अवैध बूचड़खाने : नियम-क़ानून और अलीगढ़ी सेकुलर दर्द

Written by रविवार, 02 अप्रैल 2017 19:45

उत्तरप्रदेश में अवैध बूचड़खानों के खिलाफ योगी की सख्त कार्यवाही जारी है और उधर अवैध बूचड़खाने के मालिक, जिन्होंने कभी क़ानून का पालन नहीं किया, कभी नियमों के मुताबिक़ धंधा नहीं किया वे अपने सेकुलर बुद्धिजीवी मित्रों के गिरोह की मदद से देश की जनता को बता रहे हैं कि इससे “रोजगार” खत्म होने का खतरा है और “राजस्व” का नुक्सान भी है.

ये दोनों ही तर्क इतने बोदे और मूर्खतापूर्ण हैं कि कोई सामान्य बुद्धि वाला भी इसे तत्काल खारिज कर देगा. जिस धंधे में “अवैध” शब्द ही जुड़ा हुआ है, उसको कैसी रियायत?? अवैध के साथ कैसी सहानुभूति? सरकार को करोड़ों रूपए का चूना लगाकर मनचाहे स्थानों पर जानवर काटना और स्कूल, मंदिर जैसे स्थानों की परवाह नहीं करते हुए कहीं भी कटे हुए जानवर लाकर बेचना कहाँ तक न्यायसंगत है?

अवैध बूचड़खानों के “समर्थक” एक बार भी इस बात को कहने के लिए तैयार नहीं हैं कि... हाँ, ये बूचड़खाने अवैध हैं, इनसे प्रदूषण फैलता है, इनमें नियमों का पालन नहीं होता, इन से सरकार को धेला राजस्व भी नहीं मिलता... इसलिए हम इन अवैध बूचड़खानों को वैध करने के लिए लायसेंस और अन्य सभी कानूनी कार्यवाही पूर्ण करने के लिए तैयार हैं. लेकिन योगी जी समझदार हैं, ईमानदार हैं... उन्हें माँस खाने वालों की सेहत एवं साफसफाई का भी ध्यान रखना है तथा राज्य के खजाने को मिलने वाले राजस्व को भी बढ़ाना है. इस संबंध में जारी प्रशासन की ताजा गाइडलाइंस से मीट कारोबारियों में हड़कंप मचा हुआ है। मीट को “इंसुलेटेड फ्रीजर वैन” में ढोना, मीट कारोबार से जुड़े सभी वर्करों का अनिवार्य हेल्थ सर्टिफिकेट, मीट की दुकानों की धार्मिक स्थलों और सब्जी की दुकानों पर पर्याप्त दूरी, ऐसे कई मानक हैं जिनकी जानकारी हाल ही में यूपी सरकार ने मीट दुकानदारों को भेजी है। माँस कटान कारोबार से जुड़े लोगों का मानना है कि मीट बेचने के लिए जरूरी ढांचागत सुविधाओं की लिस्ट इतनी लंबी-चौड़ी है, कि अधिकतर दुकानों के लिए इसका पालन मुमकिन नहीं और वे स्थाई तौर पर बंद हो जाएंगे।

अधिकारियों का कहना है कि यूपी में मीट बेचने से जुड़े नियम-कायदों में “कोई नया बदलाव नहीं” किया गया है। अंतर सिर्फ इतना आया है कि मायावती और अखिलेश सभी कानूनों को तोड़ने वालों की तरफ से आँखें मूँदे रहते थे और मीट कारोबारियों से उनके मधुर रिश्ते थे. करोड़ों रूपए के इस कारोबार के काले धंधे द्वारा सपा-बसपा को भी जमकर मोटा चंदा मिलता था, वोट भी मिलते थे. इसलिए सब अधिकारी और नेता क़ानून-नियमों को तोड़ते रहते थे. एक सीनियर अफसर ने कहा, 'नैशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल और सुप्रीम कोर्ट की तरफ से जारी आदेशों का सख्ती से पालन हो रहा है, हम तो बस स्थापित कानूनों का पालन करवा रहे हैं।' लेकिन काँग्रेस-सपा-बसपा और केजरीवाल को क़ानून के पालन से भी दिक्कत हो रही है. आईये देखें कि इस सम्बन्ध में गाईडलाईन क्या-क्या हैं...

1. मीट की दुकानों से कहा गया है कि वे धार्मिक स्थलों की परिधि से 50 मीटर की दूरी पर रहें। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उनकी दुकानें ऐसे स्थलों के मुख्य द्वार से कम से कम 100 मीटर दूर हों।

2. उनकी दुकानें सब्जी की दुकानों के पास नहीं होनी चाहिए।

3. दुकानदार जानवरों या पक्षियों को दुकान के अंदर नहीं काट सकते।

4. मीट की दुकानों पर काम करने वाले सभी लोगों को सरकारी डॉक्टर से हेल्थ सर्टिफिकेट लेना होगा।

5. मीट की क्वॉलिटी को किसी पशु डॉक्टर से प्रमाणित कराना होगा।

6. शहरी इलाकों में लाइसेंस पाने के लिए आवेदकों को पहले सर्किल ऑफिसर और नगर निगम की इजाजत लेनी होगी। फिर फूड सेफ्टी एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन से एनओसी लेनी होगी।

7. ग्रामीण इलाकों में मीट दुकानदारों को ग्राम पंचायत, सर्किल अफसर और एफएसडीए से एनओसी लेनी होगी।

8. मीट के दुकानदारों को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे बीमार या प्रेगनेंट जानवरों को न काटें।

9. मीट के दुकानदारों को हर छह महीने पर अपनी दुकान की सफेदी करानी होगी।

10. उनके चाकू और दूसरे धारदार हथियार स्टील के बने होने चाहिए।

11. मीट की दुकानों में कूड़े के निपटारे के लिए समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।

12. बूचड़खानों से खरीदे जाने वाले मीट का पूरा हिसाब-किताब भी रखना होगा।

13. मीट को इंसुलेटेड फ्रीजर वाली गाड़ियों में ही बूचड़खानों से ढोया जाए।

14. मीट को जिस फ्रिज में रखा जाए, उसके दरवाजे पारदर्शी होने चाहिए।

15. सभी मीट की दुकानों पर गीजर भी होना आवश्यक है।

16. दुकानों के बाहर पर्दे या गहरे रंग के ग्लास की भी व्यवस्था हो ताकि जनता को जानवरों के कटे सिर और खून आदि नजर न आए।

17. FSSA के किसी मानक का उल्लंघन होते ही लाइसेंस तुरंत रद्द कर दिया जाएगा।

सरकार के इस नोटिफिकेशन की मीट विक्रेता जमकर आलोचना कर रहे हैं। “सर्वदलीय मुस्लिम संघर्ष समिति” के राष्ट्रीय अध्यक्ष जमीलउद्दीन कुरैशी ने कहा कि इन नियमों की वजह से करीब 60 फीसदी दुकानें बंद हो जाएंगी। उन्होंने मांग की है कि इन गाइडलाइंस से संबंधिक इजाजत लेने के लिए सिंगल विंडो बनाई जाए। कुरैशी ने कहा, 'सरकारी कार्रवाई की वजह से दुकानदारों को वैसे ही बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ है। हम मांग करते हैं कि सरकार न केवल नई गाइडलाइंस जारी करे, बल्कि नए लाइसेंस भी जारी करना शुरू करे। मीट की दुकान चलाने वाले मोहम्मद रफीक कुरैशी ने कहा, 'नए नियम बेहद सख्त हैं और इसकी वजह से बहुत सारे लोग यह पेशा छोड़ने के लिए मजबूर हो जाएंगे। अधिकारी बहुत सारे NOC लेने कह रहे हैं। नए लाइसेंस पाने के लिए फीस को लेकर स्थिति भी साफ नहीं है।

उधर उत्तर प्रदेश के एक प्रमुख मुस्लिम विश्वविद्यालय यानी अलीगढ़ में एक “नई समस्या” खड़ी हो गई है. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्रों ने होस्टल के “मेस मेन्यू” से मीट हटाए जाने के बाद यूनिवर्सिटी के वीसी को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की गुहार लगाई है। स्वाभाविक है कि मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इस मुद्दे पर ट्वीट कर अपनी नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने बीजेपी पर राजनीतिक षड्यंत्र का आरोप भी लगाया। ओवैसी ने ट्वीट कर कहा, 'अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के 15000 छात्रों को मेस में 26 मार्च से मीट खाने को नहीं दिया गया है। इसके बाद भी बीजेपी कह रही है है कि हम किसी को निशाना नहीं बना रहे?' हॉस्टल मेस में पहले हर दिन खाने में मीट सर्व किया जाता था। युनिवर्सिटी प्रेजिडेंट फैजुल हसन ने कहा, 'हमें सब्जियां खाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। इसे किसी आधार पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। वीसी जमीरुद्दीन शाह ने कहा, 500 किलो भैंस के मीट का प्रतिदिन इंतजाम करना हमारे लिए संभव नहीं है। यूनिवर्सिटी में 19 डाइनिंग हॉल हैं। इस वक्त अलीगढ़ में कोई बूचड़खाना खुला नहीं है इसलिए मीट का इंतजाम नहीं हो सकता। (यानी अलीगढ़ मुस्लिम विवि में भी “अवैध” बूचड़खानों से मीट सप्लाय होता था?? होस्टल की मेस के प्रभारी के पिछले रिकॉर्ड और माँस खरीदी संबंधी सभी बिलों की गहराई से जाँच होनी चाहिए).

फिलहाल हॉस्टल मेस में सिर्फ शाकाहारी खाना ही दिया जा रहा है (जिसके कारण आठ दिनों में ही 15,000 मुस्लिम छात्र मौत की कगार पर पहुँच गए हैं)। यूनिवर्सिटी के मीडिया सलाहकार डॉक्टर जसीम मोहम्मद का कहना है, 'गुरुवार को इस समस्या से निपटने के लिए एक मीटिंग बुलाई गई है। इसमें स्टूडेंट वेलफेयर के डीन भी शामिल होंगें। यूनिवर्सिटी में 19 डाइनिंग हॉल हैं, हर हॉल कम से कम 5 से 7 हॉस्टलों के लिए खाने का इंतजाम करता है। ऐसे में शुक्रवार को छोड़कर रोज़ाना 25-30 किलो भैंस के मीट का इंतजाम करना होता है।' डॉक्टर मोहम्मद ने यह भी बताया कि शुक्रवार (जुमे की शांतिपूर्ण नमाज के कारण) छात्रों को मेस में मटन की बजाय चिकन दिया जाता है। शुक्रवार को इसके लिए 600 किलो पोलट्री से चिकन की व्यवस्था की जाती है।

अब पाठक खुद ही समझ सकते हैं कि मीट कारोबारियों को धंधा करने के लिए गाईडलाईन जारी करने का विरोध कौन कर रहा है, कैसे कर रहा है और क्यों कर रहा है? करोड़ों रूपए के इस धंधे को हर राजनैतिक दल “अवैध” या “नाजायज़” रूप से चलाना चाहता है, ताकि मुस्लिमों को खुश रखा जा सके, उनके अवैध धंधे से मोटा चंदा वसूला जा सके जबकि योगीजी हैं कि मानते ही नहीं... नियम-कानूनों का पालन करवाने पर अड़े हुए हैं.

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