वन्देमातरम और मुस्लिम :- वास्तविक तथ्य ये हैं

Written by सोमवार, 15 मई 2017 07:12

मेरठ नगर निगम में कुछ मुस्लिम पार्षदों ने सत्र के दौरान वन्दे मातरम के गान के समय राष्ट्रीय गीत का बहिष्कार यह कहकर कर दिया गया कि वन्दे मातरम का गान करना इस्लाम की मान्यताओं के खिलाफ है और वे करोड़ो मुसलमानों की भावनाओं से खिलवाड़ नहीं कर सकते।

इससे पहले लोकसभा में भी बसपा से मुस्लिम सांसद ने वन्देमातरम गाने से इनकार कर दिया था. दुनिया में शायद भारत ही ऐसा पहल मुल्क होगा जिसमे राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रीय गान न केवल दोनों अलग अलग है अपितु ऐसा पहला मुल्क भी होगा जिसमें लोकतान्त्रिक तरीके से चुने गए पार्षद भारतीय संविधान के अंतर्गत अपने पद और उसकी गरिमा की शपथ ग्रहण करने के बाद भी उसकी अवहेलना करते देखे जाते हैं। देखा जाये तो यह कदम भारतीय संविधान की अनुपालना न करने के कारण दंडनीय होना चाहिए। परन्तु हमारे देश सबसे बड़ा दुर्भाग्य अल्पसंख्यकों को प्रोत्साहन देने के नाम पर तुष्टिकरण का भी है। तुष्टिकरण के नाम पर हर नाजायज माँग को दूसरो के सर पर थोप देना कहाँ तक जायज है?

भारत जैसे विशाल देश को हजारों वर्षों की गुलामी के बाद आजादी के दर्शन हुए थे। वन्दे मातरम वह गीत है जिससे सदियों से सुप्त भारत देश जग उठा और अर्ध शताब्दी तक भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्रेरक बना रहा। इस गीत के कारण बंग-भंग के विरोध की लहर बंगाल की खाड़ी से उठ कर इंग्लिश चैनल को पार करती हुई ब्रिटिश संसद तक गूंजा आई थी। जो गीत गंगा की तरह पवित्र , स्फटिक की तरह निर्मल और देवी की तरह प्रणम्य हैं उस गीत की तुष्टिकरण की भेंट चढ़ाना राष्ट्रीयता का परिहास ही तो हैं। जबकि इतिहास इस बात का गवाह है कि भारत का विभाजन भी इसी तुष्टिकरण के कारण हुआ था। इस लेख के माध्यम से हम वन्दे मातरम के इतिहास को समझने का प्रयास करेगे।

वन्दे मातरम के रचियता बंकिम चन्द्र

बहुत कम लोग यह जानते हैं की वन्दे मातरम के रचियता बंकिम बाबु का परिवार अंग्रेज भक्त था। यहाँ तक की उनके पैतृक गृह के आगे एक सिंह की मूर्ति बनी हुई थी जिसकी पूँछ को दो बन्दर खिंच रहे थे, पर कुछ भी नहीं कर पा रहे थे। यह सिंह ब्रिटिश साम्राज्य का प्रतीक था जबकि बन्दर भारतवासी थे। ऐसा मानसिकता वाले घर में बंकिम जैसे राष्ट्रभक्त का पैदा होना निश्चित रूप से उस समय की क्रांतिकारी विचारधारा का प्रभाव कहा जायेगा। आनंद मठ में बंकिम बाबु ने वन्देमातरम गीत को प्रकाशित किया। आनंद मठ बंगाल में नई क्रांति के सूत्रपात के रूप में उभरा था।

वन्दे मातरम और कांग्रेस

कांग्रेस की स्थापना के द्वितीय वर्ष १८८६ में ही कोलकाता अधिवेशन के मंच से कविवर हेमचन्द्र द्वारा वन्दे मातरम के कुछ अंश मंच से गाये गए थे। १८९६ में कांग्रेस के १२ वें अधिवेशन में रविन्द्र नाथ टैगोर द्वारा गाया गया था। लोक मान्य तिलक को वन्देमातरम में इतनी श्रद्धा थी की शिवाजी की समाधी के तोरण पर उन्होंने इसे उत्कीर्ण करवाया था। १९०१ के बाद से कांग्रेस के प्रत्येक अधिवेशन में वन्दे मातरम गया जाने लगा। कालांतर में जब कुछ मुस्लिम सदस्यों ने वन्देमातरम पर ऐतराज किया तो महात्मा गाँधी ने उनकी नाजायज मांग को मानते हुए क़ुरान के पाठ करने का समर्थन किया। स्वामी श्रद्धानंद द्वारा महात्मा गाँधी का ध्यान इस ओर दिलाया गया कि जिन आयतों का पाठ मुस्लिम समाज कांग्रेस के अधिवेशन में कर रहा हैं। वे आयतें जिहाद से सम्बंधित है। महात्मा गाँधी ने यह उत्तर देकर उनका बचाव करने का प्रयास किया कि ये आयतें अंग्रेजों के विरुद्ध है। स्वामी श्रद्धानंद ने कहा कि जिस दिन यह हिंदुओं के विरोध में हो गई। तब आप क्या करेंगे? महात्मा गाँधी मौन धारण कर गए। स्वामी श्रद्धानंद कि भविष्यवाणी सही सिद्ध हुई। १९२० के दशक में पूरा भारत हिन्दू मुस्लिम दंगों से जल उठा। अगर महात्मा गाँधी ने मुसलमानों के तुष्टिकरण की नीति न अपनाई होती तो १९४७ में भारत पाकिस्तान विभाजन नहीं होता।

वन्दे मातरम और बंगभंग

६ अगस्त १९०५ को बंग भंग के विरोध में टाउन हॉल की सभा में वन्दे मातरम को विरोध के रूप में करीब तीस हज़ार भारतीयों द्वारा गाया गया था। स्थान स्थान पर विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया और स्वदेशी कपड़ा और अन्य वस्तुओं का उपयोग भारतीय जनमानस द्वारा किया जाने लगा। यहाँ तक की बंग भंग के बाद वन्दे मातरम संप्रदाय की स्थापना भी हो गई थी। वन्दे मातरम की स्वरलिपि रविन्द्र नाथ टैगोर जी ने भी दी थी। अक्टूबर १९०५ में ‘वसुधा’ में जितेंदर मोहम बनर्जी ने वन्दे मातरम पर लेख लिखा था। १९०६ के चैत्र मास के बम्बई के ‘बिहारी अखबार’ में वीर सावरकर ने वन्दे मातरम पर लेख लिखा था। २२ अप्रैल को मराठा में ‘तिलक महोदय’ ने वन्दे मातरम पर ‘शोउटिंग ऑफ़ वन्दे मातरम’ के नाम से लेख लिखा था। कुछ ईसाई लेखक वन्दे मातरम की प्रसिद्धि से जल भून कर उसके विरुद्ध अपनी लेखनी चलते है जैसे पिअरसन महोदय ने तो यहाँ तक लिख दिया की मातृभूमि की कल्पना ही हिन्दू विचारधारा के प्रतिकूल है और बंकिम महोदय ने इसे यूरोपियन संस्कृति से प्राप्त किया हैं। अपनी जन्म भूमि को माता या जननी कहने की गरिमा तो भारत वर्ष में उस काल से स्थापित हैं जब धरती पर ईसाइयत या इस्लाम का जन्म भी नहीं हुआ था।

वेदों में इस तथ्य को इस प्रकार ग्रहण किया गया हैं -

वह माता भूमि मुझ पुत्र के लिए पय यानि दूध आदि पुष्टि प्रद पदार्थ प्रदान करे। – अथर्ववेद १२/१/२० भूमि मेरी माता हैं और मैं उसका पुत्र हूँ। – अथर्ववेद १२-१-१५  वाल्मीकि रामायण में “जननी जन्मभूमि ” को स्वर्ग के समान तुल्य कहा गया हैं। ईसाई मिशनरियों ने तो यहाँ तक कह डाला की वन्दे मातरम राजनैतिक डकैतों का गीत है।

वन्दे मातरम और बंगाल में कहर

बंगाल की अंग्रेजी सरकार ने कुख्यात सर्कुलर जारी किया की अगर कोई छात्र स्वदेशी सभा में भाग लेगा अथवा वन्दे मातरम का नारा लगाएगा तो उसे स्कूल से निकाल दिया जायेगा।बंगाल के रंगपुर के एक स्कूल के सभी २०० छात्रों पर वन्दे मातरम का नारा लगाने के लिए ५-५ रुपये का दंड किया गया था। पूरे बंगाल में वन्दे मातरम के नाम की क्रांति स्थापित हो गयी। इस संस्था से जुड़े लोग हर रविवार को वन्दे मातरम गाते हुए चन्दा एकत्र करते थे। उनके साथ रविन्द्र नाथ टैगोर भी होते थे। यह जुलुस इतना बड़ा हो गया की इसकी संख्या हजारों तक पहुँच गयी। १६ अक्टूबर १९०६ को बंग भंग विरोध दिवस बनाने का फैसला किया गया। उस दिन कोई भी बंगाली अन्न-जल ग्रहण नहीं करेगा ऐसा निश्चय किया गया। बंग भंग के विरोध में सभा हुई और यह निश्चय किया गया की जब तक चूँकि सरकार बंगाल की एकता को तोड़ने का प्रयास कर रही हैं इसके विरोध में हर बंगाली विदेशी सामान का बहिष्कार करेगा। हर किसी की जबान पर वन्दे मातरम का नारा था चाहे वह हिन्दू हो, चाहे मुस्लिम हो, चाहे ईसाई हो। वन्दे मातरम से आम जनता को कितना प्रेम हो गया था इसका उदहारण हम इस वाकया से समझ सकते हैं। किसी गाँव में, जो ढाका जिले के अंतर्गत था, एक आदमी गया और कहने लगा की में नवाब सलीमुल्लाह का आदमी हूँ। इसके बाद वन्दे मातरम गाने वाले और नारे लगाने वालो की निंदा करने लगा। इतना सुन्ना था की पास की एक झोपड़ी से एक बुढ़िया झाड़ू लेकर बाहर आई और बोली वन्दे मातरम गाने वाले लड़को ने मुझे बचाया है। वे सब राजा बेटा है। उस वक्त तेरा नवाब कहाँ था?

फूलर के असफल प्रयास

फूलर उस समय बंगाल का गवर्नर बना। वह अत्यन्त छोटी सोच वाला व्यक्ति था। उसने कहा कि मेरी दो बीवी हैं एक हिन्दू और दूसरी मुस्लिम और मुझे दूसरी ज्यादा प्रिय हैं। फुलर का उद्देश्य हिन्दू-मुस्लिम एकता को तोड़ना था। फुलर के इस घटिया बयान के विपक्ष में क्रान्तिकारी और कवि अश्वनी कुमार दत ने अपनी कविता में लिखा -- “आओ हे भारतवासी! आओ, हम सब मिलकर भारत माता के चरणों में प्रणाम करें। आओ! मुसलमान भाइयों, आज जाती पाती का झगड़ा नहीं हैं। इस कार्य में हम सब भाई भाई है।इस धुल में तुम्हारे अकबर है और हमारे राम है। ” फूलर ने बंगाल के मुस्लिम जमींदारों को भड़का कर दंगा करवाने का प्रयास किया पर उसके प्रयास सफल न हुए। अंग्रेज सरकार के मन में वन्दे मातरम को लेकर कितना असंतोष था की उन्होंने सभी विद्यालाओं को सरकारी आदेश जारी किया की सभी छात्र अपनी अपनी नोटबुक में ५०० बार यह लिखे की "वन्दे मातरम चिल्लाने में अपना समय नष्ट करना मुर्खता और अभद्रता है। "

वारिसाल में कांग्रेस का अधिवेशन और वन्दे मातरम

१४ अप्रैल १९०६ के दिन वारिसाल में कांग्रेस के जुलुस में वन्दे मातरम का नारा लगाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। शांतिपूर्वक निकल रहे जुलुस पर पुलिस ने निर्दयता से लाठीचार्ज किया। निर्दयता की हालत यह थी की एक मकान की खूंटी पर वन्दे मातरम लिखा था तो उस मकान को गिरा दिया गया। १० -११ वर्ष का एक बालक रसोई में वन्देमातरम गा रहा था तो उसे घर से निकलकर कोर्ट के सामने चाबुक से पीटा गया। दो हलवाइयों की दुकान पर यह नारा लिखा था तो उनके सर फोड़ दिए गए। सुरेंदर नाथ बनर्जी की गिरफ्तार कर २०० रुपये जुर्माने और अलग से कोर्ट की अवमानना पर २०० रुपये का दंड लेकर छोड़ दिया गया। इतनी निर्दयता के बावजूद भीड़ वन्दे मातरम का गान करते हुए अपने सभापति महोदय रसूल साहिब को लेकर सभास्थल पर पहुँच गई। मंच पर हिन्दू नेताओं के साथ मुस्लमान नेताओं में सर्वश्री इस्माइल चौधरी, मौलवी अब्दुल हुसैन, मौलवी हिदायत बक्श, मौलवी हमिजुद्दीन अहमद, मौलवी दीन मुहम्मद, मौलवी मोथार हुसैन, मौलवी मोला चौधरी उपस्थित थे। वन्दे मातरम के गान से सभा का आरम्भ हुआ था। सभापति महोदय ने देश की आज़ादी के लिए सभी हिन्दू-मुसलमान को आपस में मिलकर लड़ने का आवाहन किया।

इतने में सुरेंदर नाथ बनर्जी अपने साथियों के साथ सभा स्थल पर जा पहुँचे जिससे वन्दे मातरम के गगन भेदी नारों के साथ सम्पूर्ण सभा स्थल गूँज उठा। सभा में ब्रिटिश सरकार के द्वारा वन्दे मातरम को लेकर किये जा रहे अत्याचार को घोर निंदा की गयी। जिस स्थान पर सुरेंदरनाथ बनर्जी को वन्दे मातरम गाने के लिए गिरफ्तार किया गया था उस स्थान पर वन्दे मातरम स्तंभ बनाने के प्रस्ताव को सभा में पारित किया गया। अगले दिन के सभी समाचार पत्र वरिसाल के वन्दे मातरम संघर्ष की प्रशंसा और अंग्रेज सरकार की निंदा से भरे पड़े थे। वारिसाल की घटना के कारण लार्ड कर्जन को भारत के वाइसराय के पद से त्याग देना पड़ा।

वन्दे मातरम और योगी अरविन्द

वन्दे मातरम के नाम से पत्र आरंभ हुआ जिसे पहले विपिन चन्द्र पाल ने सम्पादित किया बाद में श्री अरविन्द ने। श्री अरविन्द ने इस पत्र से यह भली भांति सिद्ध कर दिया की तलवार से ज्यादा तीखी लेखनी होती हैं और उसकी ज्वाला से क्रूर शाशन भी भस्मीभूत हो सकता हैं। अरविन्द के पत्र के बारे में स्टेट्समैन अखबार लिखता हैं की “अखबार की हर लाइन के बीच भरपूर राजद्रोह दीखता है पर वह इतनी दक्षता से लिखा होता है कि उस पर क़ानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती।" श्री अरविन्द ने वन्दे मातरम गीत के बारे में कहा हैं कि बंकिम ने ही स्वदेश को माता की संज्ञा दी है। वन्दे मातरम संजीवनी मंत्र है। हमारी स्वाधीनता का हथियार वन्दे मातरम है। उन्होंने कहा की वन्दे मातरम साधारण गीत नहीं है। बल्कि एक ऐसा मंत्र है जो हमें मातृभूमि की वंदना करने की सीख देता है। उनकें इस व्यक्तव्य के कारण ही बंग-भंग के क्रांतिकारियों के लिए वन्दे मातरम का यह नारा वह गीत मंत्र बन गया।

अपनी पत्नी को ३० अगस्त १९०८ को एक पत्र में श्री अरविन्द लिखते हैं “मेरा तीसरा पागलपन यह हैं कि जहाँ दुसरे लोग स्वदेश को जड़ पदार्थ ,खेत, मैदान, पहाड़, जंगल और नदी समझते है। वहां मैं अपनी मातृभूमि को अपनी माँ समझता हूँ। उसे अपनी भक्ति अर्पित करता हूँ और उसकी पूजा करता हूँ। माँ की छाती पर बैठ कर अगर कोई उसका खून चूसने लगे तो बेटा क्या करता है? क्या वह चुपचाप बैठा हुआ भोजन करता है, या स्त्री पुरुष के साथ रंगरलिया बनाता है या माँ को बचाने के लिए दौड़ जाता है।” श्री अरविन्द को गिरफ्तार कर लिया गया। उससे देश में वन्दे मातरम की लहर चल पड़ी।

१९०६ को धुलिया, महाराष्ट्र में वन्दे मातरम के नारे से सभा ही रूक गयी। नासिक में वन्दे मातरम पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। जिस जिस ने प्रतिबन्ध को तोडा तो उसे पीटा गया। कई गिरफ्तारियाँ हुई। इस कांड का तो नाम ही वन्दे मातरम कांड बन गया, फरवरी १९०७ को तमिल नाडू में मजदूरों ने हड़ताल कर दी और ब्रिटिश नागरिकों को घेर कर उन्हें भी वन्दे मातरम के नारे लगाने को बाध्य किया। मई १९०७ को रावलपिंडी में भी स्वदेशी के नेताओं की गिरफ़्तारी के विरोध में युवकों ने वन्दे मातरम के नारे को लगाते हुए लाठियाँ खाई। २६ अगस्त ,१९०७ को वन्दे मातरम के एक लेख के कारण बिपिन चन्द्र पाल को अदालत में सजा हुई तो उनका स्वागत हजारों की भीड़ ने वन्दे मातरम से किया। यह देखकर पुलिस अँधाधुंध लाठीचार्ज करने लगी। यह देखकर एक १५ वर्षीय बालक सुशील चन्द्र सेन ने एक पुलिस वाले मुँह पर मुक्का मार दिया। उस वीर बालक को १५ बेतों की सजा सुनाई गई थी। सुशील की इस सजा की प्रशंसा करते हुए संध्या में एक लेख छपा “सुशील की कुदान भरी, फिरंगी की नानी मरी”. सुशील युगांतर पार्टी के सदस्य थे। उनकी चर्चा सुरेंदर नाथ बनर्जी तक पहुँची तो उन्होंने उसे सोने का तमगा देकर सम्मानित किया। अब युगांतर पार्टी के सदस्यों ने सुशील को सजा देने वाले अत्याचारी किंग्स्फोर्ड को यमालय भेजने की ठानी। यह कार्य प्रफुल्ल चन्द्र चाकी और खुदी राम बोस को सोंपा गया। षड़यंत्र असफल हो जाने पर चाकी ने आत्महत्या कर ली और खुदीराम ने फाँसी का फन्दा चूम कर सबसे कम उम्र में शहीद होने का सम्मान प्राप्त किया। इसी केस में श्री अरविन्द को भी सजा हुई थी।

वन्दे मातरम और राष्ट्रीय झंडा

कांग्रेस का लम्बे समय तक कोई निजी झंडा नहीं था।कांग्रेस के अधिवेशन में यूनियन जैक को फहराकर भारत के अंग्रेज भगत प्रसन्न हो जाते थे। १९०६ में कोलकता में कांग्रेस के अधिवेशन में भगिनी निवेदिता ने सबसे पहले वज्र अंकित झंडे का निर्माण किया जिस पर वन्दे मातरम लिखा हुआ था। उसके बाद १८ अक्टूबर, १९०७ को जर्मनी के स्टुअर्ट नगर में मैडम बीकाजी कामा ने वन्दे मातरम गीत के बाद राष्ट्रीय झंडा फहराया जिस पर वन्दे मातरम अंकित था। अपने भाषण में मैडम कामा ने पहले अंग्रेजों द्वारा भारत में किये जा रहे अत्याचारों का विवरण दिया जिससे की सुनने वालो के रोंगटे खड़े हो गए। उसके बाद भारत का झंडा निकालती हुई वह बोली ” यह हैं भारतीय राष्ट्र का स्वतंत्र झंडा। यह देखिये फहरा रहा हैं। भारतीय देश भक्तों के रक्त से यह पवित्र हो चूका हैं। सदस्यगन, मैं आपसे अनुरोध करती हूँ की आप खड़े होकर भारत की इस स्वतंत्र पताका का अभिवादन करे।" सर्व प्रथम झंडे पर वन्दे मातरम को अंकित करने से पाठक उस काल में वन्दे मातरम के भारतीय जन समुदाय पर प्रभाव को समझ सकते हैं।

वन्दे मातरम का भारत व्यापी प्रभाव

मोतीलाल नेहरु ने जवाहरलाल नेहरु को १९०५ में एक पत्र में लिखा था की हम ब्रिटिश भारत के इतिहास की सबसे संकट पूर्ण अवधि से गुजर रहे हैं। इलाहाबाद में भी वन्दे मातरम आम अभिनन्दन बन गया हैं। यदि अभियान चलता रहा तो यहाँ लौटने पर भारत को, जब तुम गये, उससे बिलकुल बदला पाओगे। २५ नवम्बर १९०५ को ट्रिब्यून अखबार लिखता हैं “बंगाल में लोगो ने वन्दे मातरम का जयघोष शुरू किया हैं। इन शब्दों का अर्थ हैं माता की वन्दना। इसमें कुछ भी भयंकर नहीं हैं। फिर दमनशाही द्वारा वन्दे मातरम की मनाही क्यूँ हैं? अब तो पंजाब में सुशिक्षित लोग एक दुसरे से भेंट होने पर वन्दे मातरम कहकर अभिनन्दन करते हैं। इस प्रकार सारे हिंदुस्तान में असंख्य मुखों से निरन्तर निकलते वन्दे मातरम को बंद करने में सरकार को कितने सिपाहियों और अधिकारीयों की आवश्यकता होगी? पूर्वी बंगाल की जनता के साथ सारे हिंदुस्तान की सहानभूति हैं। जब हैदराबाद के निज़ाम के धर्मान्ध अत्याचारों के विरुद्ध आर्य समाज ने १९३९ में हैदराबाद सत्याग्रह किया था तब जेल में रामचन्द्र के नाम से एक आर्यवीर को बंद कर दिया गया था। अपनी क्रूरता की धाक जमाने के लिए जेल में आर्य सत्याग्रहियों पर अत्याचार किया जाता था। जेल में दरोगा जब भी वीर रामचंद्र को बेंत मारते तो उनके मुख से वन्दे मातरम का नारा निकलता था। दरोगा जब तक मरते रहते जब तक कि रामचंद्र बेहोश न हो गए पर उनके मुख से बेहोशी में भी नारा निकलता रहा। ऐसा अनुराग था देश और धर्म प्रेमियों को वन्दे मातरम के साथ।

वन्दे मातरम विदेश में

जुलाई १९०९ को मदन लाल धींगरा को लन्दन में जब फाँसी दी गई तो उनके अंतिम शब्द थे “वन्दे मातरम”। १९०९ को जिनेवा से एक पत्रिका वन्दे मातरम का का प्रकाशन आरंभ हुआ। अपने प्रथम अंक में पत्रिका ने कहा ‘विदेशी अत्याचार के विरुद्ध हमारे बहादुर और बुद्धिमान नेताओं ने बंगाल में जो यशस्वी अभियान शुरू किया हैं, वन्दे मातरम के माध्यम से हम उसे पूर्ण शक्ति और दृढ़ता के साथ में चलायेगे". कनाडा से आ रहे जहाज कमागातामारू के झंडे पर वन्दे मातरम, सत श्री अकाल और अल्लाह हो अकबर के नारे लिखे थे। साउथ अफ्रीका से जब महात्मा गाँधी भारत लौटे तो उन्होंने भारत आकर वन्दे मातरम गीत की प्रशंसा की थी (हरिजन १ जुलाई १९३८). १९२२ में जब गोखले अफ्रीका गए तो हजारों भारत वासियों ने उनका स्वागत वन्दे मातरम से किया था। १९३७ में तुर्की के अदान नगर में भारतीय मस्जिद पर वन्दे मातरम लिखा था। मस्जिद पर भारतीय तिरंगा लगा था और हर नमाज के साथ वन्दे मातरम का घोष किया जाता था।

भारतीय क्रांतिकारी और वन्दे मातरम

सन १९२० में लाला लाजपत राय ने दिल्ली से दैनिक वन्दे मातरम का प्रकाशन शुरू किया था। सन १९३० में चन्द्र शेखर आजाद अपने पिता को पत्र लिखने समय वन्दे मातरम सबसे ऊपर लिखते हैं। सन १९२० का असहयोग आन्दोलन, नमक सत्याग्रह में भी वन्दे मातरम का बोलबाला था।  रामचंद्र बिस्मिल ने काकोरी कांड में फाँसी पर लटकने से पहले वन्दे मातरम कहा था। चटगांव सशस्त्र संघर्ष में वीर सूर्यसेन को फाँसी देने से पहले जब भी मार पड़ती तो वे वन्दे मातरम का जय घोष करते थे। उन्हें इतना मार गया था की वे बेहोश हो गए और अचेत अवस्था में ही उन्हें फाँसी पर चढ़ा दिया गया था। इसके अतिरिक्त अनेक सन्दर्भ हमे भारत की आज़ादी की लड़ाई में वन्दे मातरम को प्रेरणा के स्रोत्र के रूप में पाते हैं।

वन्दे मातरम का विरोध

वन्दे मातरम का विरोध जो लोग कर रहे हैं, उनका अरबी, फारसी भाषा के शब्द मादरे वतन (हे माता तुझे सलाम करता हूँ), उम्मु कौरा (ग्राम्य जननी), उम्मुल मोमेनीन (विश्वासियो की जननी) और उम्मुल कैताब (ग्रन्थ जननी) आदि शब्द के बारे में उनका क्या कहना हैं?? कुछ मुसलमानों ने जो नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के नारे जय हिन्द का भी विरोध किया था पर वन्दे मातरम की तरह यह नारा धार्मिक नहीं अपितु देश भक्ति को बुलंद करने के लिए था। ब्रिटिश काल में उन क्रांतिकारियों से पूछा जाये की वन्दे मातरम का उनके लिए क्या महत्व हैं तब वे यही कहेंगे की वन्दे मातरम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा है, उसके प्राण है और उसके लिए सर्वस्व अर्पण हैं। वन्दे मातरम को जबरन मजहब की मान्यता के साथ नत्थी कर अपना राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध करने वालों की सार्वजनिक निंदा और बहिष्कार होना चाहिए।

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