कमल हासन :- वामपंथ-चर्च का एक भ्रमित राजनैतिक मोहरा

Written by शुक्रवार, 23 फरवरी 2018 07:35

जयललिता की मृत्यु के बाद से दक्षिण भारत की राजनीति खासकर तमिलनाडु में जो एक बड़ा सा शून्य बन गया है, उसे भरने के लिए लगभग सभी पार्टियाँ अपनी कमर कसने लगी हैं.

पहले मेगा स्टार रजनीकांत (Rajnikanth Political Party) ने राजनीति में कदम रखने की घोषणा की और अब हाल ही में कमल हासन (Kamal Hassan) ने दक्षिण भारत की राजनीति में कदम रखने की घोषणा करते हुए अपनी एक पार्टी का गठन किया है जिसका नाम उन्होंने रखा है “मक्कल नीधि मय्यम” (Makkal Needhi Maiam) (अर्थात प्रजातांत्रिक न्याय पार्टी या कहें पीपुल्स जस्टिस पार्टी). भारत में संविधान के अंतर्गत हर व्यक्ति को अपनी राजनैतिक पार्टी बनाने का अधिकार है, लेकिन आईये देखते हैं कि आखिर कमल हासन का भविष्य अंधकारमय क्यों है? और एक राजनैतिक पार्टी बनाने का उनका टाईमिंग कैसे चूक गया है....

 

rajini kamal

पिछली मई में अर्थात अब से लगभग दस माह पहले ही कमल हासन ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया था कि “राजनीति में प्रवेश करने के लिए यह सही समय नहीं है..”. वास्तव में यह बात कमल हासन ने अपने भावी प्रतिद्वंद्वी अर्थात रजनीकांत को हतोत्साहित करने के लिए कही थी. जब तक जयललिता जीवित थीं, तब तक कमल हासन और रजनीकांत दोनों की ही राजनीति में उतरने की हिम्मत नहीं थी और उन्होंने इस बारे में सोचा भी नहीं था. रजनीकांत ने तो खैर अभी तक अपने राजनैतिक पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन कमल हासन ने बार-बार यह साबित किया है कि वह “हिन्दू-विरोधी” है. मजे की बात यह है कि दक्षिण की राजनीति में वामपंथ और चर्च की प्रमुख भूमिका को देखते हुए कमल हासन अपने भगवा-विरोध के चक्कर में ये भी भूल गए कि पाँच साल पहले जब उनकी फिल्म “विश्वरूपम” का मुसलमानों ने हिंसक विरोध किया था, उस समय ये भारत छोड़ने की बात करने लगे थे. बाद में हासन ने उस फिल्म में मुसलमानों की इच्छा के अनुरूप बदलाव किए और जयललिता की मेहरबानी से फिल्म रिलीज़ हुई. पिछले वर्ष अर्थात जून 2017 तक कमल हासन राजनीति में उतरने के अपने निर्णय को लेकर आगे-पीछे हो रहे थे. कभी वे जयललिता को कोसते, तो कभी करूणानिधि को गरियाते... ताकि बैलेंस बना रहे.

अब जबकि जयललिता की मृत्यु हो चुकी है और करुणानिधि की भी चलाचली की बेला निकट ही है, दोनों पार्टियों के भ्रष्टाचार से तमिलनाडु की जनता त्रस्त हो चुकी है और किसी तीसरे विकल्प की तरफ देख रही है. तमिलनाडु में मिशनरी शक्तियाँ बहुत मजबूत हैं, इसलिए शायद कमल हासन को लगा कि यही सही वक्त है राजनीति में कूदने का. रजनीकांत और मोदी की बढ़ती "केमिस्ट्री" के कारण कमल हासन ने अपनी राजनीति को “हिन्दू विरोध” और दक्षिण भारत की उपेक्षा इन दो मुद्दों पर केंद्रित रखने का फैसला किया है. तमिलनाडु में जिस तरह जातिवादी राजनीति हावी है, उसे देखते हुए कमल हासन की राह बहुत मुश्किल है. पिछले दो वर्षों में तमिलनाडु में अस्सी से अधिक “ऑनर किलिंग” के मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें से दस हत्याएं तो कमल हासन के गृह जिले में ही हुई हैं. ऐसे में कमल हासन जैसा नौसिखिया निश्चित ही वामपंथियों और चर्च के हाथों में खेलकर समाज का तानाबाना और बिगाड़ेगा. तमिलनाडु की राजनीति “करिश्मा” आधारित होती है, चाहे MGR हों, करुणानिधि हों या जयललिता हों... वहाँ केवल करिश्मा और “गरीबों को मुफ्त बाँटों” वाली योजनाएँ ही चलती हैं. कमल हासन “अम्मा इडली” जैसी योजना तो चला लेंगे, लेकिन रजनीकांत जैसा “करिश्मा” नहीं ला पाएँगे.... इसलिए अंततः उनकी सीधी टक्कर रजनीकांत से ही होगी, जो चुपचाप सारे मामले पर निगाह बनाए हुए हैं. कमल हसन ने “हिन्दू आतंकवाद” शब्द को हवा देकर चर्च को पहले ही खुश कर दिया है, तथा पार्टी के “लॉंचिंग समारोह” में ठेठ दिल्ली से गुंडों के सरताज अरविन्द केजरीवाल भी पहुँचे, तभी से लोगों को यह खेल समझ में आने लगा है. पचास वर्षों के द्रविड़ पार्टियों के लगातार शासन से ऊबे हुए तमिलनाडु को दुष्चक्र से बाहर निकालना कम से कम कमल हासन के लिए संभव नहीं लगता.

कहने का तात्पर्य यह है कि कमल हासन की पार्टी का चिन्ह (जिसमें छः हाथ और एक तारा है, इसमें सफ़ेद रंग चर्च का, लाल रंग वामपंथ का और काला रंग नक्सल का है) स्पष्ट करता है कि वामपंथी-चर्च और नौसिखिया कमल हासन ये तीनों मिलकर दक्षिण भारत के छः राज्यों (केरल, कर्णाटक, तमिलनाडु, पांडिचेरी, तेलंगाना और आंध्रप्रदेश) का एक “दबाव समूह” बनाने (ताकि उत्तर-दक्षिण के बीच की खाई को और चौड़ा किया जा सके) की कवायद कर रहे हैं. इस बारे में कमल हासन के हालिया बयान भी बेहद आपत्तिजनक हैं... परन्तु यह राजनीति अंततः इस हीरो को, “देश तोड़ने वाली खलनायक ताकतों” के हाथों का खिलौना बना देंगी. तमिल राजनीति में कमल हासन थोड़ी-बहुत हलचल तो पैदा कर लेंगे, परन्तु वास्तव में उन्हें वहाँ की जमीनी हकीकत का कतई अंदाजा नहीं है... अभी तो खुद उनके ही तमिलनाडु में स्थापित होने की कोई गारंटी नहीं है और ये साहब छः राज्यों का “अलग संघ” बनाने का सपना देख रहे हैं. मजे की बात ये कि यह हालत तब है, जबकि उनके सामने रजनीकांत और नरेंद्र मोदी की कड़ी चुनौती पेश होने वाली है. बहरहाल तमिलनाडु में अब जयललिता-करुणानिधि का युग समाप्त हुआ, अगले बीस वर्ष रजनीकांत-कमल हासन युग वाले होंगे. 

ये लेख भी पढ़ें... 

१) दक्षिण भारत की द्रविड़ पार्टियां चर्च के मोहरे... :- http://desicnn.com/news/kanchipuram-rail-station-vandalized-by-vck-organization-which-is-church-stooge-only 

२) तमिलनाडु के दलित ईसाई ;- http://desicnn.com/blog/dalit-christians-in-tamilnadu 

Read 2751 times Last modified on शुक्रवार, 23 फरवरी 2018 07:59