मोसुल में मारे गए 39 सिख थे : अब खालिस्तानी चुप क्यों?

Written by शनिवार, 31 मार्च 2018 12:37

मोसुल के पास एक टीले में दफ़्न 39 अभागे भारतीयों की लाशें मिल गयी हैं (Mosul Killings)। उनके लम्बे बालों से पहचान हुई है कि मारे गए अधिकाँश लोग सिक्ख थे।

अपनी धरती से दूर, रूखी-सूखी खा कर अजनबियों के बीच पैसा कमाने गये लोगों की मौत दुखद है। होना यह चाहिए था कि आक्रोश से हम भारतीयों की मुट्ठियाँ भिंच जातीं, हम दाँत पीसने लगते मगर हुआ यह है कि टी वी की बहसों के लिये कई दिनों के लिए मसाला मिल गया है। अख़बारों में कई कॉलम की ख़बरें लिखी जा रही हैं। आइये देखें कि कैसे समाचार बनाये जा रहे हैं, किस तरह की बहसें हो रही हैं?

सरकार ने चार साल पहले मोसुल में 39 भारतीयों की हत्या (39 Indians Killed in Mosul) पर देश को सही सूचना नहीं दी। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने पूछा है कि जून 2014 से जुलाई 2017 के बीच सात बार विदेशमंत्री ने कहा है कि अपहृत भारतीय जीवित हैं। सरकार को बताना चाहिए कि वह क्यों झूठा आश्वासन दे रही थी ? ईराक़ और सीरिया (ISIS in Iraq and Syria) के लोगों को भले ही आई एस आई एस से मुक्ति मिल गयी है मगर दुनिया पर से इसका ख़तरा समाप्त नहीं हुआ है। आई एस आई एस की विचारधारा से प्रेरित कटटरपंथियों के लोनर वुल्फ़ अटैक {अकेले आतंकवादी का हमला} से निबटने का तरीक़ा अमरीका और योरोप समेत दुनिया के कई देशों को समझ नहीं आ रहा। सीरिया और ईराक़ के बाहर अफ़्रीक़ी देशों में आई एस आई एस की पैर ज़माने की कोशिश कामयाब नहीं हो पायी हैं। बलूचिस्तान के दुर्गम पहाड़ी इलाक़ों में आई एस आई एस के ठिकाना बनाने की गोपनीय सूचना अब आम हो गयी हैं। पाकिस्तान में शरिया क़ानून लागू करने का सपना देखने वाले आतंकी संगठनों और आई एस आई एस के बीच नया गठजोड़ भी सामने आने लगा है।

अफ़ग़ानिस्तान में आई एस आई एस वहाँ के मूल आतंकवादी संगठन तालिबान से कड़ी टक्कर मिल रही है। आई एस आई एस से बड़ा ख़तरा ईराक़ और सीरिया से भाग कर पूरी दुनिया में फैल गये उसके लडके और उनकी कट्टर विचारधारा है। भारतीय सुरक्षा एजेंसियाँ हालाँकि देश में आई एस आई एस के अस्तित्व से इंकार करती हैं मगर कश्मीर में विरोध प्रदर्शनों में आई एस आई एस का झंडा लहराना आम बात हो गयी है। पप्पू बोले सरकार 39 भारतीयों की 4 वर्ष पहले हुई हत्या से देश का ध्यान बांटने के लिये नये-नये इश्यू खड़े कर रही है। उनकी समझ में भारतीय इतने भोले हैं कि वो यह तो सोचेंगे ही नहीं कि चार साल बाद आपके दर्द कैसे उठा? आख़िर चार साल से आप लोग ग़ायब थे। आप किसी एक के भी घर गए? आपकी पार्टी का कोई प्रमुख नेता उन दुखी लोगों से मिला? एक मात्र जीवित बचे हरजीत मसीह ने फिर से मीडिया के सामने आ कर बताया कि वो और मारे गए 39 भारतीयों के साथ 60 बांग्लादेशी भी एक ईराक़ी कम्पनी में काम करते थे। 2014 में जब ईराक़ पर आतंकियों ने क़ब्ज़ा किया तो एक रात क़रीब नौ बजे सभी लोगों को गाड़ियों में बिठा कर सुनसान जगह पर ले गए। यहाँ दो दिन रखने के बाद बांग्लादेश के नागरिकों को भारतीयों से अलग कर दिया गया। इसके बाद मेरे सहित सभी भारतीयों को गोली मार दी गयी। क़िस्मत से एक गोली उमेरी टांग छू कर निकल गयी और मैं बच कर भाग निकला।

आतंकियों ने मुझे फिर पकड़ लिया। मैंने खुद को बांग्लादेशी और नाम अली बताया। वहां से मुझे बांग्लादेशी कैम्प भेजा गया और फिर मैं भारत लौट आया। टी वी पर बहसें हो रही हैं, समाचारपत्रों में लेख, सम्पादकीय आ रहे हैं और न्यूनाधिक इन्हीं मुद्दों पर चर्चा हो रही है। यहाँ एक बात स्पष्ट दिखाई दे रही है कि बहस करने वाले, लेख लिखने वाले तटस्थ और निस्पृह हो कर काम कर रहे हैं। वो ऐसे बात कर रहे हैं जैसे मई-जून में ठंडे नगर नैनीताल में हों और उन्हें मध्य प्रदेश में लू चलने पर वक्तव्य देना हो। 39 भारतीयों की भयानक मृत्यु उनके लिये ऐसी घटना है जिससे उनका कुछ ख़ास लेना-देना नहीं है। हर बहस, लेख से मसीह का यह वक्तव्य नदारद है कि "बांग्लादेश के नागरिकों को भारतीयों से अलग कर दिया गया। इसके बाद मेरे सहित सभी भारतीयों को गोली मार दी गयी" हत्या कोई सामान्य बात नहीं होती। यह हत्याएं क्रोध के कारण, दुश्मनी के कारण नहीं की गयीं। आख़िर उन्होंने अजनबी भाषा बोलने वाले, अपरिचित 39 भारतीयों को क्यों मारा और बंग्लादेशियों को क्यों छोड़ दिया? इस प्रश्न का बहस से बाहर होना बहुत भयानक बात है। अगर इन हत्याओं का कारण हम नहीं समझेंगे, समझना नहीं चाहेंगे तो इनको रोकेंगे कैसे? मोसुल ही नहीं ईराक़ और सीरिया के आतंकी क़ब्ज़े में रहे, लीजिये मैं स्वयं सच बोलने से बच रहा हूँ, इस्लामी आतंकियों के क़ब्ज़े में रहे शहरों, गांवों, पहाड़ियों, समुद्र तटों में सैकड़ों सामूहिक क़ब्रों की सूचना है जिनमें लाखों लोगों को मार कर दबा दिया गया। पकड़े गए कई इस्लामी आतंकवादियों ने स्वीकार किया है कि उन्होंने सात-आठ सौ से अधिक लोगों की हत्या की। सैकड़ों लड़कियों के साथ बलात्कार किया।

यह कोई पहली घटना नहीं है। पंद्रह सौ वर्षों से ऐसे हत्याकांड होते आये हैं। इन अरबी शान्तिदूतों के सारे प्रख्यात चरित्र ख़ूंखार लड़ाके रहे हैं। जिन्होंने अपनी दृष्टि में काफ़िरों, मुशरिक़ों, मुल्हिदों, मुर्तदों की हत्यायें की हैं। भारत की धरती पर तो शताब्दियों से ऐसे नृशंस नरसंहार चल रहे हैं। कारण केवल यह था कि इस धरती के लोग हत्यारी विचारधारा के साथ खड़े होने को तैयार नहीं थे। गुरु नानकदेव जी वाणी में इस्लामी आक्रमण के चश्मदीद वर्णन हैं। बाबर के पैशाचिक हत्याकांडों को उन्होंने जम कर कोसा है। मुसलमान बनाने से इंकार करने पर नवीं पादशाही गुरु तेग बहादुर जी की साथियों सहित शहीदी का गवाह दिल्ली का गुरुद्वारा शीशगंज सामने ही है। दसवीं पादशाही गुरु गोविंग सिंह जी के 2 बच्चों को मुसलमान न बनाने पर दीवार में जीवित चुना जाना हम सबकी स्मृति में है। वीर हक़ीक़त राय की बोटियाँ नोच-नोच कर बलिदान करना, वीर बंदा बैरागी के छोटे से बच्चे का कलेजा उनके मुँह ठूंसना फिर उनके टुकड़े-टुकड़े कर मारा जाना इतिहास के माथे पर अंकित है। ऐसे हत्याकांड इस्लाम विश्व भर में जहाँ उसका बस चलता है, करता आया है।

guru teg bahadur

39 केशधारियों की दुखद हत्या विषयक लेख के इस मोड़ पर कुछ प्रश्न मन में कौंध रहे हैं। कैनेडा, अमरीका, ब्रिटेन सहित अनेकों देशों में रह कर पाकिस्तान की फंडिंग से ख़ालिस्तान का हिंसक आंदोलन चलाया जाता रहा है। अभी कैनेडा के प्रधानमंत्री के भारत आगमन पर कैनेडा के ही ख़ालिस्तान समर्थक व्यवसायी को उनकी एम्बेसी के निमंत्रण की ख़ासी आलोचना हुई है। गुप्तचर एजेंसियों को इस की भी सूचना है कि ख़ालिस्तान के आंदोलन को फिर से खड़ा करने की जीतोड़ कोशिश हो रही है और तथाकथित खाड़कुओं की पाकिस्तान में ट्रेनिंग चल रही है। ख़ालिस्तान के पक्ष में आंदोलन करने वाले आतंकियों, अंड-बंड कमांडो फ़ोर्स के मरजीवड़ों से सवाल पूछना चाहूंगा कि क्या तुम्हारी आँखें यह देख पा रही हैं कि इस्लामियों के हाथों निहत्थे मारे गए ये 39 अभागे लोग केशधारी थे? क्या तुम समझ पा रहे हो कि अपनी धरती से दूर, रूखी-सूखी खा कर अजनबियों के बीच कमाने गये लोगों की मौत उसी कारण हुई जिस कारण नौवीं पादशाही गुरु तेग बहादुर जी का दिल्ली में शीश उतरा गया था। तुम्हें अंदाज़ा है ना कि जिस कारण दसवीं पादशाही गुरु गोविन्द सिंह के साहबज़ादे दीवार में चुने गए थे उसी कारण ये 39 लोग भी मार दिए गए? तुम्हें कभी सूझा है कि वो दो छोटे बच्चे ज़िंदा दीवार में चुने जाने पर कैसे तड़प-तड़प कर मरे होंगे? उनकी जान कैसे घुट-घुट कर निकली होगी?

जिस धर्म की रक्षा के लिये इतने बलिदान हुए उस धर्म की विरोधी "काफ़िर वाजिबुल क़त्ल {काफ़िर मर डालने योग्य है }" क़ित्ताल फ़ी सबीलिल्लाह {अल्लाह की राह में क़त्ल करो} जिहाद फ़ी सबीलिल्लाह {अल्लाह की राह में जिहाद करो} मानने वाली विचारधारा के साथ खड़े होते हुए तुम्हारे पैर नहीं टूट गये ? गुरुओं के हत्यारों, उनके सिक्खों के हत्यारों से, जिस धर्म के लिये गुरुओं ने बलिदान दिए, के विरोध में पैसे लेते हुए तुम्हारे हाथ नहीं गल गये? तुम गुरु गोविंद सिंह जी का यह वाक्य भूल गए कि "तेल में हाथ डाल कर तिलों में हाथ डालने पर जितने तिल चिपकें, उतनी क़सम भी तुर्क खाये तो भरोसा मत करना"। अब धर्म पर ही नहीं अपितु विश्व भर पर संकट आया है। मनुष्यता की रक्षा के लिये उठ खड़े होने का समय है और क्या, कब और कैसे तुम्हें भी तय करना है। 

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