से डर लगे, वह नो-गो क्षेत्र है क्योंकि ऐसा होना ही नहीं चाहिए।

अब पुलिस वालों की बात करते हैं। पुलिस वालों को वहां पर अक्सर पीटा जाता है, जब भी वे वहां पर नियमित रूप से गश्त के लिए जाते हैं। स्टॉकहोम पुलिस प्रवक्ता ईवा निल्सन के अनुसार शुक्रवार को हुई लड़ाई को बिलकुल भी स्वीकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि इसमें पुलिसवालों पर बीस से तीस लोगों की भीड़ ने अचानक से हमला किया। यह वाकई में गंभीर बात है क्योंकि अब इसमें पुलिस वालों पर हमले शुरू हो गए हैं। हालांकि हंगरी में स्थित स्वीडिश दूतावास किसी भी नो-गो क्षेत्र होने से इंकार करता है मगर यह भी बात उतनी ही सच है कि स्वीडन की पुलिस ने खुद ही स्वीकार किया है कि उनके हाथों से 55 क्षेत्र निकल गए हैं, जहां उन्हें क़ानून लागू करने में कठिनाई होती है।

 

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सितम्बर में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार पुलिस कर्मियों में अपने कार्य को लेकर बहुत ही भय का माहौल है, और उनमें से 80% अपने कैरियर में बदलाव चाहते हैं। वैसे देखा जाए तो हमारे लिए यह कहानी नई नहीं है, चाहे कैराना हो, कश्मीर हो या दिल्ली में सीमापुरी से सटे हुए इलाके। भारत में कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां पर बरसों से यह समस्या है। यह समस्या समय के साथ तुष्टिकरण की राजनीति से गंभीर ही होती गयी है। यह बात अलग है कि पूरी दुनिया को सहिष्णुता का संदेश देने वाले पश्चिम जगत में यह अब भयानक रूप लेता जा रहा है। नहीं तो हम भारतीय तो पहले कश्मीर, कैराना, शहीदनगर आदि से न जाने कितने समय से परिचित हैं। वैसे पूरे विश्व में चिड़िया को अब सावधान हो ही जाना चाहिए, बुद्धिजीवी बहेलियों के जाल और “अल-तकैया” से बचने के लिए अब सीधा मुकाबला करने का समय आ गया है... सनद रहे कि भारत के 64 जिले “संवेदनशील” की श्रेणी में आ चुके हैं, जिसमें से 40 जिले “मुस्लिम बहुल होने के कारण तथा बाकी के 24 जिले नक्सलवाद और अलगाववाद के कारण संवेदनशील माने गए हैं... तो आप भी अपने पड़ोस में कैराना-मंदसौर-मुर्शिदाबाद बनने का इंतज़ार करते रहिए... क्योंकि जब तक भारत में “नकली सेकुलरिज़्म” रहेगा, जब तक हिन्दू हित की बात करना अपराध माना जाएगा, जब तक JNU जैसे कथित प्रगतिशील गिरोह रहेंगे... यह तो होना ही है.. बस समय की बात है. यूरोप ने यह “मुस्लिम शरणार्थी आँच” अभी-अभी भुगतना शुरू की है, भारत तो साठ वर्षों से भुगत ही रहा है.

Read 1490 times Last modified on मंगलवार, 07 मार्च 2017 10:17
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