मधु दण्डवते : कोंकण रेलवे के सूत्रधार, राजनैतिक संत

Written by मंगलवार, 14 नवम्बर 2017 07:01

कणकवली रेलवे स्टेशन से मुम्बई यात्रा करते समय अथवा वहाँ से वापस आते समय स्टेशन की सीढ़ियों के पास श्री मधु दण्डवते (Madhu Dandavate) का जो तैलचित्र लगा हुआ है, मैं सदैव उसे दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार करके ही आगे बढ़ता हूँ.

स्वर्गीय दण्डवते को यह प्रणाम केवल इसीलिए करता हूँ, कि आज कोंकण रेलवे (Konkan Railways) से जो मैं यात्रा कर पा रहा हूँ, वह केवल और केवल उसी व्यक्ति के कारण. यह नमस्कार एक कर्मयोगी के प्रति व्यक्त की गयी कृतज्ञता होती है. 

बात 1971 के उन दिनों की है, जब कोंकण के राजापुर संसदीय क्षेत्र से सांसद रहे बैरिस्टर नाथ पई का अकस्मात निधन हो गया था, इस कारण अहमदनगर के एक प्राध्यापक मधु दण्डवते को अचानक लोकसभा का टिकट दे दिया गया. इसका एकमात्र कारण यही था कि बैरिस्टर श्री नाथ पई जैसी बौद्धिक क्षमता और विद्वत्ता श्री दण्डवते में भी होना. जनता पार्टी को भरोसा था कि चाहे कुछ भी हो जाए, कोंकण क्षेत्र की इस सीट पर जनता एक विद्वान व्यक्ति को ही चुनेगी. यह कालखंड इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) का समय था. 1971 में पूरे देश में इंदिरा गांधी की लहर चल रही थी, इसमें यदि किसी पत्थर को भी सिन्दूर पोतकर खड़ा कर दिया जाता, तो वो भी जीत जाता. स्वाभाविक है कि महाराष्ट्र इसका अपवाद नहीं था. इस इंदिरा गांधी की लहर में बड़े-बड़े नाम बह गए, महाराष्ट्र की 48 में से 47 सीटों पर कांग्रेस जीती... केवल एक सीट मिली जनता पार्टी को... जी हाँ!!! राजापुर से विद्वान प्रोफ़ेसर मधु दण्डवते.

कोंकण की जनता किसी लहर के बहकावे में नहीं आती यह पहले भी कई बार सिद्ध हो चुका है. उस समय इंदिरा गाँधी की लहर थी तो पिछले महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी की लहर थी. उस समय भी रत्नागिरी और सिंधुदुर्ग जिले में प्रचार करने के लिए स्वयं मोदी आए, उन्होंने विभिन्न स्थानों पर छः आमसभाएँ कीं, और उन सभी छहों स्थानों पर भाजपा हारी. कोंकण की जनता किसी भी बड़े से बड़े नेता को हराने में सक्षम है. कहने का तात्पर्य यह है कि अहमदनगर के एक प्रोफ़ेसर ने दूर कोंकण में जाकर इंदिरा गांधी की लहर में विजय प्राप्त की और वे स्वयं धीरे-धीरे कब “कोंकणी” बन गए, उन्हें पता भी न चला. उस समय मधु दण्डवते कोंकण की शान थे और आज भी हैं. बैरिस्टर पई की ही तरह उन्होंने संसद में अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज करवाई और विपक्ष में बैठकर इंदिरा गाँधी के सामने तथ्यात्मक भाषणों की झड़ी लगा दी. संसद में आज भी मधु दण्डवते, जॉर्ज फर्नांडीस (George Fernandis) और चंद्रशेखर जैसे जबरदस्त वक्ताओं के भाषण सुरक्षित रखे गए हैं.

आगे चलकर मधु दण्डवते भारत के रेलमंत्री बने. स्वर्गीय एबी वालावलकर ने कोंकण क्षेत्र में रेलवे का सपना देखा था, परन्तु मधु दण्डवते ने उनका स्वप्न दिन-रात काम करके जिया. कोंकण क्षेत्र की पहाड़ियों, खाईयों, समुद्र किनारे इत्यादि को देखते हुए यहाँ रेलवे चलाना असंभव है, ऐसा कहते हुए कई बार रेल मंत्रालय के अधिकारियों ने अपना पल्ला झाड़ा था और नेताओं को चलता कर दिया था. लेकिन जॉर्ज फर्नांडीस जैसे सहयोगी मित्र और ई.श्रीधरन (E. Sridharan) जैसे प्रतिभावान इंजीनियरिंग वाले व्यक्ति को साथ लेकर दण्डवते ने इस सपने को साकार कर दिखाया. जब कोंकण रेलवे के प्रस्ताव को यहाँ की जनता के सामने रखा गया तो कांग्रेसियों ने दण्डवते के इस प्रयास की जमकर खिल्ली उड़ाई और इस विषय पर कई कार्टून बनाए गए... दण्डवते को झूठा और बेवकूफ बनाने वाला भी कहा गया. इन सभी आलोचनाओं को शांतचित्त से मधु दण्डवते ने दरकिनार किया. लेकिन आज जब कोंकण रेलवे न सिर्फ इंजीनियरिंग का एक जीताजागता नमूना है, बल्कि उसे ठेठ मंगलौर तक जोड़ने के बाद जो इतिहास रचा गया है, उसमें मधु दण्डवते का नाम सबसे ऊपर और स्वर्णाक्षरों में लिखा जा चुका है.

 

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कोंकण के राजापुर सीट से लगातार पांच बार चुनाव जीतने के बाद मधु दण्डवते को अंततः 1991 में कांग्रेस के कर्नल सावंत के हाथों हार का मुँह देखना पड़ा, क्योंकि इस समय तक कोंकण क्षेत्र में नारायण राणे की वजह से शिवसेना मजबूत हो चली थी. शिवसेना ने वामनराव महाडिक को टिकट देकर जनता पार्टी के वोटों का बंटवारा कर दिया और इस तरह कांग्रेस के सावंत चुनाव जीते. इस हार से मधु दण्डवते को बहुत तगड़ा मानसिक झटका लगा था. मधु दण्डवते इतने सीधे-सरल और नैतिक व्यक्ति थे, कि उन्होंने राज्यसभा के माध्यम से चुना जाना भी स्वीकार नहीं किया. 1991 में ही ऐसी स्थिति बन रही थी कि संयुक्त विपक्ष नरसिंहराव के स्थान पर अपना प्रधानमंत्री चुनने की जुगाड़ में लगा था. ऐसे समय पर पार्टी लाइन से हटकर किसी निर्विवाद एवं देश को संभाल सकने वाले बुद्धिमान व्यक्ति की तलाश जारी थी. लालूप्रसाद यादव ने मधु दण्डवते से भेंट करके कहा कि आप बिहार की किसी भी सीट से खड़े हो जाएँ, आपको जितवाने की जिम्मेदारी मेरी रहेगी और फिर आप संयुक्त विपक्ष के प्रधानमंत्री पद के दावेदार होंगे, हम सभी आपके नाम पर सहमत भी हैं. लेकिन नैतिकता के पुजारी और राजनीति में शुचिता का पालन करने वाले मधु दण्डवते ने लालू यादव से हाथ जोड़कर कहा कि पांच बार जीतने के बावजूद जब मेरे राजापुर क्षेत्र की जनता ने मुझे नकार दिया है, तो ऐसे में बिहार से अथवा राज्यसभा से चुनाव जीतकर देश के सर्वोच्च पद की अभिलाषा करना अनैतिक होगा.

इसके बाद आए 1996 के चुनावों में बालासाहब ठाकरे ने सारस्वत बैंक के अध्यक्ष और चार्टर्ड अकाउंटेंट रहे एक सरल व्यक्ति को शिवसेना से टिकट दिया, जिसका नाम था सुरेश प्रभु. शिवसेना ने पांच वर्ष में और मजबूती हासिल कर ली थी, और नतीजे में सुरेश प्रभु ने कांग्रेस के कर्नल सावंत और जनता पार्टी के मधु दण्डवते दोनों को हराकर वह सीट जीती. चुनाव परिणामों के बाद सुरेश प्रभु ने सार्वजनिक रूप से कलेक्टर कार्यालय वहीं सबके सामने मधु दण्डवते के चरण स्पर्श किए. इस अवसर पर मधु दण्डवते ने सुरेश प्रभु को आशीर्वाद देते हुए कहा था कि बैरिस्टर पई और मैंने इस लोकसभा सीट का संसद में जैसा मान रखा है, वैसा ही तुम भी रखना. आज तुम्हारे रूप में इस लोकसभा सीट को पुनः एक बार एक विद्वान व्यक्ति मिला है, इसका ख़याल रखना.

कुछ समय पहले अरविन्द केजरीवाल ने सादगी का एक ढोंग रचाया था, जो जल्दी ही पकड़ा भी गया. खुद को “आम आदमी” जैसा दिखाने के चक्कर में जो पाखण्ड केजरीवाल ने किया, मीडिया ने उसकी काफी मार्केटिंग की थी. लेकिन केजरीवाल जैसी सादगी कोंकण के मधु दण्डवते में बचपन से ही थी., जिसका उन्होंने कभी न प्रचार किया और ना ही राजनैतिक फायदा उठाने का प्रयास किया. जब कोंकण में रेलवे नहीं थी, उस समय महाराष्ट्र की लाल रंग की सार्वजनिक बसों में “सांसद” मधु दण्डवते को लाइन में खड़े होकर टिकट लेते कई लोगों ने, कई बार देखा. मैं एक सांसद हूँ, इसलिए मुझे वीआईपी सुविधा मिलनी ही चाहिए, जैसा हठ उन्होंने कभी नहीं किया, यहाँ तक कि बस में आगे की तरफ सांसद के लिए आरक्षित सीट पर भी वे कम ही बैठते थे. उन्हें यह पसंद नहीं था कि नियम तोड़कर वे बस के अगले दरवाजे से चढ़ जाएँ, वे हमेशा जनता के साथ ही बस के पिछले दरवाजे चढ़ते थे और फिर आगे की सीट पर आते थे. कुछ समय के लिए मधु दण्डवते देश के वित्तमंत्री भी बने थे, उन दिनों जब कार खरीदने के लिए ऋण का आवेदन देने वे बैंक पहुँचे तो पूरा का पूरा स्टाफ अवाक रह गया और उनके सम्मान में खड़ा हो गया था. अब भारत में शायद ही कभी ऐसा कुछ देखने को मिले. इस सादगी-सरलता-बुद्धिमत्ता का उन्होंने कभी भी प्रदर्शन नहीं किया. ऐसे “पीर-औलिया” टाईप व्यक्ति ने लगातार पाँच बार लोकसभा में उपस्थिति दर्ज करवाई, वह भी अपनी जेब से पैसा खर्च किए बिना. क्योंकि दण्डवते के पास चुनाव लड़ने जितनी भारी रकम कभी थी ही नहीं. क्षेत्र की जनता, सहकारी संस्थाएँ इत्यादि आपस में मिलकर चन्दा करते, “दण्डवते जिताओ समिति” बनाते, फिर मधु जी आराम से चुनाव जीत जाते और कोंकण के किसी गाँव में चौपाल पर बैठकर आराम से कोकम का शरबत पीते नज़र आते. स्वाभाविक है कि देश की वर्तमान पीढ़ी भरोसा ही नहीं करेगी कि ऐसा भी कोई राजनेता हो सकता है भला?? परन्तु ऐसे लोग भी संसद में थे, मंत्री भी थे और जनता के लिए स्वप्न भी देखते थे, यह बताने और इतिहास को संचित रखने के लिए ही यह लेख लिखा गया है. स्वर्गीय मधु दण्डवते को सादर नमन...

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कोंकण रेल्वे की एक और खासियत तथा मधु दण्डवते :-   http://desicnn.com/blog/598 

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मूल मराठी लेखक :- अनुपम काम्बली 

अनुवाद :- सुरेश चिपलूनकर. 

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