भारत की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति : जर्मन लेखिका ने लगाया तमाचा

Written by रविवार, 07 जनवरी 2018 08:17

हाल ही में राजकोट गुजरात से आए हुए एक वीडियो ने पारिवारिक मूल्यों पर सबसे बड़ा आघात किया है. लोगों के दिलोदिमाग को हिलाकर रख दिया है. एक मानसिक रूप से अपंग माँ को उसका अपना ही बेटा छत से धकेल रहा है.

गुडगाँव में हुए प्रद्युमन हत्याकांड का भी हम सबके दिमाग में है, और इसी के साथ हर साल लाल ड्रेस में सजे हुए सैंटा हमारे सामने हैं. हालांकि इनका कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है मगर एक चीज़ है जो इन सभी को आपस में जोडती है. जो तीनों में सबसे आम है, और यह है शिक्षा (English Medium Schools) और मूल्य (Ethics). राजकोट का प्रोफ़ेसर माँ के प्रति स्नेह को नहीं पढ़ पाया, प्रद्युमन को मारने वाला अपने सहपाठी के प्रति स्नेह विकसित नहीं पर पाया और ये लाल ड्रेस पहने सैंटा अपनी संस्कृति से दूर होते हुए कदम हैं. क्या कारण है कि जैसे जैसे शिक्षा के आंकड़े बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे ही सामाजिक और सांस्कृतिक समस्याएं पैदा हो रही हैं, फिर चाहे वह महिषासुर बलिदान दिवस हो या भारत तेरे टुकड़े होंगे गाने वाला गैंग. ये सभी जड़ों से दूर होकर पाई जाने वाली शिक्षा प्रणाली का ही दुष्परिणाम है, यह विदेशी भाषा में दी जाने वाली शिक्षा का षड्यंत्र है. जिसके अंतर्गत न केवल पारिवारिक मूल्यों का क्षरण हो रहा है, बल्कि एक तरह से संज्ञा और चेतना शून्य बचपन का निर्माण हो रहा है.

यह कोई रहस्य नहीं है कि आखिर अंग्रेजों ने भारतीय शिक्षा पद्धति (Hindi Medium Schools) और संस्कृत गुरुकुल परम्परा को समाप्त कर अंग्रेजी स्कूलों को बढ़ावा दिया. वे ऐसे ही लोगों की एक फ़ौज चाहते थे जो आचार और विचार हर तरह से अंग्रेज हो. वैदिक ज्ञान और संस्कृत भारत की प्राणवायु रही है. अंग्रेजों को इस प्राणवायु को समाप्त करना था और अंग्रेजी शिक्षा ने यह बखूबी किया. भारतीय अपनी समृद्ध परम्परा से दूर होते गए. विदेशी भाषा से प्राप्त शिक्षा के कारण यह बहुत ही आसान था. इस शिक्षा के माध्यम से कुछ नव धनाढ्यों के बच्चों को अंग्रेजी प्रशासन में अच्छी नौकरी मिली और अंग्रेजी ही ऐसा माध्यम था, जिसकी चाबी से सरकारी नौकरी का ताला खोला जा सकता था. इस शिक्षा व्यवस्था से ऐसे बच्चे निकले जिनकी जड़ें अपनी संस्कृति में बिलकुल ही नहीं थी और उन्हीं विद्यार्थियों ने आज़ाद भारत के भविष्य को काफी हद तक प्रभावित किया. तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि आज़ादी के बाद भी यही आवाज़ बार बार सुनाई देती रही कि अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूल ही श्रेष्ठ स्कूल हैं और ये सभी स्कूल मिशनरी द्वारा ही संचालित होते हैं. तो यह मुट्ठी भर कुलीनों और चर्च के लिए यही बहुत सुनहरा परिद्रश्य था कि कुछ मुट्ठी भर ही लोगों के पास ही सत्ता और नौकरी रहें. उनकी अपनी मातृभाषा उनके लिए काला अक्षर भैंस बराबर हुआ करती थी. और वह इस अवधारणा को नीति निर्माताओं के मन में उकेरने में एकदम सफल हुए थे कि भारत को बुलंदियों पर ले जाने के लिए अंग्रेजी माध्यम से ही पढाई जरूरी है

भारतीय बच्चों की बुद्धिमत्ता पर किसी को कोई संदेह नहीं हैं. सीटल और गुरुग्राम में रहने वाले एक प्रवासी भर्ती संक्रांत सानु ने भारतीय और अमरिकी बच्चों के बीच एक नॉन वर्बल आईक्यू टेस्ट किया था. हरियाणा के गाँव के बच्चे इस टेस्ट में अव्वल आए. उन्होंने अमेरिका और दिल्ली में अपने साथियों को कहीं पीछे छोड़ दिया था. एक गाँव में लगभग तीस प्रतिशत बच्चों ने 90 से अधिक पर्सेंटाइल हासिल किया, जिसका अर्थ था 100 में से 30 बच्चे बुद्धिमान थे जबकि अमेरिकी बच्चों में यह प्रतिशत केवल दस था. यह बहुत ही चौंकाने वाले नतीजे थे.

लेकिन भारत के लिए वर्ष 2009 में बच्चों की शिक्षा को लेकर एक बुरी खबर आई. पहली बार भारत ने ऑर्गनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट सेक्रेटरिएट द्वारा आयोजित प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट असेसमेंट में भाग लिया. 74 देशों से लगभग एक मिलियन 15 वर्ष के बच्चों ने इसमें गणित, विज्ञान और पढ़ने के कौशल के दो घंटे के टेस्ट में भाग लिया था. भारत से हिमाचल प्रदेश और तमिलनाडु के विद्यार्थियों ने इसमें भाग लेने का फैसला किया क्योंकि ये राज्य पढ़ाई में अग्रणी हैं. पर इस टेस्ट के परिणाम बहुत ही चौंकाने वाले आए. इस परिणाम ने एशिया को तो खुश किया, क्योंकि एशियाई देश सूची में सबसे ऊपर थे और यूरोप और अमेरिका की तुलना में ऊंची रैंक पर थे, मगर भारत के लिए झटका यह था कि यह नीचे से दूसरे नंबर पर था. भारत के लिए यह बहुत ही शर्मिंदा कर देने वाला लम्हा था. विशेषज्ञों ने इसका कारण भाषा की कठिनाई बताई. यह सच था. समस्या कहीं न कहीं भाषा की ही थी. ये सारे टेस्ट बच्चों की मातृभाषा में किए गए थे. जैसे जर्मन बच्चों के लिए जर्मन भाषा में, जापानी बच्चों के लिए जापानी में, मगर भारत के बच्चों के लिए अंग्रेजी में. इस शर्मिन्दगी के बावजूद भारत में इस पर कोई भी गंभीर विमर्श नहीं हुआ.

उसके बाद से भारत ने हर तीन वर्ष में होने वाले इस टेस्ट में भाग नहीं लिया है, मगर वर्ष 2021 में केन्द्रीय विद्यालय इसमें भाग लेंगे, मगर अंग्रेजी भाषा के साथ ही. यह उम्मीद है कि चूंकि इन बच्चों के माता-पिता दोनों ही सरकारी अधिकारी हैं तो वे अच्छी अंग्रेजी ही बोलेंगे. मगर क्या वे वाकई भारत के सच्चे प्रतिनिधि हैं? क्या यह भारत के साथ धोखा नहीं है?

 

Sanskrit

जर्मन होने के नाते मुझे अंग्रेजी में बोलने में आने वाली परेशानियों के बारे में पता है. मगर जब भी मेरी तरफ से यह बात कही जाती है कि भारतीय बच्चों को उनकी मातृभाषा में ही शिक्षा देनी चाहिए, तो अंग्रेजी बोलने वाले भारतीयों से ही सबसे ज्यादा विरोध आता है. उन्हें यह समझ ही नहीं आ पाता कि अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई करना और अंग्रेजी पढ़ना दो अलग अलग बाते हैं. कोई भी अंग्रेजी न सीखने की बात नहीं करता, मगर विद्यार्थियों के लिए एक विदेशी भाषा में पढ़ना, सवाल हल करना और निबंध लिखना बहुत कठिन है और पीसा के अध्ययन ने इसे साबित भी किया है, और सबूतों के लिए हम कुछ और यूरोपीय देशों को देख सकते हैं कि जो विद्यार्थी भाषा ठीक से नहीं समझ सकते हैं, वे अच्छा नहीं करेंगे. स्वीडन और जर्मनी की रैंकिंग पीसा के टेस्ट में कम हुई है, और जर्मनी की रैंकिंग अभी और कम होने जा रही है क्योंकि प्रवासी बच्चों के लिए जर्मन भाषा के एक वर्ष के सघन पाठ्यक्रम के बावजूद ये बच्चे जर्मन भाषा सही से नहीं पढ़ पा रहे हैं. इन बच्चों को नियमित कक्षाओं में आने के लिए जर्मन लेसन कम से कम एक साल तक सीखने चाहिए. भारत में उन परिवारों के बच्चों को एकदम से अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में डाल दिया जाता है, जहां पर माता-पिता दोनों को ही अंग्रेजी की एबीसीडी नहीं आती है. यह बहुत ही गलत कदम है, यह बच्चों की नींव हिलाकर रख देने वाला है. मुझे कभी कभी बहुत आश्चर्य होता है कि आखिर भारत में यह सब किस आधार पर चल जाता है, और इसे प्रोत्साहन भी जमकर दिया जाता है. पिछली सरकार के कार्यकाल के दौरान कई सरकारी स्कूलों में पढने वाले बच्चे अपना स्कूल छोड़कर गली गली खुले कुकुरमुत्तों जैसे स्कूल में चले गए थे. अंग्रेजी स्कूलों का क्रेज़ उन लोगों के द्वारा खड़ा किया जा रहा है जो एक मजबूत भारत नहीं देख सकते हैं, जैसे चर्च. जो माँ बाप अंग्रेजी नही जानते हैं, उन्हें यह भरोसा दिलाया जाता है कि अंग्रेजी स्कूल ही उनके बच्चों के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं.

यह बच्चों के लिए सर्वश्रेष्ठ न होकर उन्हें कुँए में धकेलने जैसा होता है. दुनिया के कौन से देश में किस स्कूल में शिक्षक बच्चों से विदेशी भाषा में बात करते हैं? जरा बच्चों की पीड़ा पर नज़र डालिए. वे रटते हैं, और अटक-अटक कर कुछ न कुछ पढ़ भी लेते हैं, मगर लिखा क्या है, यह वे बार बार सोचते हैं. वे त्रिशंकु की तरह हो जाते हैं, न तो वे अंग्रेजी में ही अच्छे हो पाते हैं और न ही अपनी भाषा में. फिर वे स्कूल जाने से डरने लगते हैं. एक ऐसे बचपन की तो बात भूल ही जाएं जो मस्ती से भरपूर है. ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि कक्षा पांच के के बाद भी बच्चे अंग्रेजी का एक वाक्य न लिख पाएं. समाजशास्त्र या इतिहास की किताबों को छोड़ दिया जाए तो भी गणित और विज्ञान ऐसे विषय हैं, जिनमें स्थिति गंभीर है. बच्चे Ascending Order जैसे सवाल भी हल नहीं कर पाते हैं क्योंकि क्या संख्या है, क्या असेंडिंग ऑर्डर है, यह उनके दिमाग में स्पष्ट ही नहीं हो पाता है और इसका नतीजा यह होता है कि बच्चा अपना आत्मविश्वास खोने लगता है. फिर भी भारत बहुत विशाल देश है और अधिकतर लोग अपने बच्चों को उन्हीं स्कूलों में भेजना पसंद करते हैं, जहां पर उनकी भाषा में पढ़ाई होती है, और वे अपने बच्चों को अपनी संस्कृति के साथ जोड़े रख पाते हैं. उन्हें वह सब समझ में आता है, जो उन्हें पढ़ाया जा रहा है और वे खुलकर इसे बता सकते हैं.

इसके साथ ही यह भी जानना रोचक होगा कि कितने इसरो के वैज्ञानिक या सामान्य विद्यार्थियों ने गणित और विज्ञान का अध्ययन अपनी भाषा में कक्षा बारह तक किया होगा, शायद अधिकतर ने. इसके साथ ही यह भी जानना होगा कि हिमाचल प्रदेश और तमिलनाडु के उन बच्चों का पीसा में स्कोर क्या रहा होगा, जिन्होनें अपनी मातृभाषा में अध्ययन किया. यकीन है कि वे रैंकिंग सूची में नीचे तो नहीं रहे होंगे?

भारतीयों के पास दिमाग है और यह बात पूरी दुनिया जानती है., मगर अंग्रेजी माध्यम से उसे दबाया जाता है उसे उभारा नहीं जाता है. केवल मुट्ठी भर लोगों को छोड़कर भारतीय विद्यार्थियों को अन्य देशों की तुलना में इस कारण बहुत नुकसान हो रहा है. यह भारत के आने वाले कल के लिए भी सुनहरा दृश्य नहीं है. क्या अब समय नहीं है कि हम गुलामी की मानसिकता को उतार फेंके? अंग्रेजी का जरूरी होना, अंग्रेजी माध्यम से पढ़ना जरूरी होना नहीं होता है. आखिर भारतीय बच्चे अंग्रेजी को उसी तरह से क्यों नहीं पढ़ सकते, जिस तरह से बाकी पूरी दुनिया में बच्चे पढ़ते हैं? आखिर उनके कोमल दिमाग पर इतना बोझ क्यों डाला जाता है? वेदों में छिपे हुए खजाने को पाने के लिए संस्कृत का भी अध्ययन जरूरी है. संस्कृत की महत्ता को पूरी दुनिया में पहचाना जा चुका है. यह आईटी के क्षेत्र में सबसे अनुकूल भाषा है. इसमें न केवल मजबूती है बल्कि यह बहुत ही खूबसूरत भाषा है. भारतीयों के पास तो इसके दोहरे लाभ हैं क्योंकि उनकी भाषा तो संस्कृत का ही अपभ्रंश है. संस्कृत का भारत की भूमि से गायब हो जाना बहुत ही दुखद है. संस्कृत माध्यम वाले स्कूल फिर भी अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों के तुलना में बच्चोंके सर्वांगीण विकास के लिए लाभदायक हैं. संस्कृत को शिक्षा का माध्यम बनाने के लिए काम करना ही होगा. जरा कल्पना करें कि भारत में आईआईटी और आईआईएम, हिंदी, तमिल, मलयालम और मराठी आदि में हैं और उनमें मूल तकनीकी शब्द संस्कृत से लिए हैं और वे पूरे भारत में एक हैं. विद्यार्थी आज की सबसे बड़ी समस्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता से भी छुटकारा पाएंगे. बोलने की आज़ादी की बात करने वाले भी इस बोलने की आज़ादी पर सबसे बड़ा धब्बा हैं क्योंकि इन अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में ही बच्चे नहीं बोल पाते हैं, क्योंकि उनके पास शब्द ही नहीं हैं. जिनमें भाषा के प्रति प्राकृतिक प्रतिभा होती है, वे अनुवादक हो जाते हैं और आजकल ट्रांसलेशन एप सम्वाद को सुगम बना सकते हैं. समितियां बनती हैं और वे कंटेंट पर ही सिमट जाती हैं, सबसे जरूरी बात, माने भाषा का सवाल तो उठता ही नहीं है. इसे सबसे पहले हल किया जाना चाहिए. पीसा टेस्ट के नतीजों को भी ईमानदारी से विश्लेषित किया जाना चाहिए और उसके परिणाम देखे जाने चाहिए. 

मुस्लिम आक्रान्ताओं के द्वारा शिक्षा के केन्द्रों को नष्ट किए जाने से पहले भारत को एक ज्ञान के केंद्र के रूप में जाना जाता था. वह विश्व गुरु था. उस तक पहुँचने के लिए विद्यार्थियों को यह समझना होगा कि उन्हें क्या पढ़ाया जा रहा है और क्यों? और संस्कृत को शुरू से ही बच्चों को पढाया जाना चाहिए. इसके साथ ही उन लोगों के लिए अंग्रेजी माध्यम के स्कूल होने चाहिए जो बाहर जाना चाहते हैं. भारत की युवा प्रतिभा के साथ न्याय तभी हो पाएगा जब उन्हें इस मानसिक कष्ट से छुटकारा मिलेगा और उन्हें उनकी अपनी भाषा में पढने का अधिकार मिलेगा.

मूल लेख :- मारिया विर्थ, जर्मनी 

अनुवाद :- डॉक्टर सोनाली सिंह

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शिक्षा से सम्बन्धित कुछ और लेखों की लिंक इस प्रकार हैं... 

१) न्यूटन और आईन्स्टीन के सिद्धांतों को चुनौती देने वाले अजय शर्मा... http://www.desicnn.com/news/young-scientist-from-india-challenges-newton-einstein-formulas-and-history 

२) भारत के गणितज्ञों का इतिहास ब्रिटिश लायब्रेरी ने संभाला हुआ है... :- http://www.desicnn.com/news/keronana-chhatre-maths-teacher-of-tilak-agarkar-and-chiplunkar 

३) भारत की शस्त्र निपुणता और मल्ल विद्या कहाँ खो गई??..... http://www.desicnn.com/news/indian-ancient-fighting-weaponry-and-wrestling-knowledge-has-lost-like-gatka-malkhamb-kalripayattu 

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