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मृत्यु के बाद, दशाकर्म तक... शरीर से आत्मा का प्रवास

Written by शनिवार, 13 मई 2017 20:04

मृत्यु एक अटल सत्य है. मृत्यु सभी को आनी है और इसे टाला नहीं जा सकता. सनातन धर्म में “पुनर्जन्म” की अवधारणा है. पुनर्जन्म के सम्बन्ध में कई बार, कई स्थानों पर जीवंत तथ्य एवं सबूत मिले हैं, जिसमें किसी बच्चे ने अपने पिछले जन्म की सभी प्रमुख घटनाओं को बाकायदा चिन्हित और लिपिबद्ध भी किया है.

लोगों के मन में अक्सर यह प्रश्न उठता है कि मनुष्य के शरीर से आत्मा निकलने के पश्चात उसे अगला जन्म प्राप्त होने के बीच आत्मा का प्रवास कैसा होता है? क्या आत्मा तुरंत अगले शरीर में प्रवेश कर जाती है? अथवा भटकती रहती है? या सदैव अतृप्त रहती है? पुनर्जन्म कैसे मिलता है, और सदगति किसे कहते हैं? ऐसे ही कुछ प्रश्नों का संक्षेप में उत्तर देने का प्रयास इस लेख में किया गया है.

यहाँ थोडा सा विषयांतर करना आवश्यक है... यह तो सर्वमान्य तथ्य है कि व्यक्ति को उसके वर्तमान जीवन में किए गए पाप-पुण्यों के अनुसार ही अगली योनि में प्रवेश मिलता है. इसलिए यह आवश्यक नहीं है की मनुष्य मरने के बाद पुनः मनुष्य के रूप में ही जन्म ले. उसके कर्मों के अनुसार अगले जन्म में वह कुत्ता-सूअर-गाय-चींटी कुछ भी बन सकता है. इसी प्रकार पिछले जन्म के “कर्मभोग” भी हमें इस जन्म में भुगतने पड़ते हैं. यदि किसी के यहाँ अकाल मृत्यु हो जाए (अर्थात छः वर्षीय बालक अथवा बीस वर्षीय तरुण की मृत्यु) तो उसका अर्थ यह होता है कि उस व्यक्ति के प्रति आपका पिछले जन्म का कोई ऋण बाकी था, और वह ऋण जैसे ही आपने उतार दिया वह “आत्मा” अगले जन्म के लिए प्रस्थान कर गई. इसलिए अत्यधिक शोक मनाने की आवश्यकता नहीं है, ईश्वर ने प्रारब्ध बनाया हुआ था कि आपका और उसका साथ केवल उतने ही वर्षों का रहे. इसी प्रकार यदि किसी की संतान कुसंस्कारी, झगड़ालू, शराबी इत्यादि हो तो यह सिद्ध होता है कि यह आपके पिछले जन्म के कुकर्मों का फल है जिसका ऋण आपको इस जन्म में उतारना है. इसके अलावा पिछले जन्म के ऋणनुबंध भी होते हैं, जैसे यदि आपने किसी के रूपए नहीं चुकाए हैं अथवा किसी का अत्यधिक दिल दुखाया है तो आपको इस जन्म में कष्टों को भुगतकर वे ऋणनुबंध चुकाने होते हैं.

भारत असंख्य विविधताओं वाला देश है, इसलिए यहाँ पर जन्म से लेकर मृत्यु तक के सभी विधानों एवं संस्कारों में मत-मतान्तर एवं विधियों में काफी अंतर पाए जाते हैं. प्रस्तुत लेख में एक “सनातनी हिन्दू ब्राह्मण” की मृत्यु के पश्चात होने वाली क्रियाओं के बारे में बताया गया है. सरल प्रश्नोत्तरी के माध्यम से देखते हैं कि मृत्यु के पश्चात आत्मा का क्या होता है, उसका अगला प्रवास कैसे आरम्भ होता है...

प्रश्न :- जब आत्मा शरीर छोड़ देती है, तो क्या उसे यह पता होता है कि उसके द्वारा शरीर त्यागने के कारण मृत्यु हुई है? क्या आत्मा को भी उस शरीर की याद आती है? क्या आत्मा को भी निकट सम्बन्धियों की याद आती है?

उत्तर :- सबसे पहले यह जानना आवश्यक है की हमारी वर्तमान देह को “स्थूल देह” कहते हैं. जिस प्रकार पक जाने के बाद फल अपने-आप वृक्ष से अलग होकर गिर जाता है, उसी प्रकार समय पूरा होने पर हमारे शरीर से आत्मा भी निकल जाती है. देह से प्राण निकलते समय “सूक्ष्म देह” (अर्थात आत्मा) दस भागों में क्रमानुसार शरीर के विभिन्न अंगों से बाहर निकलती है और देह मृत्यु को प्राप्त करता है. आत्मा अजर-अमर होती है, लेकिन मृत्यु के पश्चात वह देह के आसपास ही बनी रहती है. मृतात्मा के घर रोना-धोना शुरू होता है, अंततः श्मशान ले जाकर मृतात्मा की “अंत्येष्टि” की जाती है. (अंत्येष्टि = अंतिम + इष्टि = यज्ञ). अंत्येष्टि के समय जिन मन्त्रों का उच्चारण किया जाता है, उनका अर्थ उसी आत्मा को संबोधित किया जाता है जो फिलहाल शरीर के साथ-साथ और आसपास ही भटक रही है सब देख रही होती है. मन्त्रों द्वारा उस आत्मा को बताया जाता है कि अब आपका इस नश्वर शरीर से कोई सम्बन्ध नहीं रहा, हम अब आपकी इस देह को भी अग्नि को समर्पित करने जा रहे हैं, इसलिए अब आप अपनी अगली यात्रा पर निकल जाएँ. मंत्रोच्चार करते समय जो भी व्यक्ति (बड़ा पुत्र अथवा कोई और) इस संस्कार को सम्पन्न कर रहा होता है, वह अपने कंधे पर एक मटकी में पानी भरकर शव की उल्टी परिक्रमा करता है. उस समय एक छोटे पत्थर से प्रत्येक परिक्रमा के बाद उस मटके में एक छिद्र किया जाता है. ऐसी तीन परिक्रमा करने के बाद वह पत्थर उस व्यक्ति के पीछे रख दिया जात्ता है और वह व्यक्ति अपने कंधे पर रखे मटके को बिना पीछे देखे, उस पत्थर पर गिरा देता है. ऐसा करने पर मटकी फूट जाती है और जिसकी “फट्ट” ध्वनि को घटस्फोट कहा जाता है. इसका अर्थ आत्मा को संकेत देना होता है कि अब आप इस शरीर का मोह छोड़ दीजिए और प्रस्थान कीजिए... आपका सम्बन्ध पूरी तरह समाप्त हुआ.

परन्तु ऐसा होता नहीं है, आत्मा फिर भी उस पत्थर पर चिपकी हुई रहती है जिसके द्वारा वह मटकी फोड़ी गई थी. इस पत्थर को “अश्मा” कहते हैं. इस क्रिया के बाद प्रेत को जलाया जाता है. आत्मा यह सब देख रही होती है, अपना शरीर अग्नि को समर्पित होता देखकर आत्मा को बहुत दुःख होता है. चूँकि आत्मा अभी भी चार कोष में बंधी हुई है इसलिए उस आत्मा में अब भी भावनाएँ, वासनाएँ होती हैं... इसलिए आत्मा रोती भी है. मृत देह को अग्नि समर्पित करने के बाद सभी लोग घर वापस आते हैं, लेकिन वापस आते समय वह “अश्मा” उसी सफ़ेद कपड़े में लपेटकर अपने साथ लेकर आते हैं, जिससे मटकी फोड़ी गई थी. चूँकि आत्मा उस पत्थर (यानी अश्मा) पर सवार है, इसलिए उसे उसी कपड़े सहित घर के बाहर ही रखा जाता है, अंदर नहीं ले जाते. अगले दस दिनों तक मृतात्मा घर के बाहर बनी रहती है. घर में दक्षिण दिशा (जिसे यम की दिशा माना जाता है) की ओर मुँह करके दीपक प्रज्ज्वलित किया जात्ता है. इस दीपक को नमस्कार करके बाहर के सभी लोग अपने-अपने घर चले जात्ते हैं और घर के सदस्य स्नान करके अगली क्रिया सम्पन्न करने के लिए प्रतिबद्ध होते हैं. यह दीपक मृतात्मा का प्रतीक होता है. पुराने जमाने में फोटो या तस्वीर नहीं होती थी, इसलिए आत्मा के प्रतीक रूप में दीपक प्रज्वलित किया जाता था, आजकल कई स्थानों पर दीपक की बजाय केवल फोटो रख दिया जाता है, जो गलत है. यह दीपक दस दिनों तक अखंड प्रज्ज्वलित रहना चाहिए. कहीं-कहीं ऐसी अंधश्रद्धा भी है कि मृतात्मा को आगे का मार्ग दिखाने के लिए यह दीपक जलाया जाता है, औरर कहीं-कहीं ऐसा भी माना जाता है कि दीपक के नीचे आटा अथवा राख बिखेरी जाती है और उस पर मृतात्मा के पैरों के निशान वगैरह उभरते हैं, परन्तु ये सब सिर्फ अंधविश्वास ही हैं. दशाकर्म होने तक इन दस दिनों में आत्मा सतत “अश्मा” पर सवार रहते हुए घर के आसपास मंडराती रहती है. तीसरे दिन अस्थियों को चुनकर बहते पानी में प्रवाहित किया जाता है, उस समय भी आत्मा साथ बनी रहती है.

आत्मा का आगे का प्रवास दशाकर्म के बाद शुरू होता है. दसवें दिन सभी परिजन उस “अश्मा” को लेकर अंतिम क्रियाकर्म स्थल पर जाते हैं और अगली क्रिया आरम्भ होती है. जिस व्यक्ति ने अग्नि दी होती है, वह एवं उसके निकटतम परिजन अपने केश पूरी तरह साफ़ करवाते हैं, जिसे “क्षौरकर्म” कहा जाता है. कुछ लोगों का प्रश्न होता है कि क्षौरकर्म करना आवश्यक क्यों है?? असल में जब भी हम कोई पुण्य कर्म करते हैं, कोई व्रत रखते हैं, अनुष्ठान वगैरह करते हैं तो देह शुद्धि करके ही करते हैं. हमारे जाने-अनजाने ही हमारे कार्यस्थल पर अथवा बाहर की दुनिया में अनेक प्रकार के पाप करते हैं. हमारे सभी पापकर्म इस देह में बालों से मजबूती से चिपक जाते हैं. वास्तव में सभी लोगों को प्रत्येक पूर्णिमा और अमावस्या पर क्षौरकर्म (सभी केश साफ) करना चाहिए, परन्तु आजकल यह नहीं किया जाता. हालाँकि जो वास्तविक संन्यासी हैं, वे अभी भी प्रत्येक अमावस्या/पूर्णिमा पर क्षौर कर्म करते हैं. मृत व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता एवं प्रेम व्यक्त करने का साधन है “क्षौरकर्म”. दसवें दिन चावल के पिण्ड तैयार करके “अश्मा” उसके पास रखकर मंत्रोच्चार द्वारा आत्मा को यह बताया जाता है कि आपकी देह जला दी गई है, आपके नाम से हमने क्षौरकर्म कर लिया है... अब यहाँ आपका कुछ भी बाकी नहीं है, कृपया अगली सदगति यात्रा पर निकलें. यह विधि सम्पन्न होने के पश्चात वह पिण्ड थोड़ी दूरी पर रख दिया जाता है. यदि मृत-आत्मा की कोई वासना/इच्छा बाकी रहती है तो कौआ उस पिण्ड को छूता तक नहीं, लेकिन यदि मृतात्मा पूरी तरह वासनामुक्त और इच्छाओं से मुक्त हो तो तत्काल कौआ उस पिण्ड को चोंच मार देता है. इस संसार में केवल दो ही प्राणी ऐसे हैं, जिन्हें मृत्यु एवं आत्मा दिखाई देते हैं, पहला है कौआ और दूसरा है कुत्ता. सामान्यतः इसीलिए किसी अनहोनी की आशंका में सबसे पहले कुत्ते बहुत खराब ध्वनि में रोते हैं.

जब कौआ तृप्त आत्मा अर्थात पिण्ड को स्पर्श कर लेता है, तो सभी परिजन एवं उपस्थित लोग उस “अश्मा” (पत्थर) को अँगूठे की तरफ से पानी देते हैं इसे “तर्पण” कहा जाता है. अँगूठे से ही तर्पण क्यों किया जाता है? क्योंकि अँगूठा और उसके पास की उँगली जिसे तर्जनी कहा जाता है यह दोनों पितरों के लिए आरक्षित है. जबकि बीच की उँगली से स्वयं के मस्तक पर टीका किया जाता है. जबकि चौथी उँगली यानी अनामिका उँगली से भगवानों, गुरुओं एवं साधु-संतों को टीका किया जाता है. सामान्यतः कोई भी पवित्र अँगूठी भी इसी उँगली में धारण की जाती है, ताकि ऋषियों को टीका करते समय उनकी ऊर्जा हमारे शरीर में प्रवाहित हो सके.

प्रश्न :- आधुनिक व्यस्तताओं और आपाधापी भरे जीवन में “सूतक” संबंधी नियम क्या हैं? क्या सूतक के दौरान व्यक्ति अपने कार्यस्थल पर जा सकता है?

उत्तर :- सूतक के दस दिनों में (अर्थात दशाकर्म होने तक) घर में देवताओं का पूजापाठ एवं कोई भी मंगल कार्य प्रतिबंधित होता है. इस दौरान किसी भी मंदिर में नहीं जाना चाहिए, मंदिर के बाहर से दर्शन किए जा सकते हैं. दस दिनों में घर में भजन-कीर्तन किया जा सकता है. जिस व्यक्ति ने मृतदेह को अग्नि संस्कार दिया है, वह अस्थि संचय/विसर्जन (यानी तीसरे दिन के बाद) अपने कार्यस्थल पर जा सकता है, परन्तु वहाँ भी वह दस दिनों तक किसी किस्म की पूजापाठ में संलग्न अथवा प्रसाद ग्रहण नहीं कर सकता. सूतक के दस दिनों में जमीन पर सोना चाहिए (आजकल इस नियम का पालन भी बन्द हो गया है), तिलक नहीं लगाना चाहिए, इत्र/सुगंध नहीं लगाना चाहिए, नए वस्त्र धारण नहीं करने चाहिए. ग्यारहवें दिन घर के सभी लोगों को पूर्ण स्नान करके सूतक में इस्तेमाल किए गए सभी कपड़ों को धोना चाहिए. ग्यारहवें दिन ही समूचे घर में गौमूत्र एवं गंगाजल का छिड़काव करके मकान को पवित्र करना चाहिए. इसके बाद आत्मा की सदगति और उत्तम पुनर्जन्म प्राप्ति हेतु ग्यारहवाँ, बारहवाँ और तेरहवीं का कर्मकांड पूरी श्रद्धा-भक्ति के साथ सम्पन्न किया जाता है.

मृत्यु के पश्चात चौदहवें दिन नई टोपी अथवा नया अंगवस्त्र (तौलिया) धारण करके सबसे पहले अग्नि देने वाले का और उसके बाद समस्त परिजनों का मुँह मीठा करवाया जाता है. फिर भगवान शंकर के मंदिर में शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करना चाहिए. चूँकि भगवान शंकर मृत्यु के देवता (संहारक) माने जाते हैं. उनसे हमारे समस्त परिवार की रक्षा एवं आत्मा को सदगति प्रदान की प्रार्थना करके घर वापस आते हैं. शंकर जी के मंदिर में जलाए गए उस दीपक को घर नहीं लाना चाहिए. यह क्रिया सम्पन्न करने के बाद ही सम्पूर्ण कर्मकाण्ड सम्पन्न माना जाता है.

एक प्रश्न यह भी पूछा जाता है कि सूतक किसका “नहीं” मानना चाहिए?

उत्तर : गरुड़ पुराण के निर्णयसिन्धु के अनुसार समस्त इच्छाएँ त्याग चुके तथा मृत्यु के लिए अन्न-जल का त्याग कर चुके व्यक्ति का... शस्त्रों से हत्या हुई हो... विषपान किया हो... पानी में डूबकर आत्महत्या की हुई हो... अपने गुरु की हत्या की हो... नास्तिक हो... नीचकर्म किया हो... पितृकर्म नहीं किया हो... ऐसे सभी मृतात्माओं का “सूतक” नहीं होता.

हजारों वर्षों के दौरान कई-कई लोगों द्वारा वेदों की व्याख्या अपने-अपने अनुसार किए जाने के कारण कई प्रथाओं एवं परम्पराओं में विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग कर्मकाण्ड विधियाँ प्रचलन में हैं, परन्तु अंततः सभी का उद्देश्य एक ही होता है कि मृतात्मा को शान्ति मिले, उसे अपने अगले जन्म हेतु सदगति प्राप्त हो और वह बिना भटके हुए नई आत्मा के साथ किसी भी जीव-जंतु के नए शरीर में प्रवेश पा सके. पुण्यात्माओं को, संतों को अथवा “ऋणनुबंध” लेने-देने हेतु आत्माओं को कई बार अगला जन्म भी मनुष्य का ही मिल जाता है.

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