कांग्रेस ने “हीरा” गँवा दिया, तो भाजपा ने उठा लिया :- नतीजा?

Written by बुधवार, 29 मार्च 2017 11:04

विश्लेषक हैरान हैं कि आखिर पिछले दो वर्षों में ऐसा क्या हुआ है कि भाजपा उत्तर-पूर्वी राज्यों में भी अपना आधार बनाने में सफल हो रही है. असम एक शुरुआत थी, लेकिन देखते ही देखते अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर में भी भाजपा ने पैर पसार लिए हैं. आखिर भाजपा के हाथ में ऐसा कौन सा जादू लग गया है?

पहले एक इंटरव्यू में दिया हुआ यह खुला बयान पढ़िए... – “.....“उनका ध्यान मीटिंग में नहीं था। उनका सारा ध्यान अपने कुत्ते के साथ खेलने में था। वे अपने छोटे कुत्ते के साथ खेल रहे थे। जब आप अपनी पार्टी के किसी मुख्यमंत्री के साथ बात करते हैं तो आप अपने कुत्ते को लाख चाहते हुए भी उन गंभीर बातों के बीच तो नहीं लाते न? तभी अचानक उस कुत्ते ने हमारी मेज से बिस्किट खाना शुरू कर दिया, और तब भी वे अपने कुत्ते को शाबासी रहे थे। बैठक से बाहर आते हुए मैंने तरुण गोगोई से कहा.. “सर, बस मेरे लिए बहुत हुआ, आपको उनके कुत्ते से बहुत प्यार हो सकता है, मगर जब गंभीर बातें होती हैं तो कम से कम उन्हें उसमें थोडा ध्यान तो देना ही चाहिए। कम से कम उन लोगों की बातें तो आपको सुननी ही चाहिए, जिन्हें आपने इतनी दूर से बुलाया हुआ है, और जब वे लोग आपसे बात कर रहे हों तो आप राजा की तरह व्यवहार नहीं कर सकते. उनका व्यवहार करने का यह तरीका सही नहीं है.....”

जी हाँ!!! ये बातें शेखर गुप्ता के टॉक शो “वाक द टॉक” की थी, जहाँ उत्तर-पूर्व की राजनीति के सितारे हिमंत बिस्वा सरमा ने राहुल गांधी के साथ हुए अपनी अंतिम बातचीत को साझा किया। हिमंत की आवाज़ में हताशा थी, निराशा थी और अपमान का पुट भी था। वे राहुल गांधी से असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई, तत्कालीन कोंग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अनजान दत्ता, कॉंग्रेस के महासचिव और असम के प्रभारी सीपी जोशी के साथ राहुल गाँधी से मिले थे। यह बैठक कॉंग्रेस के कार्यकर्ताओं और नेतृत्व के बीच सम्वाद स्थापित करने के लिए आयोजित की गई थी। इस बैठक से उम्मीद थी कि असम की कमजोर होती कोंग्रेस को शक्ति मिलेगी। हिमंता सरमा, गोगोई सरकार के साथ 2006 और 2011 में कैबिनट मंत्री के रूप में काम कर चुके हैं। मगर उन्होंने 2014 के मध्य में ही मुख्यमंत्री के साथ बढ़ते विवादों के चलते उन्होंने सभी पदों से खुद को अलग कर दिया था। सरमा खुद को गोगोई के प्राकृतिक उत्तराधिकारी के रूप में देख रहे थे, जबकि पुत्रमोह के मारे गोगोई अपने बेटे को असम सौंपे जाने की फिराक में थे।

राहुल गांधी ने सरमा, गोगोई और दत्ता को अपने घर सभी मतभेद भुलाकर और असम चुनावों में मिल कर काम करने के लिए बुलाया। मगर विडंबना यह रही कि राहुल के व्यवहार से क्षुब्ध होकर संवाद के गड्ढे भरने के स्थान पर, उस बैठक के बाद हिमंत बिस्वा सरमा ने पार्टी ही छोड़ दी। कांग्रेस के इस नुकसान से भाजपा के भाग्य का छींका फूटा। सरमा ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के घर जाकर अगस्त 2015 में भाजपा के साथ हाथ मिला लिया। उन्हें तुरंत ही असम राज्य चुनाव प्रबंधन का संयोजक बना दिया, जबकि सर्बानंद सोनोवाल को राज्य के मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया। यह भारत के उत्तर-पूर्व में कोंग्रेस के अंत की तरफ पहला कदम था।

अप्रैल 2016 में सरमा के इस विस्फोटक साक्षात्कार ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी और लोगों के सामने यह आया कि किस तरह कोंग्रेस के युवराज ने राज्य में नेतृत्व और पार्टी को नेस्तनाबूद करने में भूमिका निभाई। इसने कोंग्रेस पार्टी के सामंती व्यवहार को पूरी दुनिया के सामने बेपर्दा कर दिया। हालांकि सरमा का कहना है “ऐसा नहीं है कि राहुल प्रतिभा को नहीं पहचानते हैं, मगर समस्या यह है कि वह व्यक्ति उनके पिता राजीव गांधी के समय का कार्यकर्ता होना चाहिए, वह व्यक्ति ऐसा होना चाहिए जिसने इंदिरा गांधी की सेवा की हो... मगर जहां बात आएगी किसी नए युवा की, तो ऐसे इंसान पर हमेशा उन्हें हमेशा शक होता रहेगा, वे ऐसे व्यक्ति की प्रतिभा को नहीं पहचान पाते हैं।” इस एक ही वाक्य में सरमा ने राहुल की उस कमी को एक झटके में सबके सामने ला दिया जो न केवल उनकी बल्कि उस कोंग्रेस पार्टी की भी कमी है जिसका वे नेतृत्व कर रहे हैं.

जबकि भाजपा के रूप में सरमा को एक ऐसी पार्टी मिली, जो उन नए लोगों के साथ हर तरह के प्रयोग करने के लिए तैयार थी, और वह विजय की एक नई लकीर खींचने के लिए उत्सुक भी थी। प्रधानमंत्री श्री मोदी खुद जमीन से उठकर प्रधानमंत्री बनने का एक उदाहरण प्रस्तुत कर चुके है। जब शाह और मोदी प्रदेश में राज्य सरकार को आगे बढाने के लिए नए चेहरों को पहचानने की फिराक में थे तो सरमा के साथ सर्बानंद सोनोवाल असम में पार्टी के लिए एक आदर्श चेहरे के रूप में उभरे। सरमा और सोनोवाल जो असम राज्य की राजनीति में समकालीन चेहरे थे, उन लोगों ने अपना राजनीतिक जीवन आल असम स्टूडेंट युनियन के कार्यकर्ताओं के रूप में आरम्भ किया था, सरमा बाद में कोंग्रेस के साथ जुड़ गए, तो वहीं सोनोवाल ने असमगण परिषद का रुख किया। वे दोनों ही अपने राजनीतिक जीवन में वर्ष 2001 से एक दशक तक आगे बढ़ते रहे।

जहां एक तरफ भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनावों में 14 में से 9 सीटें जीतीं थीं, तो 2016 के चुनावों में जीत बहुत कठिन नहीं थी। असम के सबसे लम्बे समय तक मुख्य मंत्री रहे तरुण गोगोई एंटी-इनकम्बेंसी का सामना कर रहे थे, मगर यह भी सच है कि राज्य की लगातार बदलती जनसांख्यकी और राज्य पर तरुण गोगोई की पकड़ को देखते हुए, कॉंग्रेस को एकदम नकारा भी नहीं जा सकता था, और साथ ही आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के साथ सभी मुस्लिम भी थे। अमित शाह को स्थानीय स्तर पर एक जादू की जरूरत थी, जो उन्हें इन दोनों में दिखा।

स्थानीय दलों के साथ मिलकर भाजपा ने 126 में से 86 सीटें जीत लीं। हिमंत बिस्वा जहां प्रचार समिति के अध्यक्ष रहे, तो वहीं उन्हें स्थानीय उम्मीदवारों को चुनने की खुलकर आज़ादी मिली। उन्हें इस बात की भी आज़ादी थी कि कितनी सीटें सहयोगी दलों को दी जाएँगी और इन चुनावों में मुख्यमंत्री गोगोई और उनके बेटे और इस वंशवादी राजनीति पर खूब जमकर प्रहार किए। सरमा ने राहुल गांधी के हाथों हुई अपने व्यक्तिगत अपमान का बदला इस शानदार राजनीतिक तरीके से लिया, तब से उन्होंने वापस मुड़कर नहीं देखा है।

शाह ने उत्तरपूर्व डेमोक्रेटिक एलाइंस के रूप में एक राजनीतिक मंच बनाया जिसका लक्ष्य था भाजपा को आठ राज्यों में मजबूत करना। एक साथ इन राज्यों में 25 लोक सभा सीटें हैं और यह वह क्षेत्र है जहां भाजपा हर कीमत पर अपना राज्य चाहेगी और वह चाहेगी कि 2019 के लोकसभा चुनावों में ज्यादा से ज्यादा सीटें जीते। असम में एक कैबिनेट मंत्री के रूप में अपनी भूमिका के अतिरिक्त सरमा को NEDA के प्रमुख के रूप में भी जिम्मेदारी दी गयी है, जिसका लक्ष्य है कोंग्रेस को उस क्षेत्र में एकदम धुल चटाना। शाह और मोदी का कोंग्रेस मुक्त भारत सपने को सरमा की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के पर मिल गए। 2016 के बाद भाजपा ने असम और मणिपुर में चुनाव जीते हैं और अरुणाचल प्रदेश में सरकार का गठन किया है और उसके साथ ही नागालैंड में भी पूर्वोत्तर में भगवा गुलाल के रूप में अपने मुख्यमंत्री बनवा चुके हैं। सरमा ने कोंग्रेस मुक्त भारत के सपने को एक नया मुकाम दे दिया है। उन्होंने राहुल की कोंग्रेस को समाप्त कर वहां पर मोदी और शाह की भाजपा को एक नया जीवन और रूप दिया है। पार्टी के लिए सरमा एक पूर्णकालिक राजनेता है जिनके अन्दर अपने राजनीतिक प्रतिस्पर्धियों को जमींदोज करने की इच्छा और क्षमता है और इस मामले में वे पार्टी के प्रति और अपने प्रति जिम्मेदार हैं। यह भी स्पष्ट है कि सरमा के पास पूर्वोत्तर मोर्चे के विस्तार के लिए निर्णय लेने की पूरी स्वतंत्रता है। जब भाजपा को महसूस हुआ कि उनके पास मणिपुर में बहुमत से कुछ विधायक कम हैं तो सरमा ने भरोसा दिलाया कि यदि पार्टी चाहे तो वे कोंग्रेस के जितने चाहे उतने विधायक अपने खेमे में ला सकते हैं। और यह सब तब पता चला जब भाजपा ने अपना बहुमत सदन में साबित कर दिया, जो सबको एकदम अविश्वसनीय लग रहा था क्योंकि पार्टी के पास सीटें नहीं थीं, मगर गठबंधन करने के द्वारा वे सरकार बनाने में सफल रहे। भाजपा नेतृत्व को बहुत ही जल्द यह अहसास हो गया था कि इस कद के नेता को केवल मंत्री पद तक सीमित कर देना बहुत ही नाइंसाफी होगी और ऐसा लगा जैसे उनकी क्षमताओं को बाँध दिया जाएगा और सरमा ने उनके इस विश्वास को टूटने नहीं दिया और अपने राजनीतिक कौशल को समय के साथ साबित किया है।

पिछले वर्ष में सरमा ने अपने राज्य के लिए बहुत काम किया है। उन्होंने असम के नागरिकों की अपेक्षाओं के बारे में खुलकर बोला है, उनके राज्य को किन किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है और उसके साथ ही उन्होंने समय समय असम राज्य में विकास की संभावनाओं की तरफ भी ध्यान आकर्षित किया है। सरमा ने असम की पहचान और अस्मिता को बनाए रखने के मुद्दों पर जहां एक तरफ मुखरता से आगे कदम बढाए हैं तो वहीं बांग्लादेशियों के अवैध रूप से रहने का खुलकर विरोध किया है। सरमा ने आल इण्डिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के खिलाफ हथियार पैने किए हैं. अभी हाल ही में हिमंत बिसवा सरमा को सबसे महत्वपूर्ण राज्य पश्चिम बंगाल का राज्य प्रभारी बनाया हुआ है। यह एक ऐसा राज्य है जो भाजपा के लिए 2019 के चुनावों के परिद्रश्य में बहुत ही महत्वपूर्ण है और पार्टी अभी यहाँ जीत के लिए तरस रही है। बिस्वा सरमा की राह में केवल एक ही रोड़ा हो सकता है और वह है असम का होने के बावजूद भी बंगाल का प्रभारी होना, चूंकि पार्टी अभी केवल उत्तरी बंगाल पर ही अपना ध्यान केन्द्रित कर रही है, हिमंत यहाँ पर भी एक संस्थागत भूमिका में होंगे जो उन्हें भाजपा की अग्रिम पंक्ति में रखने के लिए पर्याप्त है।

48 वर्ष के सरमा भाजपा के युवा सितारे हैं। पार्टी के पास इस समय ऐसे बहुत नेता है जो 60 से कम आयु के हैं और वे राज्य और केंद्र मंत्रालय का सफलतापूर्वक नेतृत्व कर रहे हैं, ऐसी श्रेणी के लिए बिसवा एक स्वाभाविक पसंद हैं। वह भी महत्वाकांक्षी हैं और वे एक राज्य में ही उनकी उड़ान को सीमित नहीं किया जा सकता है। लगता तो यही है कि मोदी और शाह भी उनकी क्षमता को पहचान चुके हैं और वे ये जान चुके हैं कि यदि उन्हें दिल्ली में काफी लम्बे समय तक शासन करना है तो ऐसे में सरमा को भी राष्ट्रीय राजनीति से अधिक दूर नहीं रखा जा सकता है और वे एक प्रमुख चेहरों में से एक होंगे। शायद वे सबसे बड़े उभरते क्षेत्रीय सितारे हैं। यदि भाजपा असम में बढ़िया करना जारी रखती है तो बिसवा को जल्द ही केंद्र में भी देखा जा सकता है।

हिमंत बिसवा सरमा का कोंग्रेस से निकलना कोंग्रेस की उस सडांध को प्रदर्शित करता है, जिसमें योग्यता और चापलूसी के बीच चापलूसी ही शीर्ष नेतृत्व को पसंद है और वे हर क्षेत्रीय राजनेता को अपने लिए एक खतरा मानते हैं। भाजपा के लिए तो अंधा क्या चाहे दो आँखें जैसा ही हुआ जब सरमा को कोंग्रेस से इस कदर अपमानित किया गया। इसी गलती का अहसास करते हुए इन्डियन एक्सप्रेस को दिए गए आपके एक साक्षात्कर में दिग्विजय सिंह ने भी कहा था कि, ““हिमंत बिसवा सरमा एक शानदार व्यक्ति हैं। मैंने उन्हें सात बरस तक कोंग्रेस के प्रभारी के रूप में काम करते हुए देखा है। वह शानदार राजनीतिक व्यक्ति है और भाषण देने में तथा राजनैतिक जोड़-तोड़ में भी निपुण हैं। वाकई में उन्हें हमें नहीं जाने देना चाहिए था।” राहुल गांधी ने भाजपा को पूर्वोत्तर का सितारा खुद ही अपने हाथों से दे दिया है, और इसके लिए भाजपा को राहुल का शुक्रगुजार होना चाहिए

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