भोपाल मीडिया महोत्सव 2018 और प्रगतिशील बौद्धिक खुन्नस

Written by सोमवार, 09 अप्रैल 2018 08:33

हाल ही में स्पंदन संस्था की तरफ से भोपाल में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला “मीडिया महोत्सव” (Media Chaupal 2018) 31 मार्च और 1 अप्रैल 2018 को संपन्न हुआ.

यह उम्मीद थी कि इस आयोजन में पूरे देश से पत्रकार आएँगे क्योंकि यह मीडिया चौपाल का आठवाँ वर्ष था. विमर्श का स्तर एक पायदान और ऊपर उठाना था. इस आयोजन की तैयारी आयोजकों ने बहुत जोर शोर से शुरू कर दी थीं, निमंत्रण पत्रों पर विमर्श के विषय भी अपनी सार्थकता की कहानी जोर-शोर से कह रहे थे. इस बार मीडिया महोत्सव (Media Mahotsav, Bhopal) का विषय था “भारत की सुरक्षा : मीडिया, विज्ञान एवं तकनीकी की भूमिका”. इस आयोजन में न केवल दिल्ली बल्कि पूरे देश से सैकड़ों पत्रकार अपनी बात कहने के लिए उपस्थित थे. राष्ट्रीय सुरक्षा ऐसा विषय है, जिस पर किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए थी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.... क्योंकि जहाँ-जहाँ वामपंथ की दुर्गन्ध पहुँचेगी, वहाँ विवाद, झगड़े, आरोप-प्रत्यारोप, खुन्नस इत्यादि चलेगा. पिछले साठ वर्षों से कांग्रेस की गोद में बैठकर देश भर के “कथित विमर्श” पर कब्ज़ा जमाए बैठे तथा प्रत्येक सम्मेलन, कांफ्रेंस, मीटिंग को अपनी विचारधारा की बपौती माने बैठे, “सो कॉल्ड” प्रगतिशील बुद्धिपिशाच तबके को भला राष्ट्रीय सुरक्षा से क्या लेना-देना?

अब जरा एक ऐसे समाज की कल्पना कीजिए, जिसमें सब एक सा संवाद हो, एक सा रंग हो और एक ही विचार हो! तो क्या होगा? कैसा होगा वह समाज और कैसी होगी वह संस्कृति, जो एक ही रंग के पाले में चली जाए, जिसमें विरोध न हो, प्रतिरोध न हो! सब कुछ एक सार, सा कैसा लगेगा? अजीब न! दुर्भाग्य से भारत की आज़ादी के बाद से ही एक ही रंग के विचारों का हर आधिकारिक समारोहों, उत्सवों, शासकीय-अशासकीय विमर्शों में प्रभुत्व रहा, और इस कारण वह “लाल” रंग स्वयं को अजेय मानने लगा था. हर विश्वविद्यालय में ऊंचे ऊंचे पदों पर कब्ज़ा जमाए बैठे विद्वानों ने अपने उन विचारों का पालन अनिवार्य कर दिया, और दूसरों के विचारों को स्थान देने की सोची तक नहीं. असहमति की बात इसलिए उत्पन्न नहीं हुई, क्योंकि जब दूसरा विचार अस्तित्व में आता तभी तो असहमति आती. मगर एक बहुमुखी संस्कृति के देश में एक ही विचार का आधिपत्य एक समय से अधिक नहीं चल सकता है. अब हर तरफ के विचार मंच पर आने लगे हैं. मगर श्रेष्ठता बोध से ग्रसित “लाल” बुद्धिजीवी शायद इस बदलाव को स्वीकार नहीं रहे हैं, और अपनी ही खोल में रहने के लिए उन्होंने एक बहाना भी गढ़ लिया है, कि जो भी उनका समर्थन नहीं कर रहा.... वह या तो भक्त है या फिर नेकरधारी!

जैसे ही मीडिया महोत्सव का कार्यक्रम फेसबुक पर आया और karmveer.org के संपादक ने अपनी प्रतिभागिता की घोषणा की, कि इस महोत्सव में वे भी अपने विचार रखने जा रहे हैं, वैसे ही फेसबुक पर उनकी वाल पर इस बात का विरोध आरम्भ हो गया कि आखिर वे वहां क्या करने जा रहे हैं? गुस्से में उबलते हुए कथित पत्रकारों ने इस महोत्सव को नेकरधारियों का महोत्सव घोषित कर दिया (ये बात और है कि देश-प्रदेश की राजधानियों में उनके द्वारा आयोजित होने वाले महोत्सव “लाल बौद्धिक आतंक” के महोत्सव ही थे). पत्रकारों के भेष में आजकल कुछ लोग कांग्रेस के प्रवक्ता बने हुए हैं, वे भी अपनी भड़ास निकालने के लिए आ गए. गुजरात चुनावों में साम-दाम-दंड-भेद सब करके भी यह चौकड़ी भाजपा का बाल भी बांका नहीं कर पाई थी, मगर फिर भी निष्पक्षता की खींसे निपोरते हुए इस महोत्सव की पक्षधरता पर उंगली उठने लगीं.

मगर यह सत्य नहीं था. भोपाल में विज्ञान भवन में जहां यह आयोजन हो रहा था, वहां पर शहीद हुए पत्रकारों के बीच गौरी लंकेश का भी पोस्टर था, जो हालांकि कहने के लिए पत्रकार थीं, मगर गौरी लंकेश की मृत्यु का उनके पत्रकारिता के पेशे से कोई दूर दूर तक संबंध नहीं था. यदि एक नज़र गौरी लंकेश की कथित पत्रकारिता पर डालेंगे तो पाएंगे कि किस तरह वे केवल और केवल भाजपा विरोध के कारण वे एक पूरे धर्मनिरपेक्ष वर्ग की चहेती बनी हुई थीं. अभी तक जांच में यह साबित नहीं हुआ है कि उनकी ह्त्या उनकी कथित निर्भीक पत्रकारिता के कारण हुई थी. मगर इस मीडिया आयोजन पर पक्षधरता के आरोप लग गए. जो लोग इस आयोजन का नेकरधारी कहकर अंध-विरोध कर रहे थे, उन्होंने आमंत्रण पत्र में छपे हुए और नामों पर नज़र डालने की भी जरूरत नहीं समझीं, जिसमें कांग्रेस की प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी का नाम भी प्रमुख रूप से था.

 

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दूसरे दिन जब सत्र का आयोजन हो रहा था, और मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान सुरक्षा के हर आयामों पर बात कर रहे थे, वे मध्य प्रदेश की उपलब्धियों को गिना रहे थे, उस समय मंच पर बैठकर प्रियंका चतुर्वेदी ट्विटर के माध्यम से एक-एक बात का खंडन भी करती जा रही थीं. मगर फिर वही बात कि जब तक विपरीत विचार नहीं होंगे, लोकतंत्र नहीं स्थापित हो पाएगा. लेकिन ये बात “स्वयंभू प्रगतिशीलों” को समझ में कहाँ आती है, उनके आकाओं ने तो हजारों आवाजें दबाकर-कुचलकर एक राज्य में 30 वर्ष तक शासन किया है. युद्ध हमेशा ही विध्वंस लाता है, और इस आयोजन के बहाने एक नया वैचारिक युद्ध पता चला, जिसमें श्रेष्ठता ग्रंथि से पीडित कथित विचारकों के मन में दूसरे मत के प्रति इतनी नफरत थी कि वे उस पूरे के पूरे आयोजन को ही खारिज करने में जुट गए, जिसमें पत्रकार हिस्सा बन रहे थे.

उदघाटन सत्र में राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के अध्यक्ष श्री इन्द्रेश जी ने आतंरिक सुरक्षा पर अपने विचार व्यक्त किये. और इस बात पर भी क्षोभ व्यक्त किया कि नक्सली हमले में पुलिस की शहादत पर तो सवाल उठ जाते हैं, मगर हथियार उठाने वालों को निर्दोष करार दे दिया जाता है. इस आयोजन में मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने महिला सुरक्षा पर विशेष रूप से बात की. उन्होंने कहा कि यदि परिवार की धुरी महिला ही सुरक्षित नहीं है तो राष्ट्र कैसे सुरक्षित होगा? इसी प्रकार उन्होंने आर्थिक सुरक्षा की भी बात की. और उन्होंने जल्द ही पत्रकार सुरक्षा क़ानून लाने का भी वादा किया. इस आयोजन में प्रख्यात विचारक श्री गोविन्दाचार्य ने भी राष्ट्रीय सुरक्षा पर अपने विचार व्यक्त किये. मध्य प्रदेश की राज्यपाल श्रीमती आनंदी बेन पटेल भी कार्यक्रम के पूर्णाहुति सत्र में उपस्थित थीं. जिसमें उन्होंने इस महत्वपूर्ण विषय पर आयोजन के लिए आयोजकों का आभार व्यक्त किया. इस आयोजन में 13 प्रकाशकों ने पुस्तकों का स्टाल लगाया था. इस आयोजन में माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के वीसी एवं वरिष्ठ पत्रकार श्री जगदीश उपासने ने कहा कि यह एकदम भ्रम ही है कि पत्रकारिता को सत्ता विरोधी होना चाहिए, दरअसल पत्रकार को जनपक्षधर होना चाहिए.

यह सत्य ही है कि इस समय पत्रकारिता का एकमात्र उद्देश्य केवल और केवल उस विचारधारा का अंधा विरोध रह गया है जो सत्ता में है. फिर चाहे उसके द्वारा उठाए गए कदम सही ही क्यों न हों? इस कदर विरोध में अंधे हो जाना कि यदि कोई विरोधी विचार वाला व्यक्ति ऐसे आयोजन में अपने विचार रखने आए तो उस पर झुण्ड बनाकर टूट पड़ना, और इस तरह टूट पड़ना कि उस व्यक्ति को आकर सफाई देनी पड़े. इसी प्रकार जो पंकज चतुर्वेदी इसे नेकर वालों का उत्सव कह रहे थे, उनकी स्वयं की तस्वीर भी इसके पूर्व के प्रतिभागियों में थी. एक बात तो सच है कि इस तरह का अंधा विरोध संघ के विरोधियों को छोड़ना ही होगा, क्योंकि यह उन्हें जनता की निगाह में एकदम निर्वस्त्र कर रहा है. यह आयोजन कई अर्थों में महत्वपूर्ण था क्योंकि इस आयोजन में शायद पहली बार इतनी भारी संख्या में पत्रकार एकत्र हुए, न केवल पत्रकार, बल्कि साहित्यकार, रंगमंचकर्मी आदि सभी उपस्थित थे, नेता थे, स्थानीय सम्पादक थे, और राष्ट्रीय मीडिया भी.

कुल मिलाकर इस आयोजन के अतार्किक विरोध ने उन लोगों की कलई खोली, जो हर बात पर “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” की बात करते हैं. ये बात और है कि वे खुद ही वैचारिक छुआछूत के नित नए मानदंड स्थापित करते हैं और अपने से तनिक भिन्न मत रखने वालों को भक्त और न जाने कैसे कैसे शब्दों से नवाजते हैं. यह समय ऐसे लोगों को पहचान कर उन्हें और भी अकेला करने का है, जो भिन्न मतों को सुनने के लिए तैयार नहीं हैं. साथ ही आयोजन करने वाले “वास्तविक नेकरधारियों” को भी यह समझना होगा, कि सामंजस्य, संवाद, सहनशीलता का ठेका उन्हें खामख्वाह नहीं उठाना चाहिए. जिसकी जैसी हैसियत और नीयत हो उनके साथ वैसा ही व्यवहार होना चाहिए, “स्वयंभू संतपुरुष” नहीं बनना चाहिए

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