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प्रबंधन की सदैव प्रासंगिक अनूठी कृति :- कौटिल्य अर्थशास्त्र

Written by गुरुवार, 06 जुलाई 2017 19:44

अधिकतर लोगों ने कौटिल्य अर्थात चाणक्य के "अर्थशास्त्र" के बारे में केवल सुना ही सुना है, पढ़ा शायद ही किसी ने हो. इस संक्षिप्त लेख में चाणक्य द्वारा लिखे गए सूत्रों, नियमों एवं अनुपालनों को समझाने का प्रयास किया गया है, ताकि दिमाग पर अधिक बोझ भी न पड़े और पूरा कौटिल्य अर्थशास्त्र सरलता से समझ में भी आ जाए.

चन्द्रगुप्त मौर्य के महामंत्री और गुरु को विष्णुगुप्त, चाणक्य और कौटिल्य के नाम से जाना जाता है। चाणक्य का ‘अर्थशास्त्र’ नमक ग्रंथ अपने विशाल कोष मे राजनीति, समाज व्यवस्था, अर्थ-व्यवस्था, न्याय शास्त्र, प्रजातांत्रिक प्रशासन, विदेश नीति, गुप्तचर नीति जैसे अनेक विषयों को समेटे हुए है। चार पुरुषार्थों मे से एक “अर्थ” को केंद्र मानकर आचार्य चाणक्य ने इसके इर्द-गिर्द राजा के लिए करणीय समस्त कार्यों का अनेक आयामों को स्पर्श करते हुए वर्णन किया है। सम्पूर्ण कौटिलीय अर्थशास्त्र में पंद्रह अधिकरण, एक सौ पचास अध्याय, एक सौ अस्सी प्रकरण और छ: हजार श्लोक हैं। 

प्रथम अधिकरण

प्रथम अधिकरण का नाम विनयाधिकरण है। विनय से आचार्य का तात्पर्य शिक्षा से है। इसमे विद्या, शिक्षा, इंद्रियजय, राजा/श्रेष्ठ व्यक्ति की जीवनचर्या का वर्णन है। चूंकि आचार्य चाणक्य ने यह ग्रंथ राजनीति को केंद्र मानकर लिखा है, अतः इस ग्रंथ के अधिकतर प्रकरण राजा को संबोधित और शिक्षित करते हैं, लेकिन वस्तुतः इसका संबंध हर उस व्यक्ति से है जो राजा की भांति सफल, सम्मानित और श्रेष्ठ बनना चाहता है। इसी अधिकरण मे मंत्री, पुरोहित, गुप्तचर की नियुक्ति और उनसे संबन्धित अन्य विषयों को स्पर्श किया गया है। राजा के लिए सबसे हानिकारक राजकुमारों को मानकर उनके यथायोग्य शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था करने के साथ ही उनसे सावधान रहने को भी आचार्य चाणक्य ने कहा है-

रक्षितो राजा राज्यं रक्षत्यासन्नेभ्यः परेभ्यश्च. पूर्वं दारेभ्यः पुत्रेभ्यश्च.

सामान्य समझ रखने पर भी यह ध्यान मे रखने योग्य है कि सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते व्यक्ति को सबसे अधिक नुकसान अपने आस पास के लोगों से हो सकता है। ये हानियाँ प्रत्यक्ष ही नहीं परोक्ष भी होती है। जैसे यदि किसी व्यक्ति का पुत्र चरित्रहीन होगा तो अपने पिता के यश को नुकसान पहुंचाएगा। ऐसे ही अपव्ययी, लोभी और स्वार्थी मित्र-संबंधी बहुत घातक होते हैं, इनके संबंध मे सावधानी- सतर्कता और आचरण का वर्णन इसी अधिकरण मे चाणक्य ने किया है।

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दूसरा अधिकरण

यह अधिकरण जनतांत्रिक व्यवस्था के स्थापन, विभिन्न प्रकार की भूमियों का उपयोग, दुर्गों के निर्माण, वास्तु-कला, कोष-गृह से संबन्धित विषयों और कोषाध्यक्ष के कर्तव्य, कर-संग्रह और इसके अधिकारियों, अधिकारियों के चाल-चलन की परीक्षा, विभिन्न रत्नों की पहचान, खाद्य पदार्थों और खनिजों की पहचान और उनकी वितरण व्यवस्था, आयुधागार, कृषि-बुनकर, आबकारी विभाग, नौका-पशुपालन-अश्व-गज विभागों के अध्यक्ष, मुद्रविभाग-चरागाह विभाग के अध्यक्ष से संबन्धित है। यह अध्यक्ष अधिकरण है। इसमे किसी राज्य के सभी राजकीय विभागों के अध्यक्षों की नियुक्ति, कर्तव्यों, निरीक्षण व्यवस्था, उनके व्यवहार की परीक्षा और उनको प्रोत्साहन देने से संबन्धित है।

तीसरा अधिकरण

तीसरे अधिकरण का नाम आचार्य ने धर्मस्थीय दिया है। वस्तुतः ये सामाजिक व्यवस्था के अनिवार्य विषयों का प्रतिपादन करने वाला अध्याय है जिसमे न्याय-नैतिक व्यवस्था के सिद्धांतों का वर्णन है जिससे कि किसी राज्य मे जनसहयोग से सुशासन स्थापित होता है। इसमे विभिन्न प्रकार के शर्तनामों के लेखन, प्रकार और तत्संबंधी निर्णयों का विवेचन है। इसे हम आधुनिक CONTRACT ACT का प्राचीन स्वरूप कह सकते हैं। विभिन्न प्रकार के वैवाहिक सम्बन्धों और उनसे संबन्धित कर्तव्य-न्याय व्यवस्था का वर्णन है। इसमे स्त्री को विभिन्न कारणों से पुनर्विवाह का अधिकार देना महत्त्वपूर्ण है। ऐसे ही स्त्रियों को अपने स्त्री-धन की रक्षा, वैवाहिक आकांक्षाओं की पूर्ति के अधिकार भी चाणक्य ने दिये हैं। स्त्री को विवाह-विच्छेद के अधिकार भी दिये हैं- अगर पति नीच, प्रवासी, राजद्रोही, घातक, सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध हो तो-

नीचत्वं परदेशं वा प्रस्थितो राजकिल्बिषी
प्राणाभिहन्ता पतिस्त्याज्यः क्लीबोsपि वा पति:

इसी अधिकरण मे विवाहित पुरुष-स्त्री के एक दूसरे परस्पर मधुर सम्बन्धों का निर्देश किया है। इसके साथ ही कठोर आचरण पर दंड का भी विधान किया है। पुरुष को अपनी स्त्री के भरण-पोषण ही नहीं शिक्षा दीक्षा के लिए भी प्रतिबद्ध रहने को कहा गया है। इसी अधिकरण मे उत्तराधिकार के विभिन्न सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन भी किया गया है, जैसे-

“माता-पिता या केवल पिता के जीवित रहते लड़के संपत्ति के अधिकारी नहीं होते। उनके न रहने पर लड़के आपस मे संपत्ति बाँट सकते हैं....”

उत्तराधिकार संबंधी अनेक तथ्यों और संभावित स्थितियों के आधार पर नियम बनाए गए हैं। इसी अधिकरण मे नागरिकों के द्वारा गृह-निर्माण व उनसे संबन्धित विवादों का निपटारा, मार्गों-चारागाहों का प्रबंध, ऋण लेन- देन के नियम व स्थितियाँ, धरोहर संबंधी नियम, दास-श्रमिक संबंधी नियम, मजदूरी और साझेदारी, क्रय-विक्रय का बयाना, सामान्य अपराधों, जुए के संबन्धित नियमों का विस्तृत उल्लेख है।

K 1

चतुर्थ अधिकरण

इस अधिकरण का नाम कंटकशोधन अधिकरण है। इसमे समाज कंटक अपराधियों के प्रति नीति, दंड-नीति और अन्य समस्याओं-आपदाओं के प्रति सुनीति का वर्णन है। इसमे शिल्पियों, व्यापारियों के एकाधिकार से प्रजा की रक्षा, आपदाओं से बचने और प्रबंधन के उपाय, गुप्त षड्यंत्रकारियों से रक्षा, छुपे वेष के अपराधियों से सुरक्षा, शंकित पुरुषों-चोरी के माल-चोर की पहचान, आशुमृतक की पहचान, चोरी को स्वीकार कराने के लिए विभिन्न जाँचों और दंडों का प्रयोग, सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली और उसमे कार्यरत कर्मचारियों की निगरानी व्यवस्था,विभिन्न प्रकार के अपराधों के लिए विभिन्न दंड- एकांग वध, शुद्ध-दंड, चित्र-दंड, कुमारी कन्या से अपकार का दंड, विभिन्न प्रकार के अतिसाहसों के लिए दंडविधान का वर्णन है। इतना ही नहीं अगर राजा की ओर से अदंडनीय-निरपराध व्यक्ति को दंड दिया जाता है तो उसके लिए राजा को भी दंडित करने का विधान बताया गया है-

अदण्ड्यदण्डने राज्ञो दण्डश्त्रिन्शदगुणोम्भसि

इस प्रकार मे सही अर्थों मे प्रजातन्त्र की रक्षा और व्यवस्था का प्रबंध किया गया है।

पंचम अधिकरण

पंचम अधिकरण का नाम योगवृत्त है, क्योंकि यह प्रजा और राजकीय व्यवस्था को जोड़ने का प्रयास करता है। इस अधिकरण मे प्रजाद्रोही और राजद्रोही अधिकारिओं के संबंध मे दंड का विधान किया गया है। इसके लिए गुप्त रीतियों के प्रयोग का विधान चाणक्य ने किया है क्योंकि किसी राज्याधिकारी के संबंध मे अधिकार जानकारी न होने से उसको सार्वजनिक दंड देने से प्रजा क्षुब्ध हो सकती है-

स्वपक्षे परपक्षे वा तूष्णीं दण्डं प्रयोजयेत
आयत्यां च तदात्वे च क्षमावानविशङ्कित:

किसी भी देश और सत्ता की स्थापना के लिए कोष का प्रमुख महत्त्व है। अतः कोष-संचय के प्रयासों का उल्लेख है। विभिन्न प्रकार के कर्मचारियों के भरण पोषण और वेतनमान से संबन्धित बातों का विस्तृत वर्णन किया गया है। राज्यकर्मचारियों का राजा के प्रति व्यवहार और व्यवस्था के पालन के नियमों का वर्णन है। राजा पर विपत्ति आने पर किन परिस्थितियों मे कैसे उत्तराधिकारी बनाया जाये इसका विवेचन किया गया है।

छठा अधिकरण

संक्षिप्त होने पर भी छठा अधिकरण अनेक सारगर्भित तथ्यों को समेटे हुए है। इसमे राज्य की दृष्टि से सात प्रकृतियों, राजा के अभिगामिक गुण, प्रज्ञागुण, चार उत्साह गुण, आत्मसंपन्नता गुण, अमात्य के गुण, जनपद के गुण, दुर्ग के गुण, कोष के गुण, सेना के गुण, मित्र के गुण, शत्रु के गुणों का वर्णन है। शत्रु को छोडकर शेष सातों प्रकृतियों की युक्तता को ही राजसंपत्ति नाम दिया है-

अरिवर्जा: प्रकृतिय: सप्तैताः स्वगुणोदया:
उक्ताः प्रत्यन्गभुतास्ताः प्रकृता राजसंपदः

इसी अधिकरण मे शांति और उद्योग के महत्त्व का प्रतिपादन है। क्षेम (प्राप्त की रक्षा) का कारण शांति को और योग (प्राप्त करने) का कारण व्यायाम-उद्योग-यत्न को बताया है-

शंव्ययामौ योगक्षेममयोर्योनिः

युद्धनीति के कई सोपान इस अधिकरण मे समेटे गए है और विभिन्न प्रकार के शत्रुओं और मित्रों की भी व्याख्या है।

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सातवाँ अधिकरण

यह अधिकरण षड्गुणों से संबन्धित है अतः इसका नाम षाड्गुण्य अधिकरण है। राजनीति की दृष्टि से चाणक्य ने छः गुण- संधि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय और द्वैधीभाव बताए हैं।

संधि- सशर्त मेल
विग्रह- शत्रु का अपकार
आसन- उपेक्षा
यान- चढ़ाई
संश्रय- आत्मसमर्पण
द्वैधीभाव- संधि-विग्रह का मिश्रण

इसी अधिकरण मे आचार्य चाणक्य ने ये भी बताया है कि किन किन परिस्थितियों मे राजा को कौन सी नीति अपनानी चाहिए और क्यों अपनानी चाहिए। कौटिल्य ने राजा की तीन अवस्थाएँ मानी हैं- क्षय, स्थान, वृद्धि। पतन होना क्षय, सम स्थिति बने रहना स्थान और आगे बढ़ना वृद्धि कहा है। आचार्य कहते हैं कि इन छः गुणों के आश्रय से राजा को क्षय से स्थान और स्थान से वृद्धि की ओर बढ़ना चाहिए। ये नीतियाँ राजनीतिक विकास के साथ ही व्यक्तिगत और सामाजिक-संस्थानिक विकास के लिए भी पथ-प्रदर्शक है।

K 3

आठवाँ अधिकरण

यह अधिकरण व्यसन अर्थात विपत्तियों से संबन्धित है। कल्याण-मार्ग से भटकने कि चाणक्य ने व्यसन कहा है-
व्यस्यत्येनं श्रेयस इति व्यसनं

इसमे मानुष और दैवीय ये दो प्रकार के प्रमुख व्यसन माने हैं। व्यक्ति का योग्य मार्ग से पतन भी व्यसन ही है अतः इसके अनुसार राजा और सामान्य व्यक्तियों के व्यसनों का भी वर्णन किया गया है। राष्ट्र पर आने वाली दैवी विपत्तियों को पीड़नसंवर्ग, राजा और राजपरिवार के व्यवहार के कारण आए संकट को स्तंभसंवर्ग और कोषागार मे कमी को कोषसंवर्ग कहा है। चाणक्य ने इन सब विपत्तियों की तुलना, कारण और निवारण उपाय भी बताए हैं। सेना और सैनिकों के व्यसनों का वर्णन कर उनसे बचने के उपाय बताए हैं।

नौवाँ अधिकरण

इस अधिकरण का नाम अभियाख्यतकर्म अधिकरण है। यह अध्याय सैनिक अभियान से संबन्धित है। इस अध्याय मे सैनिक और राज्य की शक्ति, समय और बल-अबल के आधार पर आक्रमण के समय की विवेचना की गयी है। सैन्य संग्रह के समय, सैन्य संगठन के तौर-तरीकों और शत्रुसेना से मुक़ाबले का विस्तृत विवरण है। सैन्य-प्रस्थान और अभियान के समय विभिन्न प्रकार के दैवीय और मानुषी प्रकोपों के प्रभाव, प्रकार और निवारण की चर्चा की गयी है। अभियान के दौरान होने वाले विभिन्न प्रकार के क्षय, व्यय और लाभ का विचार किया गया है।अभियान के समय मे राष्ट्र पर आगत बाह्य और आंतरिक विपत्तियों से बचने के उपायों का वर्णन है। अर्थ, अनर्थ और संशय के कारण उत्पन्न हुई समस्याओं का भी वर्णन है और उनके निवारण के उपायों का विशद उल्लेख आचार्य चाणक्य ने किया है।

दसवाँ अधिकरण

ये अध्याय संग्राम से संबन्धित है। सैनिक छावनी के समयानुसार वास्तु-रचना, सुरक्षा, छावनी के परिमाण, उसकी नगर से स्थिति, आक्रमण के समय सेना की रक्षा की व्यवस्था, कूट और छद्म युद्ध का वर्णन है। चाणक्य के अनुसार कूटयुद्ध के कई उपायों और युक्तियों से बहुत कम सेना और संसाधनों के नाश के शत्रु पर विजय प्राप्त की जाती है। इससे अपनी सेना का मनोबल मजबूत होता और सामने की सेना को उसके ही उपायों से नष्ट किया हटा है। इसमे युद्धयोग्य ऊसर भूमि, पदाति-रथ-अश्व-हस्ति सेना का उल्लेख है। इन सेनाओं के कार्य और महत्ता प्रतिपादित की गयी है साथ ही प्रत्येक सेना की विशेषता का भी निरूपण किया गया है। इस अध्याय मे विभिन्न अवस्थाओं मे उपयोगी विभिन्न प्रकार के व्यूहों का वर्णन है, साथ ही चतुरंगिणी सेना से शत्रु पर कैसे प्रहार किया जाता है उसका भी विस्तृत उल्लेख है।

ग्यारहवाँ अधिकरण

इस अधिकरण का नाम संघवृत्त है और इसमे संगठन का महत्त्व प्रतिपादित किया गया है। मित्रलाभ और सेनालाभ से संघ लाभ को श्रेष्ठ बताया गया है-
संघलाभो दण्डमित्रलाभानुमुत्तम:

चाणक्य ने यह स्थापित करने का प्रयास किया है है कि यदि स्वयं की सेना, सैन्य अधिकारी, राज्याधिकारी- ये सब सब संगठित और जनमानस मे भी देशभक्ति की भावना है तो एक संगठित देश को जितना दूसरे देश के लिए संभव नहीं है, क्योंकि ऐसे देश मे भेद देने वाले नहीं मिलते और सब राज्य का हित सोचते हैं।  इस अध्याय मे अपने राज्य मे संघ की स्थापना और शत्रु देश मे संघ को तोड़ने के विविध उपाय और कारणों की व्याख्या है- यह राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा का सूत्र है।

बारहवाँ अधिकरण

ये अधिकरण आबलीयस नाम से है। अगर कोई राजा युद्ध मे दुर्बल हो रहा हो तो उसे युद्ध मे जीतने के लिए क्या क्या करना चाहिए- ये इस अध्याय का विषय है। इसमे दूत के द्वारा संधि आदि उपाय, मंत्रणा और वाचिक प्रभावों से शत्रु पर प्रभाव डालना, शत्रु सेनापतियों का वध करना, अन्य राजाओं से सहायता लेना, शस्त्र-अग्नि-रसायनों के प्रयोग से शत्रु सेना को नुकसान पहुंचाना, कपटीय उपायों, आकस्मिक आक्रमण के द्वारा विजय प्राप्त करना- आदि विषयों का वर्णन किया गया है।

तेरहवाँ अधिकरण
इस अधिकरण का नाम है- दुर्गलंभोपाय। अर्थात जब शत्रु राजा अपने दुर्ग को घेर ले या अपने द्वारा शत्रु राजा का दुर्ग घेर लिया जाए तो कैसी रणनीति अपनानी चाहिए। इसमे उपजाप विधि के प्रयोग द्वारा शत्रु की सेना मे यह प्रचारित करने का वर्णन है जैसे कि प्रचारित करने वाले पक्ष का राजा दैव-साक्षात्कारी, महान या चमत्कारी हो (औरंगजेब ने ऐसे ही प्रचार कर अपने शत्रुओं को जीता था)। इससे शत्रु राजा और सेना का मनोबल गिर जाता है और मनोबल गिरना ही दुर्ग-पतन का कारण है। इसी अध्याय मे आचार्य ने कपात उपायों द्वारा शत्रु राजा को प्रभावित करने, शत्रु के देश और दुर्ग मे रह रहे अपने गुपचारों से सहयोग लेने, शत्रु के दुर्ग को घेरने से उन्हें संकट मे डालने और विजित देश मे शांति की स्थापना के प्रयासों और आवश्यकता का उल्लेख है।

चौदहवाँ अधिकरण

यह अध्याय औपनिषदिक प्रयोग से संबन्धित है। इसका तात्पर्य है- मरवाना या नष्ट करवाना। रसायनों, औषधियों, मंत्रों और अन्य ऐसे ही युग्म प्रयोगों का वर्णन कर इसमे विरोधी लोगों के एकल या समूहिक नाश के यत्न बताए गए हैं। आचार्य ने इस अध्याय मे अपने आयुर्वेद और रसायनशास्त्र के ज्ञान का भी परिचय दिया है। इन रसायनों का आधुनिक अनुसंधान करके इनके प्रयोगों का पुनर्परीक्षण किया जा सकता है और तात्कालिक ज्ञान के महत्त्व पर शोध किया जा सकता है।

पंद्रहवाँ अधिकरण

यह अध्याय चाणक्य प्रणीत अर्थशास्त्र का अंतिम अध्याय है। इसमे चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र की बत्तीस प्रकार की युक्तियाँ बताई हैं- अधिकरण, विधान, योग, पदार्थ, हेत्वर्थ, उद्देश्य, निर्देश, उपदेश, अपदेश, अतिदेश, प्रदेश, उपमान, अर्थापत्ति, संशय, प्रसंग, विपर्यय, वाक्यशेष, अनुमत, व्याख्यान, निर्वचन, निदर्शन, अपवर्ग, स्वसंग्या, पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष, एकांत, अनागतावेक्षण, अतिक्रांतावेक्षण, नियोग, विकल्प, समुच्चय, उह्य। आचार्य के अनुसार सारा अर्थ शस्त्र इन बत्तीस युक्तियों के प्रयोग के अनुसार वर्णित और विहित है। आचार्य की अनुसार मनुष्य की जीविका ही अर्थ है. मनुष्यों से युक्त भूमि को भी अर्थ कहते हैं। इस प्रकार की भूमि को प्राप्त करने और उसकी रक्षा करने वाले उपायों का निरूपण करने वाला शास्त्र अर्थशास्त्र कहलाता है-

मनुष्याणां वृत्तिरर्थ:, मनुष्यवती भुमिरित्यर्थ:, तस्या: पृथिव्या लाभपालनोपायः शास्त्रमर्थशास्त्रमिति

इस श्रेष्ठ ग्रंथ के कुछ अन्य सर्वोपयोगी बिन्दु इस प्रकार हैं-

विद्या के प्रकार- कौटिल्य ने विद्या को चार भागों मे बांटा है- आन्वीक्षकी, त्रयी, वार्ता और दंडनीति।
आन्वीक्षकी त्रयी वार्ता दंडनीतिषचेति विद्या:। (प्रकरण- वृद्धसंयोग:)
आन्वीक्षकी:- सांख्य, योग और लोकायत दर्शन
त्रयी:- धर्म-अधर्म, वेद-वेदांग, आश्रम-धर्म
वार्ता:- अर्थ-अनर्थ, कृषि, पशुपालन, व्यापार
दंड नीति:- शासन- दु: शासन

वर्तमान शिक्षा प्रणाली के सभी विषय इसमे सम्मिलित हो जाते हैं। दर्शन का समग्र स्वरूप आन्वीक्षकी और त्रयी है। लौकिक विद्याएँ वार्ता हैं। राजनीति, प्रशासन और समाज शास्त्र दंड नीति का भाग हैं।
शिक्षा व्यवस्था:- आचार्य ने शिक्षा को ‘विनय’ कहा है। वर्तमान व्यवस्था के अनुसार शिक्षण दो प्रकार का होता है- औपचारिक और अनौपचारिक। एक बीच का मार्ग निरौपचारिक शिक्षा भी स्थापित किया गया है। चाणक्य ने भी शिक्षा को दो स्वरूप दिये हैं-

कृतक: स्वाभाविकश्च विनय:।
कृतक:- कृत्रिम, नैमित्तिक (औपचारिक)
स्वाभाविक:- स्वतः सिद्ध

आचार्य विद्या प्राप्ति को आजीवन माना है। औपचारिक शिक्षा समाप्त होने के बाद भी शिक्षा आजीवन चलने वाली प्रक्रिया है- ऐसा उनका विचार है। अतः आजीवन शिक्षा प्राप्ति के लिए उन्होनें वरिष्ठ-वृद्ध जनों को संगति को आधार माना है-
अस्य नित्यश्च विद्यवृद्ध संयोगो विनयवृद्धयर्थम तंमुलत्वाद्विनयस्य। (प्रकरण- वृद्धसंयोग:)
बुद्धि का विकास:

आचार्य के अनुसार शास्त्रों के श्रवण, मंथन से बुद्धि का विकास होता है। इससे श्रेष्ठ विषयों मे रुचि जागृत होती है और यौगिक आत्मबल प्राप्त होता है। विद्या का यही परिणाम है।
(प्रकरण- वृद्धसंयोग:) इंद्रियजय:

विद्या और विनय का हेतु चाणक्य ने इंद्रियजय को कहा है। इंद्रियजय से तात्पर्य काम, क्रोध, लोभ, मान,मद, हर्ष के त्याग से तो है ही; चाणक्य के अनुसार शास्त्रों मे विहित कर्मों का सम्पादन ही इंद्रियजय है।

शास्त्रार्थानुष्ठानं वा। कृत्स्नं हि शास्त्रमिदमिन्द्रियजयः। (प्रकरण-3, अध्याय 5)

आचार्य ने प्राचीन उदाहरण देकर स्पष्ट किया है कि शास्त्रों मे विहित कर्मों के विरुद्ध जाने से अनेक योग्य और उच्च स्थानों पर आरूढ़ लोगों का कैसे पतन हो गया। इसके लिए उन्होनें राजा दांडक्य और कराल का काम के कारण, जनमेजय और तालजंघ का क्रोध के कारण, पुरुरवा और अजबिन्दु का लोभ के कारण, रावण का पर-पत्नी हरण और दुर्योधन का अन्याय के कारण, हैहयराज और दम्बोद्भव का अहंकार के कारण, असुर वातापि का हर्ष के कारण, यादवसंघ का कपट के कारण पतन होना बताया है। चाणक्य के अनुसार शास्त्रों की विधि और नीति प्रमाण है, उसके अनुसार जीवन बनाने से ही दूरगामी सफलता मिलती है, जैसे कि इन नीतियों के परिपालन से जामदग्न्य, अंबरीष और नाभाग चिरकाल तक प्रभावी राज रहे।

त्रिवर्ग का संतुलन:

आचार्य कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को जो श्रेष्ठ जीवन यापन करना चाहता है, उसे धर्म-अर्थ-काम इन तीनों का संतुलन से भोग और पालन करना चाहिए। काम के सेवन से अर्थ और धर्म को क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए। सर्वथा सुखरहित जीवन यापन करना भी ठीक नहीं। इस त्रिवर्ग के संतुलन से ही जीवन मे श्रेष्ठता आती है और असंतुलन से ही दु:खों का सृजन होता है-
धर्मार्थाविरोधेन कामंsसेवेत। न निः सुख: स्यात्। समं वा त्रिवर्गमन्योन्यानुबन्धनं। एको ह्यत्यासेवितो धर्मार्थ्कामानामात्मानमितरौ च पीडयति। (प्रकरण-3, अध्याय-6)

वस्तुतः आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य का यह ग्रंथ जीवन प्रबंधन की एक अतुलनीय कृति है जो अनेकानेक आयाम समेटे हुए है। प्रत्येक शासक, अधिकारी और नेतृत्त्व को इसे अवश्य पढ़ना चाहिए और तदनुसार आचरण एवं शासन करना चाहिए. 

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