सोशल मीडिया पर कैसे लिखें, क्या लिखें? - एक संक्षिप्त गाईड

Written by शुक्रवार, 24 फरवरी 2017 11:17

संवाद एक सिखाई गई चीज़ है. बचपन में हम सब को शब्द और उनसे जुड़े भाव सिखाये गए तो हम बोलने लगे. आगे स्कूल-कॉलेज में लिखना सिखाया गया. समय बदलने के साथ जब सोशल मीडिया का इस्तेमाल भी संवाद के लिए होने लगा तो इसे भी सिखाया जाना चाहिए था.

मगर अभी तक देखें तो हमें कुछ वेबसाइट, कुछ ब्लॉग के अलावा किसी जगह बाकायदा क्लास लेकर सोशल मीडिया पर लिखना नहीं सिखाया जाता. नयी चीज़ों से पुराने ख़यालात वाले लोगों का द्रोह हमेशा होता है, इसलिए जब तक इन चीज़ों को पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया जाता, हमें और आपको ये खुद ही सीखना होगा.

1. सबके लिए नहीं होती आपकी पोस्ट

सोशल मीडिया पर पोस्ट करते समय आप सबके लिए नहीं लिख रहे होते हैं. आपकी दी हुई जानकारी किसी के लिए बिलकुल नयी भी हो सकती है, वहीँ किसी विशेषज्ञ के लिए वो बचकानी भी होगी. आप अपनी बात किस पाठक वर्ग तक पहुँचाना चाहते हैं उसे चुनिए. अगर पोस्ट बच्चों के लिए लिखी गई है तो भाषा सरल होनी चाहिए, शब्द छोटे. वहीँ युवाओं के बात करने की भाषा ही अलग होती है. वहां आप जिस शब्द का जो मतलब समझ रहे हैं वही हो जरूरी नहीं है. जैसे इस बात की प्रबल संभावना है कि “गरीबों का राशन कार्ड बनाया” में आप कुछ और कह रहे हों और एक बड़ा पाठक वर्ग इसका कुछ और अर्थ निकाले. अपने शब्दों, वाक्यांशों के चयन के समय ध्यान रखिये.

सबको एक तराजू में तौलने की कोशिश बेमानी होती है. अपने घर में आप देख सकते हैं कि बच्चों को जो टीवी सीरियल पसंद हैं, बुजुर्गों की पसंद उस से अलग होती है. महिलाओं को कुछ और पसंद आता है, युवाओं को कुछ और. एक आयुवर्ग की पसंद आम तौर पर मिलती जुलती होगी, उसमें फिर स्त्रियों की पसंद एक जैसी हो, पुरुषों की दूसरी, ऐसा भी होगा. किशोर वय की लड़कियां जब हना मोन्टाना देख रही होंगी तो लड़के डिस्कवरी चला के कार-बाइक देख रहे होगे. एक ही में सबको खुश करने की कोशिश बेकार होगी. अगर इतने पर हजम करने में असुविधा हो रही हो तो याद कीजिये कि जब स्कूल में चिट्ठियां लिखना सिखाते थे तो प्रधानाध्यापक महोदय को लिखी, पिताजी को लिखी और माँ या बड़े भाई को लिखी चिट्ठी में फर्क होता था. सबको एक ही कॉपी-पेस्ट नहीं मार देते थे.

2. बहुत ज्यादा या बहुत कम पोस्ट नहीं करनी चाहिए

अगर आप बहुत ज्यादा पोस्ट कर रहे हैं तो आपके पाठक को आपको पूरा पढने का समय नहीं मिलेगा. इन्टरनेट पर किसी व्यक्ति का ध्यान किसी चीज़ पर औसतन 45 सेकंड होता है. अगर माना जाए कि औसतन एक व्यक्ति एक मिनट में 250-300 शब्द पढ़ेगा तो वो 45 सेकंड में आपकी पोस्ट में 200 शब्द के लगभग पढ़ेगा. यानि अगर आप ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपनी पोस्ट पढ़ाना चाहते हैं तो अपनी पोस्ट को 350 शब्दों की सीमा में रखना होगा. अगर आप लम्बी पोस्ट लिख रहे हैं तो अखबार की तरह हर बार एक ही नियत समय पर पोस्ट कीजिये. पोस्ट करने का समय अगर पक्का हो तो आपके पाठक आपकी पोस्ट ढूंढ लेंगे.

बहुत ज्यादा पोस्ट करने पर एक नुकसान ये भी हो सकता है कि आप अपनी पोस्ट में कोई नयी बात ना कर रहे हों. ऐसे में उब कर आपका पाठक नयी चीज़ों की तलाश में निकल जायेगा. उसके अलावा हर पाठक वर्ग के पढने का तरीका भी अलग अलग होता है. जैसे कंप्यूटर से जुड़ा व्यक्ति जानता है कि बदलाव हर रोज़ होंगे. वो लगातार नयी जानकारी ढूंढेगा, लेकिन वहीँ एकाउंट्स (लेखा) से जुड़ा व्यक्ति हर रोज़ नयी सूचनाएँ ढूँढने नहीं निकलता. उसके कार्य क्षेत्र में पांच सौ साल से कोई ख़ास बदलाव नहीं हुए, वो रोज़ नयी जानकारी का आदि नहीं है. अपने पाठक वर्ग का ध्यान रखिये.

3. अपने लिखे को पोस्ट करने से पहले थोड़ा रुकिए

अपने स्कूल-कॉलेज का दौर याद कीजिये, जब भी आप कुछ लिखते थे तो पहले उसे किसी रफ़ कॉपी में तैयार किया जाता था. चाहे वो प्रश्नों के उत्तर हों या कोई लेख, थोड़े दिन बाद उसे किसी फेयर नोटबुक में दोबारा लिखा जाता था. लिखिए, फिर उसे थोड़े दिन छोड़ दीजिये. कुछ दिन बाद जब आप उसी को दोबारा पढेंगे तो आप पाएंगे कि उसमें सुधार की संभावना है. कई जगह पर विचारों को बेहतर ढंग से पेश किया जा सकता है. कभी कभी वाक्यों को छोटा किया जा सकता है, हो सकता है कुछ दोहराई गई बातें हों जिसे आप हटा देना बेहतर समझें. कहीं कुछ छूटा हो तो उसे जोड़ने का भी मौका मिलेगा, इसलिए लिखते ही उसे पोस्ट कर देने के बजाय थोड़ा रुकिए, बर्दाश्त कीजिये और कम से कम अभी के लिखे को अगली सुबह दुनियां के सामने रखिये. आप अपनी रफ़ कॉपी जांच के लिए जमा नहीं करते. पाठक आपका लेख तुलनात्मक तरीके से ही पढ़ेगा, अपनी फेयर कॉपी दीजिये उसे.

4. सिर्फ लिखना हर बार काफी नहीं होगा

सोच के देखिये कि सोशल मीडिया किसके ज्यादा करीब होता है? क्या वो उपन्यास की तरह है जो शुरू से लेकर आखरी पन्ने तक एक ही कहानी सुनाती है? या फिर उसके मुद्दे रोज़ बदलते हैं? सोशल मीडिया अखबार और पत्रिका के बीच में कहीं होता है. इसमें एक मुद्दा कुछ रोज़ चलता है फिर बदल जाता है. अखबार की तरह हर रोज़ नहीं बदलेगा, लेकिन पत्रिका की तरह पूरे महीने टिका रहे ये भी मुश्किल है. कोई पुराना मुद्दा फिर से सन्दर्भ में आ जाए ऐसा हो सकता है, लेकिन आम तौर पर बात बदलती रहती है.

जाहिर है ऐसे में आपका पोस्ट भी उपन्यास जैसा नहीं, अख़बार-पत्रिका के लेख जैसा ही होगा? दोनों में एक अंतर तो आपको स्पष्ट दिखता ही है. उपन्यास में कोई तस्वीरें नहीं होती. पत्रिकाओं में टेबल, चार्ट, ग्राफ, तस्वीरें डाल कर अपनी बात को रोचक किया जाता है, सूचनाएँ बढ़ाई जाती हैं. उसके अलावा एक तस्वीर कई सौ शब्दों की बात कह जाती है. जहाँ भी आपके लिए संभव हो वहां अपनी बात तस्वीरों, विडियो, ऑडियो के साथ रखिये. ज्यादा असर करेगी.

5. अपने आप को महान मत समझ लीजिये

आम जीवन में घमंडी, बड़बोले लोग आपको पसंद आते हैं क्या? जो डींगे मारता हो, सिर्फ अपनी कामयाबी, अपनी कार, अपना मकान में ही लगा रहता हो उसे आम तौर पर दूर रखने का प्रयास किया जाता है. सोशल मीडिया पर भी घमंडी लोगों का ऐसा ही होता है. आपका पाठक एक दो बार मेरा तीस मार खान होना पढ़ भी ले तो भी रोज़ रोज़ ऐसी बातों से उब जाएगा और पोस्ट से दूरी बना लेगा. उसके अलावा अगर आप अपनी सोशल मीडिया वाल पर दूसरों का लिखा शेयर करते हैं, अपने ब्लॉग में अतिथि लेखकों के लेख डालते हैं, रीट्वीट करते है तो एक तो आपकी सोशल मीडिया पोस्ट पे थोड़ी ताजा हवा आती है, एकरसता नहीं रहती. दूसरी चीज़ कि आप कोई महान मठाधीश नहीं लगते जो अपने इलाके में किसी को जगह ना दे, आप जमीनी लगते हैं.

6. जैसे आम तौर पर बात करते हैं वैसे ही लिखिए

ये थोड़ा सा तकनीकी हिस्सा है. सोचिये आपको गूगल पर सिन्धु घाटी सभ्यता ढूंढनी है. जब आप गूगल में टाइप करेंगे तो Indus Valley लिखेंगे, सिन्धु घाटी लिखने पर अलग नतीजे आते हैं. ऐसे शब्दों को कीवर्ड (key word) कहा जाता है. जब आप वेबसाइट के लिए लिखते हैं तो ऐसे शब्दों की जरूरत होती है क्योंकि गूगल या कोई और सर्च इंजन इन्ही के आधार पर आपका पेज ढूँढेगा. ऐसे तकनीकी शब्द इंजीनियरिंग के लिए अलग होंगे, वकालत के लिए अलग, खाना पकाने में अलग होंगे. ये क्षेत्र विशेष के भारी भरकम शब्द होते हैं. जैसे वकालत का intent या फिर motive आपकी समझ वाला “इरादा” हो ऐसा जरूरी नहीं है. इंजिनियर जब strength कहेगा तो वो एक संख्या में उसे दर्शा सकता है, आपकी तरह वो अंदाजा लगाने वाली बात नहीं कर रहा है.

ऐसे शब्दों का इस्तेमाल संभाल कर कीजिये. आप अपनी बात ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचा सकें इसके लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कम करना या करने पर एक बार उसका अर्थ बताना जरूरी है. जैसी भाषा में आप आम तौर पर बात करते हैं वैसी ही भाषा में सोशल मीडिया भी चलता है. जबरन बौद्धिकता का लबादा ओढ़ने की, बहुत ज्यादा शुद्धता, या ढेर सारे ज्ञान की कोई जरूरत नहीं होती. जैसे आप रोज़मर्रा के जीवन में बात करते हैं वैसे ही लिखिए. कहीं एक दो भारी शब्द इस्तेमाल करने पड़ जाएँ तो समझा देने का प्रयास भी कीजिये.

इतना पढ़ने के बाद अगर आप सोच रहे हैं कि इतनी सलाह मैं क्यों दे रहा हूँ? क्या मैं कोई प्रेमचंद-शरतचंद टाइप हूँ? तो मेरा जवाब है नहीं. अपनी पढ़ाई के दौरान मेरे सीनियर मुझे अपने नोट्स अपनी किताबें देते रहे. इसे भी वैसा ही समझिये. वो मेरे शिक्षक नहीं थे, शिक्षकों जितने पढ़े लिखे भी नहीं थे. फिर भी यथा संभव उन्होंने मेरी मदद की थी. ये भी वैसी ही मदद की कोशिश है. अब अगर आप यहाँ तक पढ़ चुके हैं तो जाहिर है आपकी लिखने में रूचि है. उम्मीद है ये चार-छः बातें आपके काम आएँगी. लिखते रहिये...

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