आतंकवाद और लव जेहाद का विनाशक : सूअर (भाग-२)

Written by सोमवार, 29 जनवरी 2018 08:01

लेख के पहले भाग में आपने “देवों” तथा “असुरों” के बीच का मूल अंतर, तथा भगवान् विष्णु के वराह अवतार (सूअर) (Varah Avatar) के बारे में जानकारी प्राप्त की थी (पहले भाग को पढने के लिए यहाँ क्लिक करें), इस दूसरे और अंतिम भाग में आप समझ जाएँगे कि आतंकवाद (Islamic Terror in India) और लव जेहाद (Love Jihad) का नाश करने में सूअर कितनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है... आगे पढ़िए...

मध्यकाल में हमारे भारतवर्ष की भुजशक्ति को मानसिक और मनोवैज्ञानिक रूप से तोड़ने हेतु ही असुरों ने शौचालय की परम्परा को प्रचलित किया था। इस हेतु पुराने दोनों लेखों को पढ़कर उनका मनन करने की नितांत आवश्यकता है। सभी जानते हैं कि मध्यकाल में जेहादी असुरों ने हमारी माता-भगिनियों को बलपूर्वक अपने हरम में अपने सैक्स स्लेव के रूप में बंधक बनाया था। बुजुर्ग वाल्मिकियों (Valmiki Samaj) को यह सारा इतिहास श्रुति स्मृति परंपरा द्वारा आज भी याद है। अकबर के हरम में पाँच हजार सुन्दर हिन्दू युवतियाँ उसकी यौन पिपासा को शांत करने हेतु बंधक बनाई गयीं थी। यह महिलायें और युवतियाँ बाहर शौच हेतु भी न जा सकें इसलिए उनके मल-मूत्र की सफाई हेतु बाल्मीकि समाज को बड़े पैमाने पर स्वच्छक कार्य हेतु नौकरी पर रखने की शुरूआत अकबर ने ही की थी। उन गौरवशाली बाल्मीकियों को अपने ही हिन्दू समाज की महिलाओं द्वारा इस महत्तर कार्य को करने हेतु मेहतर कहा गया, तभी से यह लोकप्रचलित नाम अस्तित्व में आया। इन महान वाल्मीकियों ने गर्हित कार्य करना स्वीकार किया, किंतु धर्म परिवर्तन न किया। (इस विषय पर लिखे गए दोनों लेखों की लिंक यहाँ पर है) 

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जबकि उसी मुगलई काल में स्वेच्छा से मुसलमान बनने वाले लोगों को राजकीय पद और अनुग्रह में बहुत सी प्रलोभन राशि भी दी जाती थी। ऐसे समय में वीर वाल्मीकियों ने जनेऊ की शुचिता का पालन न कर पाने के कारण स्वयं अपने हाथों से अपना यज्ञोपवीत सूत्र “भंग” कर तोड़ डाला और “भंगी” नाम स्वीकार किया, किंतु अपने गौरवशाली सनातन धर्म को नहीं छोड़ा। प्राणभय द्वारा डराकर, मार-मार कर, प्रलोभन देकर, स्त्रियों को अपहरण करके जैसे-जैसे और जिस-जिस तरीके से यह बढ़ सकता था, हर प्रकार से इसे राजनीतिक संरक्षण में लेकर इस्लाम को बढ़ाया गया।

जो हिंदू यह कहते हैं कि भारत इस्लामी राष्ट्र नहीं बनेगा वह लोग बहुत बड़े भ्रम में हैं। जब एक प्रतिशत से भी बहुत कम संगठित फौज उस समय निन्यानवे प्रतिशत से भी ज्यादा जनों के ऊपर क्रूर और घृणित तरीक़े से साढ़े सात सौ वर्षों तक शरीयत का शासन लादकर मनमर्जी से राज कर सकती हैं तो आज तो यह आँकड़े कहीं ज्यादा हैं। (छुपे हुए आँकड़े और भी ज्यादा हैं, और ओवेसी के भाषणों से भी भविष्य की यह स्पष्ट तस्वीर नजर आती है.. किंतु दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि सरकार इससे कतई चिंतित नही है।) सम्पूर्ण विश्व इस समस्या की तह में जाने का प्रयास कर रहा है किंतु हमारी आँखों के जाले सदैव की भाँति कभी साफ नहीं हो पाते हैं। सम्पूर्ण यूरोप अपने वहाँ घुसपैठिए आतंकवादियों द्वारा जनसाँख्यिकी को बदलने और बिगाड़ने की साजिश को समझ चुका है। आतंकवाद और इसके आकाओं से निपटने हेतु यूएस आर्मी और बहुत से अन्य देश वराहदेव की सहायता से नये-नये शोधों पर कार्य कर रहे हैं। यूरोप और उत्तरी अमेरिका की समशीतोष्ण जलवायु वाले स्थानों पर ट्रफल हॉग (Truffle hog) नामक पालतू वराह देव (Boar) को सेना में सम्मानजनक स्थान मिला है।

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ट्रफल हॉग एक अत्यन्त उपयोगी पशु है जिसकी घ्राण शक्ति स्निफर डॉग की तुलना में बहुत ज्यादा होती है। अमेरिका तथा अन्य स्थानों पर इन वराह देव का उपयोग Truffle ट्रफल नामक उपयोगी कवक या मशरूम जैसी चीज को ढूँढनें में किया जाता है। साथ ही साथ जमीन के अत्यधिक नीचे पैदा होने वाले स्वादिष्ट और पौष्टिक कंद-मूल आदि को भी सूँघकर और ढूँढकर निकालने में इसकी उपयोगिता है। अपनी चपटी और खोदने,मिट्टी हटाने में सक्षम थूथन (Flat, shovel like snout) के कारण यह वराह देव भूमिगत खजाने (buried treasure) यानि कंद मूल (tuber) और ब्लैक ट्रफल (black Truffle) नामक कवक को निकालने में बहुत सहायक है। ब्लैक ट्रफल वास्तव में बहुत महँगा और तकरीबन १२०० पौंड के हिसाब से बिकता है। अपनी परिष्कृत घ्राण शक्ति (refined sense of smell) के कारण यह इस भूमिगत खजाने को खोज ही लेता है। चाहे यह चीजें जमीन के कितने भी नीचे क्यों न दबीं हो, इसको कोई फर्क नहीं पड़ता। Geva Zin गेवाजिन नामक एक इजराइली, जो भूमिगत बमों और आईईडी (IED'S) यानि इम्प्रूवाइव्ज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइसेज को निष्क्रिय करने वाले डी-माइनिंग एक्सपर्ट हैं, और यह पहले क्रोएशिया की एक प्राइवेट डिमाइनिंग फर्म में विशेषज्ञ थे। गन पाउडर और एक्सप्लोसिव ढूँढ निकालने में गेवाजिन की तुलना में संपूर्ण विश्व में और कोई मुकाबले में नहीं है। इन्होंने "इंस्टीट्यूट ऑफ एनिमल स्टडीज" Kibbutz Lahav में छोटे-छोटे वराहदेवों के ऊपर नौ माह तक निरंतर शोध प्रयोग किया, और यह पाया कि वराह देव बारूदी सुरंगों, आईईडी को ढूँढ निकालने में स्निफर डॉग से बहुत ज्यादा सक्षम हैं।

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क्रोएशिया, मोजाम्बिक और अंगोला में "इन्टरनेशनल डिमाईनिंग बॉडीज" द्वारा किए गये यह प्रयोग बेहद सफल रहे थे। ब्रिटेन के प्रिंसेज आॅफ वेल्स मेमोरियल डिमाईनिंग फंड ने भी गेवाजिन के शोधों को सहायता प्रदान की। गेवाजिन पहले पोर्क खाने के शौकीन थे लेकिन वह कहते हैं कि जबसे मैंने इन वराह देवों के साथ कार्य करना प्रारंभ किया तबसे मेरी पोर्क छूने की भी इच्छा नहीं करती है। वे कहते हैं "They are the most sensitive creature if this world". युद्धभूमि एवं युद्ध परिस्थितियों में सैनिकों की जान बचाने में “वराह” अत्यन्त उपयोगी है, अमेरिका के "ज्वाइंट आईईडी डिफीट आर्गेनाइजेशन" के लेफ्टिनेंट कर्नल राबर्ट हैस्टन "Robert Haston" ने अफगानिस्तान में बमों को निष्क्रिय करने में इसे अत्यन्त उपयोगी पाया। इन्टरनेशनल डिमाईनिंग बॉडीज की संयुक्त कार्यशालाओं में डमी माइन्स आदि के प्रयोग द्वारा यह बात प्रकाश में आयी है कि स्निफर डॉग के मुकाबले वराहदेव ज्यादा सक्षम और ज्यादा लाभदायक जानवर है। “Because of their refined sense of smell Truffle hog is more efficient and more useful than a sniffer dog. They are more useful in battlefield conditions”. सूअर के बच्चे को छोटी उम्र से ही बारूद और अन्य विस्फोटक सामग्रियों की गंध के प्रति संवेदी बनाया जाता है, और उनकी यह क्षमता कुछ ही दिनों में विकसित हो जाती है। जिसके बाद वह किसी भी बारूदी सुरंग या छुपाकर रखे गये विस्फोटक को बहुत सहज सरल तरीके से ढूँढ निकालते हैं।

जमीन में छुपे विस्फोटक को सूँघकर ढूँढने के बाद वराह देव उस टारगेट के चारों तरफ तब तक चक्कर लगाते हैं जब तक कि उन्हें प्रोत्साहन स्वरूप गाजर, सेव या उनके मनपसंद मकई न दिया जाये। अफगानिस्तान में राबर्ट हैस्टन का यह प्रयोग अत्यधिक सफल रहा था किंतु इसके तोड़ के रूप में वहाँ आतंकवादियों ने जमीन में विस्फोटक पदार्थ छुपाने के स्थान पर फिदाईन ट्रक या जिप्सी विस्फोट करने प्रारंभ किये। चूँकि असुर (इस्लामिक शक्ति) वराह देव की उपस्थिति मात्र से ही कंपित-प्रकम्पित हो जाते हैं, अतः अफगानिस्तान में स्थानीय लोगों द्वारा विरोध किए जाने के कारण वहाँ से वराह देव की उपस्थिति को स्थगित करना पड़ा। किंतु इराक सीरिया में इस्लामिक स्टेट के आसुरी आतंकवाद के कारण मायावी असुरों ने भोले भाले पीड़ित शरणार्थियों के साथ अपने असुर दल को सम्पूर्ण यूरोप में घुसपैठ कराने का प्रयास किया। उनके इस कदम को कई यूरोपीय देशों ने भाँप लिया और अपने-अपने देश की सीमाओं पर वराह की पूरी प्लाटून को तैनात कर दिया ताकि असुर दल उन उन देशों में अवैध घुसपैठ न करने पायें। यह कदम बहुत हद तक कारगर भी रहा है। हंगरी के दक्षिणपंथी पार्टी फिदेस्ज पार्टी Fidesz Party के राजनेता Gyorgy Schopflin जार्जी शौफिन MEP (member of european parliament ) ने यह कहकर सनसनी फैला दी कि हंगरी के साऊथर्न फ्रंटियर से लगी सर्विया की सीमा से होने वाली अवैध मुस्लिमों की घुसपैठ को बार्डर से दाखिल न होने देने के लिए वहाँ वराह के सिर को सारी सीमाओं पर लगा देना चाहिए। आस्ट्रिया, पोलैंड, हंगरी, फ्राँस, बेल्जियम जैसे देशों ने आतंकवाद को रोकने के लिए वराह देव का भरपूर उपयोग किया है और इसके प्रत्यक्ष और सकारात्मक परिणाम भी सामने आये हैं।

 

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९/११ की घटना के बाद २००१ में इजराइली डेप्यूटी पोलिस मिनिस्टर जिडिआन इसरा Gideon Esra ने इजरायल के अखबार Yediot Aharonot में खबर देकर यह सुनिश्चित किया कि वह इजराइल में आतंक फैलाने वाले फिलिस्तीनी आतंकवादियों को वराह की खाल व रक्त के साथ भूमि में स्थान देंगे, और इजराइलियों ने बिना ज्यादा प्रोपोगैंडा करे यह करके भी दिखाया। इसका सकारात्मक परिणाम यह हुआ कि आज इजराइल में सुसाईड बॉम्बर आतंकवादियों का खतरा एकदम कम हो गया है। मध्यकाल में हमारे महान वाल्मीकि भाइयों ने असुरों से बचने और एक स्पष्ट व अदृश्य दूरी बनाने के लिए यह सुरक्षात्मक वराह नीति बनाई थी और इसका बहुत अधिक लाभ भी इस देश को मिला। किंतु भारतवर्ष ने इस वराह नीति को सामरिक क्षेत्र में अपनाने के स्थान पर इसे एक प्रकार से त्याग ही दिया है। भारतवर्ष को चाहिए कि सैन्य, पुलिस और पैरामिलिट्री फोर्सेज में बड़े पैमाने पर वराह वाहिनियों का निर्माण करे, मानवीय क्षति को रोकने के लिए बम डिमाईनिंग और डिस्पोजल दस्तों में इनका उपयोग करे। कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के पुनः रिहैबिलिटेशन या पुनर्वास के लिए वहाँ एक बहुत बड़ी मात्रा में वराह ग्रोथ सेंटर बनायें जायें, ताकि करोडों वराहदेव हमारी मातृभूमि की रक्षा में अपना योगदान दें। कश्मीर में बड़ी मात्रा में लाखो वराहों की उपस्थिति सैन्य छावनियों के समानांतर स्थापित की जाये। निस्संदेह इस कदम से आतंकवाद आखिरी साँसे गिनने लगेगा।

कश्मीर में पत्थरबाजी को रोकने हेतु वराह की चरबी, रूधिर और मल मूत्र से बने बदबूदार पेस्ट की वर्षा पत्थरबाज आतंकवादियों पर करनी होगी, और इस खबर मात्र से ही क्षण भर में स्टोन पैल्टिंग खत्म हो जायेगी, यह निश्चित जानिये। भारत की सारी ऊर्जा पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित छद्मयुद्ध के कारण नष्ट हो रही है। अतः वराह देवता ही भारतवर्ष को आतंकवाद के दंश से मुक्त कर सकते हैं। भारतवर्ष में बहुत वर्षों से यह देखा जा रहा है कि आतंकवादी पुलिस थानों को भीड़ के रूप में एकत्र होकर आग लगा देते हैं और सैन्य छावनियों को भी अपना निशाना बनाते हैं, इसे रोकने हेतु वराह देव बहुत अच्छी भूमिका निभा सकते हैं। अतः भारतवर्ष के गौरव व अस्मिता की रक्षा के पवित्र कार्य हेतु इन्हें यह सम्मानजनक कार्य हेतु नियोजित किया जाये। कश्मीर, असम व अन्य स्थानों पर आतंकी घुसपैठियों की अवैध घुसपैठ को खत्म करने हेतु भी इनका भरपूर उपयोग हो। इसके अतिरिक्त भारतवर्ष में गोरक्षा का मुद्दा भी वराहदेव एक चुटकी में हल कर सकते हैं। यदि गौरक्षा न की गयी तो निरंतर गो हत्या के कारण कुछ वर्षों में हमारी आने वाली संततियों को गोदुग्ध तो देखने भर को भी नहीं मिल पायेगा। गोदुग्ध के स्थान पर पाउडर का प्रचलन हम देखेंगे, अतः गोरक्षा सर्वप्रथम कर्तव्य है। गौ माता को असुरों से बचाने हेतु स्थान स्थान पर गौमाता के शरीर में वराह देव के चित्र वाले स्थायी टैटू बनाये जायें। इससे असुर गौमाता का वध नहीं कर सकेंगे. परिणामतः हमारे इच्छित अभीष्ट संकल्प यानि गौरक्षा की पूर्ति भी होगी। लेकिन गौरक्षकों को गुण्डा बताने वाले क्या इस उपयोगी सलाह को मानेंगे? इसमें संदेह है।

आतंकवादियों को वराह के साथ भूमिस्थ या अग्निहोम कर दिया जाये और इस बात का स्पष्ट संदेश आतंकवादियों को दे दिया जाये। इसकी गारंटी है कि आतंकवाद स्वतः खत्म हो जायेगा। लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या भारत सरकार इतना कलेजा रखती है? आजकल भारतवर्ष में असुरदल (लव जेहादी) हमारी माताओं भगिनियों को वशीकरण करके अपने आसुरी मत की संख्या को बेतहाशा बढा रहे हैं। यह वाममार्गी असुर बहुत अचूक तन्त्र या वशीकरण में सिद्धहस्त हैं और इनके चंगुल में जाकर हमारी पथभ्रष्ट बहनों का इस प्रकार से ब्रेनवॉश किया जाता है कि वह कोर्ट के निर्णय के पश्चात भी अपने जन्मदात्री अभिभावकों के पास लौटना नहीं चाहतीं हैं। केरल के बहुचर्चित अखिला उर्फ हदिया वाले लव जिहाद के केस को देखकर भी यदि लोगों की आँखे न खुलें तो यह समझिये कि इसे यानि लव जिहाद को नकारने वाले पथभ्रष्ट लोग शीघ्र ही इसकी चपेट में आयेंगे। असुर अबोध बालिकाओं तक का बलात्कार कर रहे हैं। यदि इन सभी पर नियन्त्रण स्थापित करना है तो वराहदेव की शरण ही इस कलिकाल का एकमात्र साधन है। बहनों को असुरों के प्रेमजाल रूपी वशीकरण से बचाने हेतु वराह देव के तीखे दाढ़ दन्तों से बने कवच रूपी ताबीज को धारण कराने से वशीकरण कट जाता है।

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सुअरों के थूथन से दो दांत निकले होते हैं जिन्हें कुकुर दंत कहा जाता है। ये इतने सख्त तथा मजबूत होते हैं कि किसी का भी पेट फाड़ देते हैं चाहे वह घोड़ा ही क्यों न हो। ऊपर के कुकुर दंत थोड़े घुमावदार होते हैं परंतु नीचे के दांत आकार में बड़े और सीधे होते हैं। जैसे ही इनका जबड़ा बंद होता है दोनो दांत आपस में रगड़ खाते हैं, जिसकी वजह से ये हमेशा नुकीले बने रहते हैं। तंत्र में इन्हीं कुकुरदंतों का इस्तेमाल होता है। यह किसी भी कसाई के यहां से प्राप्त किया जा सकता है। अथवा किसी ऐसे व्यक्ति से जो सूअर पालता हो। यद्यपि यह भी कहा जाता है कि स्वाभाविक मृत्यु के बाद प्राप्त किया गया सूअर का दांत ज्यादा कारगर होता है।

शूकर दंत वशीकरण मंत्र

इस मंत्र के द्वारा शूकर दंत लेकर वाराह देव की साधना की जाती है| सिद्ध शूकर दंत की सहायता से वशीकरण ही नहीं अपितु मारण मोहन उच्चाटन, स्तंभन कुछ भी किया जा सकता है| इसलिए वशीकरण हेतु शूकर दंत को पहले सिद्ध करना आवश्यक है, जिसकी विधि अत्यंत सरल है। होली दीपावली, दशहरा अथवा ग्रहण काल में अपने दाहिने हाथ में शूकर दंत रखें तथा 108 बार निम्नलिखत मंत्र का जाप करें :-

ओम ह्रीं क्लीं श्री वाराह दंताय भैरवाय नमः

जाप पूर्ण होते ही शूकर दंत पर फूंक मारे। इस अभिमंत्रित दंत को ताबीज बनाकर धारण कर लें। इस ताबीज से वशीकरण प्रभाव उत्पन्न होता है। इस ताबीज को पहनकर इच्छित व्यक्ति को सरलता से सम्मोहित भी किया जा सकता है और सामने वाले द्वारा यदि कोई वशीकरण मन्त्र उपयोग किया जा रहा है तो उसकी तोड़ भी इससे होती है। वशीकरण के अतिरिक्त यह अभिमंत्रित ताबीज चमत्कारी प्रभाव उत्पन्न करता है। जनसाँख्यिकी के असंतुलित अनुपात वाले स्थानों में असुर पुत्र हमारी बहन बेटियों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं। इसे रोकने के लिए स्वाभाविक मृत्यु प्राप्त वराह के दन्त का उपयोग किया जा सकता है. जैसे ही "आधुनिक असुरों" (यानी मुस्लिम लव जेहादी) को यह पता चलेगा, कि हिन्दू कन्या ने अपने गले में सूअर के दांतों वाला ताबीज पहन रखा है, वह उस लड़की से कम से कम बीस फुट की दूरी बनाए रखेगा... 

इस लेख के दोनों भागों में वराहदेव की स्तुति करने और कहने का मूल अर्थ यह है कि यदि भारतीय सभ्यता, संस्कृति, हमारी भावी संततियों और इस सनातन राष्ट्र की रक्षा करनी है, तो स्थान-स्थान पर “वराहमठ” अविलम्ब स्थापित हों और केन्द्र सरकार एक स्पष्ट वराह-नीति अपनाकर इन सारे बिंदुओं पर ध्यान दे, वाल्मीकि बंधुओं के साथ अन्य समाजों को भी सूअर पालन हेतु प्रोत्साहित एवं पुरस्कृत किया जाना चाहिए, गौमाँस की बजाय शूकर माँस का निर्यात बढ़ाने का प्रयास होना चाहिए... तभी यह सनातन राष्ट्र जीवित रह पायेगा।

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