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विश्वशान्ति हेतु इस्लामिक दर्शन में संशोधन करना आवश्यक

Written by रविवार, 30 जुलाई 2017 19:59

सामान्यतः आज देश के विभिन्न भागों में बंग्लादेशी व पाक-परस्त ज़िहादी अनेक प्रकार से इस्लामिक आतंकवाद में लिप्त है, जिससे बढती हुई राष्ट्रिय व सामाजिक समस्याओं का किसी को अनुमान ही नहीं हो रहा है। क्योंकि भारत की हज़ारों वर्ष पुरानी सत्य सनातन संस्कृति और दर्शन को आज के छदम सेक्युलर केवल मैकाले व मार्क्सवाद की दृष्टि से देखने के आदी हो चुके है।

साथ ही हमारी संस्कृति को नकारने के लिए पाकिस्तानी विचारधाराओं को हमारे विभिन्न नगरों, विश्वविद्यालयों, मीडिया समूहों, बुद्धिजीवियों, अधिकारियों और राजनैतिक दलों में विस्तार मिल रहा है। जब इस्लामिक जिहाद से हमारे देश के साथ साथ पूरा विश्व ही चिंतित है, तो भी पिछले वर्ष (17.03.2016) नई दिल्ली में आयोजित "वर्ल्ड सूफ़ी फोरम" में मोदी जी का विचार "इस्लाम का अर्थ शांति" क्या यह उनकी राजनैतिक विवशता थी? उन्होंने आतंकवाद को किसी धर्म से जोड़ने का विरोध करते हुए भी धर्म के नाम पर हिंसा करने वालों को धर्मविरोधी बताया। उनके अनुसार सूफी विचार सभी को एक मानता है और वह मानवीयता व अमानवीयता के संघर्ष में अहम भूमिका निभा सकता है। इससे ऐसा अभास हुआ कि राजनेताओं की भाषण कला लोकतांत्रिक राजनीति के अनुरुप बहुत कुछ कहने की सामर्थ रखती है। जबकि मुगलकालीन इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिल जायेंगे जब सूफियों ने भी भारत में इस्लाम स्थापित करने के लिए मुगल आदि आक्रान्ताओं का साथ दिया व लिया है

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अगर सूफियो का सन्देश वैश्विक शांति है और वह सभी को एक मानते है व क़िसी में भेदभाव नहीं करते तो इस फोरम में सम्मलित होने वाले 20 देशों के मुस्लिम धर्मगुरुओं को कश्मीर, अफगानिस्तान, ईराक़ व सीरिया आदि क्षेत्रों में चल रहें भयानक नरसंहार से कराहती हुई मानव पीड़ा का अहसास अभी तक क्यों नहीं हुआ ? भारतीय उपमहाद्वीप व यूरोप के विभिन्न देशो में जिहाद के लिए पैर पसारता दुर्दांत आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट आदि की भविष्य की योजनाओं के विरुद्ध क्या किसी सूफी मुस्लिम धर्मगुरु ने कोई सकारात्मक सक्रियता का परिचय दिया या भविष्य में ऐसा कुछ साहस करने की संभावना व्यक्त करी है ? फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि इस्लामिक आतंकवादी किसी सनक, मूर्खता या धनलोभ के कारण ही अपनी जान नहीं देते। वे अल्लाह की राह पर अल्लाह के लिए अपनी जान देते है। तभी तो अधिकतम आतंकवादी घटनाओं में एक विशेष (मुस्लिम) समुदाय की संलिप्तता को प्रायः प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रुप से सभी मानते है। जबक़ि कुछ वर्ष पूर्व के समाचार पत्रो के अनुसार अमरीकी संसद की आयी एक रिपोर्ट तो प्रत्यक्ष कहती है कि भारत में घरेलू इस्लामी आतंकवाद बढ़ रहा है।

इस पर भी ध्यान देने वाली बात यह है कि जब तक मदरसो में इस्लामी शिक्षा द्वारा जिहाद को पवित्र बताया जाता रहेगा तब तक आतंकवाद रुक नहीं सकता और आतंकवादी जिस विचारधारा के पोषक है उसमें धर्मनिरपेक्षता, मानवता व मानवाधिकार आदि के दर्शन भी नहीं होते । इन इस्लामिक जिहादियों को विश्व में इस्लामिक झंडे लहराने की महत्वाकांक्षा ने भी अत्याचारी बना दिया है। परिणामस्वरुप आज जिहादी मानसिकता से सभी व्यथित है फिर भी अगर इसके मूल कारणों की अवहेलना की जाती रहेगी तो इस्लाम में वैश्विक मानवीय विचारधारा का सूत्रपात कैसे हो पायेगा? इसी सन्दर्भ में 31 जुलाई 1986 में दिल्ली के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट श्री जेड.एस. लोहात के कुरान के विषय में किये गये एक ऐतिहासिक निर्णय के अनुसार कुरान की उन आयतों में जो बहुत ही खतरनाक और घृणास्पद होने के कारण मुसलमानों व अन्य समुदायों के बीच भेदभाव व द्वेष का निर्माण करती है, में आवश्यक संशोधन करवा कर साम्प्रदायिक सौहार्द बढ़ाने का प्रयास समस्त मानवतावादियों के लिए सार्थक हो सकता है। आज जब वर्तमान युग में मज़हबी आतंक 'जिहाद' से भारत सहित विश्व के अनेक देशों में मानवता संकट में है तो फिर कोई यह क्यों नही सोचता कि इस्लामिक विद्याओं और उसके दर्शन में सुधार करके सकारात्मक वातावरण बनाया जायें ? यह विचित्र है कि मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवियों, राजनेताओं , समाजिक एवं धार्मिक नेताओं आदि ने कभी भी अपने धार्मिक दर्शन व विद्याओं में संशोधन का विचार ही नही किया बल्कि वे सभी रुढीवादी व कट्टरपंथी विचारों को या तो प्रोत्साहित करने में ही लगे रहें या फिर उदासीन रहें। काश ऐसा होता तो आज पृथ्वी निर्दोषों व मासूमों के रक्त से लाल न होती। जिहादी जनून के प्रकोप से समाज व संसार सुरक्षित रहते हुए विकास के पथ पर निर्बाध गति से अग्रसर रहता। साथ ही सभ्यताओं के टकराव से विश्व को सुरक्षित करते हुए शांति स्थापित करने में सरलता होती।

अतः यह समझना होगा कि सत्य सनातन वैदिक हिन्दू धर्म तथाकथित कुछ सम्प्रदायो के अनुसार "अन्य धर्मियों की हत्या करो या उनका धर्मांतरण करो" अथवा "छलकपट की नीति अपनाकर अन्य धर्मियों का धर्मांतरण करो" जैसी शिक्षा नही देता। जबकि कुरान के दुसरे अध्याय के 27 पेजों में कम से कम 25 बार गैर मुस्लिमों को हानि पहचानें वाले शब्दों का प्रयोग किया गया है| उनके लिए नकारात्मक विशेषण भी है | जिसको पढ़ कर प्रश्न उठता है कि क्या ऐसी बातें भी धार्मिक ग्रन्थ का हिस्सा हो सकती है? इसलिये अत्याचारी व अमानवीय कट्टरपंथी विचारधाराओं की जड़ों को ढूंढ कर उनको सकारात्मक बनाना कठिन हो सकता है परंतु असंभव नही? यह आज कि प्रमुख आवश्यकता है।

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यह भी विचार करना चाहिये कि महान विद्वान व चार बार ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहें विलियम ग्लैडस्टोन ( जीवनकाल: 1809-1898) ने ब्रिटिश पार्लियामेंट में यह उल्लेख किया था कि जब तक धार्मिक ग्रन्थ में ऐसी बातें रहेंगी तब तक दुनिया में शान्ति नहीं होने वाली | कुछ पिछले समाचारों से यह भी ज्ञात हुआ कि सन 2008 में संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि तालिबान व अलक़ायदा आदि जिहादी संगठन पाक व अफगानिस्तान की सीमाओ पर अनेक छोटे छोटे बच्चों को धन देकर व जन्नत का वास्ता देकर जिहाद के लिये प्रशिक्षित करके "फिदायींन" बनाते है। इसके अतिरिक्त एक वरिष्ठ पत्रकार व राष्ट्रवादी विचारक के प्रकाशित एक लेख में जिहाद के विषय में कुछ निम्न तथ्य मिलें–

~ए बी सी (ABC) के पत्रकार बिल रेडेकर के अनुसार - एक बार जब पेशावर के पास एक प्रसिद्ध मदरसे में फर्श पर बैठ कर 60 लडके कुरआन की पढाई कर रहें थे, "तो मैने उन छात्रों से पूछा कि स्कूल ख़त्म करने के बाद उनमें से कितने डॉक्टर या इन्जीनियर बनना चाहेंगें? केवल दो लडकों ने हाथ उठाया | फिर मैने पूछा कि कितने लड़के बड़े होकर जिहाद के लिए लड़ना चाहते है? सबने हाथ उठा दिये।"

~एक पाकिस्तानी पत्रकार आरिफ जमाल ने कश्मीर में सक्रिय रहें 600 जिहादियों के अंतिम पत्रों का अध्ययन करके "एशिया टाइम्स" में शोध प्रकाशित किया था| उन्होंने पाया कि शायद ही ऐसा कोई पत्र हो जिसमें जिहाद में मरने के बाद इनाम स्वरुप जन्नत में मिलने वाली 72 हुरों का जिक्र न किया गया हो| इसका अर्थ स्पष्ट है कि उन्हें हुरों का लालच नहीं दिया गया होता तो वे जिहाद के लिए नहीं जातें| अपने अंतिम पत्र में जिहादियों ने यह लिख कर इसको जिहाद के लिए अत्यधिक उकसाने वाला बिंदू माना है|

~अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र मिशन (UNAMA) की अधिकृत स्कालर क्रिस्टीन फेयर ने जिहादी मानव - बमों पर अध्ययन किया था| उन्होंने पाया कि लगभग सभी आत्मघाती जिहादी इस विश्वास से प्रेरित होते है कि "काफ़िर को मारना हमारा कर्तव्य है " इसमें किसी ने चाहें कोई गलत कार्य किया हो या नहीं, उसका "काफिर" होना ही काफी है।

उपरोक्त के अतिरिक्त विश्व के अनेक मानवतावादी व समाजशास्त्रियों का भी यह मानना है कि अगर समय रहते जिहादी मानसिकता को नियंत्रित नही किया गया तो वैश्विक जिहाद की विषबेल को फैलने से कोई रोक नही पायेगा? अतः इस्लाम को शांति का मज़हब व इसके अनुयायियों को शांतिदूत बताने वालों को यह स्वीकार करना होगा कि इस्लामिक जिहाद अनेक हिंसात्मक, भयावह व विध्वंसकारी घटनाओं से मानवता के साथ साथ संसार के सुंदर रुप को भी नष्ट करने का एक जनून है। इसलिये इस्लामिक विद्याओं व इनके दर्शन शास्त्रो में आवश्यक सकारात्मक संशोधन करवाना इन विद्याओं के विशेषज्ञों और उदारवादी धर्मगुरुओं का प्रमुख दायित्व बनता है। तात्पर्य यह है कि वर्तमान विज्ञानमय आधुनिक युग में मध्यकालीन रुढीवादिताओं व परंपराओं में आवश्यक संशोधनों द्वारा वैश्विक जिहाद को नष्ट करके विश्व में मानवता की रक्षा व शांति की स्थापना हेतु इस्लामिक धर्मगुरुओं का महत्चपूर्ण योगदान लिया जा सकता है। इंडोनेशिया और मलेशिया सहित अरब के कुछ देशों में दबे स्वरों में अब यह सवाल पूछा जाने लगा है कि क्या इस्लाम की शिक्षाओं में बदलाव की आवश्यकता है? इस्लाम की बिगड़ चुकी छवि को सुधारने के लिए क्या-क्या किया जाना चाहिए... उदार माने जाने वाले कई इस्लामिक रिसर्च स्कॉलर इस बात पर सहमत होते जा रहे हैं, कि मदरसा शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन आवश्यक है... कुरआन की कुछ आयतों को या तो हटाया जाए, अथवा पढ़ाया ही न जाए. लेकिन क्या यह संभव हो सकेगा?? 

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