वामपंथ के निशाने पर : ईशा फाउन्डेशन और जग्गी वासुदेव

Written by गुरुवार, 23 फरवरी 2017 13:13

इस महाशिवरात्रि पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तमिलनाडु के कोयम्बटूर में ईशा फाउन्डेशन के तत्वावधान में आदियोगी श्री जग्गी वासुदेव के साथ 112 फुट ऊँचे शिवमूर्ति का लोकार्पण करेंगे.

इस खबर में हिंदुओं के लिए सामान्य रूप से खुश होने के अलावा ऐसी कोई विशेष बात नहीं है, कई भगवानों की ऐसी विशाल मूर्तियाँ देश भर में आए दिन लोकार्पित होती रहती हैं. फिर भी वामपंथ पोषित बुद्धिजीवियों, उनके पालतू संगठनों तथा भीषण ईसाई धर्मांतरण से ग्रस्त तमिलनाडु में कई लोगों के पेट में दर्द और वैचारिक उल्टियाँ शुरू हो गई हैं. असल में वामपंथ-चर्च के इस ठगबंधन को 16 मई 2014 से ही नरेंद्र मोदी नामक व्यक्ति से दिक्कत रही है. नरेंद्र मोदी कुछ भी करें, उसकी आलोचना करना ही उनका “वाम-पंथ” और विचार है.

लेकिन इस बार की बेचैनी इससे कहीं अधिक है. उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ ही वर्षों में आदियोगी जग्गी वासुदेव प्रवर्तित ईशा फाउन्डेशन वैचारिक जगत में एक विशेष स्थान बना चुका है. गुरुदेव जग्गी के व्याख्यानों और उनके तर्कसंगत, चुटीले एवं हास्यप्रधान लहजे ने न सिर्फ उनके भक्तों को जमकर आकर्षित किया है, बल्कि भारत के लगभग एकपक्षीय मीडिया के कई दिग्गजों तथा स्वघोषित बुद्धिजीवियों को साफ़-साफ़ धराशायी कर दिया है. ऐसे में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, ईशा फाउन्डेशन के कार्यक्रम में आएँ, एक विशाल शिवमूर्ति का लोकार्पण करें और वह भी मिशनरी से भरे पड़े तमिलनाडु जैसे इलाके में... तो स्वाभाविक ही है कि इस “गिरोह” की बेचैनी बढ़नी ही थी. यह भी स्वाभाविक है कि इस गिरोह के बुद्धिजीवियों को चेन्नई में बनने वाले विशालकाय चर्चों से कभी कोई आपत्ति नहीं हुई.

 

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इस “गिरोह” की कार्यशैली अब इतनी परिचित किस्म की हो चुकी है, कि काफी लोग इनकी चालबाजियों और लफ्फाजियों को समझने लगे हैं, फिर भी देश में एक बहुत बड़ा वर्ग अभी भी ऐसा है, जो इनके शाब्दिक जाल और “खुद को पीड़ित दर्शाने” वाली नौटंकी में फँस ही जाता है. नरेंद्र मोदी और राष्ट्रवाद की राह में टांग अड़ाने की इनकी यही शैली तमिलनाडु में भी देखी जा रही है, आईये संक्षेप में देखते हैं कि इस “वैचारिक गिरोह” की कार्यशैली क्या है....

विदेशों से पैसा प्राप्त मिशनरी और माँ-बाप तथा सरकार के पैसों पर ऐश करने वाले तथा अधेडावस्था की आयु तक “छात्र” ही बने घूम रहे JNU छाप वामपंथी कार्यकर्ता इस गिरोह का असली माल हैं. पिछले साठ वर्षों में काँग्रेस की अप्रत्यक्ष मदद से खड़े किए गए तमाम संगठन, संस्थाएँ, NGOs और जमाने भर के फर्जी इस गिरोह ने खड़े कर रखे हैं, जिनकी मदद से इन अभियानों को अंजाम दिया जाता है. जग्गी वासुदेव 2012 से ही इस गिरोह के निशाने पर आ गए थे, जब तमिलनाडु के किसी “आदिवासी संगठन” (चर्च पोषित) ने कोयम्बटूर के बाहरी इलाके में बन रहे जग्गी गुरु के आश्रम के खिलाफ आपत्तियाँ दर्ज कीं. इस “वैचारिक गिरोह” द्वारा जानबूझकर ऐसे नामालूम से संगठन और NGOs खड़े किए जाते हैं और उन्हीं के कंधे पर बन्दूक रखकर हमला किया जाता है. तो इस कथित आदिवासी संगठन ने यह आपत्ति दर्ज करवाई कि जग्गी गुरुदेव के आश्रम से पर्यावरण को नुक्सान पहुँच रहा है (अब पर्यावरण और महिला अधिकार, ये दो ऐसे मुद्दे हैं जिस पर जनता की सहानुभूति मिलना लगभग तय माना जाता है). जग्गी वासुदेव पर आरोप लगाए गए कि उन्होंने “पहाड़ी क्षेत्र संरक्षण प्राधिकरण” से अनुमति लिए बिना निर्माण कार्य कर लिए (यानी विरोध किसी और मुद्दे पर, लेकिन वास्तव में परदे के पीछे से निशाना हिंदुत्व और राष्ट्रवाद पर). ईशा फाउन्डेशन ने एक प्रेस कांफ्रेंस करके सारे दस्तावेज पेश कर दिए कि उन्होंने किसी भी कानून का उल्लंघन नहीं किया है, और सारी शासकीय अनुमतियाँ और “अनापत्ति प्रमाणपत्र” (NOC) लेकर ही सारे निर्माण कार्य किए हैं, लेकिन चूँकि इस गिरोह को केवल झूठ की भाषा आती है इसलिए इन्होंने वासुदेव के खिलाफ चिल्लाचोट जारी रखी. तमिलनाडु प्रशासन में मिशनरी का प्रभाव इतना अधिक है कि नवंबर 2012 में ईशा फाउन्डेशन को एक नोटिस देकर कहा गया कि उनकी 34 इमारतें ऐसी हैं जो अवैध हैं और कोयम्बटूर प्राधिकरण शहर योजना के खिलाफ हैं. दिसम्बर 2012 में एक और नोटिस दिया गया, जिसके खिलाफ ईशा फाउन्डेशन ने न्यायालय के सामने सारे वैध दस्तावेज पेश करके स्थगन आदेश प्राप्त कर लिया, तब जाकर मामला थोड़ा शांत हुआ. जब इस गिरोह का ये पैंतरा फेल हो गया तो उन्होंने एक दूसरा नकली आदिवासी संगठन खड़ा करके पर्यावरण वाले मुद्दे पर टांग अड़ाने की कोशिश जारी रखी है. एक ताज़ा याचिका में किसी चिरकुट वकील (स्पष्ट है कि उसे कौन पैसा दे रहा होगा?) ने “राष्ट्रीय हरित आयोग” (NGT) के सामने कहा है कि नरेंद्र मोदी द्वारा यहाँ महाशिवरात्रि का पर्व मनाने से क्षेत्र के पशु-पक्षियों, प्राणियों और पर्यावरण को भारी नुकसान पहुँचने की आशंका है इसलिए यह कार्यक्रम रोका जाए (खरीदे हुए गुर्गे के द्वारा खेला गया तीसरा पैंतरा). फिलहाल NGT ने इस याचिका की सुनवाई को 27 मार्च तक के लिए रोक दिया है, इसलिए तात्कालिक रूप से गिरोह को झटका जरूर लगा है.

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इस “वामी-चर्च गिरोह” में एक पूर्व न्यायाधीश भी शामिल हैं (स्वाभाविक है कि Highly Paid ही होंगे), उन्होंने आरोप लगाया है कि ईशा फाऊंडेशन ने तेरह लाख वर्ग फुट का अवैध निर्माण किया है (तेरह लाख वर्गफुट... ह ह ह ह ह). इन पूर्व न्यायाधीश महोदय ने पूछा है कि क्या प्रधानमंत्री को ऐसे “दागी”(??) फाउन्डेशन के कार्यक्रम में जाना चाहिए?? (यानी मनमोहन सिंह अथवा इनके पूज्य ज्योति बसु जहाँ और जिस कार्यक्रम में गए होंगे, वे सब वोल्गा नदी की तरह पवित्र होंगे? ह ह ह ह ह). ये गिरोह अक्सर खुद को “एक्टिविस्ट” कहलाना पसंद करता है (बड़ा फैशनेबल टाईप लगता है). आपको ये एक्टिविस्ट नर्मदा बचाओ आंदोलन, कुडनकुलम परमाणु बिजलीघर का विरोध करने से लेकर बाबा रामदेव के विरोध में काले झण्डे दिखाने अथवा JNU, IIT-चेन्नई में प्रायोजित आन्दोलनों तक दिखाई दे जाते हैं. फिलहाल बात यह है कि कोयम्बटूर में महाशिवरात्रि के दिन, इस गिरोह के पोषित “कथित आदिवासी संगठन और NGOs”, प्रधानमंत्री मोदी और जग्गी वासुदेव के खिलाफ प्रदर्शन करेंगे तथा अपने घरों पर काले झण्डे लगाएँगे...

हिंदूवादी संगठन इन वामपंथियों और मिशनरी की कार्यप्रणाली से काफी कुछ सीख सकते हैं, लेकिन “डायनासोर रूपी विशाल संस्था” और बात-बात पर उत्तेजित होने वाले उसके बगलबच्चे संगठन, अधिकाँश मामलों में निराश ही करते रहे हैं. उधर सामने वाला “वैचारिक गिरोह” बेहद संगठित, शातिर और विदेशों से पैसा ऐंठने में माहिर हो चुका है. जबकि इधर ये लोग आठ राज्यों और केन्द्र में सत्ता होने के बावजूद कोई वैचारिक आंदोलन खड़ा करना तो दूर, अपने लोगों को ही अपने पाले में समेटने में नाकाम रहे हैं.

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