इंदु सरकार : भंडारकर का अनपेक्षित थोथा चना बाजे घना

Written by बुधवार, 02 अगस्त 2017 08:26

जब हम थियेटर में मधुर भंडारकर की फिल्म देखने जाते हैं तो हमारे दिमाग में मधुर भंडारकर की ही छवि होती है. “चांदनी बार”, “ट्रेफिक सिग्नल”, “कारपोरेट” जैसी कई शानदार फ़िल्में देने वाले तथा अपनी फिल्मों में किसी हीरो-हीरोइन को हावी न होने देते हुए इस फिल्म माध्यम को “निर्देशक का माध्यम” सिद्ध करने वाले मधुर भंडारकर की हालिया फिल्म “इंदु सरकार” हाल ही में देखने को मिली.

यदि एक ही पंक्ति में कहा जाए तो यह फिल्म मधुर भंडारकर द्वारा अब तक सेट किए हुए “स्टैण्डर्ड” पर कहीं से कहीं तक खरी नहीं उतरती. ऐसा क्यों? इसका संक्षिप्त विश्लेषण आगे पेश किया जा रहा है.

उल्लेखनीय है कि प्रचार माध्यमों तथा स्वयं मधुर भंडारकर द्वारा दावा किया गया था, कि यह फिल्म इंदिरा गाँधी द्वारा 1975 में देश पर थोपे गए आपातकाल पर आधारित है, तथा फिल्म में मुस्लिमों की जबरिया नसबंदी, तथा दिल्ली के तुर्कमान गेट काण्ड के बारे में कथा-पटकथा रची गयी है. स्वाभाविक है कि फिल्म को लेकर अपेक्षाएँ बेहद ऊँची हो जाती हैं. और जब ऐसी राजनैतिक फिल्म में मधुर भंडारकर का नाम भी जुड़ जाता है तो उन अपेक्षाओं को पंख लग जाते हैं कि शायद हमें भारत की “पहली” पूर्ण राजनैतिक फिल्म देखने को मिलेगी. “पहली” शब्द इसलिए लिखा है, क्योंकि वास्तव में भारत में अभी तक एक भी फिल्म ऐसी नहीं बनी है, जिसे हम “राजनैतिक फिल्म” कह सकें. फिल्म आँधी भी पूर्ण राजनैतिक फिल्म नहीं थी, लेकिन फिर भी इंदु सरकार से काफी बेहतर थी, इसी प्रकार “आज का MLA रामावतार”, “इन्कलाब” जैसी कई “बॉलीवुड छाप” फ़िल्में आईं और गईं, लेकिन वे केवल मसाला फ़िल्में ही सिद्ध हुईं. प्रकाश झा की फिल्म “राजनीति”, “गंगाजल” वगैरह को थोडा ठीक कहा जा सकता है. लेकिन वास्तव में भारत के किसी भी निर्देशक में शायद अभी तक यह हिम्मत ही पैदा नहीं हो पाई, कि वह इस देश की विविधतापूर्ण और रंगबिरंगी राजनीति तथा 1947-2017 के इन सत्तर वर्षों में घटित हुई एक से बढ़कर एक राजनैतिक घटनाओं पर कोई मजबूत फिल्म बना सके. इसीलिए जब मधुर भंडारकर यह घोषणा करते हैं कि “आपातकाल” जैसे महत्त्वपूर्ण और ऐतिहासिक मुद्दे पर वे एक फिल्म लेकर आ रहे हैं, तो दर्शक बेसब्री से इंतज़ार करने लगता है.

जब हम “इंदु सरकार” के ट्रेलर तथा पोस्टर देखकर फिल्म देखने जाते हैं, अथवा इंदु सरकार के रिलीज़ से पहले कांग्रेसियों द्वारा मचाए गए हंगामे को मद्देनजर रखते हुए थियेटर में घुसते हैं तब हमारी अपेक्षा होती है कि शायद यह फिल्म पूर्णतः राजनैतिक होगीं, तथा इसकी भी पटकथा फिल्म कारपोरेट की तरह चुस्त-दुरुस्त होगी. हम यह अपेक्षा करने लगते हैं कि जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ेगी, वैसे-वैसे यह हमें बाँधने और सोचने पर मजबूर करेगी, जो कि “भंडारकर स्टाईल” रहा है. परन्तु इंदु सरकार फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं होता. यह फिल्म मध्यांतर तक तो अपने मूल प्लाट तक पहुँचने में ही समय गँवा देती है. बेहद धीमी रफ़्तार एवं बिना किसी चौंकाने वाले घटनाक्रम के फिल्म के शुरुआती पैंतालीस मिनट यूँ ही निकल जाते हैं. ना तो फिल्म इन्दू की भूमिका निभाने वाली हीरोइन को ही स्थापित कर पाती है, और ना ही पूरी तरह से राजनैतिक ताना-बाना लिए हुए एक थ्रिलर मूवी बन पाती है. सोचा गया था कि शायद मध्यांतर के बाद फिल्म गति पकड़ेगी और क्लाईमैक्स आते-आते दर्शक अपनी कुर्सी से चिपक जाएगा, चौंकेगा और भरपूर तालियाँ बजाते हुए थियेटर से बाहर निकलेगा. लेकिन ऐसा कतई नहीं होता... फिल्म का क्लाईमैक्स एक बेहद सादगी भरे अंदाज में ‘अचानक” ही हो जाता है. यहाँ तक कि जब क्लाईमैक्स में दर्शक की उत्कंठा चरम पर होनी चाहिए उस समय कोर्ट में इंदु सरकार के हकलाते हुए बयानों से दर्शक बोर होने लगता है, और उसे अचानक पता चलता है कि फिल्म ख़त्म हो गई. संजय गाँधी की भूमिका में नीलनितिन मुकेश के अलावा कोई भी किरदार ऐसा नहीं लगा, जो अपना प्रभाव छोड़ सके.

तुर्कमान गेट काण्ड को निर्देशक ने केवल सरसरी तौर पर ही छुआ है, यह काण्ड फिल्म में उन दोनों अनाथ बच्चों एवं अनाथ हीरोईन के बैकग्राउंड में ही चलता रहता है, कभी भी दर्शक में मन पर हावी नहीं हो पाता. संजय गाँधी के आसपास विचरने वाले किरदारों में से एक को “कमलनाथ” की तरह, जबकि दुसरे को “जगदीश टाईटलर” की तरह चित्रित करने की कोशिश की गई है, लेकिन उन्हें बेहद दब्बू और घबराया हुए ही दिखाया गया है. यदि मधुर भंडारकर वास्तव में संजय गाँधी की “तत्कालीन छवि” ठीक से पेश करना चाहते थे, तो उन्हें हरियाणा के बंसीलाल, मप्र के विद्याचरण शुक्ल और प्रकाशचंद सेठी और यूपी के अकबर अहमद “डम्पी” को भी उनके साथ ही चित्रित करना था, लेकिन वे अपनी अनाथ हीरोईन के दुखड़े वाली लचर पटकथा में ही उलझकर रह गए. इसी प्रकार इंदु सरकार के पति यानी नवीन सरकार की भूमिका को भी फिल्म के क्लाईमैक्स में किसी चौंकाने वाले कदम उठाते हुए दिखाया जा सकता था, लेकिन दर्शक पहले ही सोच लेता है कि शायद ये आत्महत्या करेगा और वैसा ही होता भी है. फ़िल्मकार की सफलता इस बात में होती है कि दर्शक जो सोच रहा है, वह फिल्म में कभी न हो... कुछ अप्रत्याशित घटनाक्रम हो, दर्शक या तो कुर्सी से उछले या फिर चिपके. इस फिल्म में कुल जमा चार सीन भी ऐसे नहीं आते, कि दर्शक के साथ ऐसा कुछ हो. पूरी फिल्म देखते समय यही लगता रहता है कि भंडारकर किसी दबाव में हैं, लेकिन पोस्टर-ट्रेलर जारी करते समय खामख्वाह इस फिल्म के राजनैतिक होने का आभास पैदा करते हैं.

अलबत्ता एक बात तो माननी पड़ेगी, कि मधुर भंडारकर भी प्रचार माध्यमों का “बढ़िया दुरुपयोग” करने में माहिर हो गए हैं. उन्होंने जानबूझकर फिल्म का नाम “इंदु सरकार” रखा, ताकि लोगों को “इंदु” शब्द से इंदिरा गाँधी का आभास हो तथा “सरकार” शब्द से इंदिरा गाँधी की तानाशाही एवं फिल्म के पूर्ण राजनैतिक होने का भ्रम पैदा किया जा सके. इसके बाद का बचा-खुचा काम कांग्रेसियों ने उसी तरह पूरा कर दिया, जिस प्रकार “बजरंगी भाईजान” के समय कथित हिन्दूवादियों ने किया था... अर्थात फिल्म को बिना देखे ही सड़कों पर अँधा विरोध करना. ये भी संभव है कि मधुर भंडारकर ने इस नकली विरोध के लिए कांग्रेस के कुछ नेताओं से सांठगाँठ की हो. बजरंगी भाईजान नामक फिल्म को “हिन्दू लड़की और मुस्लिम लड़के” की प्रेम कहानी के रूप में प्रचारित करने का ठेका, नकली हिन्दूवादियों ने लिया था, उसी प्रकार केवल “इंदु सरकार और आपातकाल”, यह दो शब्द सुनते ही उछलकूद मचाने वाले कांग्रेसियों ने मधुर भंडारकर की इस फिल्म को मुफ्त प्रचार दिया.

लेकिन दिक्कत तब होती है, जब आप झूठा प्रचार करके ग्राहक को अपनी दूकान तक खींच तो लाते हैं, लेकिन आपकी दुकान पर जो माल मिलता है वह घटिया निकलता है. कहने का मतलब यह है कि ना तो “इंदु सरकार” फिल्म ठीक से राजनैतिक बन पाई, और ना ही पारिवारिक... एक बेहद धीमी और लचर पटकथा वाला चूं-चूं का मुरब्बा बनकर रह गई... जो कि भंडारकर की छवि से मेल नहीं खाता. भारत के दर्शक अब इतने पतिपक्व हो चुके हैं कि उन्हें "मोपला काण्ड", "सिखों के नरसंहार", "नरसिंहराव की अप्रत्याशित ताजपोशी और उसके बाद हुए आर्थिक उदारीकरण", "वीपी सिंह के समय हुए आरक्षण आंदोलन", जैसे कई-कई विषयों पर ठोस और पूर्ण राजनैतिक फिल्मों का इंतज़ार है. 

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