कांजीवरम साड़ियों की अतिरिक्त चमक का रहस्य क्या है?

Written by गुरुवार, 17 सितम्बर 2020 12:53

मेरे चेन्नै ट्रांसफर के तीन महीने बाद पहली बार माता-पिता मेरे पास आए। यह जनवरी का महीना था। पोंगल के आसपास हमारी कांचीपुरम जाने की योजना बनी। चेन्नै से सड़क मार्ग से कांचीपुरम लगभग 2 घंटे में पहुंचा जा सकता है। मुझे किसी ने बताया था कि गिंडी से कांचीपुरम के लिए बस मिल जाएगी।

गिंडी पहुंचे तो पता चला कि जो बस वहां से चला करती थी, अब कोयंबेदु से चला करती है। कोयंबेदु पहुंचे तो पता चला कि पोंगल के चलते बसों का रूट बदल दिया गया है और हमें कांचीपुरम की बस पूनामल्ली से लेनी होगी। इस तरह से चेन्नै में दिन के तीन-चार घंटे बर्बाद करने के बाद दोपहर में मैं, मां और बाबा कांचीपुरम पहुंचे। यहां बस स्टैंड पर ही हैंडलूम हाउस के एजेंट घूम रहे होते हैं। एक एजेंट ने हमें बताया कि मंदिर का द्वार तीन बजे के बाद खुलेगा और इस समय का सदुपयोग हमें कांजीवरम साड़ी की खरीदारी में करना चाहिए। मैंने पहले ही मां के लिए कांजीवरम खरीदने का मन बना रखा था। उस एजेंट ने जो हैंडलूम हाउस बताया था, एक ऑटो में बैठ हम वहां पहुंचे।

वहां कई साड़ियां देखने के बाद मैंने मां को उनकी पसंद की साड़ी खरीद दी। कांजीवरम साड़ी दरअसल कांचीपुरम की साड़ियों को कहा जाता है। अंग्रेजों ने कांचीपुरम को कोंजीवरम कहा, जो कालांतर में कांजीवरम हो गया। ये साड़ियां तमिलनाडु के कांचीपुरम शहर में ही बनाई जाती हैं। हिंदू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कांजीवरम साड़ी के बुनकरों को महर्षि मार्कंडेय का वंशज माना जाता है, जो कमल के फूल के रेशों से स्वयं देवताओं के लिए वस्त्र बुना करते थे। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार कांजीवरम साड़ियां राजा कृष्णदेव राय के समय से ही अपनी श्रेष्ठ कारीगरी के लिए जाने जानी लगीं। ये साड़ियां अपने गोल्ड और सिल्वर ब्रोकेड, सिल्क एम्ब्रॉयडरी और सुसंपन्न थ्रेड वर्क के लिए जानी जाती हैं।

वहां बातों-बातों में पता चला कि कांजीवरम साड़ी कर्नाटक के उच्च गुणवत्ता वाले मालाबरी रेशम से बनती है। जरी गुजरात से आती है। कांजीवरम सिल्क साड़ियों की बुनाई तकनीक को कोरवई भी कहते हैं। ‘कोरवई’ युद्ध और विजय की तमिल देवी हैं, जिनकी तुलना दुर्गा से की जाती है। कोरवई साड़ी में बॉर्डर और पल्लू एक ही रंग का होता है और ज्यादा चमकीला होता है। कांजीवरम साड़ी में असली सोने-चांदी की जरी से बुनाई होती रही है। एक साड़ी को तैयार करने में हफ्ते से दस दिन लगते हैं। फिल्म निर्देशक प्रियदर्शन ने 2008 में ‘कांचीवरम’ नाम से एक फिल्म बनाई थी, जिसमें कांचीपुरम के बुनकरों की समस्या को दिखाया था। जो बुनकर कांजीवरम साड़ियां बुनते हैं, अक्सर अपने ही परिजनों को यह साड़ी नहीं दे पाते। इस विडंबना को इस फिल्म में दिखाया गया है।

कांजीवरम साड़ियों का साइज भी अलग होता है। जहां एक आम साड़ी की चौड़ाई 45 इंच होती है, वहीं कांजीवरम साड़ी की चौड़ाई 48 इंच रखी जाती है। कांजीवरम साड़ियों में डिजाइन मोटिफ्स मंदिर की स्थापत्य कला या प्रकृति से प्रेरित होते हैं। बतौर डिजाइन इनमें फूल-पत्ती, मोर, सूर्य, चंद्रमा, हंस, रथ और मंदिर के चित्र प्रयोग किए जाते हैं। किसी साड़ी में रामायण या महाभारत की कथा को उकेरा जाता है, तो किसी में राजा रवि वर्मा के चित्रों को। कहते हैं कि साड़ी बनाने की प्रक्रिया में रेशम के धागों को पलार नदी के जल से धोया जाता है जिससे इन साड़ियों में अलहदा चमक आती है। एक असली कांजीवरम का वजन कम से कम 500 ग्राम होता है और दिन भर पहने रहने पर भी यह साड़ी सिकुड़ती नहीं है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे आप साधारण पानी से भी धो सकते हैं।
साड़ी की खरीददारी के बाद हम कामाक्षी अम्मन मंदिर आए। मंदिर का द्वार अभी भी बंद था। मंदिर के बाहर कॉफी शॉप है, जो बंद थी, लेकिन बाहर मेज-कुर्सियां लगी थीं। हम घर से खाना लेकर आए थे। मां और बाबा के साथ मैंने वहीं बैठकर खाना खाया। खाना खाते-खाते तीन बज चुके थे और मंदिर का प्रवेश द्वार खुल गया था। हम भी दर्शन की कतार में लग गए।

(सुलोचना वर्मा)

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