SC/ST एक्ट जैसे छः-सात क़ानून और हैं : जानिये कौन से?

Written by बुधवार, 04 अप्रैल 2018 19:57

सामान्यतः आप सभी लोगों ने एक बात जरूर सुनी होगी कि न्यायतंत्र एवं संविधान के मूल सिद्धांत के अनुसार भले ही दस अपराधी छूट जाएँ परन्तु किसी निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए.

इसी सिद्धांत के तहत “जमानत” का प्रावधान किया जाता है, ताकि यदि व्यक्ति बाद में आगे चलकर बेक़सूर साबित हो तो भी उसका जीवन और दिनचर्या बाधित न हो. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने “महाराष्ट्र सरकार बनाम महाजन” के एक मामले की सुनवाई करते हुए एससी-एसटी एक्ट (SC ST Act) की उस धारा में संशोधन किया है, जिसके अनुसार किसी भी दलित की शिकायत मात्र पर आरोपित व्यक्ति को सीधे जेल में ठूँस दिया जाता था और उसे जमानत नहीं मिलती थी. इस सशक्त क़ानून की इस एकमात्र अन्यायपूर्ण धारा को संशोधित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि पीड़ित दलित की शिकायत दर्ज की जाए, मुकदमा कायम किया जाए, DSP स्तर का अधिकारी केस की विवेचना करे और यदि व्यक्ति दोषी पाया जाता है तो उसे इसी क़ानून के अनुसार सजा भी मिले... इसके अलावा आरोपित व्यक्ति की ही यह जिम्मेदारी है कि वह सिद्ध करे कि वह निर्दोष है, जिस दलित ने उत्पीडन का आरोप लगाया है उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है. परन्तु उस व्यक्ति को इस पूरी प्रक्रिया के दौरान जेल में न रखते हुए जमानत पर रिहा कर दिया जाए. इस निर्णय के खिलाफ पूरे देश में अनावश्यक बवाल खड़ा किया जा रहा है, जबकि वास्तविकता यह है कि कम से कम छह और क़ानून ऐसे हैं जिनमें आरोपित व्यक्ति को ही सिद्ध करना पड़ता है कि वह निर्दोष है, और इन कानूनों में भी आसानी से जमानत नहीं मिलती. जानिये ये कौन से क़ानून हैं.

१. भ्रष्टाचार निवारण क़ानून 1988 (Anti Corruption Act) :-

भ्रष्टाचार निवारण क़ानून भी संविधान की धारा 17 के अंतर्गत यह मानकर चलती है कि किसी लोकसेवक ने यदि भ्रष्टाचार किया है, रिश्वत ली है तो उसी को सिद्ध करना है कि उसने यह अपराध नहीं किया है.

२. नारकोटिक्स एंड साईकोट्रॉपिक ड्रग्स एक्ट (NDPS) 1985 :-

NDPS क़ानून की धारा 54 यह मानकर चलती है कि जिस व्यक्ति के पास से प्रतिबंधित ड्रग्स एवं दवाएँ मिली हैं, वह दोषी ही है. इसी क़ानून की धारा 35 के अंतर्गत न्यायालय यह मानकर चलता है कि जिस व्यक्ति के पास ऐसे ड्रग्स मिले हैं उसी को यह सिद्ध करना है कि उपरोक्त दवाएँ उसके पास क्यों हैं? और उनका वैध चिकित्सकीय कारण बताना होगा. इसमें भी जमानत आसानी से नहीं मिलती है.

३. अत्यावश्यक वस्तु अधिनियम 1955 (Essential Commodity) :-

किसी भी आपात स्थिति में सरकार इस क़ानून को किसी क्षेत्र अथवा राज्य में सक्रिय कर सकती है. यह क़ानून किसी वस्तु, उपज अथवा जनता के लिए किसी अत्यावश्यक वस्तु के संग्रहण एवं कालाबाजारी पर रोक लगाने के लिए होता है. उदाहरण के लिए यदि किसी सरकार ने “शकर” को इस क़ानून के तहत एसेंशियल कमोडिटी घोषित किया, तो फिर कोई भी व्यक्ति निजी अथवा व्यापार की दृष्टि से सरकार द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक का स्टॉक अपने पास नहीं रख सकता. यदि ऐसा पाया जाता है तो उस व्यक्ति (या व्यापारी) की सीधे गिरफ्तारी होती है और उसी को यह सिद्ध करना पड़ता है कि वह निर्दोष है. परिस्थितियों को देखते हुए कई बार इसमें भी जमानत मिलने में दिक्कत होती है.

४. खाद्य अपमिश्रण क़ानून 1955 (Food Adulteration Act) :-

इस क़ानून के धारा 19 के तहत यदि किसी दुकान अथवा होटल से ऐसा कोई प्रतिबंधित ड्रग, कॉस्मेटिक अथवा खाद्य पदार्थ जब्त होता है, जो कि आम जनता के लिए हानिकारक एवं घातक होता है तो उस व्यापारी को ही यह सिद्ध करना पड़ता है कि उस वस्तु में कोई मिलावट उसकी तरफ से नहीं की गई है. इस मामले में सामान्यतया जमानत मिल जाती है, लेकिन खुद को निर्दोष सिद्ध करने की जिम्मेदारी व्यापारी की ही है.

५. कस्टम्स एक्ट 1962 (Customs Act) :-

इस क़ानून की धारा 123 के तहत आरोपित व्यक्ति को ही यह सिद्ध करना है कि विदेश से वह जो सामान लेकर आया है, वह पूरी तरह से वैध और कानूनी रसीद के साथ लाया गया है. कस्टम अधिकारी को केवल संदिग्ध व्यक्ति के खिलाफ केस करना होता है, निर्दोष बरी होने और सिद्ध करने की जिम्मेदारी आरोपित की है, सरकार की नहीं.

६. दहेज संबंधी मृत्यु क़ानून 1860 (Dowry Related Death Act) :-

भारतीय दण्ड संहिता 1860 के खंड 304-B के तहत विवाह के सात वर्षों के अंदर यदि किसी महिला की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु होती है तो पुलिस आरोपित को जेल की हवा खिला सकती है. महिला की जलकर मृत्यु होने, शरीर पर घाव पाए जाने इत्यादि स्थितियों में पति और उसके परिवार वालों को ही यह सिद्ध करना पड़ता है कि यह मृत्यु दहेज संबंधी मृत्यु नहीं है और उन्होंने उस महिला को प्रताड़ित नहीं किया है.

अर्थात केवल SC/ST Act ही ऐसा क़ानून नहीं है, जिसमें निर्दोष के फँसने की पूरी संभावना है, ऐसे उपरोक्त क़ानून भी हैं जिनमें व्यक्ति निर्दोष तो बाद में छूटेगा, लेकिन उस पर मुकदमा जाँच से पहले ही दायर हो जाएगा. सोनिया गाँधी की अध्यक्षता में यूपीए सरकार भी ऐसा एक घातक क़ानून “साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा क़ानून” नामक काला क़ानून लाने वाली थी, जिसमें किसी मुसलमान की शिकायत मात्र पर हिन्दू को गिरफ्तार किया जा सकता था, और इसमें भी जमानत नहीं होती.  इसी प्रकार दिल्ली की क्रूर निर्भया बलात्कार घटना के बाद महिला संगठनों एवं विभिन्न NGOs के दबाव में सरकार ने एक और क़ानून बनाया जिसे “पोक्सो” (POCSO) एक्ट बनाया है, जिसमें जमानत का कोई प्रावधान नहीं है और सम्बन्धित आरोपी को ही सिद्ध करना है कि वह निर्दोष है. इस क़ानून के दुरुपयोग की भी ख़बरें अभी से आने लगी हैं.

कहने का तात्पर्य यह है कि क़ानून में ऐसी कई धाराएँ और न्याय व्यवस्था में ऐसी कमियाँ हैं, जिनके अंतर्गत पर्याप्त संख्या में निर्दोषों के वर्षों तक जेल में सड़ने की पूरी संभावना बनी रहती है. सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल केवल SC/ST क़ानून में हल्का सा संशोधन किया है, ताकि निर्दोषों को थोड़ी राहत मिल सके.

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मूल लेख :- अनंत कृष्णा

अनुवाद :- सुरेश चिपलूनकर 

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