टीटू मियाँ हों या टीपू मियाँ : सेनानी नहीं, शुद्ध जेहादी

Written by गुरुवार, 30 नवम्बर 2017 12:12

आज के वर्तमान बांग्लादेश लेकिन अंग्रेजों के समय जो अविभाजित बंगाल था, वहाँ एक मियाँ टीटू मीर हुआ करते थे. इनके बारे में भारत के अंदर बहुत कम लोग जानते हैं, लेकिन उधर बांग्लादेश और इधर पश्चिम बंगाल में मियाँ मीर का बहुत महिमामंडन होता है.

टीटू मीर (1782-1831) के बारे में बंगाली बच्चों को यही बताया जाता है वे एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे जिन्होंने बड़ी बहादुरी से अपने बाँस से बने किले में रहकर अंग्रेजों का मुकाबला किया. मियाँ टीटू मीर पर कई कविताएँ रची गई हैं और बांग्लादेश में इसे बहुत सम्मान दिया जाता है. 1971 में ढाका के जिन्ना कॉलेज का नाम बदलकर टीटू मीर कॉलेज रखा गया. ढाका की बांग्लादेश यूनिवर्सिटी ऑफ इन्जीनियरिंग एवं टेक्नोलॉजी में एक होस्टल का नाम भी मियाँ टीटू मीर के नाम पर है. बांग्लादेश की नौसेना के खुलना स्थित नौसेना बेस का नाम भी BNS टीटू मीर है. इसके अलावा बांग्लादेश सरकार ने इस मियाँ पर एक डाक टिकट भी जारी किया हुआ है. इतना सब पढ़ने के बाद आप सोच रहे होंगे कि ये वास्तव में बहुत महान टाईप का आदमी लगता है. वामपंथी इतिहासकारों ने भी पश्चिम बंगाल में मियाँ टीटू मीर की प्रशंसा में कई अध्याय लिखे हैं और उसे क्रान्तिकारी बताया है. 

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तो आखिर मियाँ टीटू मीर हैं कौन, इनके कारनामे क्या-क्या हैं? और वास्तव में ये मियाँ जी करते क्या थे, जो इन्हें इतना सम्मान दिया जाता है? मजे की बात यह है कि मियाँ टीटू मीर के बारे में कोई ख़ास दस्तावेजी तथ्य हासिल नहीं हैं, फिर भी बंगाल के वामपंथियों और ढाका के इस्लामियों ने उसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी घोषित कर रखा है. टीटू मीर के बारे में सर्वाधिक जानकारी के लिए एक विश्वसनीय स्रोत है ब्रिटिश ऑफिसर जॉन रसल काल्विन की एक रिपोर्ट. कॉल्विन 1857 की क्रान्ति के दौरान उत्तर-पश्चिम कमान में लेफ्टिनेंट गवर्नर था. इसी को टीटू मीर के बारे में अपनी रिपोर्ट ब्रिटिश सरकार को सौंपने का जिम्मा दिया गया था. अपनी रिपोर्ट में जॉन कॉल्विन ने लिखा है :-

“...टीटू मियाँ, अर्थात मीर निसार अली. इसने अपना युवा जीवन एक छोटे किसान के रूप में शुरू किया, हालाँकि मेरे पास ऐसी रिपोर्ट भी आई थी कि यह कुछ डाकुओं का सरदार था. जल्दी ही टीटू मियाँ कलकत्ता चला गया और वहाँ पहलवानी करने लगा. जल्दी इसकी दबंगई पर बड़े जमींदारों की निगाह पड़ गई और उनमें से एक ने टीटू मियाँ को “वसूलीदार`” (आधुनिक काल के बाउंसर) के रूप में रख लिया. स्वाभाविक रूप से टीटू मियाँ का काम यह था कि उसके मालिक के प्रतिद्वंद्वी लोगों को मारना-पीटना. जहाँ भी लगान की वसूली न हो सके, अथवा जमीन की सीमा का झगड़ा हो, वहाँ टीटू मियाँ अपने गिरोह के साथ सबसे पहले पहुँचता और सामने वालों की धुनाई करके अपने मालिक के पक्ष में फैसला करवाता, अपने कारनामों की वजह से वह जल्दी ही चार साल के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी (यानी अंग्रेजों) की जेल में पहुँच गया.

जेल से छूटने के बाद निसार अली (उर्फ टीटू मियाँ) ने मक्का जाने वाला जहाज पकड़ लिया. मक्का में सैयद अहमद नामक शख्स ने टीटू मियाँ का जमकर ब्रेनवॉश किया और उसे वहाबी प्रचारक के रूप में वापस कोलकाता भेज दिया. टीटू मियाँ ने कोलकाता के पूर्वी हिस्से और बांग्लादेश के उत्तरी इलाके में अपने पठ्ठों को भेजकर वहाबी प्रचार शुरू कर दिया. कुछ लोगों ने उसका मजाक भी उड़ाया, कुछ ने उसके मंसूबों पर शक ज़ाहिर किया, लेकिन पुराने पहलवान रहे और एक जमाने में दादागिरी के धंधे में रहे नासिर अली ने विरोधियों और मजाक उड़ाने वालों को “उसकी अपनी स्टाईल” में सबक सिखा दिया.

उस कालखंड में बंगाल के हिन्दू-मुस्लिम काफी मिलजुलकर और प्रेम से रहा करते थे. मुस्लिमों पर “सूफियों” का प्रभाव था और हिंदुओं पर “बाउल” का. हिन्दू-मुस्लिम एक दूसरे के त्यौहारों में शामिल होते थे. जहाँ एक तरफ बच्चों को चेचक निकलने पर मुस्लिम लोग सरेआम “सीतला माता के मंदिर” में दर्शन करने आते थे, वही निःसंतान हिन्दू लोग भी सूफियों की मजारों पर जाया करते थे. यहाँ पर एंट्री होती है टीटू मियाँ के “वहाबी” प्रचार की. बरेली के सैयद अहमद के शिष्य टीटू मियाँ ने जल्दी ही मुसलमानों के बीच सूफियों-मज़ारों के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया. निसार अली का यह काम 1827 से 1840 तक अबाध जारी रहा, इन वर्षों के दौरान उसने बंगाल के मुसलमानों को हिंदुओं के खिलाफ जमकर भड़काया और सूफियों को ठिकाने लगाने का काम किया.

जॉन कॉल्विन ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि सैयद अहमद ने मुगलिया सल्तनत के धीरे-धीरे खत्म होने को लेकर एक पत्र में अपना रोष प्रकट किया था. वहाबी सैयद अहमद लिखता है, “....पूरे भारत पर धीरे-धीरे विदेशियों का कब्ज़ा होता जा रहा है और मुस्लिम शासन खत्म होता जा रहा है. कोई भी मुस्लिम शासक अंग्रेजों को चुनौती नहीं दे पा रहा है, यह मुस्लमानों के लिए चिंताजनक बात है. पूरा उत्तर और पूर्वी भारत धीरे-धीरे अंग्रेजों के कब्जे में है, पश्चिम और दक्षिण मराठों के पास है, जबकि सिखों ने भी अपना राज कायम रखा है. भारत में इस्लाम की स्थिति कमज़ोर है... जब इस्लाम द्वारा शासित भूमि पर किसी गैर-मुस्लिम का कब्ज़ा हो जाता है तो उम्मत के लिए काफिरों के खिलाफ जेहाद करना पाक काम है...”.

सैयद अहमद ने सबसे पहली वहाबी इस्लामिक फ़ोर्स बनाई जिसने महाराजा रणजीत सिंह के खिलाफ बालाकोट में युद्ध लड़ा. बालाकोट का यह युद्ध इतिहास में दर्ज किया गया जिसमें लड़ाके पूर्ण रूप से वहाबी विचारधारा और इस्लामिक स्टेट के समान विचारधारा वाले थे जिसका वैचारिक नेतृत्त्व बरेली का सैयद अहमद ने किया. अपने उस्ताद की देखादेखी उसके शिष्य टीटू मियाँ (उर्फ निसार अली) ने भी प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई की. उसने सबसे पहले हिन्दू जमींदारों की जमीनों को छीनना शुरू किया, ताकि एक “दारुल इस्लाम” बनाकर अंग्रेजों के विरुद्ध एक फाईनल युद्ध लड़ा जा सके. जॉन कॉल्विन की रिपोर्ट के अनुसार, टीटू मियाँ मीर ने अपने इस्लामिक युद्ध को पैशाचिक स्वरूप देते हुए जमींदारों की गायों का क़त्ल करके उनका खून हिन्दू मंदिरों पर छिड़कना शुरू किया. जैसा कि अपेक्षित था, हिन्दू बुरी तरह भड़क गए और उन्होंने टीटू मियाँ का कड़ा प्रतिरोध करना शुरू किया. निसार अली के इस क्रूर इस्लामिक कृत्य और उसकी इस्लामिक मंशा को भाँपते हुए हिंदुओं ने अंग्रेजों का साथ देना शुरू कर दिया. टीटू मियाँ ने नर्केलबेरिया के पास (वर्तमान में बारासात) बाँस का एक विशाल महल बनाया और ईस्ट इण्डिया कंपनी तथा हिन्दू जमींदारों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया. कुछ अंग्रेज कलेक्टरों के मारे जाते ही अंग्रेज भी बुरी तरह भड़क गए और उन्होंने 14 नवंबर 1831 को एक बड़ी सेना लाकर उसका बाँस का किला जला दिया और इस युद्ध में टीटू मियाँ मारा गया. उसके चार भतीजों और अन्य 350 वहाबियों को अंग्रेजों ने फाँसी पर लटका दिया. इस प्रकार एक जेहादी मुल्ले का अंत हुआ, लेकिन टीटू मियाँ द्वारा फैलाया गया वहाबी ज़हर पूरे पूर्वी बंगाल (वर्तमान में बांग्लादेश) में फ़ैल चुका था, जो आज भी दिखाई देता है.

टीटू मियाँ की मृत्यु के पच्चीस साल बाद ब्रिटिश शासन को अंग्रेज अफसर द्वारा सौंपी गई इस रिपोर्ट से यह साफ़ हो जाता है कि टीटू मियाँ (उर्फ निसार अली) कोई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नहीं, बल्कि एक जेहादी मुल्ला था जिसे केवल और केवल इस्लाम के शासन से मतलब था. हिंदुओं से उसकी मज़हबी दुश्मनी और मंदिरों से द्वेष यह स्पष्ट करता है कि उसे बंगाल और कोलकाता में जिस प्रकार का सम्मान दिया जाता है, वह उसके लायक नहीं है. जिस तरह उसके नाम पर कॉलेज और यूनिवर्सिटी बनाई गईं या सड़कों के नाम मियाँ टीटू मीर के नाम पर रखे जा रहे हैं यह सिद्ध करता है कि वामपंथियों ने हमेशा इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा है और इस्लामिक आक्रान्ताओं को बढ़ा-चढाकर पेश किया है. मैसूर का टीपू सुलतान भी ऐसे ही कई “वहाबी और जेहादी मुल्लों” में से एक था, जिसका खामख्वाह महिमामंडन किया जाता रहा है. लेकिन सच्चाई कब तक दबी रहेगी, जैसे-जैसे सोशल मीडिया पर जागरूकता बढ़ रही है और लोग इस्लाम के बारे में जानने-पढ़ने लगे हैं उन्हें इन पुराने इस्लामिक आक्रान्ताओं की असलियत पता चलती जा रही है.

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Basic English Source : India Facts

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