दलित बिजनेस पर मुस्लिम कब्ज़ा, मुम्बई कचरा माफिया

Written by मंगलवार, 28 नवम्बर 2017 07:17

जिस कूड़े-कचरे (Garbage Management in Cities) को हम लोग अपने घरों से निकालकर बाहर फेंकते हैं, नगरनिगम की गाड़ियों में देते हैं या रद्दी=कूड़ा लेने वाले ठेलेवालों को सस्ते भावों में बेच देते हैं, वह कूड़ा-कचरा या कबाड़ वास्तव में एक करोड़ों रूपए का “शानदार बिजनेस” है...

और जब यही कूड़ा-कचरा मुम्बई जैसे शहर में एक विशाल स्वरूप ले लेता है तब वह प्रतिवर्ष 220 करोड़ रूपए का “बिजनेस” होता है. (यह आँकड़ा केवल मुम्बई शहर के डम्पिंग यार्ड अर्थात देवनार कूड़ाघर का 2016 का है). आठ-दस वर्षों पहले मुम्बई में इस कूड़ेदान से कचरा और खराब वस्तुएँ बीनकर उन्हें कबाड़ियों को बेचने वाले इस सुनहरे धंधे में केवल दलित समुदाय के लोग थे, परन्तु धीरे-धीरे अब मुम्बई के इस “कचरा माफिया” (Garbage Mafia) को मुसलमानों ने अपने कंट्रोल में कर लिया है. स्वाभाविक है कि करोड़ों रूपए के इस धंधे में कब्ज़ा, मारपीट, खूनखराबा, नेतागिरी, रिश्वतखोरी सभी चीज़ें शामिल हैं.

आप शायद थोड़ा चौंके होंगे, कि आखिर इस बिजनेस में ऐसा क्या है, कि इसमें से दलितों को बाहर धकियाकर अब मुम्बई की मुस्लिम गैंग्स इस पर कब्ज़ा जमाए हुए हैं. आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि 327 एकड़ में फैले इस देवनार (Deonar Dumping Yard) डंप यार्ड में इस समय कुल ग्यारह गैंग अपना काम कर रही हैं. मुम्बई मिरर अखबार के पत्रकारों ने जब इस सोना उगलने वाले अनोखे धंधे के बारे में खोजबीन की तो पता चला कि कूड़ा बीनने वाले इन ग्यारह गिरोहों में से सबसे बड़ा गिरोह है अतीक खान का, जिसके पास आज की तारीख में मुम्बई जैसी जगह पर दो रेस्टोरेंट, दो बेडरूम का एक फ़्लैट, तीन कारें (जिसमें एक टोयोटा फोर्चुनर शामिल) और केबल टीवी का बिजनेस हैं. चौंक गए न आप?? जी हाँ... बात ही कुछ ऐसी है.

 

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हालाँकि अतीक खान कैमरे के सामने यही कहता है कि अब उसने कूड़ा बीनने वाले गिरोह का काम बन्द कर दिया है, लेकिन रफीक नगर स्थित उसका दफ्तर (जो कि देवनार कचरा ग्राउंड के ठीक सामने है) कुछ और ही बयान करता है. उसके दफ्तर में लगभग पन्द्रह-बीस हट्टे-कट्टे “बाउंसरों” की मौजूदगी तथा शक्तिशाली CCTV कैमरों द्वारा डम्पिंग यार्ड की सतत निगरानी से यह साफ़ पता चल जाता है कि यह गैंग कितना बड़ा और शक्तिशाली है. अतीक खान पर 2009 में एक हत्या का मामला भी दर्ज हुआ था, लेकिन गवाहों के मुकर जाने के बाद 2011 में यह बाइज्जत बरी हो गया. देवनार के कचरा ग्राउण्ड को इन ग्यारह गिरोहों ने आपस में ग्यारह झोन में बाँट लिया है, लेकिन फिर भी इनमें आए दिन मारपीट और खूनखराबा होता रहता है. ग्यारह गैंग में से पाँच गैंग बहुत शक्तिशाली हैं, जिनमें से तीन गिरोहों पर अतीक खान, जावेद्द कुरैशी और सलीम भाई का नियंत्रण है, जबकि दो गिरोह मानिक राजू और भोंदूजी के कब्जे में हैं. एक समय था जब इस धंधे में केवल दलित ही हुआ करते थे और लाखों रुपया कमाते थे. लेकिन जैसे-जैसे मुसलमानों को इसमें पैसा दिखाई दिया, उन्होंने दलितों को मारपीट करके यहाँ से भगाना शुरू कर दिया और आज की तारीख में ग्यारह में से केवल तीन गैंग (यानी तीन इलाके) ही दलितों के नियंत्रण में बचे हैं. अब मुम्बई के इस विराट कचरा मैदान और इससे होने वाली आय तथा गिरोहों की कार्यप्रणाली के बारे में भी जान लीजिए.

मुम्बई महानगरपालिका के देवनार स्थित इस डम्पिंग यार्ड में रोज़ाना 500 ट्रकों द्वारा कचरा डाला जाता है. प्रत्येक ट्रक दिन भर में तीन फेरे लगाता है, जिसके द्वारा अनुमानित 6000 मीट्रिक टन का कचरा प्रतिदिन मुम्बई के 24 सर्कलों से एकत्रित किया जाता है. कचरा बीनने वाले गिरोह के एक सरगना कुरैशी के मुताबिक़ रोज़ाना लगभग साठ लाख रूपए का कागज़, प्लास्टिक, धातु, चमड़ा, काँच की बोतलें जैसे हजारों आईटम यहाँ से बीने जाते हैं. यदि वार्षिक हिसाब लगाएँ तो यह कम से कम 220 करोड़ का धंधा है. अस्पतालों और फाईव स्टार होटलों से निकलने वाले कचरे की कीमत और भी अधिक होती है, मारामारी इसके लिए भी ज्यादा होती है. स्वाभाविक रूप से पैसा आ जाने के कारण अतीक खान और कुरैशी जैसे लोगों की राजनैतिक पहुँच भी खासी बन चुकी है, इसलिए अब उन्होंने महानगरपालिका के ट्रकों की टाईमिंग और उनके द्वारा कचरा फेंके जाने का स्थान भी अपने बाहुबल से नियंत्रित करना शुरू कर दिया है.

327 एकड़ में फैले इस विशाल डम्पिंग यार्ड में अकेले अतीक खान के पास 100 छोकरे हैं जो इसके लिए कचरा बीनने का काम करते हैं, और ये छोकरे कचरा बीनने का अपना काम ठीक से करें, तथा उन्हें दूसरे गिरोहों से सुरक्षा भी मिलती रहे इसलिए बीस “बाउंसर्स” भी लगातार इन छोकरों की निगरानी करते रहते हैं. बाकी के पाँच गिरोहों के पास इतना ज्यादा “मैन-पावर” नहीं है, लेकिन उन्होंने भी एक बड़े इलाके पर अपना कब्ज़ा जमा रखा है. अतीक खान भाभा नगर और रफीक नगर देखता है, जबकि राहू और भोंदूजी शांतिनगर और इंदिरानगर में किसी और को घुसने भी नहीं देते. जिस प्रकार “माफिया” अपना काम करता है, ठीक वैसे ही ये भी अपना काम करते हैं. एक-दूसरे के इलाके में कोई भी गरीब व्यक्ति या छोकरा अपनी मनमर्जी से कचरा नहीं बीन सकता. जिसे भी कचरा बीनना हो, उसे पहले अतीक खान से अनुमति लेनी होगी. इसी प्रकार अगर राजू के इलाके से किसी ने कुछ उठाया है तो उसे वहीं बेचना होगा, वह अतीक खान को नहीं बेच सकता, वर्ना उसे मार दिया जाएगा. कचरा बीनने वाले एक वृद्ध ने बताया कि उसका दिन सुबह सात बजे से शुरू होता है और शाम को पूरा माल अतीक खान के गोदाम में पहुँचाने तक आठ बज जाते हैं. मुझे बीस हजार रूपए तक आराम से मिल जाते हैं. वास्तव में कचरा बीनने से लेकर उसे बेचने और आसपास के तमाम धंधों का हिसाब लगाया जाए तो देवनार का यह कचरा ग्राउंड लगभग 10,000 से अधिक लोगों की रोजीरोटी का साधन बना हुआ है. असली संघर्ष अधिकाधिक कचरा बीनने और अच्छी क्वालिटी का कचरा बीनने को लेकर है. कई बार ऐसा भी होता है कि कचरा बीनने वाले इन गिरोहों की लड़ाई मारपीट और खूनखराबे की बजाय एक-दूसरे के इलाके में जाकर आग लगाने की भी होती है. मुम्बई महानगरपालिका इन गिरोहों द्वारा बारम्बार लगाई जाने वाली आग से परेशान है, लेकिन कुछ कर नहीं सकती. कई बार कचरे में लगाई गयी यह आग फैलते-फैलते दूसरे गैंग के इलाके तक पहुँच जाती है तब नई मारपीट शुरू होती है. 

रहवासी दबी ज़बान में बताते हैं कि पिछले दस साल में कचरा बीनने और अपना इलाका बनाए रखने के झगड़े में कम से कम आठ हत्याएँ हो चुकी हैं, लेकिन किसी की पुलिस रिपोर्ट नहीं हुई, क्योंकि सभी इनसे डरते हैं. सभी पाँच बड़े कचरा माफिया गिरोह किसी न किसी राजनैतिक पार्टी के कारपोरेटर से जुड़े हुए हैं. अतीक खान के दफ्तर में तो खुद पुलिस वाले आराम फरमाने, पानी पीने और नाश्ता करने चले आते हैं, तो उससे पंगा कौन लेगा? इस खेल में BMC के कचरा धोने वाले ट्रक चालकों की भी पौ-बारह रहती है. अपने-अपने इलाके में कचरा फेंकने के लिए पाँचों गिरोह इन ट्रक ड्रायवरों को अच्छा पैसा खिलाते हैं, ताकि फाईव स्टार होटलों और उच्चवर्गीय कॉलोनियों से निकलने वाला कचरा उनके इलाके में डाला जाए. बीच में इस कचरे के निपटान हेतु एक निजी कंपनी यूनाईटेड फोस्फोरस लिमिटेड को ठेका भी दिया गया था, लेकिन उसने भी इन गिरोहों और बार-बार की राजनैतिक फन्देबाजी से परेशान होकर अपना पल्ला झाड़ लिया. इस इलाके की “औपचारिक निगरानी” के लिए मुम्बई महानगरपालिका ने 327 एकड़ के इस विशाल मैदान में केवल तीन अफसरों की नियुक्ति की है, इसी से आप समझ सकते हैं कि “गठबंधन” कितना मजबूत है और सरकार कितनी गंभीर है.

कचरा बीनने वाला मक़सूद अली बताता है कि “...कचरे के ढेर में से कई बार मुझे और मेरे साथियों को कीमती चीज़ें भी मिली हैं, सोने के झुमके, हार, मोबाईल... और एक बार तो मुझे एक हीरे की अंगूठी भी मिली थी जो मैंने 13,000 रूपए में बेच दी...”.
कुल मिलकर बात यह है कि कचरे का यह धंधा करोड़ों-अरबों का है, और धन के इस खेल से बड़े ही सिस्टेमैटिक तरीके से मुस्लिम गिरोह, तमाम दलितों को बाहर किए जा रहे हैं. तथाकथित दलित विचारक भी उनके दलित भाईयों को भड़काकर उन्हें कई प्रकार के पारंपरिक बिजनेस से बाहर किए दे रहे हैं. भारत के कई क्षेत्रों में मृत पशुओं की खाल निकालने का करोड़ों रूपए का बिजनेस भी इसी प्रकार दलितों के हाथ से निकलकर धीरे-धीरे मुसलमानों के हाथ में चला जा रहा है. मजे की बात यह है कि इतनी सामान्य सी बात भी दलित नहीं समझ पा रहे हैं, और ओवैसियों तथा नकली दलित चिंतकों की बातों में आकर अपने मूल धंधे छोड़ते चले जा रहे हैं. दलित-मुस्लिम भाई-भाई का नारा देकर पहले तो दलितों को कथित दलित चिंतकों ने सवर्णों के खिलाफ भड़काया, उनके कई मूल बिजनेस से उनका ध्यान हटा दिया... और अब करोड़ों के ऐसे बिजनेस पर मुस्लिमों ने अपना कब्ज़ा जमा लिया है...

 

बांद्रा की झोपडपट्टी में प्रतिवर्ष लगने वाली आग का रहस्य भी इसी "माफिया तकनीक" में छिपा हुआ है... उसे पढने के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें...

http://desicnn.com/news/bandra-railway-station-slum-area-fire-and-vote-bank-politics

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मूल अंगरेजी लेख :- By Lata Mishra and Kunal Guha, Mumbai Mirror

अनुवाद :- सुरेश चिपलूनकर 

Read 2387 times Last modified on मंगलवार, 28 नवम्बर 2017 11:52
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