धनुषकोटि :- एक और ध्वस्त एवं उपेक्षित हिन्दू तीर्थस्थल

Written by गुरुवार, 30 अगस्त 2018 18:41

धनुषकोटि, भारतके दक्षिण-पूर्वी शेष अग्रभागपर स्थित हिन्दुआेंका यह एक पवित्र तीर्थस्थल है ! यह स्थान पवित्र रामसेतु का उद्गम स्थान है. ५० वर्षोंसे हिंदुओं के इस पवित्र तीर्थस्थल की अवस्था एक ध्वस्त नगर की भान्ति बनी हुई है. २२ दिसम्बर १९६४ के दिन इस नगर को एक चक्रवात ने पूरी तरह ध्वस्त किया.

तदुपरान्त गत ५० वर्षों में इस तीर्थस्थल का पुनरूत्थान करने की बात तो दूर, अपितु शासन द्वारा इस नगर को ‘भूतों का नगर’ घोषित कर उसकी अवमानना की गई. इस घटना को आज ५० वर्ष पूर्ण हो गए हैं. इस निमित्त बंगाल, आसाम, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु राज्य के कुछ हिन्दुत्ववादी संगठनों के नेताओं की रिसर्च टीम ने धनुषकोटि जाने का फैसला किया. इस रिसर्च टीम में हिन्दू जनजागृति समितिके प्रतिनिधि भी सम्मिलित हुए थे. इस रिसर्च यात्रा में धनुषकोटि की भीषण सच्चाई इस लेख में प्रस्तुत की गई है.

D1

धनुषकोटि के दक्षिण में हिन्द महासागर गाढा नीला पानी दिखता है, तो उत्तर में बंगाल का उपसागर मैले काले रंग का दिखता है. इन दोनों सागरों में मात्र १ कि.मी की भी दूरी नहीं है. दोनों सागरों का पानी स्वाभाविक रूप से नमकीन है. ऐसा होते हुए भी धनुषकोटि में केवल तीन फुट गढ्ढा खोदने पर उसमें मीठा पानी आता है.. क्या यह प्रकृति द्वारा निर्मित चमत्कार नहीं है? तमिलनाडु राज्य के पूर्वी तट पर रामेश्व रम नामक तीर्थस्थल है. रामेश्वरम के दक्षिण की ओर ११ कि.मी. दूरी पर ‘धनुषकोडी’ नगर है. यहां से श्रीलंका केवल १८ कि.मी. दूरी पर है. बंगाल के उपसागर (महोदधि) और हिन्द महासागर (रत्नाकर) के पवित्र संगम पर बसा और ५० गज (अनुमानतः १५० फूट) चौडा धनुषकोटि, बालु रेत से व्याप्त स्थान है.

D2

 

रामेश्वरम और धनुषकोडी की धार्मिक महिमा!
उत्तर भारत में काशी की जो धार्मिक महिमा है, वही महिमा दक्षिण भारतमें रामेश्व रम की है. रामेश्वतरम हिंदुओं के पवित्र चारधाम यात्रा में से एक धाम भी है. पुराणादि धर्मग्रन्थों के अनुसार काशी विश्वेरश्व र की यात्रा श्री रामेश्वमर के दर्शन बिना पूरी नहीं मानी जाती. काशी की तीर्थयात्रा बंगाल के उपसागर (महोदधि) और हिन्द महासागर (रत्नाकर) के संगम पर स्थित धनुषकोडी में स्नान करने पर और तदुपरान्त काशी के गंगाजल से रामेश्वररम का अभिषेक करने के उपरान्त ही पूरी होती है.

धनुषकोडी का इतिहास और रामसेतु की प्राचीनता
पहले भाग को धनुषकोडी (‘कोडी’ अर्थात धनुष्य का अग्रभाग) कहते है. साढे सतरह लाख वर्ष पूर्व रावण की लंका में (श्रीलंका) प्रवेश करनेके लिए प्रभु श्रीराम ने अपने ‘कोदण्ड’ नामक धनुष के अग्रभाग से सेतु बनाने के लिए यह स्थान निश्चिेत किया था. यहां एक ही रेखा में विद्यमान बडे पाषाण क्षेत्रों की श्रृंखला भग्न अवशेषों के रूप में आज भी हमें देखने को मिलती है. रामसेतु नल और नील की वास्तुकला का एक अदभुत नमुना है. वाल्मिकी रामायण में ऐसा विस्तृत वर्णन है कि रामसेतु की चौडाई और लम्बाई का एक निश्चित अनुपात है. प्रत्यक्ष नापने पर भी उसकी चौडाई ३.५ कि.मी. तथा लम्बाई ३५ कि.मी. है. इस सेतु के निर्माण कार्य के समय गिलहरी द्वारा दिए योगदान की कथा और पानी पर तैरते हुए पाषाण हम हिंदुओं की कई पीढियां जानती हैं.

धनुषकोडी और रामभक्त विभीषण
श्रीराम-रावण महायुद्ध के पहले धनुषकोडी नगर में ही रावणबन्धु विभीषण प्रभु श्रीरामके शरणमें आए थे. श्रीलंका युद्धसमाप्ति के पश्चाहत प्रभु रामचंद्र ने इसी नगर में विभीषण का सम्राट के रूपमें राज्याभिषेक किया था. इसी समय लंकाधिपती विभीषण ने प्रभु रामचंद्र से कहा था, ‘‘भारत के शूर और पराक्रमी राजा रामसेतु का उपयोग कर बार-बार श्रीलंका पर आक्रमण करेंगे और श्रीलंका की स्वतन्त्रता नष्ट करेंगे. इसलिए प्रभु आप इस सेतु को नष्ट कीजिए।’’ अपने भक्त की प्रार्थना सुनकर कोदण्डधारी प्रभु रामचंद्रने रामसेतु पर बाण छोडकर उसे पानी में डुबाया. इसलिए यह सेतु पानीके २-३ फूट नीचे गया है. आज भी रामसेतु पर कोई खडा रहता है, तो उसकी कमर तक पानी होता है.

रामसेतुका ध्वंस करनेवाली सेतुसमुद्रम परियोजना
केन्द्र की हिन्दूद्वेषी कांग्रेस शासन ने व्यावसायिक लाभ को देखकर ‘सेतुसमुद्रम शिपिंग कॅनॉल’ नामक परियोजना द्वारा सेतु ध्वस्त करने का षडयन्त्र रचा था. यह परियोजना हिंदुओं की श्रद्धा पर प्रहार ही था. अनुमानतः २४ प्रतिशत रामसेतु ध्वस्त होने के उपरान्त सर्वोच्च न्यायालय ने इस परियोजना पर स्थगन लगाया. तब तक रामसेतु का एक चौथाई भाग ‘ड्रील’ किया गया था. फलस्वरूप इस सेतुके बडे पाषाण चकनाचूर हो गए हैं. आज भी इन पाषाणों के अवशेष हिन्द महासागर और बंगाल के उपसागर में तैरते दिखाई देते हैं. मछुआरों के जालमें कई बार इन तैरते पत्थरों के टुकडे आते हैं. कुछ लोग धनुषकोडी अथवा रामेश्व रम में यह पत्थर बेचते दिखाई देते हैं. इस प्रकार से ऐतिहासिक और धार्मिक आस्था से सम्बन्धित वास्तु स्थल का ध्वंस करनेवाले कांग्रेसजन अखिल मानवजाति के ही नहीं, अपितु इतिहास के भी अपराधी हैं. उनका अपराध क्षम्य नहीं!

धनुषकोडी वर्ष १९६४ के पहले बडा नगर था !
ब्रिटिशकाल में धनुषकोडी एक बडा नगर था, तो रामेश्वनरम एक छोटा सा गांव था. यहां से श्रीलंका जाने के लिए नौकाओं की सुविधा थी. उस समय श्रीलंका जाने के लिए पारपत्र (पासपोर्ट) की आवश्यकता नहीं थी. धनुषकोडी से थलाईमन्नार (श्रीलंका) तक की नौकायात्रा का टिकट केवल १८ रुपया था. इन नौकाओं द्वारा व्यापारी वस्तुओं का लेन-देन भी होता था. वर्ष १८९३ में अमेरिका में धर्मसंसद के लिए गए स्वामी विवेकानंद वर्ष १८९७ में श्रीलंका मार्ग से भारत में आए, तब वे धनुषकोडी की भूमि पर ही उतरे थे. वर्ष १९६४ तक धनुषकोडी विख्यात पर्यटनस्थल और तीर्थस्थल था. श्रद्धालुओं के लिए यहां होटल, कपडों की दुकान और धर्मशालाएं थी. उस समय धनुषकोडी में जलयान निर्माण केन्द्र, रेलवे स्टेशन, छोटा रेल चिकित्सालय, पोस्ट कार्यालय और मत्स्यपालन जैसे कुछ शासकीय कार्यालय थे. वर्ष १९६४ के चक्रवात के पहले चेन्नई और धनुषकोडी के मध्य में ‘मद्रास एग्मोर’ से ‘बोट मेल’ नामक परिचित रेलसेवा थी. आगे श्रीलंका में फेरीबोट से जाने वालों के लिए वह उपयुक्त थी.

धनुषकोडीका ध्वंस करनेवाला १९६४ का चक्रवात!

१९६४ में आया चक्रवात धनुषकोडी का ध्वंस करनेवाला सिद्ध हुआ. १७ दिसम्बर १९६४ को दक्षिणी अण्डमान समुद्र में ५ डिग्री पूर्व में उसका केन्द्र था. १९ दिसम्बर को उसने एक बडे चक्रवात के रूपमें वेग धारण किया. २२ दिसम्बर की रात में वह २७० कि.मी प्रतिघण्टा के वेग से श्रीलंका को पार कर धनुषकोडी के तट पर पहुँच गया. चक्रवात के समय आई २० फूट ऊंची लहरों ने धनुषकोडी के पूर्व संगम से नगर पर आक्रमण किया और सम्पूर्ण धनुषकोडी नगर ध्वस्त कर दिया. धनुषकोडी के बस स्थानक के पास चक्रवात में बली हुए लोगों का एक स्मारक बनाया गया है. उस पर लिखा है - ‘उच्च वेग से बहनेवाली हवा के साथ आए उच्च गति के चक्रवात में २२ दिसम्बर १९६४ की रात में प्रचण्ड हानि हुई और धनुषकोडी ध्वस्त हुआ!’

D3

(चक्रवात से पहले और चक्रवात के बाद धनुषकोटि का बंदरगाह और रेलवे स्टेशन)

२२ दिसम्बर की अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण रात में ११.५५ बजे धनुषकोडी रेलवे स्टेशन में प्रवेश की ६५३ क्रमांक की ‘पंबन-धनुषकोडी पैसेन्जर’ (वह उसकी नियमित सेवा के लिए पंबन से ११० यात्री और ५ कर्मचारियों के साथ निकली थी), इन प्रचण्ड लहरों के आक्रमण की बली हुई. उस समय वह धनुषकोडी रेलवे स्टेशन से कुछ ही मीटर दूरी पर थी. पूरी ट्रेन उसके ११५ यात्रियों के साथ बह गई. पंबन से आरम्भ हुआ धनुषकोडी का रेलमार्ग १९६४ के चक्रवातमें नष्ट हुआ. चक्रवात के उपरान्त रेलमार्ग की दुःस्थिति हुई और कुछ समय उपरान्त वह पूर्णतः बालु के नीचे ढंक गया..
प्रचण्ड वेगसे आनेवाला पानी रामेश्वररमके मन्दिरके पास थम गया !

यह चक्रवात आगे-आगे बढते हुए रामेश्वरम तक आ गया था. उस समय भी आठ फुट ऊंची लहरें आ रही थीं. इस परिसर के कुल १८०० से अधिक लोग इस चक्रवात में मृत हुए. हालाँकि स्थानीय लोगों के मतानुसार यह संख्या ५००० थी. धनुषकोडी के सभी निवासियों के घर और अन्य वास्तु की इस चक्रवात में दुःस्थिति होकर उनके केवल भग्न अवशेष रह गए. इस द्वीप कल्प पर १०० कि.मी. वेगसे हवा बही और पूरा नगर ध्वस्त हुआ; परन्तु प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि समुद्र की प्रचण्ड तरंगों का वेग से आनेवाला पानी रामेश्वपरम के मुख्य मन्दिर के पास थम गया था. विशेष बात यह कि सैंकडो लोगों ने रामेश्वपरमके मन्दिरमें चक्रवात से बचनेके लिए आश्रय लिया था!

D4

 

D5

केवल एक व्यक्ति बचना !

वर्ष १९६४ के चक्रवात में धनुषकोडी नगर के सभी लोगों की मृत्यु हुई. केवल एक ही व्यक्ति इस चक्रवात में बच गया, उसका नाम था कालियामन! इस व्यक्ति ने समुद्र में तैरकर अपने प्राण बचाए; इसलिए शासन ने उसका नाम पास के गांव को देकर उसका सम्मान किया. यह गांव आज भी ‘निचल कालियामन’ नाम से जाना जाता है.. निचल का अर्थ है तैरनेवाला.

शासन द्वारा धनुषकोडी ‘भूतों का शहर’ घोषित
इस संकट के उपरान्त तुरन्त ही तत्कालीन मद्रास शासन ने धनुषकोडी को ‘भूतों का शहर’ (Ghost Town) घोषित किया और नागरिकों के वहां रहने पर प्रतिबन्ध लगाया. सामान्यतः निर्मनुष्य नगरों को ‘भूतों का शहर’ सम्बोधित किया जाता है. अब कुछ मछुआरे और दुकानदार व्यवसाय हेतु दिन भर के लिए जा सकते हैं. सायंकाल में ७ बजने से पहले उन्हें वहां से लौटना पडता है.

D6

बालू और विभिन्न वास्तुओं के भग्न अवशेषों का नगर

अब धनुषकोडी नगर पर पूर्णतः (मध्यमें समुद्र का पानी और वनस्पती) बालू का साम्राज्य है. आकाश से खींचे चित्रों से इस नगर की ओर देखने पर केवल बालु ही दिखती है. यहां की बालु में सर्वत्र भग्न अवशेष दिखाई पडते हैं. जलयान निर्मिती केन्द्र, रेलवे स्टेशन, पोस्ट ऑफिस, चिकित्सालय, पुलिस और रेलवे कालोनियां, विद्यालय, मन्दिर चर्च आदि के अवशेष यहां स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।

धनुषकोडी के विकास की उपेक्षा...
धनुषकोडी नगर में जाने से पहले श्रद्धालुओं को बताया जाता है कि, ‘एक साथ जाओ और सूर्यास्त के पहले लौट आओ’; क्योंकि १५ कि.मी. की पूरी सडक वीरान और भयानक है. वर्तमान में लगभग ५०० से अधिक यात्री प्रतिदिन धनुषकोडी में आते हैं. त्यौहार और पूर्णिमा के दिन हजारों की संख्या में यात्री यहां आते हैं. धनुषकोडी में पूजन-अर्चन करनेवालों के लिए निजी वाहन के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है. निजी वाहनों के चालक यात्रियोंसे ५० से १०० रुपयों तक किराया लेते हैं. रामेश्व रम जाने वाले पूरे देश के यात्रियों की मांगके अनुसार वर्ष २००३ में दक्षिण रेल मन्त्रालय ने रामेश्व रम से धनुषकोडी तक १६ कि.मी. रेलमार्ग बनाने के लिए एक प्रतिवेदन भेजा था, परन्तु आज तक इसकी उपेक्षा ही की गई है.

पूरे भारत से श्रद्धालु यहां केवल पवित्र रामसेतु का दर्शन लेने आते हैं. धनुषकोडी में आने के पश्चा त पता चलता है कि रामसेतु के दर्शन करने के लिए कस्टम की अनुमति लगती है. कस्टम विभाग का कार्यालय रामेश्वकरम में है. रामेश्वतरम से धनुषकोडी तक यात्री पक्की सडक न होने के कारण कभी बालु से तो कभी सागर के पानी से कष्टप्रद यात्रा करते हुए यहां पहुंचते हैं. परन्तु यहां आने पर अनुमति लेने के लिए उन्हें पुनः १८ कि.मी. का कष्टप्रद अन्तर काटकर रामेश्व रम को जाना पडता है. परिणामस्वरूप ९० प्रतिशत श्रद्धालु धनुषकोडी पहुंचने पर भी पवित्र रामसेतु के दर्शन नहीं कर पाते. शासन धनुषकोडी में ही कस्टम कार्यालय क्यों नहीं खोलता?

भारत-श्रीलंका में सागरी सीमा विवाद उत्पन्न होने से धनुषकोडी से थलाईमन्नार तक की सागरी यातायात बन्द हुई. इससे यहां के हिंदुओं का श्रीलंका के हिंदुओं से सम्पर्क टूट गया. इसके पहले प्रतिदिन सायंकाल में ६ बजे श्रीलंका से भारत में दूध आता था, जिससे दूसरे दिन प्रातः रामेश्वेरम के शिवलिंग पर अभिषेक किया जाता था. यह परम्परा अनेक वर्षों से थी. भारत-श्रीलंका के सागरी सीमा विवाद के कारण वह बन्द हुई. पहले थलाइमन्नार से धनुषकोडी तक की ३५ कि.मी. की यात्रा नौका से २ घण्टे में होती थी. अब थलाईमन्नार से कालंबो तक ५०० कि.मी. की यात्रा करके जाना पडता है. कोलंबो से मदुराई विमानसेवा है. इसके लिए १ घण्टा लगता है. मदुराई से रामेश्वेरम की २०० कि.मी की यात्रा रेल अथवा बससे करनेके लिए साढे चार घण्टे लगते हैं.

वर्तमान स्थिति में रामेश्वेरम से धनुषकोडी को जाना हो, तो या तो बालु और समुद्र से मार्ग निकालते हुए पैदल जाना पडता है अथवा निजी बस से! रामेश्वसरम में आने पर धनुषकोडी जाकर रामसेतु के दर्शन करने की इच्छा रहती है. इस १८ कि.मी. की यात्रा में हेमपुरम तक पक्की सडक है. वहां से आगे की सम्पूर्ण यात्रा सागरी तट की बालु से अथवा सागरी तट के निकट पानी के वाहन चलाकर करनी पडती है. इस अंतिम ७ कि.मी. के लिए सडक बनाई ही नहीं है. भारत का प्रमुख तीर्थस्थल होते हुए भी यहां सडक बनाई न जाना आश्चर्यजनक है. श्रद्धालु यहां आना चाहते हैं. अपने आपको बडे संकट में डालकर वे यहां आते हैं. अधिकांश श्रद्धालु हेमपुरम तक ही आते हैं. यहां से आगे सडक न होने के कारण वे आगे जाने का साहस नहीं करते. जो साहसी होते हैं, ऐसे श्रद्धालु ही धनुषकोडी तक जाने का प्रयास करते हैं. रामेश्वेरम से धनुषकोडी की सडक आज तक क्यों नहीं बनाई गई, ऐसा प्रश्नय यहां आनेवाले प्रत्येक श्रद्धालु के मन में आता है. हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को किसी भी प्रकार से महत्त्व न देने का भारत का धर्मनिरपेक्षतावादी तत्त्व यहां भी दिखाई देता है.

केवल धर्मभावना की दृष्टि से ही नहीं, अपितु राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से भी यह मार्ग बनाना आवश्यक है. काशी जाने वाले करोडो हिन्दू जाति, भाषा, प्रान्त आदि भेद त्यागकर रामेश्ववरम के दर्शन की आस लगाए बैठते हैं. केवल दक्षिण भारत के ही नहीं, अपितु कश्मीर के साथ उत्तर भारत, आसाम के साथ उत्तरपूर्वी भारत, बंगाल के साथ पूर्व भारत, मुंबई, गुजरात आदि पश्चितम भारत के नागरिक यहां दर्शन हेतु आते हैं अथवा आने की इच्छा रखते हैं. धनुषकोडी राष्ट्रीय एकता साधनेवाला नगर है. तमिलनाडु शासन और केन्द्र शासन यह छोटी सी सडक बनाकर राष्ट्रीय एकता का यह आधार सुदृढ क्यों नहीं बनाते? महानगरों में मेट्रो ट्रेन आरम्भ करने के लिए हजारों करोड रुपए व्यय किए जाते हैं; तो फिर केवल ५०-६० करोड रुपयों की यह सडक क्यों नहीं बनाई जाती? कश्मीर में पूंछ से श्रीनगर में मुगलकालीन मार्ग था. इस मार्ग को इस्लामी संस्कृति की देन समझकर उसका पुनरूत्थान करनेके लिए शासन ने करोडो रुपए व्यय किए; फिर १९६४ में ध्वस्त हुआ; परन्तु हिंदुओं के आस्था स्रोत से सम्बन्धित यह मार्ग पुनः निर्माण करने में क्या अडचन आती है?

धनुषकोडी में चर्च का आडंबर संकट की सूचना

आज तक का अनुभव है कि ईसाई मिश्न री भारत के कोने-कोने में विशेषकर पिछड़े और दुर्गम क्षेत्र में जाकर धर्मान्तरण का कार्य करते हैं. भारत के दक्षिण पूर्व के अग्रभाग में स्थित धनुषकोडी नगरमें एक भव्य चर्च के अवशेष हैं. यह चर्च १९६४ के चक्रवात में ध्वस्त हुआ. इसका अर्थ यह है कि उस समय भी ईसाई धर्मप्रचारक भारी संख्या में धर्मान्तरण कर रहे थे. अब धनुषकोडी नगर के २ कि.मी. पहले एक मध्यम आकार का चर्च खडा है. उसके आसपास कोई मनुष्य बस्ती नहीं है. वास्तव में हिंदुओं के इस पवित्र स्थान में चर्च बनाने के लिए शासन को अनुमति नहीं देनी चाहिए. जिस प्रकार मक्का में चर्च नहीं बना सकते, अथवा वैटिकन में मन्दिर नहीं बना सकते, उसी प्रकार हिंदुओं के तीर्थस्थलों के स्थान पर चर्च, मस्जिदें, दरगाह बनाने की अनुमति नहीं होनी चाहिए.

यहां के चर्च का रहस्य ध्यान में रखकर हमने यहां के मछुआरों को मिलने का प्रयत्न किया. हमें लगा कि वे धर्मान्तरित हुए होंगे. प्रत्यक्ष मिलने पर पता चला कि सभी मछुआरे हिन्दू ही हैं. वर्ष १९६४ के पहले के भव्य चर्च के अवशेष देखने पर ध्यानमें आता है कि वहां भारी संख्यामें धर्मान्तरण हुआ होगा; परन्तु अब वहां एक भी ईसाई नहीं है, या तो १९६४ के चक्रवात में सभी ईसाई नष्ट हुए या ‘आकाश का बाप धनुषकोडी के ईसाईयों को बचाता नहीं है‘, यह ध्यान में आने पर वे वहां से भाग गए होंगे. ऐसा होते हुए भी आसपास के परिसर में चर्च की स्थापना और भारी संख्या में ईसाई धर्मप्रचारक आदि के कारण भविष्य में वहां के अज्ञान और निर्धन हिन्दू ईसाई हो गए, तो कोई आश्चर्य नहीं लगेगा. भविष्य में धर्मान्तरण का आडंबर बढकर जब यह क्षेत्र नागालैण्ड-मीजोरम जैसा बनेगा, तब भारतीय राज्यकर्ता इस क्षेत्र के विकास के लिए करोडो रुपए व्यय करेंगे।

धनुषकोडी की भीषण अवस्था प्रत्यक्ष देखने पर ध्यान में आता है कि सभी राजनैतिक पार्टियों ने भारतीय तीर्थस्थलों की किस प्रकार उपेक्षा की है. प्रश्न है कि क्या काशी को ‘स्मार्ट सिटी’ बनाने की घोषणा करने वाले विकास पुरुष काशीयात्रा को पूर्णत्व देनेवाले धनुषकोडी नगर को भी न्याय देंगे? हिंदुओं की असंवेदनशीलता भी इस दुर्गति का एक कारण है. हमें यह समझना होगा कि यदि हम हिन्दू इसी प्रकार असंवेदनशील रहेंगे, तो आज तक विकसित हुए अनेक तीर्थस्थलों की अवस्था भविष्य में धनुषकोडी समान हो जाएगी. हिंदुओं के तीर्थस्थलों का विकास करने के लिए तथा वहां धर्मशालाएं, सडकें आदि सुविधा करने के लिए हमें शासन से आग्रहपूर्वक मांग करनी चाहिए. वास्तव तो यह है कि प्रचलित धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था में हिन्दू धर्महित के कार्य होंगे, ऐसी अपेक्षा करना उचित नहीं होगा. इसलिए हिन्दूहित साधनेवाला धर्माधिष्ठित हिन्दू राष्ट्र स्थापित करना, तीर्थस्थलों का विकास करने के लिए यही खरा उपाय है.

साभार :- चेतन राजहंस, हिन्दू जनजागृति समिति 

Read 914 times Last modified on गुरुवार, 30 अगस्त 2018 19:20