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महाराजा दुलीपसिंह के वंशजों को नपुंसक बनाया? किसने?

Written by सोमवार, 07 अगस्त 2017 21:24

(मूल अंगरेजी लेख के अनुवादक और संकलक :- सुरेश चिपलूनकर)

महाराजा रणजीत सिंह की वंशावली खत्म करने की रानी विक्टोरिया की योजना का खुलासा हुआ है. जैसा कि सभी जानते हैं, पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह का साम्राज्य एक खुशहाल एवं समृद्ध राज्य था.

महाराजा रणजीत सिंह ही वे अंतिम योद्धा थे, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के विस्तार को रोके रखा. इनका शासनकाल खत्म होने के बाद ही वास्तविक रूप में अंग्रेजों का पूरे भारतवर्ष पर एकछत्र राज्य स्थापित हो सका. अंग्रेज जानते थे कि यदि महाराजा रणजीत सिंह के वंशज सत्ता में जमे रहे, या उनसे संघर्ष करते रहे तो पंजाब की तरफ का पूरा इलाका कभी भी अंग्रेजों के कब्जे में नहीं आएगा. इसीलिए ब्रिटिशों की रानी विक्टोरिया ने ऐसी योजना बनाई कि महाराजा रणजीत सिंह निर्वंश हो जाएँ अर्थात उनकी वंशावली ही खत्म हो जाए. जब कोई उत्तराधिकारी ही नहीं बचेगा तो स्वाभाविक रूप से अंग्रेजों का कब्ज़ा सरलता से हो जाएगा. (इसी से मिलता-जुलता षड्यंत्र अंग्रेजों ने झाँसी में भी रचा था).

महाराजा दुलीप सिंह (6 सितम्बर 1838 से 22 अक्टूबर 1893) को उनके दुसरे नाम “ब्लैक प्रिंस ऑफ़ पर्थशायर” के नाम से भी जाना जाता है. दुलीप सिंह, सिख साम्राज्य के प्रणेता महाराजा रणजीत सिंह के सबसे छोटे बेटे थे. पहले “एंग्लो-सिख युद्ध” के बाद जब महाराजा रंजीत सिंह हार गए और उनके चार पुत्रों की हत्या कर दी गयी, तब केवल पाँच वर्ष की आयु में दुलीप सिंह को सिख साम्राज्य का उत्तराधिकारी घोषित किया गया. लेकिन अंग्रेज बहुत कुटिल और धूर्त थे, वे जानते थे कि यदि यह वंश आगे बढ़ा तो बहादुर सिख लोग पुनः उन्हें दिक्कत दे सकते हैं. इसलिए अंग्रेजों ने दुलीप सिंह को इंग्लैण्ड भेज दिया और उनकी माता जींद कौर को बंदी बना लिया. दस वर्ष की आयु में दुलीप सिंह को डॉक्टर जॉन लोगिन के सुपुर्द कर दिया गया, और वहीं से उनका “ब्रेनवाश” शुरू कर दिया गया. अगले पंद्रह वर्षों तक दुलीप सिंह को उनकी माँ से दूर रखा गया और ईसाई शिक्षा तथा अंग्रेजियत उनके दिमाग व चालचलन में भरी जाती रही. इसी बीच पंद्रह वर्ष की आयु में लॉर्ड डलहौजी ने दुलीप सिंह का बप्तिस्मा करके उन्हें ईसाई भी बना दिया. ऐसा कहा जाता है कि अपनी मृत्यु से कुछ वर्ष पूर्व उन्होंने 1886 में पुनः सिख धर्म स्वीकार कर लिया था, और यही विक्टोरिया की चिंता का विषय था.

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बहरहाल... भारतीय मूल के एक लेखक पीटर बांस ने महाराजा रणजीत सिंह के पुत्र दुलीप सिंह की आत्मकथा वाली पुस्तक “सोवेरिन, स्क्वियर एंड रेबेल” में इस बात का खुलासा किया है, कि रानी विक्टोरिया के स्पष्ट निर्देश थे कि चाहे जैसे भी इस वंश का खात्मा होना चाहिए, ताकि अंग्रेजों की पकड़ स्थायी रूप से मजबूत हो. विक्टोरिया चाहती थी कि बेहद धनवान और लाभकारी सिख साम्राज्य पर अंग्रेजों का मजबूत कब्ज़ा हो, ताकि आगे उन्हें कोई चुनौती देने वाला पैदा ही न हो.

उल्लेखनीय है कि महाराजा रणजीत सिंह के बेटे दुलीप सिंह को बारह वर्ष की आयु में ईसाई बनाकर ब्रिटेन भेज दिया गया था. इंग्लैण्ड में दुलीप सिंह की पहली पत्नी से छः संतानें हुईं, जबकि दूसरी पत्नी से दो बच्चे हुए. इन आठ में से चार बच्चों का विवाह हुआ, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से किसी का भी वंश आगे नहीं बढ़ पाया, क्योंकि इन चारों की एक भी संतान नहीं हुई. दुलीप सिंह के बड़े बेटे प्रिंस विक्टर अलबर्ट जय की अंग्रेज पत्नी लेडी एने एलिस ब्लांक को रानी विक्टोरिया ने सख्त निर्देश दिए थे, कि चाहे जैसे भी हो अब यह वंश आगे नहीं बढ़ना चाहिए. असल में दुलीप सिंह के मन में भारत के प्रति मोह पुनः जागृत होने लगा था और वे चाहते थे कि पंजाब रियासत को पुनः खड़ा किया जाए... और अंग्रेज जानते थे कि यदि ऐसा हुआ तो यह एक नया सिरदर्द पैदा हो जाएगा. इसीलिए अंग्रेजों ने दुलीप सिंह को जबरन इंग्लैण्ड में ही “लगभग नजरबन्द” कर दिया था.

इसी प्रकार 1898 में दुलीप सिंह के बेटे प्रिंस विक्टर जो कि लेडी एने ब्लांक के साथ हनीमून मनाकर भारत लौटने का मन बना रहे थे, उन्हें भी कोलम्बो में जबरन रोक दिया गया. जब ये लोग लौट कर इंग्लैण्ड गए तब वहाँ रानी विक्टोरिया ने एक पार्टी दी, जिसमें प्रिंस विक्टर की बहन प्रिंसेस सोफिया, छोटा भाई प्रिंस फ्रेडरिक भी बुलाए गए थे. पार्टी समाप्त होने से कुछ समय पहले विक्टोरिया ने सोफिया को अकेले में बुलाकर धमकी दी थी, कि तुम भाई-बहनों का वंश अब आगे नहीं बढ़ना चाहिए. बन्स, जो कि 1996 से ही दुलीप सिंह पर रिसर्च कर रहे हैं, वे कहते हैं कि “1888 में दुलीप सिंह के शब्द थे कि यदि मैं भारत पहुँच जाऊँ, तो मैं और मेरे 25 करोड़ देशवासी दो साल के अन्दर ही अंग्रेजों को भारत से खदेड़ देंगे...”. यदि दुलीप सिंह की योजना कामयाब हो जाती, वे भारत आते तो 1849 में जिस शक्तिशाली सिख सेना को अंग्रेजों ने दबा दिया था, वह पुनः उठ खड़ी होती... और संभवतः भारत 1947 से कुछ वर्ष पहले ही स्वतन्त्र हो गया होता.  

(यह लेख आप तक desicnn.com के सौजन्य से पहुँच रहा है... जारी रखें...)

पुस्तक में इस बात का भी ज़िक्र है कि दुलीप सिंह की एक छोटी बेटी प्रिंसेस बम्बा ने खुलेआम यह स्वीकार किया था कि, उन्होंने बचपन में कई बार विक्टोरिया के मंत्रियों द्वारा अंग्रेज खानसामाओं को कुछ “विशेष पदार्थ” हमारे भोजन में मिलाने के निर्देश देते देखा था, परन्तु उस समय वे इसे समझ नहीं पाती थीं. जैसे-जैसे समय बीतता गया, उनकी समझ में आ गया कि उनके खाने में मिलाया गया वह पदार्थ उनकी पूरी पीढ़ी को नपुंसक बनाने के लिए था... पुस्तक के लेखक ने भी इस सम्बन्ध में सवाल उठाया है कि क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि इतने बड़े परिवार के मुखिया, आठ-आठ बच्चों के पिता दुलीप सिंह की तीसरी पीढ़ी, जन्म ही नहीं ले पाई?

यह कैसा "संयोग"(?) था, कि महाराजा रंजीत सिंह जैसे महान व्यक्ति की दूसरी पीढ़ी का केवल एक उत्तराधिकारी, वो भी ईसाई बना दिया गया... उसके आठ बच्चे लेकिन सभी को नपुंसक बनाकर सिख साम्राज्य के राजतंत्र का वंशनाश कर दिया गया... अंग्रेजों की राह का आख़िरी काँटा इस प्रकार साफ़ किया गया. ऐसा कहा जा सकता है 1845 से 1947 तक अंग्रेजों ने लगभग “पूरे सौ वर्ष, पूरे भारत पर” निष्कंटक शासन किया. धूर्तता, कुटिलता और अत्याचार के मामले में ब्रिटिशों का मुकाबला करना मुश्किल है. 

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