कणेरी मठ की अदभुत जैविक खेती : एक वर्ष में सौ फसलें

Written by सोमवार, 04 जून 2018 07:50

सिद्धगिरि मठ, कनेरी (Siddhagiri Math Kaneri) में पिछले 25-30 वर्षों से जैविक खेती (Organic Farming) की जा रही है। वर्ष 2014 से हमने छोटे-छोटे किसानों को समृद्ध स्वावलंबी और स्वाभिमानी बनाने के लिए एक प्रयोग प्रारंभ किया।

इसके लिए हमने एक आदर्श प्रारूप विकसित किया है जिसे हमने नाम दिया है लखपतिया खेती। इस प्रारूप में हमने एक एकड़ जिसे हमारी स्थानीय बोली में 40 गुंठा बोलते हैं और जिसमें 41000 वर्गफीट जमीन होती है, जमीन पर खेती करने की योजना बनाई। इसी जमीन पर किसान का घर भी होगा। उसमें ही दो गाय के लिए एक गौशाला भी होगी। इसमें एक शौचालय और गोबर गैस संयंत्र भी होगा। इस गोबर गैस संयंत्र से ही किसान को रसोई गैस मिलेगी। उसके घर में सोलर ऊर्जा के द्वारा विद्युत प्रकाश किया जाएगा। कपड़े, जूते, नमक, माचिस, साबुन जैसी वस्तुओं के अलावा उसे कुछ भी खरीदना न पड़े, इसकी व्यवस्था की गई है।

इसके लिए इस प्रारूप में हम एक वर्ष में इतनी ही भूमि में सौ फसलें लेते हैं। देखा जाए तो मेड़ पर लगे पेड़ों को मिला कर 180 से अधिक वनस्पतियां इस खेत में होती हैं, परंतु फसलें सौ के लगभग ली जाती हैं। इस खेत में खेती के लिए खाद, बीज और कीटनाशक खरीदना नहीं होता (Chemical Free Farming)। खेत में काम करने के लिए मजदूर नहीं लगाए जाते। उस खेत के मालिक किसान के घर का किसी भी व्यक्ति को आजीविका के लिए कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं होगी। उस खेत में लगभग 40 से अधिक प्रकार की सब्जियां उपजाई जाइंगी। इनमें दस प्रकार के प्याज, लहसुन, शकरकंद, आलू, गाजर, चुकुंदर आदि कंदवर्गीय, दस प्रकार के मेथी, धनिया, पुदिना, पालक, चौलाई आदि पर्णवर्गीय, दस प्रकार के मिर्च, बैंगन, टमाटर, भिंडी, ग्वार आदि फलवर्गीय तथा कद्दू, लौकी, करेला, तोरई आदि लतावर्गीय सब्जियां शामिल हैं।

इनके अलावा मोटे अनाज, छोटे अनाज, तिलहन, दलहन सभी थोड़ी-थोड़ी मात्रा में उपजाए जाते हैं। इससे उस किसान को खाने के लिए कुछ भी खरीदना नहीं पड़ेगा। दस गुंठा यानी एक चौथाई खेत में गन्ना लगाया जाता है। इससे आठ से नौ हजार गन्ना होता है यानी 25 से 30 टन। इससे वर्ष के अंत में स्थानीय मूल्य के अनुसार किसान को 80 से 90 हजार रुपये की आय हो जाती है। इसके अलावा थोड़े से इलाके में गाय का चारा भी लगाया जाता है। ये सारी फसलें मिश्रित खेती के तहत लगाई जाती हैं। एक फसल ऊपर लगती है तो नीचे दूसरी फसल लगी होती है। जैसे बैंगन या मिर्च के थोड़े बड़े होने पर उसमें पालक जैसे पत्तों वाली फसल लगा दी जाती है। पत्तों वाली फसल हो जाने के बाद बैंगन या मिर्च होने लगेगा। इसी प्रकार गन्ने के साथ भी मिश्रित फसल लगाई जाती है।

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इसमें फूलों की भी खेती की जाती है। मेड़ों पर भी फलदार वृक्ष लगाए गए हैं। चंदन और सागौन जैसे पेड़ भी लगाए गए हैं ताकि बच्चों के बड़े होने पर विवाह, शिक्षा आदि पर होने वाले मोटे खर्चों की व्यवस्था हो सके। ये पेड़ एक प्रकार के फिक्स डिपॉजिट हैं जिनसे एकदम से 10 लेकर बीस लाख रूपयों तक की आय हो जाएगी। किसान के प्रतिदिन के भोजनादि के बाद भी प्रत्येक दिन 300 से 400 रुपयों की सब्जी और फूल की बिक्री होती है। इससे दैनंदिन खर्चों के लिए भी व्यवस्था हो जाती है। इस प्रकार सभी खर्चे करने के बाद भी इस एक एकड़ की खेती से किसान को दो से तीन लाख रूपयों की आय हो जाती है।

इस खेती में लागत कुछ नहीं आती। खेती के लिए आवश्यक खाद गाय को गोबर से बनाया जाता है। कीटनियंत्रक आदि भी गौमूत्र से खेत पर ही बनाया जाता है। इसमें प्रत्येक दिन 20 हजार लीटर पानी की आवश्यकता पड़ती है। यह प्रारूप सिंचित भूमि का है, सूखे इलाके का नहीं। इस प्रारूप को देख कर आसपास के कई किसानों ने इस तरीके को अपनाया है। हालांकि सभी पूरी तरह नहीं अपना पा रहे, परंतु उन्होंने 20-30 फसलें लेना प्रारंभ कर दिया है। पहले यही किसान एक ही फसल लगाते थे और यदि किसी कारण वह फसल बर्बाद हो जाती थी, तो वह किसान बर्बाद हो जाता था। उदाहरण के लिए गन्ने की दो पंक्तियों में थोड़ा अंतर रख कर उसमें दूसरी फसल लगाने से कोई एक फसल तो मिल ही जाएगी। मिश्रित खेती करने के पीछे विज्ञान भी है। एक फसल मिट्टी में जो तत्व छोड़ती है, वह दूसरे फसल का भोजन होता है। इस प्रकार मिट्टी में पोषक पदार्थों का चक्र संतुलित बना रहता है और उसकी उत्पादकता कभी भी कम नहीं होती। इसके अतिरिक्त यदि दोनों फसलें ठीक हुईं तो आय दुगुनी हो जाती है।

एक प्रारूप को विकसित करने के बाद किसानों के लिए प्रशिक्षण की भी व्यवस्था की गई है। वर्ष में छह बार दो दिनों का प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया जाता है। उसमें एक दिन सिद्धांत सिखाया जाता है और दूसरे दिन प्रयोगों का व्यावहारिक प्रदर्शन किया जाता है। उर्वरक कैसे बनाएं, ग्रोथ प्रोमोटर कैसे बनाएं, कीटनियंत्रक कैसे बनाएं, इस सभी को प्रत्यक्ष दिखाया जाता है। यह योजना सिंचित भूमि के लिए है। अब हम सूखे क्षेत्र के लिए भी एक प्रारूप विकसित करने पर विचार कर रहे हैं। दस कुंठा यानी चौथाई एकड़ भूमि के लिए हजार-डेढ़ हजार लीटर पानी भी हो तो उसके लिए शेडनेट बना कर सब्जियों की खेती करने की योजना बनाई जा रही है। इससे एक एकड़ के समान सब्जियां केवल चौथाई एकड़ से लेना संभव हो पाएगा। इसमें हम बूँद-बूँद सिंचाई जैसे अत्याधुनिक सिंचाई के तरीकों का प्रयोग कर रहे हैं।

इस योजना के तहत हमने 14 किसानों को 5-5 गुंठे जमीन देकर इसका प्रयोग प्रारंभ किया है। हमने यह योजना बनाई है कि उनकी सब्जियां मठ ही क्रय कर लेगा। फिर उन सब्जियों के लिए कोल्हापुर शहर में हमने स्थायी ग्राहक बनाए हैं। उनसे वर्षभर का अनुबंध किया गया है। सब्जियों का मूल्य किसानों और ग्राहकों दोनों से तय कर लिया गया है। यदि सब्जी का मूल्य कभी बाजार में कम भी हो तो भी किसान को तय दर से ही मूल्य दिया जाता है। इसी प्रकार उसका मूल्य अधिक भी हो तो भी किसान को या ग्राहक को भी उसी निर्धारित मूल्य पर ही दिया जाता है। किसान और ग्राहक के दर में न्यूनतम अंतर रखा गया है।

देश में और भी ढेर सारे लोग ऐसे प्रयोग कर रहे हैं। वे अलग-अलग नाम भी प्रयोग करते हैं। कोई जैविक खेती बोलते हैं, कोई प्राकृतिक खेती कहते हैं, कोई नैसर्गिक बोलते हैं, कोई अध्यात्म कृषि कहते हैं, कोई ऋषि कृषि कहते हैं। ऐसे ढेर सारे नाम हैं। नाम कुछ भी हो, रसायनमुक्त खेती हो तो सब ठीक है। अब सरकार भी इस पर ध्यान देने लगी है। पहले की सरकारें गाय की बात ही नहीं करती थी। जैविक खेती की भी बात नहीं होती थी। आज इन पर सरकार चर्चा करने लगी है। यह अच्छा है। इसके कारण हमारे क्षेत्र में गायों की संख्या में लगभग लाख-सवा लाख की वृद्धि हुई है।

खुशी की बात यह है कि ये गायेंं गौशालाओं में नहीं हैं, किसानों के घरों में हैं। गौशालाओँ में गायों की संख्या बढऩा स्वस्थ समाज के लक्षण नहीं हैं। स्वस्थ समाज में गाय का मूल स्थान है किसान का घर। हम इस काम में भी जुटे हुए हैं। इसके लिए हम प्रति वर्ष सौ गाँवों की पदयात्रा करते हैं। पदयात्रा में किसानों को गाय और जैविक खेती का महत्व समझाते हैं। पंचगव्य की आवश्यकता भी लोगों को समझाई जाती है। लोग अब समझने भी लगे हैं। रासायनिक खेती के दुष्परिणाम अब लोगों को समझ में आने लगे हैं और वे जैविक खेती को अच्छा मानने लगे हैं। आने वाला समय रसायनमुक्त जैविक खेती का ही है। 

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साभार : भारतीय धरोहर

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