लिंगायत हिन्दुओं ने अल्पसंख्यक बनना क्यों स्वीकार किया?

Written by बुधवार, 21 मार्च 2018 20:47

कर्नाटक से समाचार मिला है कि लिंगायत (Lingayat Communisty) में वीरशैव विचारधारा को मानने वाले हिन्दुओं को अल्पसंख्यक घोषित करने के लिए कर्नाटक की कांग्रेस सरकार अध्यादेश लाने की तैयारी कर रही है। सभी जानते है कि कर्नाटक में चुनाव आने वाले हैं।

लिंगायत विचारधारा को मानने वाले बड़ी संख्या में कर्नाटक में रहते है। स्वाभाविक रूप से यह वोट बैंक की राजनीति है। मगर इसका दूसरा पक्ष भी जानना आवश्यक है। अंग्रेजों ने 1857 के पश्चात मुसलमानों को अल्पसंख्यक और पीड़ित दिखाकर हिन्दुओं के ऊपर वरीयता देना आरम्भ किया। जिससे कि मुसलमान अपने आपको सदैव विशेष अधिकार प्राप्त करने के लिए प्रयासरत रहे। परिणाम भारत के दो टुकड़े हुए। पाकिस्तान का बनना हुआ। मगर मुसलमानों की वह अंग्रेजों द्वारा पोषित मानसिकता यथावत बनी हुई है। हमारे देश के सत्ताधीशों ने इसे समाप्त तो क्या करना था। इसे अधिक बढ़ावा ही दिया है। अल्पसंख्यक बनने की होड़ रामकृष्ण मिशन, जैन समाज, सिख पंथ, नाथ सम्प्रदाय आदि से फैलते फैलते अब लिंगायत तक पहुंच गई है। लिंगायत लोग अल्पसंख्यक सम्प्रदाय बनने को तैयार है। उससे उन्हें अनेक लाभ मिलेंगे।

वर्तमान में मुसलमानों को अल्पसंख्यक के नाम पर सुविधा की सूची

1. एक हिन्दू अगर कोई शिक्षण संस्थान खोलता है तो उसे उस संस्थान की 25% सीटों को अल्पसंख्यक वर्ग के लिए आरक्षित रखना होता है। जहाँ पर अल्पसंख्यक वर्ग को नाम मात्र की फीस देनी होती है। जबकि हिन्दू छात्रों को भारी भरकम फीस देनी पड़ती है। अर्थात अल्पसंख्यक को हिन्दू अपने जेब से पढ़ाता हैं।

2. किसी भी अल्पसंख्यक को शिक्षण संस्थान खोलने के लिए सरकार 95% तक आर्थिक सहयोग करती है। जबकि किसी हिन्दू को अपने संस्थान को खोलने के लिए आसानी से लोन तक नहीं मिलता। अल्पसंख्यक संस्थान sc/st/obc के अनुपात में शिक्षकों की भर्ती के लिए किसी भी प्रकार से बाध्य नहीं है। जबकि एक हिन्दू संस्थान को सरकारी नियम के अनुसार अध्यापकों की भर्ती इसी अनुपात में करनी होती है। अर्थात किसी भी मुस्लिम या ईसाई संस्थान के 100% शिक्षक मुस्लिम या ईसाई हो सकते है। वहां पर कोई भी हिन्दू शिक्षक कभी नौकरी पर रखने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। यह सरकारी सुविधा National Commission for Minority Education Institutions (NCMEI) के अंतर्गत सरकार द्वारा दी जाती है। UPA सरकार के कार्यकाल में हज़ारों मुस्लिम या ईसाई संस्थानों को अनुमति दी। जबकि हिन्दू संस्थाओं को अनुमति के लिए दफ्तरों के चक्कर के चक्कर काटने पढ़े।

3. 2014-2015 में 7,500,000 अल्पसंख्यक छात्रों को कक्षा पहली से दसवीं तक 1100 करोड़ रुपये छात्रवृति के रूप में दिया गया।

4. इसी काल में 11वीं से पीएचडी तक 905,620 अल्पसंख्यक छात्रों को को 501 करोड़ रुपये छात्रवृति के रूप में दिया गया।

5. इसी काल में टेक्निकल शिक्षा के लिए 138,770 अल्पसंख्यक छात्रों को 381 करोड़ रुपये छात्रवृति के रूप में दिया गया।

6. अल्पसंख्यक छात्रों को प्रोफेशनल कोर्स की कोचिंग के लिए 1500 से 3000 रुपये का अनुदान दिया गया। वर्तमान सरकार ने यह अनुदान दुगुना कर दिया है।

7. 2015-2016 में मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय फ़ेलोशिप के नाम पर 7,500,000 अल्पसंख्यक छात्रों को पीएचडी और Mphil के लिए 55 करोड़ रुपये छात्रवृति के रूप में दिया गया।

8. UPSE और SPSC के prelim में प्रवेश पाने पर 50000 से 250000 रुपये तक का सहयोग अल्पसंख्यक छात्रों को दिया गया।

9. पढ़ो-पढ़ाओ अभियान के अंतर्गत विदेश में शिक्षा के लिए पीएचडी और Mphil के लिए 55 करोड़ रुपये छात्रवृति के रूप में दिया गये।

10. नई मंजिल अभियान के अंतर्गत मोदी सरकार ने मदरसों में पढ़ने वाले 25000 बच्चों की शिक्षा के लिए 155 करोड़ रुपये छात्रवृति के रूप में दिया गये।

11. बेगम हजरत महल छात्रवृति योजना के अंतर्गत कक्षा 11 वीं और 12 वीं की 48000 छात्राओं को 57 करोड़ रुपये छात्रवृति के रूप में दिया गये।

12. बैंक से लोन व्यवस्था में भी अल्पसंख्यक को विशेष अधिकार प्राप्त है। रोजगार के लिए 30 लाख तक लोन केवल 8% (पुरुषों के लिए) और 6% (महिलाओं के लिए) दिया जाता है।

13. शिक्षा लोन व्यवस्था में भी अल्पसंख्यक को विशेष अधिकार प्राप्त है। प्रोफेशनल शिक्षा के लिए देश में 20 लाख और विदेश में 30 लाख का लोन केवल 4% (छात्रों के लिए) और 2% (छात्राओं के लिए) दिया जाता है।

14. इसके अतिरिक्त अल्पसंख्यक युवाओं को Vocational Training Scheme, Marketing Assistance Scheme, Mahila Samridhi Yojana and Grant in Aid Assistance scheme आदि योजनाओं के अंतर्गत विशेष लाभ दिया जाता है।

15. जिन जिलों में अल्पसंख्यक की जनसंख्या 20% से ऊपर है। उन्हें विशेष रूप से धन दिया जा रहा है। एक जिले में अगर कोई ब्लॉक ऐसा है जिसमें 25% से अधिक अल्पसंख्यक की जनसंख्या है। तो वे भी इस सुविधा के अंतर्गत आते है। ऐसे देश में 710 ब्लॉक और 196 जिलों का चयन केंद्र सरकार द्वारा 12 वीं पञ्च वर्षीय योजना के अंतर्गत किया गया हैं। इन जिलों पर सरकार अल्प संख्यक विकास के नाम पर हर वर्ष 1000 करोड़ रुपये खर्च करती है। सोचिये अगर हिन्दू बहुल गरीब पिछड़ा हुआ जिला या ब्लॉक है तो उसे केवल हिन्दू होने के कारण यह लाभ नहीं मिलेगा।

16. सीखो सिखाओ, उस्ताद, नई रोशनी, हमारी धरोहर अल्पसंख्यक महिलाओं और वक्फ बोर्ड के लिए विशेष रूप से चलाई गई योजनाएं है।

17. हिन्दुओं को इस प्रकार की किसी योजना का कोई लाभ नहीं मिलता। इसके विपरीत सरकार द्वारा हर समृद्ध और बड़े हिन्दू मंदिरों का अधिग्रहण कर लिया गया हैं। वहां से प्राप्त होने वाला धन और दान सरकार अपने कोष में पहले जमा करती है। फिर उसी धन को ईसाई चर्च और मस्जिद-मदरसों के विकास पर खर्च करती है। ईसाई चर्च और मदरसों को विदेशों से मिलने वाले धन पर सरकार का कोई हक नहीं है। क्यूंकि अल्पसंख्यक से जुड़े मामलों में सरकार हस्तक्षेप नहीं करती।

18. हिन्दुओं के मनोबल को तोड़ने के लिए जल्लिकट्टु, दही-हांडी, होली, दिवाली आदि पर सरकार अपना हस्तक्षेप करना हक समझती है। जबकि बकरीद पर लम्बी चुप्पी धारण कर लेती हैं। क्यूंकि अल्पसंख्यक से जुड़े मामलों में सरकार हस्तक्षेप नहीं करती।

19. हज़ यात्रा पर दी जाने वाले सब्सिडी पहले 500 करोड़ थी। जिसे अटल बिहारी जी की सरकार से 1000 करोड़ कर दिया था। जबकि अमरनाथ आदि यात्रा पर विशेष कर सुविधा के नाम पर लगाया जाता है।

20. इसके अतिरिक्त सच्चर आयोग के नाम पर मुस्लिम सांसद चाहे वो किसी भी राजनीतिक पार्टी के हो। सरकार पर सदा दबाव बनाने का कार्य करते है।

पाठक सोच रहे होंगे ऐसे लाभ मिलेंगे तो हर हिन्दू पंथ या मत अपने संख्या बल के आधार पर अल्पसंख्यक बनने का प्रयास करने के लिए राजनेताओं के हाथ की कठपुतली क्यों नहीं बनेगा? इस होड़ से सबसे बड़ा अहित हिन्दू समाज की एकता को पहुँचता है। एकजुट होकर एक लक्ष्य के लड़ने के स्थान पर केवल अपने मत अथवा सम्प्रदाय विशेष के हित की सोचने से आने वाली पीढ़ियां अपने मूल उद्देश्य को भूल जाती हैं। देशहित के ऊपर सम्प्रदाय हित हावी हो जाता है। दोष केवल राजनेताओं का ही नहीं है। इस समस्या की मूल जड़ हमारा स्वार्थ है और इस स्वार्थ का नाजायज फायदा राजनेता उठाते हैं।

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