राम मंदिर वाले केके मुहम्मद और वामपंथी इरफ़ान हबीब

Written by रविवार, 11 मार्च 2018 08:39

कुछ दशक पहले की बात है, अलीगढ़ मुस्लिम विवि (Aligarh Muslim University AMU) में प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब (Irfan Habib) ने अपने एक पूर्व छात्र और अब उसी विवि में पढ़ा रहे फैकल्टी सदस्य केके मुहम्मद (KK Muhammed) को अपने दफ्तर में बुला भेजा.

उन दिनों केके मुहम्मद ने ही यह शोध किया था कि फतेहपुर सीकरी में एक इबादतखाना” भी था, जिसे अकबर ने 1575 ईस्वी में बनवाया था. इबादतखाना वह स्थान था, जहाँ विभिन्न धर्मों, पंथों के लोग एक साथ बैठकर चर्चाएँ किया करते थे. उस समय यह एक प्रमुख शोध था, जिसे विभिन्न अखबारों में अपने पहले पेज पर स्थान दिया था, लेकिन इरफ़ान हबीब, केके मुहम्मद की इस प्रसिद्धि से खुश नहीं थे. इन दोनों महानुभावों के बीच बातचीत शुरू हुई....

इरफ़ान हबीब :- आप ये जो खोज लाए हैं, यह कोई इबादतखाना नहीं है.
केके मुहम्मद :- जी नहीं, यह एक इबादतखाना ही है.
इरफ़ान हबीब :- टाईम्स ऑफ़ इण्डिया में आपने बकवास लिखी है, वो स्थान इबादतखाना नहीं थी...
केके मुहम्मद :- आप ऐसा कैसे कह सकते हैं? क्या आप पुरातत्त्ववेत्ता हैं?
इरफ़ान हबीब :- मैं भले ही आपकी तरह बेहतर पुरातत्त्ववेत्ता नहीं हूँ, लेकिन इतना तो जानता हूँ कि आपने सही नहीं लिखा है...
केके मुहम्मद :- सॉरी सर, आप अच्छे या बुरे कैसे भी पुरातत्त्ववेत्ता हैं ही नहीं..

IRFAN HABIB

 

इरफ़ान हबीब भौंचक्के और मौन रह गए. उन्होंने धीरे से एक पेपर निकाला और मुहम्मद के सामने रखते हुए कहा, कि इस पर मुझे लिखकर दीजिए कि आपने जिस स्थान का शोध किया है, वह इबादतखाना नहीं था. केके मुहम्मद ने साफ़ इंकार कर दिया और कमरे से निकल गए. केके मुहम्मद ने मलयालम में प्रकाशित अपनी आत्मकथा “मी, द इन्डियन” (मैं, एक भारतीय) में प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब और उनके चमचों के साथ अलीगढ़ मुस्लिम विवि (AMU) तथा अर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ़ इण्डिया (ASI) में साथ-साथ काम करते हुए आपस में हुए विवादों का विस्तार से उल्लेख किया है. अपने शोध एवं अध्ययन के दौरान केके मुहम्मद ने पाया कि कैसे इरफ़ान हबीब जैसे कथित सेकुलर इतिहासकारों ने भारत के इतिहास और संस्कृति को बुरी तरह विकृत कर दिया है. 

लेख में आगे बढ़ने से पहले केरल में जन्मे केके मोहम्मद के बारे में थोड़ा सा जान लीजिए. राम मंदिर की वास्तविकता को सबूतों, ऐतिहासिक साक्ष्यों, पुरातत्त्व और तथ्यों सहित उजागर करने के लिए आर्कियोलौजिकल सर्वे ऑफ़ इण्डिया ने काफी काम किया है. इसमें केके मुहम्मद का बहुत बड़ा हाथ है, और इसीलिए केके हमेशा इरफ़ान हबीब छाप “कथित वामपंथी”, लेकिन वास्तव में मुस्लिम कट्टरपंथियों के निशाने पर रहे हैं. केके मुहम्मद का एक और कारनामा जो अधिक लाईमलाईट में नहीं आ सका, वो है मध्यप्रदेश में ग्वालियर के बटेश्वर में लगभग ध्वस्त हो चुके 200 हिन्दू मंदिरों को भी इन्होंने बचाया है. मप्र के खनन माफिया और सुस्त प्रशासन से लड़ते हुए केके मोहम्मद ने आठवी शताब्दी में बने इन मंदिरों के जीर्णोद्धार का काम हाथ में लिया तथा चम्बल के डाकुओं तथा दिल्ली-भोपाल में बैठे सफेदपोशों से संघर्ष करते हुए बटेश्वर के हिन्दू मंदिरों को फिर से खड़ा किया.

केके मोहम्मद बताते हैं कि इस क्षेत्र में राम बाबू गुर्जर और निर्भर गुर्जर का बोलबाला था. ऐसे में जब डाकुओं को बताया गया कि मंदिरों को गुर्जर प्रतिहार राजाओं द्वारा बनवाया गया था और गुर्जर समुदाय के डाकू उस वंश के राजकुमार की तरह हैं. इसके बाद उन्होंने मंदिर के जीर्णोद्धार को अपना कर्तव्य मानते हुए मदद करना शुरू कर दिया. मोहम्मद बताते हैं कि चंबल में डाकुओं के गिरोह के खात्मे के साथ ही खनन माफिया ने मंदिर के नज़दीक खनन का कार्य शुरू कर दिया. वे कहते हैं, "अवैध खनन की वजह से मंदिर के जीर्णोद्धार की प्रक्रिया वापस वहीं पहुंचने लगी जहां से शुरू हुई थी. कई प्रशासकों को फोन किया लेकिन बात नहीं बनी. इसके बाद संघ प्रमुख सुदर्शन जी को पत्र लिखकर उनसे मदद मांगी तब जाकर शिवराज सरकार की मशीनरी हरकत में आई और मंदिर के नज़दीक खनन होना रुका. इसके बाद केके मोहम्मद ने वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते हुए मंदिर परिसर के नक्शे को समझना शुरू किया. 

केके मोहम्मद बताते हैं, "मंदिरों के अंदर कोई मूर्ति नहीं थी. लेकिन ये किसका मंदिर है, इसके बारे में सोचा तो एक आयताकार जगह दिखी. इसे देखते ही मुझे लगा कि ये नंदिस्तान होना चाहिए क्योंकि विष्णु मंदिर की स्थिति में ये जगह चौकोर होनी चाहिए थी. क्योंकि, विष्णु मंदिर के बाहर गरुड़ स्तंभ होना चाहिए."

"वाहनं वृषभो यस्य वासुकिः कंठभूषणम्। वामे शक्तिधरं देवं वकाराय नमो नमः ।।

केके मोहम्मद ने इस मंत्र का जाप करते हुए नंदी के अवशेष को इस आयताकार जगह पर ऱखा. दरअसल, इसी मंत्र में शिव के मंदिर और उनके साथ रहने वाले नंदी का वर्णन था जिसकी वजह से उन्हें पता चला कि ये शिव मंदिर था. बहरहाल केके मोहम्मद के बारे में संक्षेप में जानने के बाद अब आईये पुनः अपने मूल विषय की तरफ चलते हैं.

जब केके मुहम्मद एक छात्र के रूप में अलीगढ़ मुस्लिम विवि पहुँचे, तो वह बेहद उत्साहित थे कि उन्हें प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब जैसे नामचीन शिक्षक के साथ काम करने का मौका मिल रहा है.मुहम्मद अपनी यादों को समेटते हुए कहते हैं कि, मुझे बड़ी निराशा हुई जब इरफ़ान हबीब मुझ पर अपना कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाए. यहाँ तक कि मेरे साथ पढने वाले दुसरे मित्रों की राय भी यही थी. पता नहीं कैसे यह बात इरफ़ान हबीब के कानों तक पहुँच गयी कि छात्र उन्हें नापसंद करते हैं. इसके बाद केके मुहम्मद ने विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनावों में कांग्रेस की तरफ से उम्मीदवारी भरी. लेकिन इरफ़ान हबीब के मार्क्सवादी चेलों ने निश्चय कर लिया कि केके मुहम्मद को आगे नहीं बढ़ने देना है. इस तरह इरफ़ान हबीब के साथ उनका “पंगा” विस्तारित रूप लेने लगा, जिसका उल्लेख उन्होंने अपनी पुस्तक में किया है.

इरफ़ान हबीब और उनके गिरोह द्वारा विवि में खेली गयी राजनीति और तिकड़मों के कारण अंततः केके मुहम्मद को “इतिहास” के छात्र के रूप में रिसर्च करने के लिए एडमिशन नहीं मिला इसलिए उन्होंने पुरातत्त्व (Archaeology) को चुना. आर्कियोलॉजी में अपना पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा पूरा करने के बाद केके पुनः अलीगढ़ मुस्लिम विवि वापस लौटे. मन ही मन उन्होंने इरफ़ान हबीब और उनके चमचों का धन्यवाद अदा किया कि उनके कारण उन्हें इतिहास की जगह पुरातत्त्व चुनना पड़ा और इसीलिए उन्होंने न केवल फतेहपुर में अकबर का बनाया हुआ इबादतखाना खोज निकाला, बल्कि अकबर द्वारा मिशनरी लोगों के लिए बनाया हुआ एक चर्च भी तथ्यों–सबूतों के साथ खोज निकाला.

इसके बाद इरफ़ान हबीब और तमाम मार्क्सवादी इतिहासकार छात्र केके मुहम्मद पर चिढ़ने लगे. उन्होंने यह साबित करने का बहुत प्रयास किया कि यह तमाम खोजें केके मुहम्मद की नहीं हैं, लेकिन वे नाकाम रहे. इसके बाद उन्होंने यह दावा करना भी शुरू किया कि मुहम्मद ने जो खोजा है, वह “इबादतखाना” है ही नहीं. लेख में ऊपर दी गयी, इन दोनों के बीच उपरोक्त चर्चा इसी कालखंड में हुई थी. हालाँकि केके मुहम्मद भी मार्क्सवादी विचारों के प्रति सहानुभूति रखते थे, लेकिन अलीगढ़ मुस्लिम विवि के कैम्पस में उन्होंने अपनी आँखों से जो देखा, वह मार्क्सवाद का बेहद नीच संस्करण था. मुहम्मद लिखते हैं, मैंने तभी तय कर लिया था कि इरफ़ान हबीब जैसे तानाशाह और जी-हुजूर छाप लोगों के साथ मेरी कभी नहीं बनेगी.

इरफ़ान हबीब का गिरोह विश्वविद्यालय में बहुत मजबूत स्थिति में था, वे मेरा पूरा करियर बर्बाद कर सकते थे. इरफ़ान हबीब का गिरोह ही यह तय करता था कि रिसर्च के लिए छात्रवृत्ति किसे मिलेगी और किसे नहीं. यदि आप उनके समूह के लोगों की हाँ में हाँ नहीं मिलाते, तो आपको तत्काल “साम्प्रदायिक” कहकर दुत्कारना शुरू कर दिया जाता था. किसी छात्र की स्वतन्त्र सोच तो मानो अभिशाप थी, परन्तु यदि आप इस गिरोह के सदस्य बनने को राजी हो जाते तो आप तत्काल सेकुलर बन जाते थे.
अपनी इस थ्योरी को बल देने के लिए केके मुहम्मद, प्रोफ़ेसर रामचंद्र गौर का उदाहरण देते हैं. इरफ़ान हबीब के ख़ास वैचारिक विरोधी प्रोफ़ेसर गौर को इस मार्क्सवादी गिरोह ने “संघी” घोषित कर रखा था, लेकिन एक बार जैसे ही गौर साहब विभाग प्रमुख बने, उन्होंने भी पाला बदल लिया. जैसे ही रामचंद्र गौर, इरफ़ान हबीब के गुट में शामिल हुए उन्हें तत्काल सेकुलर होने का तमगा दे दिया गया. गौर साहब ने केके मुहम्मद को सलाह दी कि यदि अपना करियर बनाना है तो इरफ़ान हबीब की जी-हुजूरी शुरू कर दो, लेकिन केके को यह मंजूर नहीं था कि वे भी रामचंद्र गौर की तरह अपनी निष्ठाएँ बदल लें.

इरफ़ान हबीब के साथ अपनी भिडंतों का उल्लेख करते हुए केके मुहम्मद लिखते हैं कि एक बार एक इंटरव्यू पैनल में वाईस चांसलर और इरफ़ान हबीब बैठे थे. इंटरव्यू के दौरान वीसी ने मुझसे कहा कि मैं ऐसे किसी व्यक्ति को AMU में नहीं आने दूंगा, जो प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब की इज्जत ना करता हो. केके मुहम्मद ने सपाट जवाब दिया कि, इज्जत माँगी नहीं जाती है, बल्कि कमाई जाती है. इसके बाद उनसे कम अंक मिले हुए एक दूसरे मुस्लिम छात्र को उस प्रोजेक्ट में रिसर्च स्कॉलर के रूप में एडमिशन मिल गया. इसी प्रकार एक और मामले में उनसे कम अंक लाने वाले तथा आर्कियोलॉजी में पीजी डिप्लोमा तक न किए हुए व्यक्ति को असिस्टेंट आर्कियोलौजिस्ट बना दिया गया, लेकिन केके मुहम्मद को आगे नहीं बढ़ने दिया. जब भी केके मुहम्मद का आमना-सामना इरफ़ान हबीब से होता था, हबीब अपनी नज़रें झुका लेते थे. मुहम्मद आगे लिखते हैं कि हालाँकि मुझे खासा पीछे धकेलने के बाद मेरे प्रति उनका व्यवहार थोड़ा बदल चुका था, लेकिन मुझे पूरा भरोसा था कि जब भी मौका मिलेगा ये आदमी मेरी पीठ में छुरा अवश्य घोंपेगा.

अपनी आत्मकथा में केके मुहम्मद लिखते हैं कि इरफ़ान हबीब को इतिहासकार मक्कन लाल जैसे चाटुकार लोग पसंद थे. इरफ़ान हबीब ने प्रोफ़ेसर मक्कन लाल को आर्कियोलॉजी विभाग का डिप्टी डायरेक्टर बनाने का प्रयास किया. जब केके मुहम्मद ने इसे न्यायालय में चुनौती दी, तो मक्कन लाल साहब इरफ़ान हबीब के ही साथी बन गए. लेकिन केके जानते थे कि यह अपवित्र गठबंधन अधिक चलने वाला नहीं है. उन्हीं दिनों दिल्ली में वर्ल्ड आर्कियोलॉजी कॉंग्रेस चल रही थी और उसमें हबीब का मार्क्सवादी गुट और प्रोफ़ेसर मक्कन लाल का गुट खुलेआम बाबरी मस्जिद ढाँचे के इतिहास एवं पुरातत्व को लेकर आमने-सामने आ गए और उनमें खटास पुनः बढ़ गयी. अंततः केके मुहम्मद को आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इण्डिया (ASI) का डिप्टी सुपरिंटेंडेंट चुन लिया गया. यहाँ भी इरफ़ान हबीब ने उनका पीछा नहीं छोड़ा और ASI के डायरेक्टर जनरल से मिलकर केके मुहम्मद को खारिज करने का आग्रह कर डाला. उच्चाधिकारी ने इरफ़ान हबीब से साफ़ कहा कि चूँकि केके मुहम्मद UPC परीक्षा से बाकायदा चुनकर आए हैं, इसलिए उन्हें खारिज करने अथवा हटाने का अधिकार उनके पास नहीं है. इरफ़ान हबीब ने फिर भी हार नहीं मानी और डायरेक्टर जनरल से कहा कि ठीक है, यदि आप उन्हें हटा नहीं सकते तो कम से कम उन्हें आगरा की पोस्टिंग नहीं दें (उन्हें डर था कि केके मुहम्मद कहीं कुछ और नई खोज दुनिया के सामने न ले आएँ). इरफ़ान हबीब के दबाव में उन की बात मानकर केके मुहम्मद की पोस्टिंग मद्रास सर्कल में की गयी. हालाँकि इस बीच केके मुहम्मद के आर्कियोलौजिकल शोध लगातार धूम मचाते रहे और वे अलीगढ़ मुस्लिम विवि में अपने लेक्चर देने आते रहे. इरफ़ान हबीब ने उन्हें जहाँ-तहाँ रोकने का पूरा प्रयास किया, लेकिन वे JNU में केके मुहम्मद को रोकने के अलावा और कहीं भी उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को रोक न सके.

इस आत्मकथा की प्रस्तावना में प्रोफ़ेसर एमजीएस नारायणन भी प्रोफ़ेसर हबीब के बारे में ऐसा ही लिखते हैं. प्रोफ़ेसर नारायणन के मुताबिक़ इरफ़ान हबीब ने भारतीय इतिहास में काफी ज़हर बोया है. न सिर्फ इतिहास, बल्कि भारतीय संस्कृति और सामाजिक वातावरण में भी इरफ़ान हबीब के मार्क्सवादी गिरोह ने अपने परिवारवाद, समूहवाद और विश्वासघात के जरिये कटुता एवं झूठ को बढ़ावा दिया. इरफ़ान हबीब का ये गिरोह अपने विरोधी विचार वालों को धमकाता, व उनके साथ धोखाधड़ी करता था. जो भी व्यक्ति इनका विरोध करता, उसे ये लोग “हिन्दुत्ववादी” और “साम्प्रदायिक” घोषित करके अलग-थलग करने का पूरा प्रयास करते थे. प्रोफ़ेसर नारायणन के अनुसार इरफ़ान हबीब का गिरोह ही बाबरी मस्जिद को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मसला बनाने का जिम्मेदार है, अन्यथा पुरातत्ववेत्ताओं ने तो उस स्थान पर राम मन्दिर के पर्याप्त सबूत खोज निकाले हैं. प्रोफ़ेसर नारायणन आगे लिखते हैं कि बाबरी मस्जिद विवाद के दौरान इरफ़ान हबीब का सेकुलर मुखौटा पूरी तरह से उतर चुका था. एक शासकीय संस्था अर्थात ICHR (भारतीय इतिहास शोध संस्थान) का प्रमुख होने के नाते, उन्हें इस विवाद में किसी एक पक्ष का साथ नहीं देना चाहिए था, परन्तु उन्होंने खुलेआम बाबरी मस्जिद के पक्ष में माहौल बनाया. शुरुआत में स्थिति ऐसी भी बनी थी प्रोफ़ेसर नारायणन, इरफ़ान हबीब के बड़े प्रशंसक बन गए थे, लेकिन जैसे-जैसे उन्हें केके मुहम्मद के साथ हुए अन्याय तथा बाबरी मस्जिद के नीचे स्थित राम मन्दिर के बारे में मुहम्मद की खोजों के बारे में पता चलता गया, वे इरफ़ान हबीब का इस्लामिक खेल समझ गए. ज़ाहिर है कि जल्दी ही प्रोफ़ेसर नारायणन को भी “हिन्दुत्ववादी” घोषित कर दिया गया.

इस लेख में ये तो चन्द घटनाएँ ही बताई गयी हैं कि किस तरह से मार्क्सवादी तत्वों ने विभिन्न विश्वविद्यालयों में अपने गिरोहों के माध्यम से पकड़ मजबूत बना रखी थी और भारतीय संस्कृति, इतिहास के बारे में शोध करने वाले रिसर्चर बच्चों को ये किस बेरहमी से तंग करते थे, उनका करियर खराब करते थे. इरफ़ान हबीब जैसे कई लोग भारत के विश्वविद्यालयों, संस्थाओं, शोध प्रकल्पों इत्यादि में आज भी भरे पड़े हैं. चाहे राम मन्दिर की ऐतिहासिक मौजूदगी के सबूतों के बारे में बात हो... अथवा सरस्वती नदी के प्रवाह के बारे में खोज हो... अथवा भारत के अफगानिस्तान के साथ मजबूत सांस्कृतिक सम्बन्ध के बारे में कोई लेख हो... ऐसे सभी सांस्कृतिक मुद्दों को इरफ़ान हबीब जैसे लोगों ने कभी उठने ही नहीं दिया, अच्छे जर्नल्स में प्रकाशित नहीं होने दिया... अपने प्रभाव, दबाव और पद के इस्तेमाल से भारतीय संस्कृति एवं इतिहास का शोध करने वालों को निरंतर हतोत्साहित किया. मार्क्सवादी इतिहासकारों ने चरमपंथी मुस्लिम समूहों का समर्थन किया और अयोध्या विवाद का एक सौहार्दपूर्ण समाधान खोजने के प्रयासों को पटरी से उतार दिया. अयोध्या में पुरातात्विक खुदाई में स्पष्ट रूप से मस्जिद के नीचे एक मंदिर की उपस्थिति के निशान मिले थे, लेकिन वामपंथी इतिहासकारों ने इन्हें खारिज कर दिया और इलाहाबाद उच्च न्यायालय को भी गुमराह करने की कोशिश की... इसकी अगुआई इरफ़ान हबीब और रोमिला थापर जैसे फर्जी इतिहासकारों ने ही की.

कहने का तात्पर्य यह है कि भारत के वैचारिक आभामण्डल पर मार्क्सवाद नामक काली छाया का बुरा प्रभाव लम्बे समय तक मौजूद रहा है और इसे धीरे-धीरे दूर करने में काफी समय लगेगा. सोचिये जब केके मुहम्मद (जो कि एक मुस्लिम हैं) जैसे प्रतिभाशाली शोधवेत्ता को, एक दूसरे मुस्लिम यानी इरफ़ान हबीब ने आगे बढ़ने से रोकने के लिए तमाम दांवपेंच लगा डाले, तो फिर JNU सहित देश के अन्य विश्वविद्यालयों में इन मार्क्सवादी गिरोहों ने न जाने कितनी प्रतिभाओं को कुचला होगा, न जाने भारतीय इतिहास के कितने शोध अलमारियों की धूल खा रहे होंगे... इसीलिए विश्वविद्यालयों की “साफ़-सफाई” बेहद जरूरी काम है. 

इसे भी जरूर पढ़ें... :- ICHR में घुसे बैठे बौद्धिक लुटेरे और धूर्त :- http://www.desicnn.com/blog/ichr-and-intellectual-anarchists 

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