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भारत के गणितज्ञ, ब्रिटिश लायब्रेरी सहेजे :- हम पर लानत

Written by गुरुवार, 07 सितम्बर 2017 08:08

पुणे के प्रसिद्ध शनिवार पेठ के वीर मारुती चौराहे से शनिवार वाड़े की तरफ जाने वाले एक छोटे से मार्ग का नाम रखा गया है, “केरूनाना छत्रे मार्ग”.

आजकल के ब्राह्मण विरोधी जहरीले माहौल में जब पुणे में लोकमान्य तिलक और सावरकर जैसे दिग्गजों की ही बखिया उधेड़ी जा रही हों, उनके कार्यों के सबूत माँगे जा रहे हों... भला ऐसे में एक छोटे से मार्ग पर एक गुमनाम से “केरूनाना” भला किस खेत की मूली हैं?? खुद पुणे के निवासियों ने ही शायद ये नाम पहली बार सुना होगा. कौन थे ये केरूनाना छत्रे? उनके नाम पर मार्ग भी है, भला क्यों??

विनायक लक्ष्मण छत्रे, उर्फ़ केरूनाना छत्रे का जन्म 1824 में अलीबाग के पास नागाव में हुआ. बाल्यकाल में ही माता-पिता की छाया सिर से उठ जाने के कारण वे अपने काका के यहाँ मुम्बई आ गए. मुम्बई में छत्रे परिवार की बाणगंगा-वालकेश्वर स्थान पर एक बड़ी इमारत और जमीन वगैरह थी. पढ़ाई के लिए मुम्बई आने वाले छत्रे को बाल्यकाल से ही गणित, खगोलशास्त्र एवं विज्ञान जैसे गूढ़ विषयों में रूचि थी. आगे चलकर पुणे के एल्फिन्स्टन इंस्टीट्यूट में उन्हें पढ़ाने वाले आचार्य बाळ शास्त्री जाम्भेकर तथा प्रोफ़ेसर आर्थर बेडफ़ोर्ड आर्लिबार द्वारा उन्हें अनमोल मार्गदर्शन प्राप्त हुआ. 1840 के आसपास का वह कालखंड भारत में अंगरेजी सीखने की शुरुआती समय था. केरूनाना छत्रे ने मन लगाकर पढ़ाई की तथा अंगरेजी सहित सभी विषयों में प्रावीण्य सूची में स्थान प्राप्त किया.

केरूनाना के गुरु यानी प्रोफ़ेसर आर्लिबार ने 1840 में मुम्बई के कुलाबा स्थित जमीन पर एक वेधशाला का आरम्भ किया. प्रोफ़ेसर आर्लिबार को चुम्बकत्व एवं खगोलशास्त्र जैसे विषयों में कुछ ख़ास प्रयोग करने थे, इसलिए तत्कालीन मुम्बई सरकार ने वेधशाला की स्थापना हेतु अनुदान भी दिया (सनद रहे, सन 1840). केरूनाना इतने प्रतिभाशाली थे कि आयु के सोलहवें वर्ष में ही उन्हें प्रोफ़ेसर आर्लिबार ने अपनी वेधशाला में नौकरी करने का प्रस्ताव दिया. प्रतिमाह वेतन – पचास रूपए (उस कालखंड का जबरदस्त पॅकेज). केरूनाना द्वारा मना करने का सवाल ही नहीं उठता था. एक तो मनपसंद विषय, मनपसन्द गुरु और मात्र सोलह वर्ष की आयु में पचास रूपए जैसा शानदार वेतन. अगले दस वर्षों तक केरूनाना ने यह नौकरी पूरी ईमानदारी और कड़ी मेहनत से की. इन दस वर्षों के अपने वेधशाला के अनुभवों से केरूनाना को समझ में आया कि भारतीय परंपरा के अनुसार बनाए जाने वाले पञ्चांग का सम्बन्ध प्रत्यक्ष रूप से आकाश में ग्रहों की स्थिति से सटीक मेल नहीं खाता. इसका कारण था, भारतीय पञ्चांग परंपरा का रूढ़िवादी होना तथा कालबाह्य हो चुके गणित का प्रयोग करना. इस कारण होता यह था कि ग्रहों की स्थिति एवं पञ्चांग के बीच सटीक सामंजस्य नहीं बैठता था. उन्होंने इस दिशा में शोध करने का विचार किया, परन्तु समयाभाव के कारण वे कर नहीं सके. लेकिन इतना जरूर हुआ कि प्रोफ़ेसर आर्लिबार जैसे गुरु और वेधशाला की नौकरी ने केरूनाना के मनोमस्तिष्क में वैज्ञानिक विचारों की अमिट छाप छोड़ दी.

 

Keru Nana 2

(1868, यानी आज से लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व केरूनाना द्वारा अंकगणित पर लिखी गयी पुस्तक का पहला पृष्ठ)

मुम्बई में 1848 में अंगरेजी के वैज्ञानिक ज्ञान को मराठी में लाने हेतु “ज्ञान प्रसारक सभा” नामक संस्था का गठन हुआ था. इस संस्था की सभाओं में केरूनाना ने 17 अलग-अलग विषयों पर अपने शास्त्रीय निबंधों का वाचन किया. इसमें “ज्वार-भाटा के नियम”, “कालगणना”, “सूर्य पर स्थित धब्बे” जैसे अनेक महत्वपूर्ण विषयों का समावेश था.

पढ़ना-पढ़ाना-वैज्ञानिक शोध इन तीनों विषयों की अत्यधिक रूचि होने के कारण, केरूनाना ने 1851 में वेधशाला की वह नौकरी छोड़कर पूना के एक स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया. पूना के वर्नाक्युलर स्कूल (जो आगे चलकर ट्रेनिंग कॉलेज बन गया) तथा अहमदनगर के अंगरेजी स्कूल में उन्होंने बच्चों को पढ़ाया. गणित, जीवविज्ञान और पदार्थ विज्ञान (यानी भौतिकी) यह उनके प्रिय विषय थे. विशेष बात यह थी, कि इन विषयों को केरूनाना अंगरेजी, और मराठी दोनों भाषाओं में पढ़ा लेते थे. पुणे के शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेज में उन्होंने जीवविज्ञान पर अनेक व्याख्यान दिए. 1865 में निवृत्त होने तक केरूनाना पुणे के डेक्कन कॉलेज में पढ़ाते रहे. पुणे के इस प्रसिद्ध कॉलेज में उस कालखंड में केरूनाना के शिष्य रहे बाल गंगाधर तिलक, गोपाल गणेश आगरकर, विष्णु शास्त्री चिपलूनकर. एक बार 1918 में लोकमान्य तिलक से इंग्लैण्ड मं एक पत्रकार ने प्रश्न पूछा कि “भारत के स्वतन्त्र होने के बाद आप क्या करेंगे?” एक क्षण में ही तिलक ने जवाब दे दिया, कि “मेरे गुरु केरोनाना छत्रे की तरह मैं भी अपने पहले प्यार की तरह, बच्चों को गणित पढ़ाऊँगा”.

लोकमान्य तिलक के मन में गणित के प्रति प्रेम जगाने वाले और कोई नहीं, बल्कि उनके गुरु केरूनाना छत्रे ही थे. तिलक जैसे उत्तम शिष्य यहीं नहीं रुके, उन्होंने केरूनाना द्वारा नौकरी में रहते हुए पञ्चांग शुद्धि का जो कार्य अधूरा रह गया था, उसे गुरु ऋण मानकर पूरा किया. आगे चलकर “ओरायन” तथा “आर्कटिक होम ऑफ़ वेदाज़” जैसे खगोल एवं गणित द्वारा सिद्ध किए गए ग्रन्थ भी उन्होंने लिखे. केरोनाना एक पूर्ण शिक्षक इसलिए भी थे कि उन्होंने हमेशा जरूरतमंद छात्रों की आर्थिक मदद भी की. स्वयं आगरकर ने लिखा है कि मैं उनसे जब चाहे, जितनी चाहे पुस्तकें माँग लेता था. आगरकर के पास कॉलेज की फीस भरने के पैसे नहीं थे, यह जानते ही केरोनाना ने उनकी भी आर्थिक मदद की. केरोनाना स्वयं एक उत्तम पियानो वादक थे. भारतीय शास्त्रीय संगीत की उन्हें गहरी समझ थी. किर्लोस्कर नाट्य मंडली में उनका आना-जाना लगा रहता था.

 

Kero Nana 1

(पदार्थ विज्ञान, अर्थात भौतिकी पर लिखी गयी पुस्तक, सन 1879)

शैक्षणिक क्षेत्र में केरोनाना छत्रे का एक और महत्त्वपूर्ण योगदान मराठी में अंकगणित और पदार्थविज्ञान की पुस्तकें लिखना. उस समय ये पुस्तकें बहुत लोकप्रिय हुईं. केरोनाना की सर्वसुलभ सरल मराठी भाषा में होने के कारण शिक्षकों में भी ये पुस्तकें बहुत पसंद की जाती थीं. राव बहादुर केरोनाना छत्रे का निधन 19 मार्च 1884 के दिन हुआ. उन दिनों “टाईम्स” जैसे धुर अंग्रेज अखबार ने भी केरोनाना के प्रति आदरयुक्त शब्दों का प्रयोग करते हुए लिखा, “...यदि केरोनाना छत्रे को यूरोपियन शिक्षा प्राप्त हुई होती, तो वे निश्चित रूप से समूचे विश्व में एक युगप्रवर्तक वैज्ञानिक के रूप में पहचाने जाते.

ऐसे एक महान वैज्ञानिक, एक महान शिक्षक, तिलक-आगरकर-चिपलूनकर के लोकप्रिय गुरु एवं उस कालखंड में अंकगणित तथा पदार्थविज्ञान जैसे विषयों पर सरल मराठी भाषा में पुस्तकें लिखने वाले केरोनाना छत्रे के नाम पर पुणे जैसी सांस्कृतिक नगरी में अब केवल एक गुमनाम सी छोटी सड़क है, जिस पर उनके नाम का छोटा सा बोर्ड लगा हुआ है... जिसके बारे में, इस प्रखर व्यक्ति के कार्यों के बारे में, गौरवशाली इतिहास के बारे में आसपास से गुजरने वाले पुणेरी लोग जानते तक नहीं. विडंबना देखिये कि हम कृतघ्न और लापरवाह भारतवासियों ने जिन महान लोगों को, जिन उत्तम ग्रंथों को, जिन दुर्लभ पांडुलिपियों को सहेजकर नहीं रखा, उनकी परवाह नहीं की... आज उन्हीं के बारे में हमें लन्दन की ब्रिटिश लायब्रेरी से पता चलता है, क्योंकि अंग्रेजों को इतिहास की कद्र है... उन्हें संस्कृति को सहेजना आता है. हम लोग केवल अपने गाल बजाने एवं जाति-धर्म के नाम पर एक-दूसरे की टांग खींचने में ही माहिर हैं.

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मूल लेखक : संकेत कुलकर्णी 

मराठी से हिन्दी अनुवाद :- सुरेश चिपलूनकर

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