कश्मीर की कहानी है... पूरे देश को सुनानी है...

Written by रविवार, 05 फरवरी 2017 10:54

अंग्रेजी नव वर्ष के आगमन के बाद पूरा विश्व नव वर्ष की खुशियां मना रहा था। किंतु कड़ाके की ठंड के बाद भी कश्मीर में गर्मी अचानक बढ़ गई थीI 4 जनवरी 1990 कश्मीर के एक स्थानीय "उर्दू समाचार पत्र आफताब" में कश्मीर के सभी अल्पसंख्यक हिंदुओं एवं सिक्खों को अपना सामान पैक कर कश्मीर छोड़ने के लिए कहा गया था।  पढ़िए 20वीं शताब्दी के सबसे बड़े मुस्लिम अत्याचार अर्थात कश्मीर के बारे में...

यह शुरुआत थी, कश्मीर को हिंदुस्तान से अलग करने की, जिसके लिए हिजबुल मुजाहिद्दीन द्वारा यह प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई थीI एक अन्य कश्मीरी समाचार पत्र अलसफा में अगले दिन निष्काशन आदेश को दोहराया गया। उसके बाद के दिनों में अराजकता ही सत्ता होती है, नकाबपोश जिहादियों ने सड़कों पर भारत विरोधी नारे लगाए, कलाशनिकोव को लहराते बेगुनाह कश्मीरी हिंदुओं की हत्या करते नजर आए। कश्मीरी हिंदुओ को डराने के लिए बम विस्फोटों का भी सहारा लिया गया। मस्जिदों के लाउड स्पीकर से भडकाऊ भाषण दिए गए और कश्मीर के हिंदू व सिक्खों को घाटी छोड़ने के लिए पब्लिक एड्रेस सिस्टम का उपयोग किया गया। एक भयानक साजिश कश्मीर के हिंदू व सिखाओ को चपेट में लेने के लिए शुरू की जाती है। हथियारबंद नकाबपोश कश्मीर में जनता को अपनी घड़ियां पाकिस्तान के मानक समय से के अनुसार सेट करने का आदेश देते हैं। कश्मीरी पंडितों के घरों पर पोस्टर चिपके रहते हैं कि 24 घंटे के भीतर कश्मीर खाली कर दो या मरने के लिए तैयार हो जाओ। हजारों पंडित पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को इस्लाम के इन क्रांतिकारियों द्वारा मौत के घाट उतार दिया गया। हैरानी की बात कागज पर आधिकारिक संख्या बहुत कम प्रदर्शित की जाती है। 

यह सब हिंदुओं की लूट के साथ अनंतनाग जिले से 1986 में शुरू किया गया था। जम्मू और कश्मीर नवंबर 1989 में कश्मीर क्षेत्र में हिंसा भड़क उठी, हालांकि राज्य में अशांति 1987 चुनाव के बाद शुरू हो गयी थी, कुछ का मानना था कि केंद्रीय सरकार और नेशनल कांफ्रेंस द्वारा स्वतंत्रता समर्थक और स्वायत्तता समर्थक दलों के एक गठबंधन (Muslim United Front) की हार सुनिश्चित करने के लिए चुनाव में धांधली की गई थी। पिछले कुछ दिनों में अपवित्र जिहादी सैकड़ों हिंदू पुरुष और महिलाओं की जान ले चुके थे। नितिन पंडित, टीका लाल टपलू जी की 14 सितंबर 1989 को घर में घुसकर हत्या कर दी गई थी, जो कि एक वकील और भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य थे। उसके बाद श्रीनगर उच्च न्यायालय के न्यायधीश नीलकंठ गंजू की हरि सिंह मार्केट में हत्या कर दी गई, पंडित सर्वानंद प्रेमी एक 80 वर्षीय कवि थे, उनके बेटे की आंखें निकाल ली गई। अत्याचार और अपहरण रोज के काम थे, कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट को अपहरण करके और 5 दिनों तक सामूहिक बलात्कार करके उसके बाद शरीर को उमर कॉलोनी की मुख्य सड़क पर फेंक दिया गया। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट और उसके शरीर पर चोटों के निशान सारी कहानी खुद बयान कर रहे थे, उसका जिस्म जम्मू एवं कश्मीर लिबरेशन फरंट (JKLF) द्वारा किए गए अत्याचार की कहानी बता रहा था। खामोह श्रीनगर के रहने वाले एक सरकारी कर्मचारी एम एल मान को 15 जनवरी को मार दिया गया और इस प्रकार के अनेक वारदात की गई थीं। बलदेव राज दत्ता नामक ऑपरेटर को लाल चौक से दिनदहाड़े अपहरण कर आ गया उसका शव 19 जनवरी 1990 को चार दिन बाद नई सड़क पर मिला। एक और महिला का अपहरण किया गया और बलात्कार के बाद एक आरा मिल पर उसका शव टुकड़ों में कटा हुआ मिला।

भारतीय गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के दिसंबर1989, में अपहरण के बाद सरकार ने अलगाववादी विद्रोह के खिलाफ एक कठिन रुख लेने का फैसला किया। राज्य सरकार की ओर से उग्र विरोध के बावजूद नई दिल्ली ने जगमोहन, एक ज्ञात सशक्त प्रशासक, को राज्य का राज्यपाल नियुक्त किया। नतीजतन राज्य सरकार, तत्कालीन मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला के नेतृत्व ने विरोध में इस्तीफा दे दिया और राज्य राष्ट्रपति शासन के अधीन चला गया। फारूक अब्दुल्ला पहले से ही खुद को सरकार चलाने में असमर्थ, अयोग्य और अक्षम साबित कर चुका था। वस्तुतः उसकी राज्य तंत्र पर कोई पकड़ नहीं थी, उसे केवल गैर-गवर्नेंस का दोषी नहीं ठहराया जा सकता है, बल्कि धारणा यह थी कि राज्य प्राधिकरण गायब हो गया था। उसने अपने पिता की तरह राज्य की रीढ़ की हड्डी को नष्ट कर दिया था.

पहले से ही नष्ट एक सामाजिक-राजनीतिक स्थिति को संभालना बहुत ही कठिन और असंभव के बराबर काम था, हालांकि जगमोहन ने उल्लेखनीय नेतृत्व के निशान के रूप में कश्मीरी पंडितों को सुरक्षित आश्रय प्रदान करने में मदद की। जगमोहन ने इस्लामी कट्टरपंथियों का मुकाबला करने के लिए एक असाधारण रणनीति तैयार की और समय की परवाह किए बगैर जनता के लिए उनका दरबार (कार्यालय) खुला रहता था, वहीँ शहीद हिंदुओं के परिवारों का दौरा किया। भारतीय सुरक्षा बलों ने अवैध हथियार और छिपे आतंकवादियों को खोजने के प्रयास में, श्रीनगर में घर-घर की व्यापक तलाशी ली, सैंकड़ों लोग गिरफ्तार किए गए थे। 19 जनवरी 1990 को कानून व्यवस्था बहाल करने के उद्देश्य से पहली बार कर्फ्यू उपाय के रुप में लगाया गया किंतु वह विफल रहा है। दिन भर जम्मू एवं कश्मीर लिबरेशन फरंट के मुजाहिदीन आतंकवादी कर्फ्यू को धता बता बता कर सड़कों पर निकल कर कर्फ्यू तोड़ने की अपील करते है। शाम होते होते मस्जिद से होने वाले ऐलान पब्लिक एड्रेस सिस्टम से होने वाले एलान कानों को भेदने लगते हैं और इस समय तक कश्मीरी पंडितों ने एवं सिक्खों ने अपने आपको घर में बंद कर लिया था। उन्हें आतंकित करने का काम जम्मू एवं कश्मीर लिबरेशन फरंट ने और तेज कर दिया था, उल्टे तीन नारे मैं मस्जिदों से पूरी रात चलाए गए पहला था....

-- यहां क्या चलेगा निजाम ए मुस्तफा अर्थातहम शरीयत के कानून यहां चाहते हैं,

-- दूसरा था जालिमों काफिरों कश्मीर हमारा है अर्थात बेरहमी काफिरों हमारा कश्मीर छोड़ दो

-- तीसरा था कश्मीर में अगर रहना है अल्लाहो अकबर कहना है हां अर्थात कश्मीर में जीने के किसी भी व्यक्ति को इस्लाम में परिवर्तित होना होगा।

इसके अलावा पब्लिक एड्रेस सिस्टम से चलने वाले नारे थे.. -- ला शरिकिया आला गरिबिया अर्थात पूर्व से पश्चिम तक केवल इस्लाम।

-- मुसलमानों काक काफिरो भागो अर्थात है मुस्लिमों उठो और काफिरों भगो।

-- इस्लाम हमारा मकसद है कुरान हमारा दस्तूर जेहाद हमारा रास्ता है अर्थात इस्लाम हमारा उद्देश्य है कुरान हमारा संविधान है जिहाद हमारे जीवन का तरीका है।

-- कश्मीर बनावट पाकिस्तान घटाव अनिवार्य बट निशांत अर्थात कश्मीरी पंडित महिलाओं के साथ लेकिन उनके पुरुषों के बिना कश्मीर पाकिस्तान बनेगा।

-- पाकिस्तान से क्या रिश्ता लाला इलाही लीला अथात इस्लाम पाकिस्तान से हमारे संबंधों को परिभाषित करता है।

-- दिल में रखो अल्लाह का खौफ हाथ में रखो क्लासनिकोव।

अगला नारा था

-- यहां क्या चलेगा नाम निजाम ए मुस्तफा अर्थात यहां शरीयत का कानून चलेगा।

-- अंतिम नारा था, पीपलस लीक का क्या पैगाम फतेह आजादी और इस्लाम।

इस के बाद कई दूसरे लोग जो अन्य लोगों से भाग्यशाली रहे जो घर में घुसकर अगले सूरज की चमक का इंतजार कर रहे थे, केंद्र और राज्य सरकार के लिए निर्दोष और अहिंसक, शांतिपूर्ण, अल्पसंख्यक कश्मीरी पंडित एवं सिख महत्वहीन थे। उनके मंदिरों को खंडहर में बदल दिया गया। इस समय तक भारत विरोधी अभियान और तेज हो गया था राज्य में नए-नए आतंकी संगठन तेजी से पैदा हो रहे थे। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POKI - Pak Occupied KASHMIR of India) में असंख्य तथाकथित जिहादियों (मुस्लिम पुरुषों) के लिए अब हथियारों के प्रशिक्षण शुरू हो चुके थ। कश्मीर घाटी में खूनी कलाश्निकोव संस्कृति का उद्भव साफ देखा जा रहा था, कश्मीर घाटी में आतंकवादी कश्मीरी पंडितों व सिखों को मार रहे थे। सरकार और प्रशासन पूरी तरह से साथ-साथ गायब हो गए थे। पुलिस को कहीं देखा नहीं जाता था। कश्मीरी हिंदुओं ने जिहादियों से अपना जीवन व अपने आने वाली पीढ़ी को बचाने के लिए कश्मीर घाटी छोड़ने का निर्णय लिया और इस प्रकार 20 वीं सदी का अपने ही देश में सबसे बडा व भारी पलायन शुरू हुआ। तीन लाख पचास हजार से अधिक कश्मीरी पंडितों ने अपने पूर्वजों की, अपने सभी देवी देवताओं की भूमि, जिस मिट्टी में उनकी जड़ें थीं, (कश्मीर घाटी) छोड़ दी और दूर और अपरिचित भूमि में बस गए। जम्मू के निर्जन, अस्थायी में शिविरों में सांप और बिच्छू के काटने, दर्दनाक गर्मियों में और अंत में भयानक रोगों के साथ मरने के लिए उन्हें छोड़ दिया गया। पिछले 25 वर्षों में कश्मीरी पंडितों एवं सिखों की दो पीढ़ियां समाप्त हो चुकी हैँ। इसमें हम सभी देशवासियों को अपने लाभ और राजनीति से ऊपर उठकर कश्मीरी हिंदुओं के सम्मान पूर्वक और सुरक्षित कश्मीर में पुनर्वास के लिए कदम उठाने होंगे। भारत की सांस्कृतिक विरासत का एक हिस्सा नष्ट कर दिया गया है, भारत की सभ्यता का एक अध्याय मिटा दिया गया है। इस देश में सामाजिक कार्यकर्ता समलैंगिकों के अधिकारों के लिए चिंतित हैं, जानवरों के साथ भी नैतिक व्यवहार करने के लिए श्रीमती मेनका गांधी कार्यरत हैं, मैं उनके कार्य की सराहना करता हूँ किंतु इस देश में कोई भी नेता या इस देश की और राज्य की सरकार कश्मीरी पंडितो एवं सिखों के जीने के अधिकार, स्वतंत्रता के अधिकार, न्याय के अधिकार, सुरक्षा के अधिकार के बारे में नहीं सोचते हैं ना चर्चा करते हैं। इस समय कश्मीरी पंडित और सिख अपनी खोई हुई पहचान के साथ विस्थापित टेंटों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जीवन जीने के लिए मजबूर हैं, उनके घावों, उनकी मानसिक और शारीरिक पीड़ा के लिए में कौन सी सरकार और कौन सा प्रशाशन जवाब देह है। उनके जख्म भरने लायक नहीं हैँ।

मैं एक 48 वर्षीय हिंदू व्यक्ति हूँ, कुछ समय पहले मैंने - मिशन कश्मीर - शुरू किया है। मुझसे कुछ मित्रों ने पूछा कि 25 /26 वर्ष बाद क्यों, अभी तक आप कहां थे। मैं कमल किशोर शर्मा 1986 से सब कुछ बहुत गहराई और नजदीकी से देख रहा था। लगता था कश्मीरी पंडित एवं सिख अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं और वे अपना अधिकार हासिल कर लेंगे किंतु, वह दिन नहीं आया। पिछले कुछ समय से किसी भी राजनीतिक या किसी और प्रकार के संगठन से कोई मदद नहीं मिली। अब हमने कुछ गैर राजनीतिक व वास्तविक मानव मित्रों के साथ खुद की क्षमता के साथ मिशन कश्मीर शुरू किया है जो है जिसका नाम है जस्टिस फॉर कश्मीरी पंडित एंड सिख। इसका गहराई से अध्ययन करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा, कि कश्मीरी पंडितों को न्याय इसलिए नहीं मिला क्योंकि वह अपनी लड़ाई अकेले लड़ रहे थे। दादरी (U.P.) अखलाक वाली घटना के बाद सभी मुस्लिम (राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक, कलाकार, बुद्धिजीवी, पत्रकार_ हर तरह का मुस्लिम) राजनीतिक दलों के नेता, सामाजिक नेता, अखबार और सभी टेलीविजन बुद्धिजीवी वर्ग उसके परिवार के साथ थे। अखलाख के परिवार की लड़ाई , अखलाक के परिवार की कम और इस देश के मुसलमानों की अधिक थी। पूरे देश का मुस्लिम समाज उसके साथ खड़ा था, आजम खान ने तो संयुक्त राष्ट्र संघ में चिट्ठी भी लिखी थी कि भारतवर्ष में अल्पसंख्यकों पर क्या अत्याचार हो रहे हैं, असहिष्णुता को अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया गया था, यदि मैं गलत हूं तो मुझे सही करें। इसीलिए अखलाक को अच्छे से अच्छा इलाज , मकान फ्लैट और नगदी के रूप में बहुत बड़ी रकम मिली। शायद इसका कारण यह था कि मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या लगभग 20 करोड़ है और कश्मीरी पंडित व सिख 7 से 10 लाख के करीब है, यानि मुस्लिम बहुत बड़ा वोट बैंक हैं और कश्मीरी हिंदू ना के बराबर। जिस प्रकार सितंबर 2014 में कश्मीर में और नवंबर 2015 में मद्रास में बाढ़ के समय में पूरा देश ईस विपत्ति में उनके साथ था, उसी प्रकार से मैं सोचता हूँ, मेरा सुझाव है कि पूरे देश के हिंदुओं को कश्मीर के हिंदुओं व सिखों को नयाय दिलाने के लिए एकत्र और संगठित होकर संघर्ष करना चाहिए। 

एक महत्वपूर्ण बात मैं आपको बताना चाहता हूं, कि कश्मीर में चल रहे आतंकवाद और जिहाद में मुझ पर या मेरे परिवार पर, मेरे किसी नजदीकी रिश्तेदार या मित्र पर इन घटनाओं का कोई प्रभाव अथवा कोई हानि नहीं पहुंची है परंतु, मैं अपने कश्मीर के इन हिंदुओं व सिक्खों को न्याय दिलाने के लिए वचनबद्ध हूँ और इसके लिए मैं काफी समय से प्रयास कर रहा हूँ और आशा करता हूँ कि आप भी मानवता से जुड़े जिस कार्य में मेरे साथ हैं। 

कश्मीर की कहानी है ।
पूरे देश को सुनानी है।।

वंदेमातरम

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