गिरनार शिखर भगवान दत्तात्रेय मंदिर : अदभुत हिन्दू तीर्थ

Written by बुधवार, 11 अप्रैल 2018 08:08

आमतौर पर देखा जाए तो भगवान दत्तात्रेय हिन्दू जनमानस में उतने अधिक जाने-पहचाने हुए भगवान नहीं हैं, जितने भगवान राम-कृष्ण या शंकरजी अथवा हनुमान. इसीलिए बहुत से लोगों को भगवान दत्तात्रेय के बारे में अधिक जानकारी भी नहीं है, और दत्त तीर्थस्थलों के बारे में भी उतना प्रचार-प्रसार दिखाई नहीं देता, जैसा कि वैष्णो देवी या कामाख्या मंदिर का होता है.

भगवान दत्तात्रेय, ब्रह्मा-विष्णु-महेश का संयुक्त रूप हैं, और इन्हें “आदिगुरू” के रूप में जाना जाता है. दक्षिण-पश्चिम भारत में दत्तात्रेय को पूजने वालों की संख्या करोड़ों में है और कर्नाटक-महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित गाणगापुर नामक गाँव में भगवान दत्तात्रेय की चरण पादुकाएँ स्थापित हैं, वहाँ श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है. इसी प्रकार गुजरात में जूनागढ़ के पास स्थित गिरनार (Girnar Gujrat) पर्वत श्रृंखला की सबसे ऊंची चोटी पर भी दत्तात्रेय (Dattatreya temple on Girnar) की चरण पादुकाएँ स्थित हैं, जिनके दर्शनों के लिए प्रतिवर्ष लाखों भक्त कठिन चढ़ाई पूरी करके पहुँचते हैं... तो मित्रों आईये जानें गिरनार शिखर स्थित इस कम प्रचारित हिन्दू तीर्थ के बारे में....

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गुजरात के सौराष्ट्र स्थित जूनागढ़ से कुछ ही किमी दूर है गिरनार पर्वतमाला. इसी पर्वतमाला की एक चोटी पर भगवान दत्तात्रेय ने कठोर तपस्या की थी, और आज भी उनकी चरण पादुकाएँ वहाँ स्थापित हैं. गिरनार को “सिद्धक्षेत्र” कहा जाता है. ऐसा कोई भी क्षेत्र, जहाँ किसी आध्यात्मिक शक्तिशाली सिद्धपुरुष ने चार तप किए हों, उसे सिद्धक्षेत्र कहते हैं. गिरनार की ऊँची चोटी पर स्थित दत्तात्रेय की चरण पादुकाओं के दर्शन प्राप्त करने के लिए श्रद्धालुओं को दस हजार सीढ़ियों की कठिन चढ़ाई करनी पड़ती है. ज़ाहिर है कि इस चढ़ाई के लिए कठोर परिश्रम, अपार श्रद्धा और लगन चाहिए होगी, लेकिन अक्सर देखा गया है कि कई वृद्धजन भी “अवधूत चिंतन श्री गुरुदेवदत्त” तथा दिगंबरा, दिगंबरा श्रीपादश्रीवल्लभ दिगंबरा” का उदघोष करते हुए आराम से इतनी कठिन यात्रा पूरी कर ही लेते हैं.

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गिरनार पर्वत श्रृंखला की सबसे बड़ी खासियत ये है कि दत्तात्रेय भगवान के चरणों तक पहुँचने से पहले जैन पंथ के सुन्दर मंदिर भी मिलते हैं, अम्बाजी का मंदिर भी है और नाथ सम्प्रदाय के गुरु गोरखनाथ का पवित्र स्थान भी यहाँ स्थित है. गिरनार पर्वत की सबसे ऊंची चोटी 1000 मीटर से भी ऊंची है. यह पूरी पर्वतमाला सत्तर मील के क्षेत्रफल में फ़ैली हुई है, जबकि भगवान दत्तात्रेय के मंदिर वाली पहाड़ी का परिक्रमा व्यास लगभग चालीस किमी का है. जैन धर्मावलम्बियों के साथ अन्य हिन्दू धर्मावलम्बी गिरनार दर्शन हेतु लालायित रहते हैं. अत्रि ऋषि एवं सती अनुसूया के पुत्र दत्तात्रेय हैं. दोनों पति-पत्नी ने लगातार 24 वर्ष तक कठोर तपस्या की, जिससे भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने गिरनार पर्वत श्रृंखला को आशीर्वाद देते हुए कहा, कि यह पर्वतमाला देवताओं एवं ऋषियों का निवास स्थान होगी.

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भगवान दत्तात्रेय चरण पादुकाओं के दर्शन की श्रद्धापूर्ण लेकिन कठिन यात्रा आरम्भ होती है, दामोदर कुण्ड से. दामोदर कुण्ड से पवित्र जल लेकर एवं बलदेवजी के मंदिर से “बल” प्राप्त करके भक्तगण यात्रा शुरू करते हैं. इस यात्रा पहला पड़ाव आता है, 4500 सीढ़ियाँ चढने के बाद जहाँ श्वेताम्बर और दिगंबर जैन सम्प्रदायों के सुन्दर, कलात्मक और शांत मंदिर स्थित हैं. यहाँ जैन मुनियों एवं तीर्थंकरों के दर्शन करने के बाद भक्तगण 1000 सीढ़ियाँ और चढ़ते हैं तो उन्हें मिलता है अम्बाजी मंदिर. यह देवी माता का मंदिर है और गुप्त साम्राज्य के समय निर्मित किया गया था. नवविवाहित जोड़े इस अम्बाजी के मंदिर में अपने सफल वैवाहिक जीवन हेतु आशीर्वाद प्राप्त करने अवश्य आते हैं.

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अम्बाजी मंदिर से दक्षिण दिशा में चलने पर एक और पर्वत चोटी आती है, जिसे गुरु गोरखनाथ पर्वत कहा जाता है. यहाँ पर नाथ सम्प्रदाय के गोरखनाथ जी की “धूनी” स्थित है, जो अखंड स्वरूप में जलती रहती है. मजे की बात यह है कि अम्बाजी मंदिर से दूसरी दिशा में पहले 1500 सीढ़ियाँ उतरनी पड़ती हैं और 600 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं, तब श्रद्धालु गुरु गोरखनाथ के मंदिर में पहुँचते हैं. गुरु गोरखनाथ के दर्शन करने के बाद पुनः श्रद्धालु अपनी दिशा बदलते हुए लेकिन चढ़ाई जारी रखते हुए “कमण्डल कुण्ड” पहुँचते हैं. कमण्डल कुण्ड वह स्थान है जहाँ भगवान दत्तात्रेय ने इस पर्वत की चोटी पर पहुँचने से पहले अपनी धूनी रमाई थी. पूरी यात्रा में केवल यही एक स्थान है, जहाँ “अन्नदान” किया जाता है, अर्थात कुछ खाने को मिल सकता है. गिरनार जी की आधी चढ़ाई होने के बाद श्रद्धालुओं को यह अन्नदान प्रसाद एक तरह से अमृत जैसा ही लगता है और वे दोगुने जोश से अपने अंतिम पड़ाव की ओर चल पड़ते हैं. कमण्डल कुण्ड पर जो अखंड धूनी जलती रहती है, उसे केवल सोमवार को ही दर्शनों के लिए खोला जाता है. पवित्र भस्म का वितरण किया जाता है, श्रद्धालु केवल दूर से उस पवित्र धूनी के दर्शन कर सकते हैं. इसके बाद पुनः एक सप्ताह के लिए इस धूनी का दर्शन बंद कर दिया जाता है, हालाँकि प्रतिदिन शाम को यहाँ दत्तात्रेय भगवान् की आरती जरूर होती है.

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कमण्डल कुण्ड के बाद चढ़ाई और भी कठिन हो जाती है तथा श्रद्धालु अपनी भक्ति, अपनी श्रद्धा के बल पर ही आगे बढ़ते-बढ़ते, दत्तात्रेय भगवान की चरण पादुकाओं के पास पहुँचते हैं. चोटी पर बना हुआ यह मंदिर बहुत ही छोटा है तथा वहाँ अधिक संख्या में भक्तों के खड़े होने का स्थान भी नहीं है. इसलिए चरण कमलों के दर्शनों के तत्काल बाद कुछ ही मिनटों में श्रद्धालु को वापस मुड़ना पड़ता है. घने जंगलों से आच्छादित इस पूरे मार्ग में भक्तों को नागा साधुओं के दर्शन होते रहते हैं, जो यत्र-तत्र अपनी धूनी रमाए हुए रहते हैं.

इसके अलावा गुजरात राज्य में गिरनार पर्वत श्रृंखला के चारों तरफ की जाने वाली “परिक्रमा”, जिसे लिली परिक्रमा कहा जाता है, वह बड़े पैमाने पर की जाती है. श्रद्धालुओं का ऐसा मानना है कि इस पर्वतमाला में तैंतीस कोटि देवताओं का वास है, इसलिए चालीस किमी लम्बी इस परिक्रमा को पूर्ण करने से मोक्ष प्राप्ति होगी. यह परिक्रमा गिरनार पर्वत के सबसे निचले स्थान पर स्थित भवनाथ मंदिर से शुरू होकर वापस यहीं समाप्त होती है. कार्तिक माह की एकादशी से यह परिक्रमा आरम्भ जी जाती है. गत वर्ष इस परिक्रमा में दस लाख से अधिक श्रद्धालु शामिल हुए थे.

आदिगुरू दत्तात्रेय भगवान के इस पवित्र तीर्थस्थान पर पहुँचने के लिए जूनागढ़ से टैक्सियाँ मिलती हैं. जूनागढ़, अहमदाबाद से 325 किमी दूर है, जबकि राजकोट से 100 किमी दूर है. गुजरात के सभी प्रमुख स्थानों से जूनागढ़ के लिए उत्तम बसें भी उपलब्ध हैं. गिरनार पर्वत की ऊँचाई पर ठहरने और भोजन की कोई व्यवस्था नहीं है. चढ़ाई शुरू करने से पहले ही भक्तों के लिए धर्मशालाएँ बनी हुई हैं जो काफी अच्छी हैं. इसी कारण श्रद्धालुओं को दत्तात्रेय भगवान् की चरण पादुकाओं के दर्शन हेतु अपनी यात्रा सुबह चार बजे आरम्भ कर देनी चाहिए, ताकि वे उसी दिन देर शाम तक वापस नीचे उतर सकें, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि पहाड़ों पर स्थित जंगलों में घातक जानवर बड़ी संख्या में हैं, इसलिए यात्रा दिन के उजाले में ही पूरी हो जाए तो अच्छा. पर्वतमाला की यात्रा अर्थात दस हजार सीढ़ियों की चढ़ाई बहुत कठिन है, इसलिए संभव हो तो अपने साथ पानी के पाउच, बिस्कुट, नींबू, जैसे सामान अवश्य रखें.

सुबह नौ बजते-बजते ही आर्द्रता बढ़ने लगती है, इसलिए सुबह चार से नौ के बीच तेज गति से चढ़ाई कर सकते हैं, उसके बाद नहीं. ठण्ड के दिनों अर्थात अक्टूबर-नवम्बर में यह यात्रा करना अधिक सुखदाई होता है, क्योंकि मानसून के दौरान प्राचीन सीढ़ियों पर फिसलने का खतरा भी होता है. अच्छे मजबूत रबर सोल वाले जूते एवं सहारे के एक लाठी अवश्य साथ में रखें. कमण्डल कुण्ड पर प्रसाद अवश्य ग्रहण करें, यह दिव्य प्रसाद आप में शक्ति का संचार करेगा. इसलिए अब सोचिये मत... निकल पड़िए... “दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा” का उदघोष करते हुए आप निश्चित रूप से यह कठिन यात्रा पूरी कर लेंगे, और भगवान दत्तात्रेय का परम आशीर्वाद प्राप्त करेंगे. 

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