सोशल मीडिया के दबाव में आया SBI, दरें घटाईं

Written by मंगलवार, 26 सितम्बर 2017 07:52

भारत के सबसे बड़े बैंक अर्थात भारतीय स्टेट बैंक जिसे सभी लोग SBI के नाम से जानते हैं, को अंततः सोशल मीडिया के दबाव में आकर झुकना ही पड़ा.

सभी पाठकों ने नोट किया होगा कि पिछले लगभग दो माह से SBI की “मिनिमम बैलेंस” नहीं रखने पर शुल्क वसूलने के खिलाफ सोशल मीडिया में लगातार पोस्ट आ रही थीं. कई पोस्ट में यह भी बताया गया था कि किस तरह SBI ने “मिनिमम एवरेज बैलेंस” (MAB) के नाम पर लगभग 300 करोड़ रूपए अपने ग्राहकों से लूट लिए. इसके अलावा फेसबुक सहित विभिन्न माध्यमों के द्वारा लगातार SBI पर हमले जारी रहे. अब जाकर SBI ने माना है कि “हाँ, उनसे गलती हुई है..”.

कल जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार स्टेट बैंक ने “सामान्य बैंक खातों” के लिए दंड शुल्क लगाने संबंधी न्यूनतम बैलेंस राशि की सीमा 5000 से घटाकर 3000 रूपए कर दी है. यह अक्टूबर माह से लागू होगी. उल्लेखनीय है कि इसी वर्ष अप्रैल में SBI ने यह नियम उसके ग्राहकों पर थोपा था, उसके बाद जैसे-जैसे जनता को पता चलता गया, उनके खातों से पैसे गायब होने लगे, तभी से लगातार इसकी आलोचना शुरू हो गयी थी. हालाँकि अभी भी SBI ने केवल “थोड़ी सी ही राहत” दी है, पूरी तरह मामला ख़त्म नहीं किया है, क्योंकि SBI ने केवल पेंशनर्स एवं नाबालिग के खातों को ही पूरी तरह डांस शुल्क से मुक्त रखा है. बाकी के सामान्य खातों के लिए 3000 रूपए की सीमा (मेट्रो शहरों के लिए), 2000 रूपए की सीमा “अर्ध-मेट्रो” शहरों के लिए तथा 1000 रूपए की सीमा ग्रामीण शाखाओं के लिए जारी रहेगी.

पिछले सप्ताह नेशनल बैंकिंग समूह के मैनेजिंग डायरेक्टर रजनीश कुमार ने कहा कि जनता की माँग एवं दबाव के अनुसार यह निर्णय लिया गया है. साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दंड शुल्क को भी 50 रूपए से घटाकर 20 रूपए किया जा रहा है. इससे पहले SBI अपने खाताधारी से मिनिमम बैलेंस दंड के नाम पर कभीकभार 100 रूपए तक वसूल रहा था... उसके ऊपर GST भी काट रहा था. लेकिन अब यह सीमा घटाकर 20 से 50 (शाखा क्षेत्र के अनुसार) रूपए कर दी गयी है. SBI ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में यह भी स्पष्ट किया है कि 13 करोड़ जनधन खाते भी मिनिमम बैलेंस दंड शुल्क से मुक्त रहेंगे.

एक तरह से देखा जाए तो यह सोशल मीडिया की ही जीत मानी जाएगी, क्योंकि सबसे पहले सोशल मीडिया और ई-मेल के जरिये कई लोगों ने आवाज़ उठानी शुरू की थी. जैसे-जैसे जनता का दबाव बढ़ता गया, जनमानस में SBI और अरुण जेटली की छवि खराब होने लगी, तब अंततः इन्हें मानना ही पड़ा कि वास्तव में यह एक “संगठित लूट” ही थी... हालाँकि अप्रैल से सितम्बर के बीच जिन पेंशनर्स, नाबालिग, गरीबों के बैंक खातों से पैसे काटे जा चुके हैं, उनसे पूर्ण सहानुभूति के अलावा और क्या किया जा सकता है.

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