पाठ्यक्रम से बाहर वाला “जलालुद्दीन अकबर” :- भाग 2

Written by शुक्रवार, 29 सितम्बर 2017 07:54

पिछले भाग में आपने अकबर की क्रूरता, वासना और हत्यारी इस्लामिक मानसिकता के बारे में पढ़ा... (पिछला लेख पढने के लिए यहाँ क्लिक करें).... इसी के अगले भाग में हम आपको अकबर की कुछ और असलियतें बताएँगे.

जिन्हें पढ़कर आप समझ जाएँगे कि वामपंथी इतिहासकारों ने किस तरह से मुग़ल साम्राज्य को दयालु और न्यायप्रिय बताने में कोर-कसर बाकी न रखी, ताकि हिन्दुओं को सही इतिहास का पता न चले. पाठ्यक्रम में आपने हमेशा अकबर-शाहजहाँ-जहांगीर -औरंगजेब इत्यादि के बारे में अच्छा-अच्छा ही पढ़ा होगा. ऐसा इसीलिए किया जाता था, ताकि हिन्दुओं को उनके पीड़ित इतिहास से दूर रखा जाए और बाहर से आने वाले आक्रान्ता मुस्लिमों को सदाशयता से भरा हुआ व्यक्ति बताया जाए. बहरहाल, अब आप "कथित रूप से महान अकबर" के काले कारनामों को इस दूसरे भाग में आगे पढ़िए... 

महाराणा प्रताप के विरुद्ध अकबर के अभियानों के लिए सबसे बड़ा प्रेरक तत्व था “इस्लामी जिहाद की भावना”, जो उसके अन्दर कूट-कूटकर भरी हुई थी. अकबर के एक दरबारी इमाम अब्दुल कादिर बदाउनी ने अपने इतिहास अभिलेख, ‘मुन्तखाव-उत-तवारीख’ में लिखा था कि 1576 में जब शाही फौजें राणाप्रताप के खिलाफ युद्ध के लिए अग्रसर हो रहीं थीं, तो मैनें (बदायूंनी ने) ”युद्ध अभियान में शामिल होकर हिन्दुओं के रक्त से अपनी इस्लामी दाढ़ी को भिगोंकर शाहंशाह से भेंट की अनुमति के लिए प्रार्थना की।” मेरे व्यक्तित्व और जिहाद के प्रति मेरी निष्ठा भावना से अकबर इतना प्रसन्न हुआ कि उन्होनें प्रसन्न होकर मुझे मुठ्ठी भर सोने की मुहरें दे डालीं।” (मुन्तखाब-उत-तवारीख : अब्दुल कादिर बदाउनी, खण्ड II, पृष्ठ 383, अनुवाद वी. स्मिथ, अकबर दी ग्रेट मुगल, पृष्ठ 108).

बदाउनी ने हल्दी घाटी के युद्ध में एक मनोरंजक घटना के बारे में लिखा था - ”हल्दी घाटी में जब युद्ध चल रहा था और अकबर की सेना से जुड़े राजपूत, और राणा प्रताप की सेना के राजपूत जब परस्पर युद्धरत थे, और उनमें कौन किस ओर है, भेद कर पाना असम्भव हो रहा था, तब मैनें शाही फौज के अपने सेना नायक से पूछा कि वह किस पर गोली चलाये ताकि शत्रु ही मरे. तब कमाण्डर आसफ खाँ ने उत्तर दिया कि यह जरूरी नहीं कि गोली किसको लगती है क्योंकि दोनों ओर से युद्ध करने वाले काफिर हैं, गोली जिसे भी लगेगी काफिर ही मरेगा, जिससे लाभ इस्लाम को ही होगा।” (मुन्तखान-उत-तवारीख : अब्दुल कादिर बदाउनी, खण्ड II, अनु अकबर दी ग्रेट मुगल : वी. स्मिथ पुनः मुद्रित 1962; हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ दी इण्डियन पीपुल, दी मुगल ऐम्पायर : आर. सी. मजूमदार, खण्ड VII, पृष्ठ 132, तृतीय संस्करण).

जहाँगीर ने, अपनी जीवनी, ”तारीख-ई-सलीमशाही” में लिखा हुआ है कि ‘‘अकबर और जहाँगीर के शासन काल में पाँच से छः लाख की संख्या में हिन्दुओं का वध हुआ था।” (तारीख-ई-सलीम शाही, अनु. प्राइस, पृष्ठ 225-226). जून 1561 - एटा जिले के (सकित परंगना) के 8 गावों की हिंदू जनता के विरुद्ध अकबर ने खुद एक आक्रमण का संचालन किया और परोख नाम के गाँव में मकानों में बंद करके 1000 से ज़्यादा हिंदुओं को जिंदा जलवा दिया था. कुछ इतिहासकारों के अनुसार उनके इस्लाम कबूल ना करने के कारण ही अकबर ने क्रुद्ध होकर ऐसा किया. थानेश्वर में दो संप्रदायों कुरु और पुरी के बीच पूजा की जगह को लेकर विवाद चल रहा था. अकबर ने आदेश दिया कि दोनों आपस में लड़ें और जीतने वाला जगह पर कब्ज़ा कर ले. उन मूर्ख लोगों ने आपस में ही अस्त्र शस्त्रों से लड़ाई शुरू कर दी. जब पुरी पक्ष जीतने लगा तो अकबर ने अपने सैनिकों को कुरु पक्ष की तरफ से लड़ने का आदेश दिया, और अंत में इसने दोनों ही तरफ के लोगों को अपने सैनिकों से मरवा डाला, फिर “अकबर महान” जोर से हँसा. एक बार अकबर शाम के समय जल्दी सोकर उठ गया तो उसने देखा कि एक नौकर उसके बिस्तर के पास सो रहा है. अकबर अनपढ़ और गँवार तो था ही, इससे उसको इतना गुस्सा आया कि उसने अपने मुस्लिम नौकर को भी मीनार से नीचे फिंकवा दिया.

अगस्त 1600 में अकबर की सेना ने असीरगढ़ का किला घेर लिया, पर मामला बराबरी का था. विन्सेंट स्मिथ ने लिखा है कि अकबर ने एक अद्भुत तरीका सोचा. उसने किले के राजा मीरां बहादुर को संदेश भेजकर अपने सिर की कसम खाई कि उसे सुरक्षित वापस जाने देगा. जब मीरां शान्ति के नाम पर बाहर आया, तो उसे अकबर के सामने सम्मान दिखाने के लिए तीन बार झुकने का आदेश दिया गया क्योंकि अकबर महान को यही पसंद था. उसको अब पकड़ लिया गया और आज्ञा दी गयी कि अपने सेनापति को कहकर आत्मसमर्पण करवा दे. मीराँ के सेनापति ने इसे मानने से मना कर दिया और अपने लड़के को अकबर के पास यह पूछने भेजा कि उसने अपनी प्रतिज्ञा क्यों तोड़ी? अकबर ने उसके बच्चे से पूछा कि क्या तेरा पिता आत्मसमर्पण के लिए तैयार है? तब बालक ने कहा कि चाहे राजा को मार ही क्यों न डाला जाए उसका पिता समर्पण नहीं करेगा. यह सुनकर अकबर महान ने उस बालक को मार डालने का आदेश दिया. यह घटना अकबर की मृत्यु से पांच साल पहले की ही है... यानी बुढ़ापे में भी अकबर नीच ही था.

हिन्दुस्तानी मुसलमानों को यह कह कर बेवकूफ बनाया जाता है कि अकबर ने इस्लाम की अच्छाइयों को पेश किया. असलियत यह है कि कुरआन के खिलाफ जाकर ३६ शादियाँ करना, शराब पीना, नशा करना, दूसरों से अपने आगे सजदा करवाना आदि इस्लाम के लिए हराम है और इसीलिए इसके नाम की मस्जिद भी हराम है. अकबर स्वयं पैगम्बर बनना चाहता था इसलिए उसने अपना नया धर्म “दीन-ए-इलाही – ﺩﯾﻦ ﺍﻟﻬﯽ ” चलाया। जिसका एकमात्र उद्देश्य खुद की बड़ाई करवाना था. यहाँ तक कि मुसलमानों के कलमें में यह शब्द “अकबर खलीफतुल्लाह – ﺍﻛﺒﺮ ﺧﻠﻴﻔﺔ ﺍﻟﻠﻪ ” भी जुड़वा दिया था. उसने लोगों को आदेश दिए कि आपस में अस्सलाम-वालैकुम नहीं बल्कि “अल्लाह-ओ-अकबर” कहकर एक दूसरे का अभिवादन किया जाए. यही नहीं अकबर ने हिन्दुओं को गुमराह करने के लिए एक फर्जी उपनिषद् “अल्लोपनिषद” बनवाया था, जिसमें अरबी और संस्कृत मिश्रित भाषा में मुहम्मद को अल्लाह का रसूल और अकबर को खलीफा बताया गया था. इस फर्जी उपनिषद् का उल्लेख महर्षि दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश में किया है।

अकबर के वामपंथी चाटुकारों ने इस धूर्तता को भी उसकी उदारता की तरह पेश किया. जबकि वास्तविकता ये है कि उस धर्म को मानने वाले अकबरनामा में लिखित कुल 18 लोगों में से केवल एक हिन्दू बीरबल था. अकबर ने अपने को रूहानी ताकतों से भरपूर साबित करने के लिए कितने ही झूठ बोले. जैसे कि उसके पैरों की धुलाई करने से निकले गंदे पानी में अद्भुत ताकत है जो रोगों का इलाज कर सकता है. अकबर के पैरों का पानी लेने के लिए लोगों की भीड़ लगवाई जाती थी. उसके दरबारियों को तो इसलिए अकबर के नापाक पैर का चरणामृत पीना पड़ता था ताकि वह नाराज न हो जाए. अकबर ने एक आदमी को केवल इसी काम पर रखा था कि वह उनको जहर दे सके जो लोग उसे पसंद नहीं.

“अकबर महान” ने न केवल कम भरोसेमंद लोगों का क़त्ल कराया, बल्कि उनका भी कराया जो उसके भरोसे के आदमी थे जैसे - बैरम खान (अकबर का गुरु, जिसे मारकर अकबर ने उसकी बीवी से निकाह कर लिया), जमन असफ खान (इसका वित्त मंत्री), शाह मंसूर, मानसिंह, कामरान का बेटा शेख अब्दुर नबी, मुइजुल मुल्क, हाजी इब्राहिम और बाकी सब जो इसे नापसंद थे. अकबर के हाथों मारे गए उसके विश्वासपात्र मुसलमानों की पूरी सूची स्मिथ की किताब में दी हुई है. अकबर के चाटुकारों ने राजा विक्रमादित्य के दरबार की कहानियों के आधार पर उसके दरबार और नौ रत्नों की कहानी गढ़ी, परन्तु असलियत यह है कि अकबर अपने सभी दरबारियों को मूर्ख समझता था. उसने स्वयं कहा था कि वह अल्लाह का शुक्रगुजार है कि उसको योग्य दरबारी नहीं मिले वरना लोग सोचते कि अकबर का राज उसके दरबारी चलाते हैं वह खुद नहीं. अकबरनामा के एक उल्लेख से स्पष्ट हो जाता है कि उसके हिन्दू दरबारियों का प्रायः अपमान हुआ करता था. ग्वालियर में जन्में संगीत सम्राट रामतनु पाण्डेय उर्फ तानसेन की तारीफ करते-करते मुस्लिम दरबारी उसके मुँह में चबाया हुआ पान ठूँस देते थे. भगवन्त दास और दसवंत ने इसीलिए आत्महत्या कर ली थी.

प्रसिद्ध नवरत्न टोडरमल, अकबर की लूट का हिसाब करता था. इसका काम था जजिया न देने वालों की औरतों को हरम का रास्ता दिखाना. वफादार होने के बावजूद अकबर ने एक दिन क्रुद्ध होकर उसकी पूजा की मूर्तियाँ तुड़वा दी. जिन्दगी भर अकबर की गुलामी करने के बाद टोडरमल ने अपने जीवन के आखिरी समय में अपनी गलती मान कर दरबार से इस्तीफा दे दिया, और अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए प्राण त्यागने की इच्छा से वाराणसी होते हुए हरिद्वार चला गया और वहीं मरा. लेखक और नवरत्न अबुल फजल को स्मिथ ने अकबर का अव्वल दर्जे का निर्लज्ज चाटुकार बताया. बाद में जहाँगीर ने इसे भी मार डाला. फैजी नामक रत्न असल में एक साधारण सा कवि था, जिसकी कलम अपने शहंशाह को प्रसन्न करने के लिए ही चलती थी. बीरबल शर्मनाक तरीके से एक लड़ाई में मारा गया. अकबर-बीरबल के किस्से असल में मन बहलाव की बातें हैं जिनका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं. ध्यान रहे कि ऐसी कहानियाँ दक्षिण भारत में तेनालीराम के नाम से भी प्रचलित हैं. एक और रत्न शाह मंसूर दूसरे रत्न अबुल फजल के हाथों अकबर के आदेश पर मार डाला गया.

मानसिंह जो देश में पैदा हुआ सबसे नीच गद्दार था, ने अपनी बेटी तो अकबर को दी ही जागीर के लालच में कई और राजपूत राजकुमारियों को तुर्क हरम में पहुँचाया. बाद में जहांगीर ने इसी मान सिंह की पोती को भी अपने हरम में खींच लिया. मानसिंह ने पूरे राजपूताने के गौरव को कलंकित किया था. यहाँ तक कि उसे अपना आवास आगरा में बनाना पड़ा, क्योंकि वो राजस्थान में मुँह दिखाने के लायक नहीं था. यही मानसिंह जब संत तुलसीदास से मिलने गया तो अकबर ने इस पर गद्दारी का संदेह कर दूध में जहर देकर मरवा डाला, और इसके पिता भगवान दास ने लज्जित होकर आत्महत्या कर ली. इन नवरत्नों को अपनी बीवियां, लडकियां, बहनें तो अकबर की खिदमत में भेजनी पड़ती ही थीं, ताकि बादशाह सलामत उनको भी सलामत रखें, और साथ ही अकबर महान के पैरों पर डाला गया पानी भी इनको पीना पड़ता था जैसा कि ऊपर बताया गया है. अकबर शराब और अफीम का इतना शौक़ीन था, कि अधिकतर समय नशे में धुत रहता था. अकबर के दो बच्चे नशाखोरी की आदत के चलते अल्लाह को प्यारे हो गये.

हमारे फिल्मकार अकबर को सुन्दर और रोबीला दिखाने के लिए रितिक रोशन जैसे अभिनेताओं को फिल्मों में पेश करते हैं परन्तु विन्सेंट स्मिथ अकबर के बारे में लिखते हैं - “अकबर एक औसत दर्जे की लम्बाई का था, उसके बाएं पैर में लंगड़ापन था. उसका सिर अपने दायें कंधे की तरफ झुका रहता था. उसकी नाक छोटी थी जिसकी हड्डी बाहर को निकली हुई थी. उसके नाक के नथुने ऐसे दिखते थे जैसे वो गुस्से में हो. आधे मटर के दाने के बराबर एक मस्सा उसके होंठ और नथुनों को मिलाता था”. अकबर का दरबारी लिखता है कि अकबर ने इतनी ज्यादा पीनी शुरू कर दी थी कि वह मेहमानों से बात करते-करते भी नींद में गिर पड़ता था. वह जब ज्यादा पी लेता था, तो आपे से बाहर हो जाता था और पागलों जैसी हरकतें करने लगता. “अकबर महान”(?) के खुद के पुत्र जहाँगीर ने लिखा है, कि अकबर कुछ भी लिखना पढ़ना नहीं जानता था, पर यह दिखाता था कि वह बड़ा भारी विद्वान है. अकबर ने एक ईसाई पुजारी को एक रूसी गुलाम का पूरा परिवार भेंट में दिया. इससे पता चलता है कि अकबर गुलाम रखता था और उन्हें वस्तु की तरह भेंट में दिया और लिया करता था.

कंधार में एक बार अकबर ने बहुत से लोगों को गुलाम बनाया क्योंकि उन्होंने 1581-82 में इसकी किसी नीति का विरोध किया था. बाद में इन गुलामों को मंडी में बेच कर घोड़े खरीदे गए. अकबर बहुत नए तरीकों से गुलाम बनाता था. उसके आदमी किसी भी घोड़े के सिर पर एक फूल रख देते थे. फिर बादशाह की आज्ञा से उस घोड़े के मालिक के सामने दो विकल्प रखे जाते थे, या तो वह अपने घोड़े को भूल जाये, या अकबर की वित्तीय गुलामी क़ुबूल करे. जब अकबर मरा था तो उसके पास दो करोड़ से ज्यादा अशर्फियाँ केवल आगरे के किले में थीं. इसी तरह के और खजाने छह और जगह पर भी थे. इसके बावजूद भी उसने 1595-1599 की भयानक भुखमरी और अकाल के समय एक सिक्का भी, देश की सहायता में खर्च नहीं किया.

अकबर के कथित धर्मनिरपेक्ष होने का सबसे बड़ा सबूत यह है कि अकबर ने गंगा, यमुना, सरस्वती के संगम तीर्थनगर “प्रयागराज” जो एक काफिर नाम था, को बदलकर इलाहाबाद रख दिया था. वहाँ गंगा के तटों पर रहने वाली सारी आबादी का क़त्ल करवा दिया और सब इमारतें गिरा दीं, क्योंकि जब उसने इस शहर को जीता तो वहाँ की हिन्दू जनता ने उसका इस्तकबाल नहीं किया. यही कारण है कि प्रयागराज के तटों पर कोई पुरानी इमारत नहीं है. अकबर ने हिन्दू राजाओं द्वारा निर्मित संगम प्रयाग के किनारे के सारे घाट तुड़वा डाले थे. आज भी वो सारे साक्ष्य वहाँ मौजूद हैं. 28 फरवरी 1580 को गोवा से एक पुर्तगाली मिशन अकबर के पास पंहुचा और उसे बाइबल भेंट की, जिसे इसने खोलकर देखे बिना ही वापस कर दिया, ऐसी थी उसकी धर्मनिरपेक्षता.

4 अगस्त 1582 को इस्लाम को अस्वीकार करने के कारण सूरत के दो ईसाई युवकों को अकबर ने अपने हाथों से क़त्ल किया था, जबकि ईसाईयों ने इन दोनों युवकों को छोड़ने के लिए 1000 सोने के सिक्कों का सौदा किया था, लेकिन फिर भी अकबर ने उनका क़त्ल करना ज्यादा सही समझा. सन् 1582 में बीस मासूम बच्चों पर भाषा परीक्षण किया, और ऐसे घर में रखा जहाँ किसी भी प्रकार की आवाज़ न जाए और उन मासूम बच्चों की ज़िंदगी बर्बाद कर दी वो गूंगे होकर मर गये, यही परीक्षण दोबारा 1589 में बारह बच्चों पर किया. सन् 1567 में नगरकोट को जीत कर कांगड़ा देवी मंदिर की मूर्ति को खण्डित की, और लूट लिया फिर गायों की हत्या कर के गौ-रक्त को जूतों में भरकर मंदिर की प्राचीरों पर छाप लगाई. जैन संत हरिविजय के समय सन् 1583-85 को जजिया कर और गौ हत्या पर पाबंदी लगाने की झूठी घोषणा की जिस पर कभी अमल नहीं हुआ. (अकबरनामा, अनुवाद प्रोफ़ेसर विन्सेंट).

एक अंग्रेज रूडोल्फ ने अकबर की घोर निंदा की. कर्नल टोड लिखते हैं कि अकबर ने एकलिंग की मूर्ति तोड़ डाली, और उस स्थान पर नमाज पढ़ी. 1587 में जनता का धन लूटने और अपने खिलाफ हो रहे विरोधों को ख़त्म करने के लिए अकबर ने एक आदेश पारित किया कि जो भी उससे मिलना चाहेगा, उसको अपनी उम्र के बराबर मुद्राएँ उसको भेंट में देनी पड़ेगी. जीवन भर इससे युद्ध करने वाले महान महाराणा प्रताप जी से अंत में इसने खुद ही हार मान ली थी, यही कारण है कि अकबर के बार बार निवेदन करने पर भी जीवन भर जहाँगीर केवल ये बहाना करके महाराणा प्रताप के पुत्र अमर सिंह से युद्ध करने नहीं गया कि उसके पास हथियारों और सैनिकों की कमी है, जबकि असलियत ये थी की उसको अपने बाप का बुरा हश्र याद था. विन्सेंट स्मिथ के अनुसार अकबर ने मुजफ्फर शाह को हाथी से कुचलवाया. मसूद हुसैन मिर्ज़ा की आँखें सीकर बंद कर दी गयीं. उसके 300 साथी उसके सामने लाये गए और उनके चेहरों पर अजीबोगरीब तरीकों से गधों, भेड़ों और कुत्तों की खालें डाल कर काट डाला गया. मुग़ल आक्रमणकारी थे

यह सिद्ध हो चुका है. मुगल दरबार तुर्क एवं ईरानी शक्ल ले चुका था, वह कभी भारतीय न बन सका. जबकि भारतीय राजाओं ने लगातार संघर्ष कर मुगल साम्राज्य को कभी स्थिर नहीं होने दिया. वास्तविक रूप से समूचे भारत पर मुग़ल साम्राज्य कभी था ही नहीं. यह बात हमारे दिमाग में खामख्वाह भरी गयी है. अपने सर्वोच्च काल में जितना मुग़ल शासन था, उससे दोगुना तो मराठा साम्राज्य था, लेकिन हमारे नकली इतिहासकारों ने इस बारे में कभी भी विस्तार से नहीं बताया. क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं इससे हिन्दुओं का स्वाभिमान जागृत न हो जाए.

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