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हमारी शस्त्र निपुणता और मल्ल विद्या कहाँ खो गई?

Written by शनिवार, 29 जुलाई 2017 08:27

प्राचीन भारत में हमारे ऋषि-मुनियों एवं विद्वानों ने जनता को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रखने के लिए परम्पराओं में कई ऐसे खेल आविष्कार कर दिए थे, जिनके द्वारा न सिर्फ हिन्दुओं का युद्ध कौशल उभरकर सामने आता था, बल्कि शस्त्रों को पहचानने, उनके द्वारा सटीक हमला करने एवं उनसे बचाव करने की तकनीक भी व्यक्ति खेल-खेल में ही सीख जाता था.

ज़ाहिर है कि एक बार बचपन में किसी को हथियारों एवं युद्ध कौशल का ज्ञान करवा दिया जाए तो वह आजीवन नहीं भूलता. माता सरस्वती को छोड़कर हिन्दुओं के एक भी देवता ऐसे नहीं हैं जिनके हाथों में अस्त्र-शस्त्र नहीं हों. शास्त्रों-वेदों के साथ शस्त्र का होना भी उतना ही आवश्यक है. लेकिन केवल शस्त्र घर में रखकर कोई लाभ नहीं, उन शस्त्रों को चलाने की कला भी होनी चाहिए. पता नहीं कैसे शनैः-शनैः हिन्दुओं के घरों से न सिर्फ हथियार गायब होते चले गए, बल्कि स्कूलों एवं बच्चों के नियमित खेलों में भी मल्ल युद्ध की तकनीकें एवं मानसिक “फिटनेस” हेतु कुछ शस्त्र चलाने का अभ्यास भी लुप्त होता चला गया.

चीनी यात्री ह्वेन-सोंग तथा फा-ह्यांन ने अपनी भारत यात्रा के विवरणों में इस बात का उल्लेख किया है कि नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों में तलवारबाजी, तैराकी, धनुर्विद्या जैसे कई खेल आमतौर पर खेले जाते थे. यह भी उल्लेखनीय है कि मोहन जोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई में सिन्धु घाटी सभ्यता के कई हथियार मिले हैं, जिनमें कुल्हाड़ी, भाला, तलवार, चक्र इत्यादि शामिल हैं. तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि न केवल राजपरिवार की, बल्कि सामान्य जनजीवन में काम करने वाली गरीब महिलाएँ भी उस कालखंड में युद्ध-कौशल में माहिर होती थीं. राजाओं ने कई ऐसे युद्ध लड़े जिनमें महिलाओं ने बढचढकर हिस्सा लिया. इतिहास में अधिक पीछे जाने की भी जरूरत नहीं, आज भी भारत के ऐसे कई राज्य हैं, जहाँ उनके पारंपरिक युद्ध कौशल वाले खेल प्रचलन में हैं, जैसे कि केरल का मार्शल आर्ट “कलरिपयात्तू”, तथा पंजाब की सिख परंपरा में “गतका”. इसी प्रकार तमिलनाडु में सांडों को काबू में करने वाला खेल “जलीकट्टू” हो या फिर महाराष्ट्र का मलखम्ब और दही-हांडी... ऐसे खेलों द्वारा युवाओं एवं बच्चों में प्रतिस्पर्धा की भावना मजबूत होती है साथ ही आक्रामकता एवं मल्ल-कौशल में वृद्धि होती है.

 

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भारतीय शस्त्र विद्या बहुत परिपूर्ण एवं वैज्ञानिक शिक्षा लिए हुए है. शस्त्र विद्या के नाम से एक पूरा ग्रन्थ भारतीय परंपरा में मौजूद है, जिसमें निशस्त्र होने पर भी युद्ध के मैदान में प्राकृतिक वस्तुओं से हथियार कैसे बनाए जाते हैं, इसका भी उल्लेख है. बौद्ध धर्म की शिक्षाओं के साथ भारतीय मार्शल आर्ट की यह कलाएँ धीरे-धीरे चीन और जापान में पहुँचीं और विकसित हुईं, लेकिन दुर्भाग्य से भारत में यह विलुप्त होती चली गयी. आज के बच्चों को स्कूल में केवल और केवल पढ़ाई पर ध्यान देने को कहा जाता है. आधुनिक बच्चों में आक्रामकता का नितांत अभाव है, इस समय उनकी जो भी आक्रामकता है वह केवल वीडियो गेम्स और सोशल मीडिया में व्यर्थ हो रही है. विभिन्न शस्त्रों के नाम... उन्हें कैसे चलाया जाता है... उनसे कैसे बचाव किया जाता है... कैसे बनाया जाता है... इत्यादि बातें अब आधुनिक बच्चे केवल गूगल पर सीखते हैं, प्रैक्टिकल कुछ भी नहीं. रही-सही कसर भारत की आज़ादी के बाद से ही “अहिंसा परमोधर्मः” जैसे डरपोक और नकली नारे ने कर दी है. हालाँकि सिख समुदाय (जो कि गुरु तेगबहादुर के समान वीर एवं हिन्दू-रक्षक के रूप में प्रसिद्द है) ने अपनी परंपरा को छोड़ा नहीं है. पंजाब में “गतका” नामक खेल आज भी खूब लोकप्रिय है.

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इतिहास में थोड़ा पीछे जाएँ तो हम पाते हैं कि सिख परंपरा में यह मल्ल-युद्ध एवं शस्त्र चालन की विद्याएँ उनके गुरुओं से ही उन्हें प्राप्त हुई हैं. मुगलों के सर्वाधिक और सबसे पहले हमले हमेशा पंजाब ने ही झेले हैं, तो स्वाभाविक है कि एक “लड़ाकू मानसिकता” का समुचित विकास वहाँ हुआ है. गुरुओं के अलावा महाराजा रंजीत सिंह जैसे महान राजाओं ने भी अपनी प्रजा को आत्मरक्षण एवं शस्त्र संचालन सिखाने में कोई कमी नहीं रखी. गुरुकुलों में तथा आम जनजीवन में परम्परानुसार ही ऐसे खेल रखे गए थे कि जिनके द्वारा बच्चे और युवा कुछ सीख सकें. लठ्ठ चलाना (जिसे कहीं-कहीं सोटी भी कहा जाता है) जैसी सामान्य सी विद्या से लेकर घातक हथियारों के संचालन एवं उनमें निपुणता प्राप्त करना ही इन खेलों का उद्देश्य होता था. आजकल ये खेल धीरे-धीरे विलुप्त हो रहे हैं. इसी प्रकार केरल का मार्शल आर्ट “कलरीयपट्ट” भी एक वर्ग विशेष तक ही सीमित रह गया है.

लड़ाई, खेल, कौशल, आक्रामकता.... इनके प्रति आधुनिक शिक्षा की यह उदासीन मानसिकता निश्चित रूप से चिंता की बात है. हिन्दुओं की पूरी पीढ़ी को अंगरेजी शिक्षा, करियर बिल्डिंग, अहिंसा, इत्यादि का पाठ पढ़ा-पढ़ाकर कमज़ोर किया जा रहा है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि अब स्कूलों तथा समाज के खेलों में पश्चिमी खेलों को अधिक बढ़ावा दिया जा रहा है. जबकि भारतीय पारंपरिक युद्ध एवं मल्ल कौशल वाले खेल जैसे कबड्डी, खो-खो, मलखंभ, कुश्ती इत्यादि या तो गायब हो रहे हैं, अथवा इन खेलों की पहुँच एवं रूचि एक सीमित वर्ग तक ही रह गयी है जो या तो “खेलों में करियर” बनाने अथवा “खेल द्वारा करियर” बनाने तक ही रहती है. शस्त्रों की जानकारी एवं उनका संचालन आज एक सामान्य हिन्दू परिवार में वर्जित सा माना जाता है... जो कि निश्चित रूप से एक अंधकारमय भविष्य की तरफ इशारा करता है.

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