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ना जिन्ना सेक्यूलर थे, ना पाकिस्तान का निर्माण आकस्मिक

Written by सोमवार, 17 जुलाई 2017 19:24

कुछ झूठ ऐसे होते हैं, जो लम्बे समय तक सच मान लिए जाते हैं. इन्हीं में से एक झूठ यह है कि मोहम्मद अली जिन्ना “सेक्यूलर” थे और 1947 से पहले गांधी-नेहरू के साथ हुए सत्ता एवं शक्ति संघर्ष की राजनीति में हारने के कारण जिन्ना ने पाकिस्तान के निर्माण का दाँव चला. लेकिन यह सच नहीं है, “पाकिस्तान” नामक इस्लामिक शरिया देश की कल्पना 1947 से बहुत-बहुत पहले अर्थात 1937 में ही रखी जा चुकी थी.

विभाजन को लेकर इस समय भारत में तीन विचार हैं, पहला विचार यह है कि गाँधी-नेहरू ने अपनी जिद और सत्ता-प्रेम के कारण भारत के टुकड़े होने दिए... दूसरा विचार यह है कि जिन्ना को इतना उपेक्षित और आहत कर दिया गया था कि उन्होंने अपने अहंकार में आकर, एक इस्लामिक देश यानी पाकिस्तान बनाने की जिद पकड़ ली.... जबकि तीसरा विचार यह है कि हिन्दू महासभा तथा सावरकर जैसे कट्टर हिन्दू नेताओं के (जो कि मुस्लिमों को भारत से खदेड़ना चाहते थे) रुख के कारण पाकिस्तान का निर्माण हुआ.

उपरोक्त तीनों विचारों में से पहला विचार काफी हद तक सही माना जाता है, जबकि दूसरा विचार एकदम झूठा और मुस्लिमों तथा जिन्ना की वास्तविक नीयत और छवि छिपाने के लिए किया गया “एजेंडात्मक दुष्प्रचार” है... जबकि सावरकर संबंधी तीसरा विचार बढ़चढ़कर पेश किया गया है, क्योंकि उन दिनों हिन्दू महासभा अथवा सावरकर कभी भी इतने शक्तिशाली नहीं थे कि वे देश में “हिन्दू शासन” स्थापित कर पाते या मुस्लिमों को भारत से निकाल पाते. असल में प्रस्तुत लेख उस दूसरे विचार (अर्थात जिन्ना को गाँधी-नेहरू ने अपमानित और उपेक्षित किया इसलिए पाकिस्तान बना) की धज्जियाँ उड़ाने के लिए तथ्य पेश करता है. उस समय भी और आज भी वास्तविकता यह है कि मुस्लिमों को हमेशा एक ऐसा “देश” चाहिए होता है, जहाँ वे सदैव बहुमत में रहें. मुस्लिम कभी भी, कहीं भी अल्पसंख्यक नहीं रहना चाहता, वह केवल शरीयत आधारित इस्लामिक राष्ट्र चाहता है. सुनने में शायद यह अतिवादी लगे, परन्तु सच यही है और इसी सच का पूरा तथ्यानुसार एवं विवरणात्मक विश्लेषण पेश किया है लेखक वेंकट धुलिपाला ने अपनी नई अंगरेजी पुस्तक “क्रिएटिंग अ न्यू मदीना”” (Creating a New Medina… कैम्ब्रिज विवि प्रेस, पृष्ठ 530) में.

असल में “इस्लाम के मूलभूत विचारों से अनजान” लोग मोहम्मद अली जिन्ना को टाई-सूट पहनने वाला, सिगार और चुरुट पीने वाला, सूअर का माँस खाने वाला एक पढ़ा-लिखा मुस्लिम समझते हैं. परन्तु 1930 में जिस समय पाकिस्तान का नामोनिशान तक नहीं था, उस समय भी जिन्ना एक ऐसे देश के बारे में बातें करते थे, जो “इस्लामिक पुनर्जागरण” का केंद्र बनेगा. 1938 में मुम्बई के एक अधिवेशन में सबसे पहली बार पाकिस्तान का झंडा प्रदर्शित किया गया. उस समय जिन्ना ने घोषणा की थी कि यह इस्लामी परचम हमें खुदा-रसूल ने दिया है. इसके तीन वर्ष बाद 1942 में एक और सम्मेलन में जिन्ना ने सरेआम कहा था कि “..पाकिस्तान नामक देश बनना जरूरी है और, यह इस्लामिक दुनिया के लिए सफलता की कुंजी है..”. जिन्ना को सेक्यूलर मानने और समझने वाले लोगों ने उनका यह बयान भी भुला दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान बने बगैर अगर भारत स्वतन्त्र हो भी गया, तब भी यहाँ मुस्लिमों को कोई अधिकार मिलने वाले नहीं हैं... हिन्दू बहुसंख्यक समुदाय उन्हें हमेशा दबाकर रखेगा और उनका शोषण करेगा..”. दुनिया गवाह है कि भारत में मुस्लिमों को कितने लोकतान्त्रिक अधिकार मिले हुए हैं, और अल्पसंख्यक के नाम पर कितने विशेषाधिकार एवं छूट मिली हुई है. ज़ाहिर है कि जिन्ना के अंदर छिपा बैठा कट्टर मुस्लिम, भारत की संस्कृति और हिन्दू उदार मानसिकता को कभी समझ ही नहीं पाया. इसीलिए जब 2005 में आडवाणी पाकिस्तान गए और वहाँ उन्होंने जिन्ना को सेक्यूलर होने का तमगा प्रदान किया, तभी भारत की जनता ने समझ लिया था कि उन्होंने “दिल्ली के लुटियन झोन” और “नकली सेक्यूलरिज्म बुद्धिजीविता” के समक्ष हार मान ली है. बहरहाल, लेख का मूल विषय यह नहीं है... मूल विषय है जिन्ना की असलियत और इस्लाम की विस्तारवादी मानसिकता को समझना.

Gandhi Jinnah 1944

वेंकट धुलीपाला (जो कि वर्तमान में उत्तर कैरोलिना के एक विवि में इतिहास पढ़ाते हैं) की पुस्तक इसे परत-दर-परत हमारे सामने खोलती है. धुलीपाला का स्पष्ट मानना है कि पाकिस्तान के निर्माण का विचार कोई “अचानक उपजा हुआ” विचार नहीं था, ना ही इसका जिन्ना के अपमान और उपेक्षा से कोई लेना-देना है, क्योंकि 1930 के आसपास जिन्ना इतने महत्त्वपूर्ण नेता थे ही नहीं कि गाँधी उन्हें उपेक्षित या अपमानित करें. असल में जिन्ना द्वारा पाकिस्तान का निर्माण एक सुनिश्चित इस्लामी विचारधारा के तहत सोच-समझकर किया गया. इसमें गड़बड़ यह हुई कि जिन्ना के मन में जो पाकिस्तान की कल्पना थी, उसमें वर्तमान उत्तरप्रदेश का एक बड़ा हिस्सा भी शामिल था, जो उन्हें मिल नहीं सका. असल में जिन्ना के दिमाग में वर्तमान यूपी ही एक “इस्लामिक स्टेट” की शुरुआत के रूप में था, परन्तु उस समय आंबेडकर ने जिन्ना के मंसूबों पर पानी फेरने में बड़ी भूमिका निभाई. संक्षेप में कहें तो देवबंद के कई प्रमुख मौलाना, जैसे मौलाना शब्बीर अहमद उस्मानी जो कि जमीयत-उलेमा-ए-इस्लाम के संस्थापक थे... मौलाना अशरफ अली थानावी और अब्दुल अला मौदूदी सभी लोग जिन्ना के इस विचार के समर्थन में कूद पड़े थे, और जिसे तेजी से हवा दी तत्कालीन शायर मोहम्मद अल्लामा इकबाल ने. एक मौलाना थे हुसैन अहमद मदनी जो कि कांग्रेस के साथ थे और लगातार एक “मुत्तहिदा कौमियत” (अर्थात संयुक्त देश) की वकालत करते रहे, लेकिन वे अलग-थलग पद चुके थे और जिन्ना तथा देवबंदी मौलानाओं ने इस्लाम के मूलभूत विचार अर्थात “बहुसंख्यक पाकिस्तान देश” की अवधारणा को हाथोंहाथ लपक लिया था.

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वेंकट धुलीपाला की पुस्तक का तीसरा अध्याय बेहद रोचक है, क्योंकि इस अध्याय में धुलीपाला बाकायदा तथ्यों एवं बयानों के आधार पर डॉक्टर भीमराव आंबेडकर को एक लगभग सावरकर के समकक्ष “कट्टर हिंदूवादी” के रूप में चित्रित करते हैं. वेंकट के अनुसार बाबासाहेब शुरू से ही जिन्ना के इस विचार से सहमत थे कि मुस्लिमों को हिन्दुओं से अलग होकर एक नया देश बनाना चाहिए, आंबेडकर का स्पष्ट मानना था कि हिन्दू और मुस्लिम कभी भी सह-अस्तित्त्व की भावना से साथ-साथ नहीं रह सकते. इसलिए बाबासाहेब ने जिन्ना के इस विचार का केवल समर्थन भर नहीं किया, बल्कि अपनी पुस्तक “थॉट्स ऑन पाकिस्तान” में बाकायदा हिन्दुओं को यह नसीहत भी दी कि देश का विभाजन उनके हित में है, क्योंकि यदि मुसलमानों से युक्त यह देश अगर एक विशाल संयुक्त भारत बना तो इसे शासित करना असंभव हो जाएगा, और आगे चलकर मुस्लिम बहुल देश के रूप में यह “एशिया का रोगी” कहलाएगा. जब जिन्ना ने पाकिस्तान के अपने विचार पर ज़हर उगलते हुए देश के हर संसाधन में पचास प्रतिशत की हिस्सेदारी माँगनी शुरू की तो सबसे पहले गाँधी ने नहीं, बल्कि आंबेडकर ने जिन्ना की कठोरतम आलोचना की. आंबेडकर ने खुलेआम जिन्ना की आलोचना करते हुए लिखा कि, “अब जिन्ना जैसे लोग हिटलर की भाषा बोलने लगे हैं..” आंबेडकर ने हिंदुओं को चेतावनी देते हुए कहा है कि हिंदुओं को पाकिस्तान के निर्माण के प्रति भावनात्मक रूप से नहीं सोचना चाहिए, क्योंकि उन्हें यह सच्चाई स्वीकार कर लेनी चाहिए कि मुस्लिम लोग हिंदुओं को “काफिर” के रूप में देखते हैं और वे काफिरों की रक्षा नहीं करते, बल्कि उत्पीड़न करते हैं..”.

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विभाजन के बाद भी आंबेडकर ने सरेआम स्वीकार किया कि यदि उन्हें पाकिस्तान के निर्माता के रूप में जाना जाता है तो वे प्रसन्न होंगे, क्योंकि अच्छा हुआ जो भारत ने एक अलग पाकिस्तान का निर्माण कर दिया... अब एक स्वतन्त्र भारत अच्छे से सभी क्षेत्रों में तरक्की कर सकेगा... ईश्वर ने अब भारत का भाग्य अच्छे से लिख दिया है, मुस्लिम बहुसंख्यक भय से मुक्त भारत निश्चित रूप से एकजुट, महान और समृद्ध बनेगा...”. वेंकट धुलीपाला की पुस्तक का नाम एकदम स्पष्ट है... “एक मदीना का निर्माण”. उल्लेखनीय है कि जब पैगम्बर मोहम्मद को जब मक्का में भारी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, तो उन्होंने मदीना को अपना “टेम्परेरी अभ्यारण्य” बना लिया था... पाकिस्तान का निर्माण भी कुछ ऐसा ही है. यह जिन्ना की सनक या किसी तात्कालिक कारणों का नहीं, बल्कि इस्लाम नामक राजनैतिक पंथ का नतीजा है. वेंकट धुलीपाला के शोध के बिन्दुवार संक्षेप में नतीजे इस प्रकार हैं.

१) दुनिया भर में मुस्लिम कहीं भी “अल्पसंख्यक” के रूप में रहना पसंद नहीं करते हैं, वे केवल इस्लामिक यानी शरिया शासन के अंतर्गत रहना पसंद करते हैं.

२) मुस्लिमों को सभी देशों में “समानता” वाले क़ानून से घृणा है. वे इस्लाम को “एक अलग विशेषाधिकार” के रूप में देखते हैं, इसीलिए समान नागरिक संहिता को लेकर वे सदैव नकारात्मक रहते हैं. वंदेमातरम का विरोध करना हो, योग का विरोध हो अथवा देश के संविधान को सर्वोपरि मानना हो... मौलवियों की निगाह में इन सभी को “शिर्क” (गैर-इस्लामिक) माना जाता है.

३) 1930 से 1940 के बीच उत्तरप्रदेश के बड़े भाग में अधिकाँश मुस्लिमों का मानना था कि दुनिया भर के मुस्लिमों को एक झण्डे तले लाने का काम एक “खलीफा” द्वारा किया जाना चाहिए. गाँधी द्वारा खिलाफत आंदोलन को समर्थन देने का कारण भी यही था. ISIS के खलीफा को मिलने वाला समर्थन भी आज कहीं न कहीं मुस्लिमों के मन की थाह बताता है.

४) पूर्ण बहुमत या पूर्ण सत्ता प्राप्त होने तक “मदीना” को एक तात्कालिक शरणस्थली बनाने की मानसिकता आज भी मौजूद है, जिसका उदाहरण है कश्मीर. जैसे ही कश्मीर में अलगाववादी तत्वों ने पैर पसारना आरम्भ किए, उन्होंने सबसे पहले कश्मीरी पंडितों को वहाँ से खदेड़ दिया. इसी प्रकार आज पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की शह पर कई जिले मुस्लिम बहुल बन चुके हैं, क्योंकि यह भी उनके लिए “टेम्परेरी मदीना” ही है, क्योंकि उधर बांग्लादेश में शेख हसीना ने कट्टर इस्लामी तत्वों पर जबरदस्त आक्रमण किया हुआ है और वे चुनचुनकर 1971 के दोषी मुल्ला-मौलवियों को फाँसी पर चढ़ा रही है.

५) चाहे असम का बदरुद्दीन अजमल हो, या हैदराबाद के ओवैसी हों... रामपुर के आज़म खान हों, काँग्रेस और क्षेत्रीय दलों ने ऐसे छोटे-छोटे जिन्नाओं को शरण देकर उनका कद बढ़ाया. ये सभी भारत के अंदर अपने-अपने “टेम्परेरी मदीना” के निर्माण में लगे हुए हैं. पाकिस्तान और बांग्लादेश में बड़े ही “व्यवस्थित” तरीके से हिंदुओं के खात्मे, जबरन धर्मान्तरण और उत्पीडन को देखते हुए 1947 से पहले आंबेडकर ने हिंदुओं को जो सलाह दी थी कि “मुस्लिमों को जाने दो, अलग देश बनाने दो”, वह आज सही लगता है.

कहने का तात्पर्य यह है कि वेंकट धुलीपाला की यह पुस्तक सभी को पढ़नी चाहिए ताकि वह सही स्वरूप में भारत के विभाजन, तात्कालिक गतिविधियाँ, जिन्ना को सेकुलर समझने की भूल, मुस्लिम राजनीति और विस्तारवादी मानसिकता इत्यादि को ठीक से समझ सके.

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मूल लेख : आर. जगन्नाथन... Swarajyamag.com 

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