चापेकर बंधुओं की वीरता और नेहरू शासन की नीचता

Written by शनिवार, 24 जून 2017 21:03

जिन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में रूचि है, उन्होंने चाफेकर बंधुओं का नाम जरूर सुना है. परन्तु चूँकि हमारी पाठ्यपुस्तकों में इन बंधुओं और इनके योगदान को उचित स्थान नहीं मिला है, इसलिए आजकल के युवाओं और बच्चों ने इनके बारे में कुछ नहीं जाना.

चाफेकर बंधुओं की ही तरह ऐसे कई दर्जनों बड़े क्रांतिकारी हुए हैं, जिन्हें इतिहास लेखन में तथा पाठ्यक्रमों में से बड़े धूर्ततापूर्ण पद्धति से गायब किया गया है. बहरहाल, लेख का विषय यह नहीं है.

इस लेख का मूल विषय यह है कि अंग्रेजों और भारतीयों के बीच सबसे बड़ा फर्क क्या है? वह है प्रशासनिक चुस्ती तथा अपने क्रांतिकारियों एवं हुतात्माओं का सम्मान. आप सोचेंगे इस बात का चाफेकर बंधुओं से क्या सम्बन्ध है? बिलकुल है... जैसे-जैसे आप पूरा लेख पढ़ेंगे तो जानेंगे, कि भारत की सरकारें और इसके “नकली इतिहासकार” कितने गिरे हुए लोग रहे होंगे. लेकिन इसके लिए सबसे पहले आपको चाफ़ेकर बंधुओं के योगदान को संक्षेप में जानना-समझना होगा. जो लोग जानते हैं, उनकी बात अलग है... परन्तु जो लोग इनके बारे में नहीं जानते हैं वे निश्चित रूप से आश्चर्यचकित हो जाएँगे.

चाफेकर बंधु यानी दामोदर हरि चाफेकर, बालकृष्ण हरि चाफेकर तथा वासुदेव हरि चाफेकर को संयुक्त रूप से कहा जाता हैं। ये तीनों भाई बाल्यकाल से ही लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के सम्पर्क में थे। तीनों भाई तिलक जी को गुरुवत्‌ सम्मान देते थे। चाफेकर बंधु महाराष्ट्र के पुणे के पास चिंचवड़ नामक गाँव के निवासी थे। 22 जून 1897 को रैंड को मौत के घाट उतार कर भारत की आज़ादी की लड़ाई में प्रथम क्रांतिकारी धमाका करने वाले वीर दामोदर पंत चाफेकर का जन्म 24 जून 1869 को पुणे के ग्राम चिंचवड़ में प्रसिद्ध कीर्तनकार हरिपंत चाफेकर के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में हुआ था। उनके दो छोटे भाई क्रमशः बालकृष्ण चाफेकर एवं वसुदेव चाफेकर थे। बचपन से ही सैनिक बनने की इच्छा दामोदर पंत के मन में थी, विरासत में कीर्तनकार का यश-ज्ञान मिला ही था। महर्षि पटवर्धन एवं लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक उनके आदर्श थे।

तिलक जी की प्रेरणा से उन्होंने युवकों का एक संगठन व्यायाम मंडल तैयार किया। ब्रितानिया हुकूमत के प्रति उनके मन में बाल्यकाल से ही तिरस्कार का भाव था। दामोदर पंत चाफ़ेकर ने ही तत्कालीन बंबई में रानी विक्टोरिया के पुतले पर तारकोल पोत कर, गले में जूतों की माला पहना कर अपना रोष प्रकट किया था। 1894 से चाफेकर बंधुओं ने पूना में प्रति वर्ष शिवाजी एवं गणपति समारोह का आयोजन प्रारंभ कर दिया था। इन समारोहों में चाफेकर बंधु शिवाजी श्लोक एवं गणपति श्लोक का पाठ करते थे। उनका मानना था कि शिवाजी श्लोक के अनुसार, केवल शिवाजी की कहानी दोहराने मात्र से स्वाधीनता प्राप्त नहीं की जा सकती. आवश्यकता इस बात की है कि शिवाजी और बाजीराव की तरह तेज़ी से काम किए जाएं. आज हर भले आदमी को तलवार और ढाल पकड़नी चाहिए, यह जानते हुए कि हमें राष्ट्रीय संग्राम में जीवन का जोखिम उठाना होगा. गणपति श्लोक में धर्म और गाय की रक्षा के लिए कहा गया है. ये अंग्रेज़ कसाइयों की तरह गाय और बछड़ों को मार रहे हैं, उन्हें इस संकट से मुक्त कराओ. मरो, लेकिन अंग्रेजों को मारकर.

(यह लेख आपको desicnn.com के सौजन्य से प्राप्त हो रहा है... जारी है) 

सन्‌ 1897 में पुणे नगर प्लेग जैसी भयंकर बीमारी से पीड़ित था। इस स्थिति में भी अंग्रेज अधिकारी जनता को अपमानित तथा उत्पीड़ित करते रहते थे। वाल्टर चार्ल्स रैण्ड तथा आयर्स्ट, ये दोनों अंग्रेज अधिकारी लोगों को जबरन पुणे से निकाल रहे थे। जूते पहनकर ही हिन्दुओं के पूजाघरों में घुस जाते थे। महिलाओं के साथ बेईज्जती करते थे. ये दोनों अधिकारी प्लेग पीड़ितों की सहायता की बजाय लोगों को प्रताड़ित करना ही अपना अधिकार समझते थे। किसी अत्याचार-अन्याय के सन्दर्भ में एक दिन तिलक जी ने चाफेकर बन्धुओं से कहा, "शिवाजी ने अपने समय में अत्याचार का विरोध किया था, किन्तु इस समय अंग्रेजों के अत्याचार के विरोध में तुम लोग क्या कर रहे हो?' बस, इसके बाद इन तीनों भाइयों ने क्रान्ति का मार्ग अपना लिया। संकल्प लिया कि इन दोनों अंग्रेज अधिकारियों को छोड़ेंगे नहीं। 

संयोगवश वह अवसर भी आया, जब २२ जून १८९७ को पुणे के "गवर्नमेन्ट हाउस' में महारानी विक्टोरिया की षष्ठिपूर्ति के अवसर पर राज्यारोहण की हीरक जयन्ती मनायी जाने वाली थी। इसमें वाल्टर चार्ल्स रैण्ड और आयर्स्ट भी शामिल हुए। दामोदर हरि चाफेकर और उनके भाई बालकृष्ण हरि चाफेकर भी एक दोस्त विनायक रानडे के साथ वहां पहुंच गए और इन दोनों अंग्रेज अधिकारियों के निकलने की प्रतीक्षा करने लगे। रात १२ बजकर, १० मिनट पर रैण्ड और आयर्स्ट निकले और अपनी-अपनी बग्घी पर सवार होकर चल पड़े। योजना के अनुसार दामोदर हरि चाफेकर रैण्ड की बग्घी के पीछे चढ़ गए और उसे गोली मार दी, उधर बालकृष्ण हरि चाफेकर ने भी आर्यस्ट पर गोली चला दी। आयर्स्ट तो तुरन्त मर गया, किन्तु रैण्ड तीन दिन बाद अस्पताल में चल बसा। पुणे की उत्पीड़ित जनता चाफेकर-बन्धुओं की जय-जयकार कर उठी। गुप्तचर अधीक्षक ब्रुइन ने घोषणा की कि इन फरार लोगों को गिरफ्तार कराने वाले को २० हजार रुपए का पुरस्कार दिया जाएगा। (1897 में बीस हजार रूपए बहुत बड़ी रकम होती थी) चाफेकर बन्धुओं के क्लब में ही दो भाई थे - गणेश शंकर द्रविड़ और रामचन्द्र द्रविड़। इन दोनों ने पुरस्कार के लोभ में आकर अधीक्षक ब्रुइन को चाफेकर बन्धुओं का सुराग दे दिया। इसके बाद दामोदर हरि चाफेकर पकड़ लिए गए, लेकिन बालकृष्ण हरि चाफेकर फिर भी पुलिस के हाथ न लगे। सत्र न्यायाधीश ने दामोदर हरि चाफेकर को फांसी की सजा दी, और उन्होंने मन्द मुस्कान के साथ यह सजा सुनी। कारागृह में तिलक जी ने उनसे भेंट की और उन्हें "गीता' प्रदान की। 18 अप्रैल 1898 को प्रात: वही "गीता' पढ़ते हुए दामोदर हरि चाफेकर फांसीघर पहुंचे और फांसी के तख्ते पर लटक गए। उस क्षण भी वह "गीता' उनके हाथों में थी।

उधर बालकृष्ण चाफेकर ने जब यह सुना कि उसको गिरफ्तार न कर पाने से चिढ़ी हुई पुलिस उसके सगे-सम्बंधियों को सता रही है, तो वह स्वयं पुलिस थाने में उपस्थित हो गए। बाद में तीसरे भाई वासुदेव चाफेकर ने अपने साथी महादेव गोविन्द विनायक रानडे को साथ लेकर उन गद्दार द्रविड़-बन्धुओं को जा घेरा, और उन्हें गोली मार दी। वह 8 फ़रवरी 1899 की रात थी। वासुदेव चाफेकर को 8 मई को और बालकृष्ण चाफेकर को 12 मई 1899 को पुणे के यरवदा कारागृह में फांसी दे दी गई। योजना में साथ देने वाले इनके साथी क्रांतिवीर महादेव गोविन्द विनायक रानडे को 10 मई 1899 को यरवदा कारागृह में ही फांसी दी गई।

(यह लेख आपको desicnn.com के सौजन्य से प्राप्त हो रहा है... जारी है) 

यहाँ तक का यह गौरवशाली इतिहास पढ़कर निश्चित ही आपके रोंगटे खड़े हुए होंगे... लेकिन इस लेख का असली पेंच आगे है. वॉल्टर चार्ल्स रैंड अंग्रेज सरकार का ICS अफसर था, उस जमाने में ICS अफसर की धाक और दबदबा जबरदस्त होता था. 1897 में चाफेकर बंधुओं द्वारा मारे जाने से पहले उसने लगभग 13 वर्षों तक महारानी विक्टोरिया के सम्मान में भारत में अपनी सेवाएँ दीं. उसकी अधिकाँश नियुक्तियाँ मुम्बई-पुणे में ही हुईं. दूसरा अधिकारी जिसे चाफेकर बंधुओं ने गोली मारी, यानी आयर्स्ट वह रैंड से थोड़ी निचली पदवी पर था. हाल ही में ब्रिटिश लायब्रेरी के दस्तावेजों के अध्ययन का अध्ययन करते समय एक शोधकर्ता श्री संकेत कुलकर्णी के हाथ एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज लगा. इस दस्तावेज में 23 सितम्बर 1883 को रैंड के हस्ताक्षर युक्त पत्र भी है. इस पत्र में वॉल्टर रैंड लिखता है कि मैंने मुम्बई जाने के लिए विक्टोरिया जहाज में सीट बुक कर दी है, परन्तु अभी तक मुझे आधिकारिक आदेश प्राप्त नहीं हुआ, इसलिए मुझे जल्दी से जल्दी भेजने की व्यवस्था की जाए. 24 सितम्बर को तार सन्देश द्वारा यह पत्र भारत के दफ्तर में पहुँचता है और 26 सितम्बर को यानी केवल दो दिनों के भीतर वॉल्टर रैंड को वापस तार सन्देश द्वारा आदेश भी मिल जाते हैं... (यहाँ पर यह उदाहरण केवल इसलिए दिया गया, कि आज से लगभग सवा सौ वर्ष पूर्व भी अंग्रेजों की प्रशासनिक मशीनरी कितनी चुस्त और समयबद्ध थी... उपरोक्त दोनों पत्र आज भी ब्रिटिश लायब्रेरी में सुरक्षित रखे हुए हैं... यह भी एक कौतूहल वाली बात है).

Chapekar

खैर... आगे बढ़ते हैं.... अंग्रेजों की कार्यपद्धति एवं उनकी प्रशासनिक व्यवस्था का एक और नमूना... वॉल्टर रैंड तथा आयर्स्ट की हत्या हो जाने के मात्र तीन माह के अन्दर श्रीमती रैंड और श्रीमती आयर्स्ट को “विशेष पेंशन” भी आरम्भ हो गई. 1897 में यानी आज से 120 वर्ष पहले, श्रीमती रैंड को 250 पौंड वार्षिक तथा उनके प्रत्येक बच्चे को 21 पौंड वार्षिक की पेंशन मिलने लगी. जबकि श्रीमती आयर्स्ट को उनके पति के ओहदे के अनुसार 150 पौंड वार्षिक तथा बच्चों को 15 पौंड वार्षिक की पेंशन मिलने लगी. चूँकि दोनों अधिकारी ऑन-ड्यूटी मारे गए थे, इसलिए उन्हें विशेष शहीद का दर्जा और पेंशन दी गई. (पेंशन संबंधी यह सभी दस्तावेज ब्रिटिश लायब्रेरी में सुरक्षित हैं).

अब आते हैं इस लेख के दर्दनाक अंत पर, जो आपको स्तब्ध कर देगा... दामोदर चाफ़ेकर की पत्नी श्रीमती दुर्गाबाई (जिनका आज कोई नाम तक नहीं जानता) उस समय केवल 17 वर्ष की युवती थीं. इसके बाद पूरे साठ वर्ष अर्थात 1956 तक वे जीवित रहीं. 1947 में भारत स्वतन्त्र हुआ... यानी स्वतंत्रता के पश्चात भी नौ वर्षों तक दुर्गाबाई जीवित थीं.... लेकिन हा दुर्भाग्य!!! भारत सरकार की तरफ से उन्हें कोई विशेष पेंशन मिलना तो दूर, उनके पति वीर स्वतंत्रता सेनानी थे यह दर्शाने वाली ताम्र पट्टिका तक उन्हें नसीब नहीं हुई. वामपंथी इतिहासकारों ने इतिहास से उनका नाम मिटाने की भरपूर कोशिश की, वह घृणित अध्याय अलग है. जरा सोचिये... चाफ़ेकर बंधुओं की वीरता, उनकी प्लानिंग... हँसते-हँसते फाँसी चढ़ना और फिर पूरे साठ वर्षों तक उनकी विधवा दुर्गाबाई का जीवन संघर्ष... उधर अंग्रेजों ने अपने अधिकारियों को "शहीद" का दर्जा देकर उनके पूरे परिवार का ध्यान रखा... और इधर भारत में सत्ता की मलाई चाटने वाले नेहरू की सरकार ने दुर्गाबाई को क्या दिया... उपेक्षा और अपमान. 

Read 4576 times Last modified on रविवार, 25 जून 2017 07:58