GM सरसों और अनिल माधव दवे की रहस्यमयी मृत्यु

Written by रविवार, 19 नवम्बर 2017 07:27

इसी वर्ष 18 मई 2017 को भारत के तत्कालीन पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे जी का स्वर्गवास हुआ था. अनिल माधव दवे (Anil Madhav Dave) की कर्मभूमि मध्यप्रदेश रही है.

उनका जन्म उज्जैन से कुछ दूरी पर स्थित बड़नगर में और शिक्षा इंदौर में हुई थी. उनकी इस “अचानक मृत्यु” के छः माह बाद, कॉलेज के जमाने से उनके मित्र रहे इंदौर के ही तपन भट्टाचार्य ने उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका अर्जी दाखिल करके स्वर्गीय अनिल माधव दवे की मृत्यु की न्यायिक जाँच करने की माँग कर दी है. तपन भट्टाचार्य का कहना है कि उन्हें पहले दिन से ही शक था कि श्री दवे की मृत्यु स्वाभाविक नहीं है, बल्कि रहस्यमयी है, लेकिन पिछले छः माह से इस मामले में मैं उनके परिवार के किसी सदस्य के आगे बढ़ने का इंतज़ार कर रहा था. जब मुझे ऐसा कुछ होता नहीं दिखा, तो मैंने यह जनहित याचिका दायर की है.

अपने सनसनीखेज़ आरोप में तपन भट्टाचार्य ने दावा किया है कि स्वर्गीय अनिल दवे जी की मृत्यु के समय की संदिग्ध घटनाओं और GM (Genetically Modified) सरसों के बीज को अनुमति देने संबंधी बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों के दबाव को देखते हुए उनकी मृत्यु संदेहास्पद है. मैं कॉलेज के जमाने से उनका मित्र हूँ और वे कई बातें मुझसे शेयर किया करते थे. पर्यावरण और नदियों-खेत को लेकर उनकी चिंताएं और सरोकार सभी जानते हैं. नर्मदा नदी को लेकर उनके कार्य सराहनीय रहे हैं. पिछले दो वर्षों से उन्होंने भारतीय पर्यावरण और कृषि को खतरा समझी जाने वाली सरसों की GM (GM Mustard Hybrid) बीजों को रोक रखा था, अनुमति नहीं दी थी. इस हेतु उन पर काफी दबाव भी था.

तपन भट्टाचार्य की जनहित याचिका के अनुसार अनिल माधव दवे एक संतुलित जीवन जीते थे, अपने काम में व्यस्त रहते थे. उनकी मृत्यु के अगले दिन (अर्थात 19 मई 2017 को) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ GM सरसों बीज को लेकर एक महत्त्वपूर्ण बैठक होने वाली थी, लेकिन 18 मई की सुबह साढ़े सात बजे जब उनके स्टाफ ने उन्हें जगाने का प्रयास किया, तो बेचैन दिखाई दिए और कोई उत्तर नहीं दे सके. स्वर्गीय अनिल माधव दवे को सुबह नौ बजे AIIMS ले जाया गया और 9.45 पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया. भट्टाचार्य ने सवाल उठाया है कि जब वे सुबह 7.30 से ही बेचैन और अर्ध-बेहोशी में थे, तो उन्हें तत्काल केवल दो सौ मीटर दूरी पर स्थित राम मनोहर लोहिया अस्पताल क्यों नहीं ले जाया गया? भट्टाचार्य कहते हैं कि उनके सूत्रों के मुताबिक़ दवे के शरीर पर नीले रंग के धब्बे मौजूद थे. अधिकारियों ने उनका पोस्टमार्टम भी नहीं करवाया. ऐसी संदिग्ध परिस्थितियों में चाहे कोई वीआईपी हो या सामान्य व्यक्ति पुलिस को पोस्टमार्टम करवाना होता है. जबकि इस मामले में पुलिस ने दवे जी के घरवालों को भी सूचित नहीं किया. याचिका में आगे कहा गया है कि दंड विधान की धारा 174 के अनुसार जो भी सुरक्षा अधिकारी या पुलिस उनके बंगले पर मौजूद थी, उन्हें तत्काल मजिस्ट्रेट को बुलाना चाहिए था, ताकि पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी करके इस “अचानक मृत्यु” के कारणों का पता लगाया जाता. केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री होने के कारण GM सरसों के बीजों की अनुमति देने के लिए कई दिग्गज कम्पनियाँ और मीडिया का एक धड़ा उन पर लगातार दबाव बनाए हुए थे.

आरोप है कि दो मल्टीनेशनल कंपनियों ने आपस में हाथ मिला लिया था, क्योंकि पिछले दो वर्ष से उन सरसों के बीजों को अनुमति देने या खारिज करने संबंधी फाईल उनकी टेबल पर ही पड़ी थी, क्योंकि अनिल माधव दवे इन GM-17 Hybrid सरसों बीज के खतरों और पर्यावरण के बारे में पूरी तरह संतुष्ट हो जाना चाहते थे. तपन भट्टाचार्य का आरोप है कि जिस ताबड़तोड़ तरीके से उनका दाह संस्कार किया गया, वह भी संदेह पैदा करने वाला था. याचिका में उन्होंने कुछ तस्वीरें और दस्तावेजी सबूत भी लगाए हैं तथा माननीय न्यायालय से कहा है कि 18 मई 2017 का AIIMS का पूरा रिकॉर्ड सील किया जाए, AIIMS के निदेशक एवं गृह मंत्रालय के प्रमुख सचिव से जवाबतलब करके एक उच्च स्तरीय समिति गठित की जाए, तथा न्यायालयीन निगरानी में ही मामले की पूरी जाँच की जावे. उनका कहना है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने फायदे के लिए किसी भी स्तर तक गिर सकती हैं.

 

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अब संक्षेप में यह भी जान लीजिए कि आखिर GM सरसों है क्या? जेनेटिकली मोडिफाईड बीज (इसे सरल भाषा में समझना हो तो प्रयोगशाला में तैयार किया गया बीज) प्राकृतिक बीज नहीं होता है. इस बीज का उपयोग केवल एक बार ही किया जा सकता है, यानी आपने फसल ले ली और ख़त्म. अगली फसल के लिए आपको फिर से उस कम्पनी का बीज खरीदना पड़ेगा जिसके पास इस GM बीज के उत्पादन का पेटेंट और लाईसेंस है. यह सारा खेल कुख्यात डंकल प्रस्तावों और WTO (World Trade Organization) के अंतर्गत चल रहा है, जिस पर विश्व के लगभग सभी देशों ने हस्ताक्षर किए हैं. इसमें अक्सर विकासशील देशों की बाँह मरोड़कर, उन्हें लालच देकर, अथवा अधिकारियों-नेताओं-वैज्ञानिकों को रास्ते से हटाकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए मार्ग प्रशस्त किया जाता है. GM बीजों के बारे में आज तक विश्व में एक राय नहीं बन पाई है, वैज्ञानिक, पर्यावरणविद और चिकित्सक आपस में बंटे हुए हैं कि इन बीजों से धरती की उर्वर क्षमता तथा मनुष्य के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है या नहीं. इसीलिए लगातार प्रयोग चलते रहते हैं. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार भारत जैसे शानदार जैव विविधता वाले तथा परम्परागत किसानी एवं बीजों के अगले पीढ़ी को ट्रांसफर करने की पद्धति के कारण यहाँ GM बीजों की जरूरत नहीं है.

पर्यावरण मंत्रालय की समिति जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (GEAC) ने 11 मई 2017 को ही GM सरसों के DMH-11 (धारा सरसों हाइब्रिड) नंबर वाले बीज को अपनी हरी झंडी दिखाई थी, लेकिन अंतिम अडंगा थे पर्यावरण मंत्री स्वर्गीय अनिल माधव दवे जो “संयोग” से सात दिनों बाद मृत्यु को प्राप्त हुए. GM बीजों के खिलाफ विभिन्न आन्दोलन चलाने वाले कार्यकर्ता बताते हैं कि इन बीजों का ट्रायल गुपचुप तरीके से किया जा रहा है, लेकिन इसकी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की जाती. एक तरफ तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दावा है कि DMH-1 और DMH-4 श्रेणी के सरसों बीजों से जबरदस्त उत्पादन होता है (यह बीज कनाडा और अमेरिका में बेचा जाता है), लेकिन यही कम्पनियाँ भारत में सरसों का DMH-11 वाला बीज बेचना चाहती हैं, जिसका उत्पादन उन्हीं के दावों के मुताबिक़ कम है, ऐसा क्यों? इसका कोई जवाब नहीं है. आज की तारीख में कम से कम 100 ऐसे GM खाद्य बीज हैं जो भारत में घुसने की ताक में बैठे हैं, लेकिन उसके लिए सबसे पहले GM सरसों का बीज की अनुमति मिलना जरूरी है. उल्लेखनीय है कि मामला संदिग्ध होने के कारण ही सर्वोच्च न्यायालय ने आठ अक्टूबर 2016 के अपने निर्णय में कहा है कि GM सरसों के DMH-11 का पूरा परीक्षण होने के बाद ही अक्टूबर 2017 के बाद पुनः सुनवाई होगी, तब तक इन बीजों पर रोक जारी रहेगी. अक्टूबर 2016 से अक्टूबर 2017 के बीच में पर्यावरण मंत्रालय की समिति ने इन बीजों को हरी झंडी भी दिखा दी और जिस व्यक्ति को इस पर अंतिम निर्णय लेना था वह रहस्यमयी तरीके से स्वर्गवासी हो गया.... अब हाल ही में अक्टूबर 2017 निकला है, नवम्बर लग गया है. आप GM सरसों के बीजों संबंधी ख़बरों पर निगाह बनाए रखिये, उधर तपन भट्टाचार्य ने केन्द्रीय मंत्री दवे की मृत्यु की जाँच की अर्जी लगा ही दी है. 

कहने का तात्पर्य यह है कि सारा खेल करोड़ों-अरबों रूपए का है, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भीषण और वीभत्स मुनाफे का है... भारत के पर्यावरण और हमारे स्वास्थ्य का है... किसानों से उनके बीज छीनकर उन्हें बाजार के हवाले करने का है.... बहुत सी चीज़ें दाँव पर लगी हैं. स्वर्गीय अनिल माधव दवे को श्रद्धांजलि, देखते हैं अब GM बीजों के मामले में आगे क्या होता है. 

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पर्यावरण से सम्बंधित कुछ लिंक्स इस प्रकार हैं... 

उड़ीसा में बहुराष्ट्रीय ही नहीं भारतीय कम्पनियाँ भी खनिज सम्पदा लूटने में लगी हैं :- http://desicnn.com/blog/orissa-mining-scam-aditya-birla-and-vedanta 

रेड्डी बंधुओं का वीभत्स खनन भ्रष्टाचार... :- http://desicnn.com/blog/reddy-brothers-karnataka-mining-scam 

सरस्वती नदी को पुनर्जीवित करना जरूरी क्यों है :- http://desicnn.com/news/ancient-indian-river-saraswati-should-be-revived-for-haryana-rajasthan-next-generation 

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