भारतीय संस्कृति में आतिशबाजी का इतिहास (तथ्य और चित्र)

Written by शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2017 20:57

माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रकाश के त्योहार दिवाली पर आतिशबाजी पर रोक लगाने के साथ ही देश में आतिशबाजी की परम्परा तथा चलन पर एक बहस छिड़ गई है. पटाखों (आतिशबाजी) के चलन को नकारने वाले मुख्य रूप से दो तर्क दे रहें हैं -

1. आतिशबाजी एक आधुनिक आविष्कार है

2. आतिशबाजी भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं हैं

ये दोनों दावे पहली नज़र में ही खारिज करने योग्य हैं. भारतीय संस्कृति में प्रत्येक आनन्द के उत्सव, त्योहार आदि में लगभग 3000 वर्षों से आतिशबाजी की परंपरा रही है. पटाखें मुख्यतः बारूद के चूर्ण से बनतें है, जिसका ज्ञान भारतीयों को बहुत पहले था, रसायन शास्त्र से संबंधित सर्वाधिक पुरानी पुस्तकें संस्कृत में ही मिलती हैं. इसी बारूद से गनपाउडर बनाया जाता है, महाभारत, रामायण कालीन अग्निबाण इसी का उदाहरण है. लगभग 2300 वर्ष पुरानें कौटिल्य के अर्थशास्त्र में अग्निचूर्ण के प्रयोग का वर्णन प्राप्त होता है, चीनी विद्वानों की पुस्तकों से यह ज्ञात होता है कि भारत में इस अग्निचूर्ण का प्रयोग सैन्य उद्देश्यों के अलावा उत्सवों में रंगीन रोशनी निकालने के लिए भी किया जाता था.

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(यह जर्मन इंडोलॉजिस्ट गुस्तव ओपोर्ट की पुस्तक का उद्धरण है जिसमें उन्होंने गनपाउडर के आविष्कार का श्रेय भारत को दिया है तथा चीन के क्लेम को नकारा है)

 

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(ये दाराशिकोह की शादी का चित्र है)

 भारत से प्राप्त इस विधा का उपयोग चीनियों ने कई प्रकार से किया उन्होंने इससे धीमी आवाज के पटाखे, शॉवर तथा रॉकेट आदि को बनाना सीखा तथा 16 वीं शताब्दी तक भारत एवं यूरोप को आतिशबाजी का निर्यात करने लगा. मध्यकालीन भारत में 1609 में आदिलशाह की शादी में 80 हजार रुपये की आतिशबाजी की गई थी, जबकि उसी समय 1687 में रोम के साथ अपने व्यापारी सम्बन्ध रखने वाले बैंगलोर को चिक्कादेवराय वाडियार ने 3 लाख रुपयों में खरीदा था, आप आदिलशाह द्वारा आतिशबाजी पर खर्च की गई रकम की कीमत का अंदाज लगा सकतें है. 1633 का दाराशिकोह की शादी का एक चित्र प्राप्त होता है जिसमें समारोह में की गई आतिशबाजी को दर्शाया गया है. 16-17 वीं शताब्दी के कई ऐसे चित्र मिलते है जिसमें दीवाली में की जा रही आतिशबाजी को दिखाया गया है. (सभी चित्र पोस्ट के साथ संलग्न हैं). औरंगजेब के शासनकाल में 1665 में दिवाली पर आतिशबाजी करने पर रोक लगाई गई, जिस आशय का पत्र बीकानेर संग्रहालय में सुरक्षित है तथा पोस्ट में संलग्न है.

 

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(ये सारे चित्र वारेन हेस्टिंग्स के कृपापात्र सीताराम द्वारा बनाये गए है, ब्रिटिश आर्काइव में सुरक्षित हैं)

 

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(यह औरंगजेब द्वारा 1665-67 में आतिशबाजी पर लगाई गई रोक का आज्ञापत्र है, बीकानेर संग्रहालय में सुरक्षित है)

 

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(यह तमिलनाडु के तिरुवरूर स्थित त्यागराज मंदिर में 700 वर्ष पुरानी पेंटिंग है, जिसमें दीपावली के समय पटाखे चलाने का चित्रण किया गया है.)

17-18वीं शताब्दी में भारत में आतिशबाजी का चलन तेजी से बढ़ा तथा यह उत्सव की शान बढ़ाने का एक साधन बन गया. 1815 में फतेहगढ़ को लॉर्ड मॉरिया के स्वागत में कुछ इस तरह की सजाए गए थे और जमकर आतिशबाजी की गई थी. 1815 में ही लखनऊ के नबाब के सम्मान में रंगबिरंगी आतिशबाजी की गई थी. आतिशबाजी की इस कला ने समाज में कई आतिशबाजों को स्थापित किया. लार्ड वारेन हेस्टिंग्स के कृपापात्र चित्रकार सीताराम ने अपने चित्रों में आतिशबाजी तथा विभिन उत्सवों और की जा रही चित्रकारी को दिखाया है. 19वीं सदी की शुरुआत में आतिशबाजी की बढ़ती मांग को देखते हुए दासगुप्ता ने कलकत्ता में भारत की पहली पटाखा फेक्ट्री डाली, जहां धीमी आवाज के पटाखें, लाइट फाउन्टेन, फुलझड़ी बनाई जाती थी, बाद में यह व्यवसाय तमिलनाडु के शिवकाशी में स्थापित हो गया. इस प्रकार यह प्रमाणित होता है कि भारत में आतिशबाजी की परम्परा आधुनिकता की देन नहीं है, बल्कि वर्षों पुरानी है.

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